
“कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है; और इसको सुनकर भी कोई नहीं जानता। अर्थात यह शरीरी दुर्विज्ञेय है। — VaniSagar”
Global Translations
Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.
ఒకరు దీనిని (సెల్ఫ్) ఒక అద్భుతంగా చూస్తారు; మరొకరు దానిని ఒక అద్భుతంగా మాట్లాడుతున్నారు; మరొకరు దానిని అద్భుతంగా వింటారు; ఇంకా, విన్నాను, ఎవరికీ అర్థం కాలేదు.
याला (स्वतःला) एक आश्चर्य वाटते; दुसरा एक आश्चर्य म्हणून बोलतो; दुसऱ्याने ते आश्चर्य म्हणून ऐकले; तरीही, ऐकून, कोणालाही ते समजले नाही.
વ્યક્તિ આ (સ્વ)ને અજાયબી તરીકે જુએ છે; અન્ય એક અજાયબી તરીકે તે બોલે છે; અન્ય એક અજાયબી તરીકે તે સાંભળે છે; તેમ છતાં, સાંભળ્યા પછી, કોઈ તેને બિલકુલ સમજતું નથી.
কেউ এটাকে (আত্ম) বিস্ময় হিসেবে দেখে; অন্য একজন বিস্ময় হিসাবে এটি কথা বলে; অন্য একটি বিস্ময় হিসাবে এটি শুনতে; তবুও, শুনেও কেউ বুঝতে পারে না।
ஒருவர் இதை (சுயத்தை) ஒரு அதிசயமாகப் பார்க்கிறார்; இன்னொருவர் அதை ஒரு அதிசயமாகப் பேசுகிறார்; இன்னொருவர் அதை ஒரு அதிசயமாகக் கேட்கிறார்; இன்னும், கேள்விப்பட்டும், யாருக்கும் புரியவில்லை.
ഒരാൾ ഇതിനെ (സ്വയം) ഒരു അത്ഭുതമായി കാണുന്നു; മറ്റൊരാൾ അതിനെ ഒരു അത്ഭുതമായി പറയുന്നു; മറ്റൊരാൾ അതിനെ അത്ഭുതമായി കേൾക്കുന്നു; എന്നിട്ടും, കേട്ടിട്ടും ആർക്കും അത് മനസ്സിലാകുന്നില്ല.
इस (आत्मा) गी इक आश्चर्य दे रूप च दिक्खदा ऐ; दूजा इस गी आश्चर्य दे रूप च बोलदा ऐ; दूजा इस गल्ल गी आश्चर्य दे रूप च सुनदा ऐ; फिरी बी सुनियै कोई बी इसगी बिल्कुल नेई समझदा।
एकरा (आत्मा) के एगो आश्चर्य के रूप में देखल जाला; एगो अउरी एकरा के अचरज के रूप में बोलत बा; दोसरका एकरा के अचरज के रूप में सुनत बा; तबो सुन के केहू एकरा के बिल्कुल ना समझ पावेला।
ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯃꯁꯤ (ꯃꯁꯥ) ꯑꯁꯤ ꯑꯉꯀꯄꯥ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯎꯏ; ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯃꯁꯤꯕꯨ ꯑꯉꯀꯄꯥ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯉꯥꯡꯏ; ꯑꯇꯣꯞꯄꯥ ꯑꯃꯅꯥ ꯃꯁꯤ ꯑꯉꯀꯄꯥ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯇꯥꯔꯤ; ꯑꯗꯨꯕꯨ ꯇꯥꯕꯗꯥ ꯀꯅꯥꯒꯨꯝꯕꯥ ꯑꯃꯠꯇꯅꯥ ꯃꯁꯤ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯅꯥ ꯈꯉꯕꯥ ꯉꯃꯗꯦ꯫
कसैले यो (आत्म) लाई आश्चर्यको रूपमा देख्छ; अर्कोले यसलाई अचम्मको रूपमा बोल्छ; अर्काले यसलाई अचम्मको रूपमा सुन्छ; तर, सुनेर, कसैले बुझेन।
ਮਨੁੱਖ ਇਸ (ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ) ਅਚਰਜ ਸਮਝਦਾ ਹੈ; ਇੱਕ ਹੋਰ ਇਸ ਨੂੰ ਇੱਕ ਹੈਰਾਨੀ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਬੋਲਦਾ ਹੈ; ਇੱਕ ਹੋਰ ਹੈਰਾਨੀ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਇਸ ਬਾਰੇ ਸੁਣਦਾ ਹੈ; ਫਿਰ ਵੀ, ਸੁਣ ਕੇ, ਕੋਈ ਇਸ ਨੂੰ ਬਿਲਕੁਲ ਨਹੀਂ ਸਮਝਦਾ।
اُن (پاڻ) کي ڪو عجب سمجھي ٿو. ٻيو ان جي باري ۾ هڪ تعجب جي طور تي ڳالهائيندو آهي؛ ٻيو ان جي باري ۾ هڪ تعجب جي طور تي ٻڌي؛ اڃان تائين، ٻڌڻ کان پوء، ڪو به ان کي سمجهي نه سگهيو.
Sacred Commentaries
Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.
Swami Ramsukhdas
2.29।। व्याख्या-- 'आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्'-- इस देहीको कोई आश्चर्यकी तरह जानता है। तात्पर्य यह है कि जैसे दूसरी चीजें देखने सुनने पढ़ने और जाननेमें आती हैं वैसे इस देहीका जानना नहीं होता। कारण कि दूसरी वस्तुएँ इदंतासे ( यह करके) जानते हैं अर्थात् वे जाननेका विषय होती हैं पर यह देही इन्द्रिय मनबुद्धिका विषय नहीं है। इसको तो स्वयंसे अपनेआपसे ही जाना जाता है। अपनेआपसे जो जानना होता है वह जानना लौकिक ज्ञानकी तरह नहीं होता प्रत्युत बहुत विलक्षण होता है। 'पश्यति' पदके दो अर्थ होते हैं नेत्रोंसे देखना और स्वयंके द्वारा स्वयंको जानना। यहाँ 'पश्यति' पद स्वयंके द्वारा स्वयंको जाननेके विषयमें आया है (गीता 2। 55 6। 20 आदि)। जहाँ नेत्र आदि करणोंसे देखना (जानना) होता है वहाँ द्रष्टा (देखनेवाला) दृश्य (दीखनेवाली वस्तु) और दर्शन (देखनेकी शक्ति) यह त्रिपुटी होती है। इस त्रिपुटीसे ही सांसारिक देखनाजानना होता है। परन्तु स्वयंके ज्ञानमें यह त्रिपुटी नहीं होती है अर्थात् स्वयंका ज्ञान करणसापेक्ष नहीं है। स्वयंका ज्ञान तो स्वयंके द्वारा ही होता है अर्थात् वह ज्ञान करणनिरपेक्ष है। जैसे मैं हूँ ऐसा जो अपने होनेपन ज्ञान है इसमें किसी प्रमाणकी या किसी करणकी आवश्यकता नहीं है। इस अपने होनेपनको इदंता से अर्थात् दृश्यरूपसे नहीं देख सकते। इसका ज्ञान अपनेआपको ही होता है। यह ज्ञान इन्द्रियजन्य या बुद्धिजन्य नहीं है। इसलिये स्वयंको (अपनेआपको) जानना आश्चर्यकी तरह होता है। जैसे अँधेरे कमरेमें हम किसी चीजको लाने जाते हैं तो हमारे साथ प्रकाश भी चाहिये और नेत्र भी चाहिये अर्थात् उस अँधेरे कमरेमें प्रकाशकी सहायतासे हम उस चीजको नेत्रोंसे देखेंगे तब उसको लायेंगे। परन्तु कहीं दीपक जल रहा है और हम उस दीपकको देखने जायँगे तो उस दीपकको देखनेके लिये हमें दूसरे दीपककी आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि दीपक स्वयंप्रकाश है। वह अपनेआपको स्वयं ही प्रकाशित करता है। ऐसे ही अपने स्वरूपको देखनेके लिये किसी दूसरे प्रकाशकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह देही (स्वरूप) स्वयंप्रकाश है। अतः यह अपनेआपसे ही अपनेआपको जानता है। स्थूल सूक्ष्म और कारण ये तीन शरीर हैं। अन्नजलसे बना हुआ स्थूलशरीर है। यह स्थूलशरीर इन्द्रियोंका विषय है। इस स्थूलशरीरके भीतर पाँच ज्ञानेन्द्रियों पाँच कर्मेन्द्रियाँ पाँच प्राण मन और बुद्धि इन सत्रह तत्त्वोंसे बना हुआ सूक्ष्मशरीर है। यह सूक्ष्मशरीर इन्द्रियोंका विषय नहीं है प्रत्युत बुद्धिका विषय हैं। जो बुद्धिका भी विषय नहीं है जिसमें प्रकृति स्वभाव रहता है वह कारणशरीर है। इन तीनों शरीरोंपर विचार किया जाय तो यह स्थूलशरीर मेरा स्वरूप नहीं है क्योंकि यह प्रतिक्षण बदलता है और जाननेमें आता है। सूक्ष्मशरीर भी बदलता है और जाननेमें आता है अतः यह भी मेरा स्वरूप नहीं है। कारणशरीर प्रकृतिस्वरूप है पर देही (स्वरूप) प्रकृतिसे भी अतीत है अतः कारणशरीर भी मेरा स्वरूप नहीं है। यह देही जब प्रकृतिको छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है तब यह अपनेआपसे अपनेआपको जान लेता है। यह जानना सांसारिक वस्तुओंको जाननेकी अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता है इसलिये इसको 'आश्चर्यवत् पश्यति' कहा गया है। यहाँ भगवान्ने कहा है कि अपनेआपका अनुभव करनेवाला कोई एक ही होता है 'कश्चित्' और आगे सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भी यही बात कही है कि कोई एक मनुष्य ही मेरेको तत्त्वसे जानता है 'कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः'। इन पदोंसे ऐसा मालूम होता है कि इस अविनाशी तत्त्वको जानना बड़ा कठिन है दुर्लभ है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। इस तत्त्वको जानना कठिन नहीं है दुर्लभ नहीं है प्रत्युत इस तत्त्वको सच्चे हृदयसे जाननेवालेकी इस तरफ लगनेवालेकी कमी है। यह कमी जाननेकी जिज्ञासा कम होनेके कारण ही है। 'आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः'-- ऐसे ही दूसरा पुरुष इस देहीका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है क्योंकि यह तत्त्व वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी भी प्रकाशित होती है वह वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है जो महापुरुष इस तत्त्वका वर्णन करता है वह तो शाखाचन्द्रन्यायकी तरह वाणीसे इसका केवल संकेत ही करता है जिससे सुननेवालेका इधर लक्ष्य हो जाय। अतः इसका वर्णन आश्चर्यकी तरह ही होता है। यहाँ जो 'अन्यः' पद आया है उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो जाननेवाला है उससे यह कहनेवाला अन्य है क्योंकि जो स्वयं जानेगा ही नहीं वह वर्णन क्या करेगा अतः इस पदका तात्पर्य यह है कि जितने जाननेवाले हैं उनमें वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। कारण कि सबकेसब अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष उस तत्त्वका विवेचन करके सुननेवालेको उस तत्त्वतक नहीं पहुँचा सकते। उसकी शंकाओंका तर्कोंका पूरी तरह समाधान करनेकी क्षमता नहीं रखते। अतः वर्णन करनेवालेकी विलक्षण क्षमताका द्योतन करनेके लिये ही यह अन्यः पद दिया गया है। 'आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति'-- दूसरा कोई इस देहीको आश्चर्यकी तरह सुनता है। तात्पर्य है कि सुननेवाला शास्त्रोंकी लोकलोकान्तरोंकी जितनी बातें सुनता आया है उन सब बातोंसे इस देहीकी बात विलक्षण मालूम देती है। कारण कि दूसरा जो कुछ सुना है वह सबकासब इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिका विषय है परन्तु यह देही इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है प्रत्युत यह इन्द्रियों आदिके विषयको प्रकाशित करता है। अतः इस देहीकी विलक्षण बात वह आश्चर्यकी तरह सुनता है। यहाँ 'अन्यः' पद देनेका तात्पर्य है कि जाननेवाला और कहनेवाला इन दोनोंसे सुननेवाला (तत्त्वका जिज्ञासु) अलग है। 'श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्'-- इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसने सुन लिया तो अब वह जानेगा ही नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि केवल सुन करके (सुननेमात्रसे) इसको कोई भी नहीं जान सकता। सुननेके बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा तब वह अपनेआपसे ही अपनेआपको जानेगा । यहाँ कोई कहे कि शास्त्रोँ और गुरुजनोंसे सुनकर ज्ञान तो होता ही है फिर यहाँ सुन करके भी कोई नहीं जानता ऐसा कैसे कहा गया है इस विषयपर थोड़ी गम्भीरतासे विचार करके देखें कि शास्त्रोंपर श्रद्धा स्वयं शास्त्र नहीं कराते और गुरुजनोंपर श्रद्धा स्वयं गुरुजन नहीं कराते किन्तु साधक स्वयं ही शास्त्र और गुरुपर श्रद्धाविश्वास करता है स्वयं ही उनके सम्मुख होता है। अगर स्वयंके सम्मुख हुए बिना ही ज्ञान हो जाता तो आजतक भगवान्के बहुत अवतार हुए हैं बड़ेबड़े जीवन्मुक्त महापुरुष हुए हैं उनके सामने कोई अज्ञानी रहना ही नहीं चाहिये था। अर्थात् सबको तत्त्वज्ञान हो जाना चाहिये था पर ऐसा देखनेमें नहीं आता। श्रद्धाविश्वासपूर्वक सुननेसे स्वरूपमें स्थित होनेमें सहायता तो जरूर मिलती है पर स्वरूपमें स्थित स्वयं ही होता है। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य तत्त्वज्ञानको असम्भव बतानेमें नहीं प्रत्युत उसे करणनिरपेक्ष बतानेमें है। मनुष्य किसी भी रीतिसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे पर अन्तमें अपनेआपसे ही अपनेआपको जानेगा। श्रवण मनन आदि साधन तत्त्वके ज्ञानमें परम्परागत साधन माने जा सकते हैं पर वास्तविक बोध करणनिरपेक्ष (अपनेआपसे) ही होता है। अपनेआपसे अपनेआपको जानना क्या होता है एक होता है करना एक होता है देखना और एक होता है जानना। करनेमें कर्मेन्द्रियोंकी देखनेमें ज्ञानेन्द्रियोंकी और जाननेमें स्वयंकी मुख्यता होती है। ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा जानना नहीं होता प्रत्युत देखना होता है जो कि व्यवहारमें उपयोगी है। स्वयंके द्वारा जो जानना होता है वह दो तरहका होता है एक तो शरीरसंसारके साथ मेरी सदा भिन्नता है और दूसरा परमात्माके साथ मेरी सदा अभिन्नता है। दूसरे शब्दोंमें परिवर्तनशील नाशवान् पदार्थोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है और अपरिवर्तनशील अविनाशी परमात्माके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध है। ऐसा जाननेके बाद फिर स्वतः अनुभव होता है। उस अनुभवका वाणीसे वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तो बुद्धि भी चुप हो जाती है। सम्बन्ध -- अबतक देह और देहीका जो प्रकरण चल रहा था उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
जिसका प्रकरण चल रहा है यह आत्मतत्त्व दुर्विज्ञेय है। सर्वसाधारणको भ्रान्ति करा देनेवाले विषयमें केवल एक तुझे ही क्या उलाहना दूँ यह आत्मा दुर्विज्ञेय कैसे है सो कहते हैं पहले जो नहीं देखा गया हो अकस्माद् दृष्टिगोचर हुआ हो ऐसे अद्भुत पदार्थका नाम आश्चर्य है उसके सदृशका नाम आश्चर्यवत् है इस आत्माको कोई ( महापुरुष ) ही आश्चर्यमय वस्तुकी भाँति देखता है। वैसे ही दूसरा ( कोई एक ) इसको आश्चर्यवत् कहता है अन्य ( कोई ) इसको आश्चर्यवत् सुनता है एवं कोई इस आत्माको सुनकर देखकर और कहकर भी नहीं जानता। अथवा जो इस आत्माको देखता है वह आश्चर्यके तुल्य है जो कहता है और जो सुनता है वह भी ( आश्चर्यके तुल्य है )। अभिप्राय यह कि अनेक सहस्रोंमेंसे कोई एक ही ऐसा होता है। इसलिये आत्मा बड़ा दुर्बोध है।
Sri Anandgiri
अर्जुनं प्रत्युपालम्भं दर्शयित्वा प्रकृतस्यात्मनो दुर्विज्ञेयत्वात्तं प्रत्युपालम्भो न संभवतीति मन्वानः सन्नाह दुर्विज्ञेय इति। तथाचात्माज्ञाननिमित्तविप्रलम्भस्य साधारणत्वादसाधारणोपलम्भस्य निरवकाशतेत्याह किं त्वामेवेति। अहंप्रत्ययवेद्यत्वादात्मनो दुर्विज्ञेयत्वमसिद्धमिति शङ्कते कथमिति। विशिष्टस्यात्मनोऽहंप्रत्ययस्य दृष्टत्वेऽपि केवलस्य तदभावादस्ति दुर्विज्ञेयतेति श्लोकमवतारयति आहेति। आश्चर्यवदित्याद्येन पादेनात्मविषयदर्शनस्य दुर्लभत्वं दर्शयता द्रष्टुर्दौर्लभ्यमुच्यते द्वितीयेन च तद्विषयवेदनस्य दुर्लभत्वोक्तेस्तदुपदेष्टुस्तथात्वं कथ्यते तृतीयेन तदीयश्रवणस्य दुर्लभत्वद्वारा श्रोतुर्विरलता विवक्षिता श्रवणदर्शनोक्तीनां भावेऽपि तद्विषयसाक्षात्कारस्यात्यन्तायासलभ्यत्वं चतुर्थेनाभिप्रेतमिति विभागः। आत्मगोचरदर्शनादिदुर्लभत्वद्वारा दुर्बोधत्वमात्मनः साधयति आश्चर्यवदिति। संप्रत्यात्मनि दृष्टुर्वक्तुः श्रोतुः साक्षात्कर्तुश्च दुर्लभत्वाभिधानेन तदीयं दुर्बोधत्वं कथयति अथवेति। व्याख्यानद्वयेऽपि फलितमाह अत इति।
Sri Dhanpati
शुद्धात्मनो दुर्विज्ञेयत्वाद्रभान्तेश्च सर्वसाधारणत्वान्न त्वां प्रत्येवोपालम्भो युक्त इत्याह आश्चर्यवदिति। आश्चर्यमद्भुतभदृष्टपूर्वमकस्मादृष्यमानं तेन तुल्यमाश्चर्यवत्। कश्चिदेनमात्मानमाश्चर्यवत्पश्यति। तथैव चान्य एनमाश्चर्यवद्वदति। अन्यश्चैनमाश्चर्यवच्छ्रणोति। श्रुत्वोक्त्वा दृष्ट्वाप्येनं कश्चित्प्रतिबन्धवशान्न वेद साक्षान्न जानाति।ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् इति व्याससूत्रात् फलोन्मुखं विद्याविरुद्धफलत्वं कर्म प्रस्तुतं तेन प्रतिबन्धः प्रस्तुतप्रतिबन्ध तदभावेऐहिकभस्मिन्नेव जन्मनि विद्या जायते सति तु तस्मिञ्जन्मान्तरेऽपि सा जायते कुतः तद्दर्शनात् प्रतिबन्धतदभावभ्यामुभयविधविद्याजन्मनः श्रुतौ दर्शनात्गर्भस्थ एव वामदेवः प्रतिपेदे ब्रह्मभावम् इति वदन्ती श्रुतिः सति प्रतिबन्धे जन्मान्तरसंचितसाधनाज्जन्मान्तरे विद्योत्पत्तिं दर्शयतीति तदर्थः। यद्वा योऽयमात्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्य एवमग्रेऽपि यो वदति यश्च श्रृणोति सोऽनेकशतसहस्त्रेषु कश्चिदेव यश्चोक्त्वा श्रुत्वा पश्यति परोक्षज्ञानवान् भवति स ततोऽपि दुर्लभः यस्तु साक्षात्करोति स तु ततोऽपि दर्लभ इत्याह श्रुत्वापीति। अतो दुर्बोध आत्मेत्यभिप्रायः। तथाच प्रथमपक्षे प्रथमपादेनात्मविषयकपरोक्षदर्शनस्य तथैव द्वितीयेन वदनस्य तृतीयने श्रवणस्य चच दुर्लभत्वं चतुर्थेन साक्षात्कारस्य चात्यन्तदौर्लभ्यं च दर्शयता द्रष्टुर्वक्तुः श्रोतुः साक्षात्कर्तुर्विरलतोच्यते। तद्द्वारा चात्मनो दुर्विज्ञेयत्वं कथ्यते। द्वितीयपक्षे त्वात्मनि चतुर्णां दुर्लभत्वकथनेन तदीयं दुर्बोधत्वमुच्यत इति विवेकः। इत्थं च श्रुत्यैकार्थत्वमस्याः स्मृतेः सभ्यगुपपद्यते। तथाच श्रुतिःश्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति। विवृता चेयं भगवत्पादैः प्रायेण ह्येवंविधएव लोकः यस्तु श्रेयोर्थी सोऽनेकशतसहस्त्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधः यस्मादित्याह। श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुमपि यो न लभ्यः आत्मा बहुभिरनेकैः शृणवन्तो बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विन्दन्ति अभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः। किंचास्य वक्ताप्याश्चर्योऽश्रुतव देवानेकेषु कश्चिदेव भवति। तथा श्रुत्वाप्यस्यात्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति। तस्मादाश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेनाचार्येणानुशिष्टः सन्नित्यर्थ इति। तथाच श्रवणायापीत्यादेरर्थः आश्चर्यवत्कश्चिदेनं श्रृणोतीति श्रृण्वन्तोऽपीत्यादेः श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चिदिति आश्चर्यो वक्तेत्यस्य आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य इति कुशलोऽस्येत्यादेराश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमिति आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्ट इत्येतत्तु कुशल इत्यादेर्व्याख्यानं तस्मादित्यादिभाष्यात्। यद्वा लब्धा परोक्षज्ञानवान् ज्ञाता साक्षात्कर्ता। आश्चर्यवत्पश्यतीत्यत्रापि द्विविधं दर्शनं वक्ष्यते श्रुत्येकवाक्यतार्थम्। अस्मिन्पक्षेपरोक्षेणापरोक्षेण वाऽस्य दर्शनं द्रष्टावात्यन्तदुर्लभः परोक्षेणास्य दर्शनं द्रष्टा वा कुतो दुर्लभ इत्यत आह आश्चर्यवद्वदती त्यादि। तोऽस्य कथनं वक्ता वा श्रवणं श्रोता वा दुर्लभोऽत इत्यर्थः। अपरोक्षेणास्य दर्शनस्य द्रष्टुर्वात्यन्तदौर्लभ्ये हेतुमाह श्रुत्वापीति। श्रुत्वा उक्त्वा परोक्षेण दृष्ट्वाप्येनं कश्चिदभागी असंस्कृतात्मा लोको नचैव जानातीति। अतः साक्षादस्य दर्शनं द्रष्टा वात्यन्तदुर्लभ इत्यर्थः। एतेन यदि श्रुत्वाप्येनं न चैव कश्चिदित्येवं व्याख्यायेत तदाआश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति श्रुत्येकवाक्यता न स्यात्।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः इति भगवद्वचनविरोधश्चेति प्रत्युक्तम्। य आत्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्यो यो वदति यश्च शृणोति सोऽनेकसहस्त्रेषु कश्चिदेवेति भाष्यात्स्मृतिविरोधानवकाशाच्च। अत्र केचिद्वर्णयन्ति। एनं प्रकृतं देहिनं आश्चर्येणाद्भुतेन तुल्यतया वर्तमानं आविद्यकनानाविरुद्धधर्मवत्तया सन्तमप्यसन्तमिव स्वप्रकाशचैतन्यरुपमपि जडमिवानन्दरुपमपि दुःखितमिवेत्याद्यसंभावितविचित्रानेकाकारप्रतीतिविषयं पश्यति शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामाविद्यकसर्वद्वैतनिषेधेन परमात्मस्वरुपाकारायां वेदान्तमहावाक्यजन्यायां सर्वसुकृतफलभूतायामन्तःकरणवृत्तौ प्रतिफलितं समाधिपरिपाकेन साक्षात्करोति। कश्चिच्छमदमादिसाधनसंपन्नचरमशरीरः कश्चिदेव मर्त्यो नतु सर्वः। तथा कश्चिदेनं यत्पश्यति तदाश्चर्यवदिति क्रियाविशेषणम्। आविद्यकमपि दर्शनमविद्यां स्वात्मानं च निवर्तयतीति। तथा यः कश्चिदेनं पश्यति स आश्चर्यवदिति कर्तृविशेषणम्। यत एकएव विद्वान् समाधिव्युत्थानयोः परस्परविरुद्धमात्मनो ब्रह्मभावं जीवभावं च यावत्प्रारबधकर्मक्षयमनुभवतीति तदेतत्र्यमप्याश्चर्यमात्मा तज्ज्ञानं ज्ञाता चेति। एवमग्रेऽपि कर्मणि क्रियायां कर्तरि चाश्चर्यवदिति योज्यम्। सर्वशब्दावाच्यस्य शुद्धस्यात्मनो यद्वदनं तदाश्चर्यवत् श्रुत्वाप्येनं वेद श्रुत्वाचैनं मनननिदिध्यासनपरिपाकाद्वेदापि साक्षात्करोत्यपि आश्चर्यवत्। तथा चाश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमित्यत्र व्याख्यातम्। ननु यः श्रवणादिकं करोति स आत्मानं वेदेति किमाश्चर्यमत आह नचैव कश्चिदिति। चकारः क्रियाकर्मपदयोरनुषङ्गार्थः। कश्चिदेनं नैव वेद श्रवणादिकं कुर्वन्नपि तदकुर्वन्न वेदेति किमु वक्तव्यम्। अथवा नचैव कश्चिदित्यस्य सर्वत्र संबन्धः। कश्चिदेनं न पश्यति न वदति न श्रृणोति श्रुत्वापि न वेदेति पञ्च प्रकारा उक्ताः। कश्चित्पश्यत्येव न वदति कश्चित्पश्यति वदति च कश्चित्तद्वचनं श्रृणोति तदर्थ जानाति च कश्चित् श्रुत्वापि न जानाति कश्चित्तु सर्वबहिर्भूत इति तत्रेदमवधेयम्। आश्चर्यमद्भुतभदृष्टमकस्माद्दृश्यमानं तेन तुल्यमाश्चर्यवत् यो वदति यश्च श्रृणोति स सहस्त्रेषु कश्चिदेवेत्यादिवदद्भिराचार्यैः कर्तृक्रिययोराश्चर्यवत्त्वं दुर्लभत्वं प्रदर्शितम्।श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यते इति श्रुत्यनुरोधात् आत्मनस्तु कर्तृक्रियाविरलत्वद्वारैव दुर्ज्ञेयत्वं नतु साक्षात् आश्चर्यवत्पदविशेष्यत्वेन श्रुतौ तथात्वासंभवात्तदेकवाक्यतानापत्तेः। तस्मादाश्चर्यवत्पदस्य विरुद्धधर्माश्चर्यपरत्वं कर्मविशेषणत्वं चावदतामाचार्याणां न्यूनता न शङ्कनीया। यदपि वेदेत्यस्य पृथक्करणादि तदपि क्लेशमात्रं तद्विनापि श्रुत्येकवाक्यतायां निरुपितत्वात् यदपि नचैव कश्चिदित्यस्य सर्वत्र संबन्ध इत्यादि तदपि न आश्चर्यवदित्याद्युक्त्या बहव एनं न पश्यन्ति इत्यादेरर्थस्य स्पष्टप्रतीतेः क्लिष्टकल्पनया पक्षान्तरप्रदर्शनस्य वैयर्थ्यात् कश्चिदेनं पश्यतीत्यादिनोपपादिते सर्वबहिर्भूते श्रुत्वापि न वेदेत्यस्योक्तत्वेन चतुर्थप्रकारानर्थक्याच्चेति दिक्। एतेन कश्चिदेनमात्मानं शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां पश्यन्नाश्चर्यवत्पश्यति सर्वगतस्य नित्यज्ञानानन्दस्वभावस्यात्मनोऽलौकिकत्वादैन्द्रजालिकवदघटमानं पश्यन्निव विस्मयेन पश्यति असंभावनाभिभूतत्वादित्यादिभाष्यकृद्भि कुतो न व्याख्यातमिति प्रत्युक्तम्। अत्रापि मूलश्रुत्येकवाक्यत्वाभावापत्तेस्तुल्यत्वात्। अन्ये तु वज्रपञ्जरतुल्यस्य सर्वप्रमाणसिद्धस्य वियदादिप्रपञ्चस्य कथं रज्जूरगादिवदज्ञानप्रभवत्वेनात्यन्ततुच्छत्वमुच्यते कथंवा कर्मज्ञानकाण्डापेक्षितमात्मनो यज्ञादिकर्तृत्वं चापह्नूयत इत्याशङ्क्याह आश्चर्यवदिति। कश्चिज्ज्ञातात्मतत्त्व एनं अतीतानन्तरश्लोकोक्तं भूतग्राममाश्चर्यं अद्भुतं स्वप्नमायेन्द्रजालादिकं तेन तुल्यमाश्चर्यवत्तथाभूतं पश्यति। तथा कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति सत्त्वेनासत्त्वेन वा निर्वक्तुमशक्यमप्यनिर्वचनीयत्वेनैव लोकाप्रसिद्धेन रुपेणोपपादयति। तथा एनं प्रपञ्चमन्य आश्चर्यबच्छृणोति।इमे लोका इमे देवा इमे वेदा इद्ँसर्वं यदयमात्मा इति। प्रत्यक्षेणानात्मतयोपलभ्यमानस्यापि प्रपञ्चस्य यत्प्रत्यगभिन्नत्वेन श्रवणं तदत्यन्तमाश्चर्यम्। तथा कश्चिदेनं प्रपञ्चं प्रत्यगनन्यत्वेन श्रुत्वापिशब्दादुक्त्वा दृष्ट्वापि तत्त्वतो न वेदेति वर्णयन्ति तदपि सर्वमुपेक्ष्यम्।देही नित्यम् इति श्लोकस्थभूतानीत्यनुरोधेनातीतानन्तरश्लोकस्थभूतानीत्यस्य कार्यकरणसंघातपरत्वेन व्याख्यातत्वात् प्रपञ्चस्यानुक्तेरेनदादेशानुपपत्तेः एनमित्यनेन बह्वभ्यस्तस्यात्मनस्त्यागेन प्रकरणविरोधात् बह्वध्याहारग्रस्तत्वादुपलभ्यमानमूलभूतश्रुतिविरोधात् एतद्य्वाख्यातृभिरप्यरुच्या यद्वेत्यादिपक्षान्तरस्वीकाराच्च पक्षान्तरं च केषांचिद्य्वाख्यानमनूदितमिति निर्मत्सरैर्विद्वद्भिराकलनीयम्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| āśhcharya | vat |
| paśhyati | see |
| kaśhchit | someone |
| enam | this soul |
| āśhcharya | vat |
| vadati | speak of |
| tathā | thus |
| eva | indeed |
| cha | and |
| anyaḥ | other |
| āśhcharya | vat |
| cha | also |
| enam | this soul |
| anyaḥ | others |
| śhṛiṇoti | hear |
| śhrutvā | having heard |
| api | even |
| enam | this soul |
| veda | understand |
| na | not |
| cha | and |
| eva | even |
| kaśhchit | some |
Related Shloks
हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं। अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है? — VaniSagar
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। — VaniSagar
Sacred Wallpapers & Shareable Cards
Download high-fidelity pre-rendered visual cards and wallpapers optimized with proofed Sanskrit ligatures and zero-loss scaling.


“कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है; और इसको सुनकर भी कोई नहीं जानता। अर्थात यह शरीरी दुर्विज्ञेय है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 2 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है; और इसको सुनकर भी कोई नहीं जानता। अर्थात यह शरीरी दुर्विज्ञेय है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sankhya Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29?
Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29 translates to: "One sees this (the Self) as a wonder; another speaks of it as a wonder; another hears of it as a wonder; yet, having heard, none understands it at all. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणो" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 2, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Sankhya Yoga में संकलित है। कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है और वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है; और इसको सुनकर भी कोई नहीं जानता। अर्थात यह शरीरी दुर्विज्ञेय है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "āśhcharya-vat paśhyati kaśhchid enan" mean in English?
"āśhcharya-vat paśhyati kaśhchid enan" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29. One sees this (the Self) as a wonder; another speaks of it as a wonder; another hears of it as a wonder; yet, having heard, none understands it at all. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.