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Sudarshana Chakra
Adhyay 2, Shlok 38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। — VaniSagar

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TeluguIND

సుఖదుఃఖాలు, లాభనష్టాలు, గెలుపు ఓటములను సమానంగా చేసి, యుద్ధం కోసం యుద్ధంలో పాల్గొనండి; అందువలన, మీరు పాపం చేయకూడదు.

MarathiIND

सुख-दुःख, लाभ-हानी, जय-पराजय यांना समान करून, युद्धासाठी युद्धात गुंतणे; त्यामुळे तुम्हाला पाप लागणार नाही.

GujaratiIND

આનંદ અને દુઃખ, લાભ અને હાર, જીત અને હારને સમાન બનાવીને, યુદ્ધ ખાતર યુદ્ધમાં જોડાઓ; આમ, તમે પાપ ભોગવશો નહીં.

SindhiIND

لذت ۽ درد، نفعو نقصان، فتح ۽ شڪست کي برابر ڪري، لڙائيءَ لاءِ لڙائي ۾ مشغول ٿي وڃڻ. ان ڪري، توهان کي گناهه نه ٿيندو.

BengaliIND

আনন্দ-বেদনা, লাভ-ক্ষতি, জয়-পরাজয়কে সমান করে নিয়ে, যুদ্ধের উদ্দেশ্যে যুদ্ধে লিপ্ত হও; সুতরাং, আপনি পাপ বহন করবেন না.

TamilIND

இன்பமும் துன்பமும், ஆதாயமும், நஷ்டமும், வெற்றியும் தோல்வியும் சமமாக்கி, போருக்காகப் போரில் ஈடுபடுங்கள்; இதனால், நீங்கள் பாவம் செய்ய மாட்டீர்கள்.

KannadaIND

ಸಂತೋಷ ಮತ್ತು ನೋವು, ಲಾಭ ಮತ್ತು ನಷ್ಟ, ಗೆಲುವು ಮತ್ತು ಸೋಲುಗಳನ್ನು ಸಮಾನವಾಗಿ ಮಾಡಿದ ನಂತರ, ಯುದ್ಧದ ಸಲುವಾಗಿ ಯುದ್ಧದಲ್ಲಿ ತೊಡಗುತ್ತಾರೆ; ಹೀಗಾಗಿ, ನೀವು ಪಾಪಕ್ಕೆ ಒಳಗಾಗುವುದಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਸੁੱਖ-ਦੁੱਖ, ਲਾਭ-ਹਾਨੀ, ਜਿੱਤ-ਹਾਰ ਨੂੰ ਬਰਾਬਰ ਬਣਾ ਕੇ, ਜੰਗ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ ਜੰਗ ਵਿੱਚ ਜੁਟ ਜਾਣਾ; ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ, ਤੁਹਾਨੂੰ ਪਾਪ ਨਹੀਂ ਲੱਗੇਗਾ।

NepaliIND

सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीत-हारलाई बराबर बनाएर युद्धको लागि युद्धमा लाग। यसरी, तिमीले पाप भोग्नु पर्दैन।

MalayalamIND

സുഖവും വേദനയും, നേട്ടവും നഷ്ടവും, ജയവും പരാജയവും തുല്യമാക്കി, യുദ്ധത്തിനായി യുദ്ധത്തിൽ ഏർപ്പെടുക; അതിനാൽ നിങ്ങൾ പാപം ചെയ്യരുത്.

MizoIND

Nawmna leh hrehawmna, hlawkna leh hlohna, hnehna leh hnehna chu inang tlanga siamin, indona atan indo rawh; chutiang chuan, sual in tuar lo vang.

ManipuriIND

ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯋꯥꯕꯥ, ꯀꯥꯟꯅꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯥꯡꯖꯕꯥ, ꯃꯥꯏꯄꯥꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯥꯏꯊꯤꯕꯥ ꯑꯁꯤ ꯃꯥꯟꯅꯕꯥ ꯄꯨꯔꯛꯇꯨꯅꯥ ꯂꯥꯅꯒꯤꯗꯃꯛ ꯂꯥꯅꯐꯃꯗꯥ ꯁꯔꯨꯛ ꯌꯥꯕꯤꯌꯨ; ꯑꯁꯨꯝꯅꯥ, ꯅꯈꯣꯌꯅꯥ ꯄꯥꯞ ꯇꯧꯔꯣꯏꯗꯕꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

2.38।। व्याख्या-- [अर्जुनको यह आशंका थी कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे हमारेको पाप लग जायगा, पर भगवान् यहाँ कहते हैं कि पापका हेतु युद्ध नहीं है, प्रत्युत अपनी कामना है। अतः कामनाका त्याग करके तू युद्धके लिये खड़ा हो जा।] 'सुखदुःखे समे ৷৷. ततो युद्धाय युज्यस्व'-- युद्धमें सबसे पहले जय और पराजय होती है, जय-पराजयका परिणाम होता है--लाभ और हानि तथा लाभ-हानिका परिणाम होता है सुख और दुःख। जयपराजयमें और लाभ-हानिमें सुखी-दुःखी होना तेरा उद्देश्य नहीं है। तेरा उद्देश्य तो इन तीनोंमें सम होकर अपने कर्तव्यका पालन करना है। युद्धमें जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःख तो होंगे ही। अतः तू पहलेसे यह विचार कर ले कि मुझे तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है, जय-पराजय आदिसे कुछ भी मतलब नहीं रखना है। फिर युद्ध करनेसे पाप नहीं लगेगा अर्थात् संसारका बन्धन नहीं होगा। सकाम और निष्काम--दोनों ही भावोंसे अपने कर्तव्य-कर्मका पालन करना आवश्यक है। जिसका सकाम भाव है, उसको तो कर्तव्यकर्मके करनेमें आलस्य, प्रमाद बिलकुल नहीं करने चाहिये, प्रत्युत तत्परतासे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। जिसका निष्काम भाव है, जो अपना कल्याण चाहता है, उसको भी तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। सुख आता हुआ अच्छा लगता है और जाता हुआ बुरा लगता हौ तथा दुःख आता हुआ बुरा लगता है और जाता हुआ अच्छा लगता है। अतः इनमें कौन अच्छा है, कौन बुरा? अर्थात् दोनोंही समान हैं, बराबर हैं। इस प्रकार सुख-दुःखमें समबुद्धि रखते हुए तुझे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। तेरी किसी भी कर्ममें सुखके लोभसे प्रवृत्ति न हो और दुःखके भयसे निवृत्ति न हो। कर्मोंमें तेरी प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्रके अनुसार हो ही (गीता 16। 24)। 'नैवं पापमवाप्स्यसि'-- यहाँ 'पाप' शब्द पाप और पुण्य--दोनोंका वाचक है, जिसका फल है--स्वर्ग और नरककी प्राप्तिरूप बन्धन, जिससे मनुष्य अपने कल्याणसे वञ्चित रह जाता है और बार-बार जन्मता-मरता रहता है। भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! समतामें स्थित होकर युद्धरूपी कर्तव्य-कर्म करनेसे तुझे पाप और पुण्य --दोनों ही नहीं बाँधेंगे। प्रकरण सम्बन्धी विशेष बात भगवान्ने इकतीसवें श्लोकसे अड़तीसवें श्लोकतकके आठ श्लोकोंमें कई विचित्र भाव प्रकट किये हैं; जैसे-- (1) किसीको व्याख्यान देना हो और किसी विषयको समझाना हो तो भगवान् इन आठ श्लोकोंमें उसकी कला बताते हैं। जैसे, कर्तव्य-कर्म करना और अकर्तव्य न करना--ऐसे विधि-निषेधका व्याख्यान देना हो तो उसमें पहले विधिका, बीचमें निषेधका और अन्तमें फिर विधिका वर्णन करके व्याख्यान समाप्त करना चाहिये। भगवान्ने भी यहाँ पहले इकतीसवें-बत्तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन किया, फिर बीचमें तैंतीसवेंसे छत्तीसवेंतकके चार श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म न करनेसे हानिका वर्णन किया और अन्तमें सैंतीसवें-अड़तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्य-कर्म करनेसे लाभका वर्णन करके कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा दी। (2) पहले अध्यायमें अर्जुनने अपनी दृष्टिसे जो दलीलें दी थीं, उनका भगवान्ने इन आठ श्लोकोंमें समाधान किया है; जैसे अर्जुन कहते हैं-- मैं युद्ध करनेमें कल्याण नहीं देखता हूँ (1। 31), तो भगवान् कहते हैं--क्षत्रियके लिये धर्ममय युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणका साधन नहीं है (2। 31)। अर्जुन कहते हैं--युद्ध करके हम सुखी कैसे होंगे? (1। 37) तो भगवान् कहते हैं--जिन क्षत्रियोंको ऐसा युद्ध मिल जाता है वे ही क्षत्रिय सुखी है (2। 32)। अर्जुन कहते हैं--युद्धके परिणाममें नरककी प्राप्ति होगी (1। 44) तो भगवान् कहते हैं--युद्ध करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होगी (2। 32 37)। अर्जुन कहते हैं--युद्ध करनेसे पाप लगेगा (1। 36) तो भगवान् कहते हैं--युद्ध न करनेसे पाप लगेगा (2। 33)। अर्जुन कहते हैं--युद्ध करनेसे परिणाममें धर्मका नाश होगा (1। 40) तो भगवान् कहते हैं--युद्ध न करनसे धर्मका नाश होगा (2। 33)। (3) अर्जुनका यह आग्रह था कि युद्धरूपी घोर कर्मको छोड़कर भिक्षासे निर्वाह करना मेरे लिये श्रेयस्कर है (2। 5), तो उनको भगवान्ने युद्ध करनेकी आज्ञा दी (2। 38); और उद्धवजीके मनमें भगवान्के साथ रहनेकी इच्छा थी तो उनको भगवान्ने उत्तराखण्डमें जाकर तप करनेकी आज्ञा दी (श्रीमद्भा0 11। 29। 41)। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अपने मनका आग्रह छोड़े बिना कल्याण नहीं होता। वह आग्रह चाहे किसी रीतिका हो, पर वह उद्धार नहीं होने देता।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

युद्ध स्वधर्म है यह मानकर युद्ध करनेवालेके लिये यह उपदेश है सुन सुखदुःखको समान तुल्य समझकर अर्थात् ( उनमें ) रागद्वेष न करके तथा लाभहानिको और जयपराजयको समान समझकर उसके बाद तू युद्धके लिये चेष्टा कर इस तरह युद्ध करता हुआ तू पापको प्राप्त नहीं होगा। यह प्रासङ्गिक उपदेश है। स्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यादि श्लोकोंद्वारा शोक और मोहको दूर करनेके लिये लौकिक न्याय बतलाया गया है परंतु पारमार्थिक दृष्टिसे यह बात नहीं है। यहाँ प्रकरण परमार्थदर्शनका है जो कि पहले ( श्लोक 30 ) तक कहा गया है। अब शास्त्रके विषयका विभाग दिखलानेके लिये एषा तेऽभिहिता इस श्लोकद्वारा उस ( परमार्थदर्शन ) का उपसंहार करते हैं।

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Sri Anandgiri

पापभीरुतया युद्धाय निश्चयं कृत्वा नोत्थातुं शक्नोमीत्याशङ्क्याह तत्रेति। युद्धस्य स्वधर्मतया कर्तव्यत्वे सतीति यावत्। सुहृज्जीवनमरणादिनिमित्तयोः सुखदुःखयोः समताकरणं कथमिति तत्राह रागद्वेषाविति। लाभः शत्रुकोषादिप्राप्तिलाभस्तद्विपर्ययः न्याय्येन युद्धेनापरिभूतेन परस्य परिभवो जयस्तद्विपर्यस्त्वजयस्तयोर्लाभालाभयोर्जयाजययोश्च समताकरणं समानमेव रागद्वेषावकृत्वेत्येतद्दर्शयितुं तथेत्युक्तम् यथोक्तोपदेशवशात्परमार्थदर्शनप्रकरणे युद्धकर्तव्यतोक्तेः समुच्चयपरत्वं शास्त्रस्य प्राप्तमित्याशङ्क्याह एष इति। क्षत्रियस्य तव शर्मभूतयुद्धकर्तव्यतानुवादप्रसङ्गागतत्वादस्योपदेशस्य नानेन मिषेण समुच्चयः सिध्यतीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

ननु गुर्वादिवधार्थं प्रवृत्तस्य पापावाप्त्या कुतः स्वर्गप्राप्तिः जित्वा वा कुतो भोगसुखं निन्दया व्याप्तवात्तेषामित्याशङ्क्य निष्कामस्य समदृष्टेः स्वधर्मबुद्य्धा प्रवृत्तस्य ते पापादिप्राप्तिर्नास्तीत्याशयेनाह सुखेति। सुखदुःखे समे कृत्वा सुखे रागं दुःखे द्वेषं चाकृत्वा तथा तत्साधनीभूतौ लाभालाभौ तत्साधनीभूतौ जयाजयौ च समौ कृत्वा ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि। तथाचाग्नीषोमीयहिंसाविधायकवचनवद्युद्धहिंसाविधायकमपि धर्मशास्त्रविशेषवचनंन हिंस्यात्सर्वा भूतानि इत्यस्य सामान्यशास्त्रस्य बाधकमतः पापावाप्तेरभावाद्युद्धप्रवृत्तौ सर्वथापि लाभ एवेति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sukhahappiness
duḥkhein distress
same kṛitvātreating alike
lābhaalābhau
jayaajayau
tataḥthereafter
yuddhāyafor fighting
yujyasvaengage
nanever
evamthus
pāpamsin
avāpsyasishall incur
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 2.37
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः

अगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 2.39
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु। बुद्ध्यायुक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि

हे पार्थ! यह समबुद्धि तेरे लिए पहले सांख्ययोगमें कही गयी, अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन; जिस समबुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनका त्याग कर देगा। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 2Shlok 38
Bhagavad Gita · Adhyay 2, Shlok 38
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि

जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 38 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 38 का हिंदी अर्थ: "जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 38?

Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 38 translates to: "Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat equal, engage in battle for the sake of battle; thus, you shall not incur sin. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 38 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau" mean in English?

"sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 38. Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat equal, engage in battle for the sake of battle; thus, you shall not incur sin. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.