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Bhagavad Gita · BG 2.24

Bhagavad Gita 2.24 — Commentary

19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः

achchhedyo ’yam adāhyo ’yam akledyo ’śhoṣhya eva cha nityaḥ sarva-gataḥ sthāṇur achalo ’yaṁ sanātanaḥ

"This Self cannot be cut, burned, wetted, nor dried up; it is eternal, all-pervasive, stable, immovable, and ancient."

Scholar Commentaries (19)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

यस्मात् अन्योन्यनाशहेतुभूतानि एनमात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते अस्यादीनि तस्मात् नित्यः। नित्यत्वात् सर्वगतः। सर्वगतत्वात् स्थाणुः इव स्थिर इत्येतत्। स्थिरत्वात् अचलः अयम् आत्मा। अतः सनातनः चिरंतनः न कारणात्कुतश्चित् निष्पन्नः अभिनव इत्यर्थः।।नैतेषां श्लोकानां पौनरुक्त्यं चोदनीयम् यतः एकेनैव श्लोकेन आत्मनः नित्यत्वमविक्रियत्वं चोक्तम् न जायते म्रियते वा इत्यादिना। तत्र यदेव आत्मविषयं किञ्चिदुच्यते तत् एतस्मात् श्लोकार्थात् न अतिरिच्यते किञ्चिच्छब्दतः पुनरुक्तम् किञ्चिदर्थतः इति। दुबोर्धत्वात् आत्मवस्तुनः पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरूपयति भगवान् वासुदेवः कथं नु नाम संसारिणामसंसारित्वबुद्धिगोचरतामापन्नं सत् अव्यक्तं तत्त्वं संसारनिवृत्तये स्यात् इति।।किञ्च

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

शस्त्राग्न्यम्बुवायवः छेदनदहनक्लेदनशोषणानि आत्मानं प्रति कर्तुं न शक्नुवन्ति। सर्वगतत्वाद् आत्मनः सर्वतत्त्वव्यापकस्वभावतया सर्वेभ्यः तत्त्वेभ्यः सूक्ष्मत्वात् अस्य तैः व्याप्त्यनर्हत्वाद् व्याप्यकर्तव्यत्वात् च छेदनदहनक्लेदनशोषणानाम्। अत आत्मा नित्यः स्थाणुः अचलः अयं सनातनः स्थिरस्वभावः अप्रकम्प्यः पुरातनः च।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

लोकप्रसिद्धमविरुद्धमत्राप्यङ्गीकार्यम्। अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते न बहुतरो लेप आसीदित्युत्कर्षमेव वक्ति। बहुनरकफलो ह्यसौ। तस्य (मे तत्र) न लोम च (ना) मीयते कौ.उ.3।1 इति श्रुत्यन्तराच्च।यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् 15।19 इति तदुक्तेश्च।सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः। विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा। पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा। नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः। इति नारदीये। अन्योत्कर्ष ऐक्यं चतथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् वि.पु.3।4।5 इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम्। तत्र हिनास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति। एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान्साधयाम्यहम्यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः। न त्वत्समोऽस्ति इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तमुत्कर्षं विष्णोर्वक्ति। अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे। तद्ध्यग्न्यादेरपि वेदादावस्ति। त्वमग्न इन्द्रो ऋषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः ऋक्सं.2।5।17।3 विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ऋक्सं.8।4।1।1 इत्यादिषु तद्ग्रन्थविरोधाच्च।तथाहि स्कान्दे शैवे यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः। यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि। यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि। यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोस्तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि। यदन्तरं प्रलयजवारिविप्रुषोर्यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः। स्फुलिङ्गसंवर्त्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः। अनन्तत्वात्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम्। माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदाहरणमीरितम्। तत्समो ह्यधिको वापि नास्ति कश्चित्कदाचन। एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् इत्याह। तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि इत्यादि। पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः इत्यादि। समब्राह्मविरोधाच्च। वेदश्चेतिहासाद्यविरोधेन योज्यःयदि विद्यात् इति वचनात्। अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा तत्रापीष्टसिद्धिः नामवैशेष्यात्। अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम्। तथापि स्वतः प्रामाण्यत्सन्नेवोच्यते अविरोधात्।नच प्रमाणसिद्धस्य अन्यत्रादृष्ट्यापह्नवो युक्तः धर्मवैचित्र्यादर्थानाम्। स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तदावप्यदोषत्वं च साधयेदित्यतिप्रसङ्गः। अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम्।नारायणपरा वेदाः भाग.2।5।15 सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति कठो.1।2।15वासुदेवपरा वेदाः भाग.1।2।28 इति। न चैतद्विरुद्धम् ईश्वरनियमात्। अनादौ च तत्सिद्धम्द्रव्यं कर्म च कालश्च भाग.2।10।12 इत्यादौ। प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन। अतः सिद्धमेतत्। तच्चानन्यापेक्षाचिन्त्यशक्तित्वादेव युक्तम्। अतो न मायामयमेकम्। अचलत्वं त्वप्रहर्षमनानन्दमदुःखमसुखमप्रज्ञमसद्वेत्यादिवत्। क्रियादृष्टेःतपो मे हृदयं साक्षात् ब्रह्मन् तनुर्विद्या क्रियाकृतिः भाग.6।4।46 इत्याद्युक्तम्। अतश्च न मायामयं सर्वम् ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च। तं त्वा भग ऋक्सं.5।4।8।5 इत्यादौ स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम्।विज्ञानशक्तिरहमासमननन्तशक्तेः भाग.3।9।24मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे भाग.6।4।48 पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च श्वे.उ.6।8 इत्यादिवचनात्।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

यह तो स्पष्ट ही है कि जिस वस्तु का नाश प्रकृति की विनाशकारी शक्तियाँ अथवा मानव निर्मित साधनों एवं शस्त्रास्त्रों के द्वारा संभव नहीं है उसे नित्य होना चाहिये।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में आत्मा के अनेक विशेषण बताये गये हैं जो शीघ्रतावश चाहें जहां से उठाकर निष्प्रयोजन ही प्रयोग में नहीं लाये गये हैं। विचारों की एक शृंखला के रूप में प्रत्येक शब्द को चुनकर प्रयोग किया गया है। प्रथम पंक्ति में वर्णित जो अविनाशी तत्व हैं उसको नित्य होना चाहिये। जो नित्य वस्तु है वह निश्चित ही सर्वगत भी होगी।सर्वगत इस छोटे से शब्द का अर्थ व्यापक और तात्पर्य गम्भीर है। कोई भी वस्तु ऐसी शेष नहीं रह सकती जो सर्वगत तत्त्व के द्वारा व्याप्त न हो। नित्य आत्मा सर्वगत है तो उसका कोई आकार विशेष भी नहीं हो सकता क्योंकि आकार केवल परिच्छिन्न वस्तु का होता है जिसकी सीमा के बाहर उससे भिन्न अन्य कोई वस्तु रहती है। जैसे हाथ पैर इत्यादि अवयवों का आकार होता है क्योंकि इनके बाहर आसपास आकाश तत्त्व है। अत अपरिच्छिन्न सर्वगत आत्मा का कोई आकार नहीं है क्योंकि उसको परिच्छिन्न करने वाली कोई अन्य वस्तु है ही नहीं।इस प्रकार नित्य सर्वगत वस्तु का स्थिर और अचल होना स्वाभाविक है। उसमें चलनादि क्रिया संभव नहीं। गति केवल उस वस्तु के लिये है जो किसी काल और देश विशेष में रहती हो तब उसका स्थानान्तरण किया जा सकता है। आत्मा का किसी काल अथवा देश में अभाव नहीं है तो उसमें गति होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मैं अपने स्वयं में ही घूम फिर नहीं सकता।यहाँ स्थिर और अचल दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग व्यर्थ प्रतीत हो रहा है क्योंकि वे कुछ समानार्थी हैं। परन्तु स्थिर शब्द से अभिप्राय नीचे मूल की स्थिरता से है जैसे पेड़ एक जगह स्थिर होते हैं परन्तु उनकी वृद्धि ऊपर की ओर होती है। यहाँ अचल रहकर ऊर्ध्व गति का भी निषेध किया गया है। अनन्तस्वरूप आत्मा स्थिर और अचल है अर्थात् उसमें किसी भी प्रकार की चलन क्रिया नहीं है।प्राचीन पुरातन वस्तु को सनातन कहते हैं। इस सनातन शब्द के दो अर्थ हैं एक वाच्यार्थ (शाब्दिक) और दूसरा है लक्ष्यार्थ। उसका सरल वाच्यार्थ यह है कि आत्मा कोई नई बनी वस्तु नहीं है वह प्राचीन है। लक्ष्यार्थ के अनुसार इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा काल और देश से मर्यादित परिच्छिन्न नहीं है। किसी भी देश में किसी भी काल में कोई भी व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार से पूर्णत्व प्राप्त करता है तो वह साक्षात्कार एक ही होगा भिन्नभिन्न नहीं।आगे भगवान कहते हैं

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

2.24 अच्छेद्यः cannot be cut? अयम् this (Self)? अदाह्यः cannot be burnt? अयम् this? अक्लेद्यः cannot be wetted? अशोष्यः cannot be died? एव also? च and? नित्यः eternal? सर्वगतः allpervading? स्थाणुः stable? अचलः immovable? अयम् this? सनातनः ancient.Commentary The Self is very subtle. It is beyond the reach of speech and mind. It is very difficult to understand this subtle Self. So Lord Krishna explains the nature of the immortal Self in a variety of ways with various illustrations and examples? so that It can be grasped by the people.Sword cannot cut this Self. It is eternal. Because It is eternal? It is allpervading. Because It is allpervading? It is stable like a stature. Because It is stable? It is immovable. It is everlasting. Therefore? It is not produced out of any cause. It is not new. It is ancient.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या-- [शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते यह बात इस श्लोकमें कहते हैं।] 'अच्छेद्योऽयम्'-- शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है। शस्त्रके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक0)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे वाणीसे कट सकता है पर देही सर्वथा अछेद्य है। 'अदाह्योऽयम्'-- यह शरीरी अदाह्य है क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि शाप आदिसे वही जल सकता है जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहनक्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता। 'अक्लेद्यः'-- यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे सुननेमें आता है कि मालकोश रागके गाये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही रागरागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है। 'अशोष्यः'-- यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय यह ऐसी वस्तु नहीं है क्योंकि इसमें शोषणक्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता। 'एव च'-- अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान् 'एव च' पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं। 'नित्यः'-- यह देही नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा ऐसी बात नहीं है किन्तु यह सब कालमें नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है। 'सर्वगतः'-- यह देही सब कालमें ज्योंकात्यों ही रहता है तो यह किसी देशमें रहता होगा इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति वस्तु शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है। 'अचलः'-- यह सर्वगत है तो यह कहीं आताजाता भी होगा इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ इस प्रकार आनेजानेकी क्रिया नहीं है। 'स्थाणुः'-- यह स्थिर स्वभाववाला है कहीं आताजाता नहीं यह बात ठीक है पर इसमें कम्पन तो होता होगा जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है कहीं भी आताजाता नहीं पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है। 'सनातनः'-- यह देही अचल है स्थाणु है यह बात तो ठीक है पर यह कभी पैदा भी होता होगा इसपर कहते हैं कि यह सनातन है अनादि है सदासे है। यह किसी समय नहीं था ऐसा सम्भव ही नहीं है। 'विशेष बात' यह संसार अनित्य है एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता उस देहीकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'नित्यः'पदका तात्पर्य है। देखने सुनने पढ़ने समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'सर्वगतः' पदका तात्पर्य है। संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदि हैं वे सबकेसब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'अचलः' पदका तात्पर्य है। प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित परिवर्तनरहित स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें 'स्थाणुः' पदका तात्पर्य है। मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा उस तत्त्व(देही)की तरफ लक्ष्य करानेमें 'सनातनः' पदका तात्पर्य है। उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीरसंसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीरशरीरीभावका अलगअलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्यनिरन्तर एकरस एकरूप रहता है।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

ऐसा होनेके कारण ( यह आत्मा न कटनेवाला न जलनेवाला न गलनेवाला और न सूखनेवाला है )। आपसमें एक दूसरेका नाश कर देनेवाले पञ्चभूत इस आत्माका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है। इसलिये यह नित्य है। नित्य होनेसे सर्वगत है। सर्वव्यापी होनेसे स्थाणु है अर्थात् स्थाणु ( ठूँठ ) की भाँति स्थिर है। स्थिर होनेसे यह आत्मा अचल है और इसीलिये सनातन है अर्थात् किसी कारणसे नया उत्पन्न नहीं हुआ है। पुराना है। इन श्लोकोंमें पुनरुक्तिके दोषका आरोप नहीं करना चाहिये क्योकि न जायते म्रियते वा इस एक श्लोकके द्वारा ही आत्माकी नित्यता और निर्विकारता तो कही गयी फिर आत्माके विषयमें जो भी कुछ कहा जाय वह इस श्लोकके अर्थसे अतिरिक्त नहीं है। कोई शब्दसे पुनरुक्त है और कोई अर्थसे ( पुनरुक्त है )। परंतु आत्मतत्त्व बड़ा दुर्बोध है सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है इसलिये बारंबार प्रसंग उपस्थित करके दूसरेदूसरे शब्दोंसे भगवान् वासुदेव उसी तत्त्वका निरूपण करते हैं यह सोचकर कि किसी भी तरह वह अव्यक्त तत्त्व इन संसारी पुरुषोंके बुद्धिगोचर होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

पृथिव्यादिभूतप्रयुक्तच्छेदनाद्यर्थक्रियाभावे योग्यताभावं कारणमाह यत इति। पूर्वार्धमुत्तरार्धे हेतुत्वेन योजयति यस्मादिति। नित्यत्वादीनामन्योन्यं हेतुहेतुमद्भावं सूचयति नित्यत्वादित्यादिना। नच नित्यत्वं परमाणुषु व्यभिचारादसाधकं सर्वगतत्वस्येति वाच्यम्। तेषामेवाप्रामाणिकत्वेन व्यभिचारानवतारात्। न च सर्वगतत्वेऽपि विक्रियाशक्तिमत्त्वमात्मनोऽस्तीति युक्तं विभुत्वेनाभिमते नभसि तदनुपलम्भात्। न च विक्रियाशक्तिमत्त्वे स्थैर्यमास्थातुं शक्यं तथाविधस्य मृदादेरस्थिरत्वदर्शनादित्याशयेनाह स्थिरत्वादिति। स्वतो नित्यत्वेऽपि कारणान्नाशसंभवादुत्पत्तिरपि संभावितेति कुतश्चिरंतनत्वमित्याशङ्क्याह न कारणादिति। आत्मनोऽविक्रियत्वस्य न जायते म्रियते वेत्यादिना साधितत्वात्तस्यैव पुनःपुनरभिधाने पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह नैतेषामिति। अनाशङ्कनीयस्य चोद्यस्य प्रसङ्गं दर्शयति यत इति। अतो वेदाविनाशिनमित्यादौ शङ्क्यते पौनरुक्त्यमिति विशेषः। कथं तत्र पौनरुक्त्याशङ्का समुन्मिषति तत्राह तत्रेति। वेदाविनाशिनमित्यादिश्लोकः सप्तम्या परामृश्यते श्लोकशब्देन न जायते म्रियते वेत्यादिरुच्यते। नन्विह श्लोके जन्ममरणाद्यभावोऽभिलक्ष्यते वेदेत्यादौ पुनरपक्षयाद्यभावो विवक्ष्यते तत्र कथमर्थातिरेकाभावमादाय पौनरुक्त्यं चोद्यते तत्राह किञ्चिदिति। कथं तर्हि पौनरुक्त्यं न चोदनीयमिति मन्यसे तत्राह दुर्बोधत्वादिति। पुनःपुनर्विधानभेदेन वस्तु निरूपयतो भगवतोऽभिप्रायमाह कथं न्विति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

फलितमाह अच्छेद्य इति। एवकारस्य सर्वत्र संबन्धः। यस्मादन्योन्यनाशहेतूनि भूतान्यात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते तस्मान्नित्यः परमाणुनित्यत्वे प्रमाणाभावान्न तन्नातिप्रसङ्गः। अतएव सर्वगतः तत एव सर्वगताकाशवत्स्थाणुरिव स्थिर इत्यर्थः। तत एवाचलः अतएवायमात्मा सनातनश्चिरंतनः न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इतीदं भाष्यमुपलक्षणं यथेष्टहेतुहेतुमद्भावस्यापि। तथाचोत्पाद्याप्यविकार्यसंस्कार्यरुपाणां क्रियाफलामा क्रमेण नित्य इत्यादिविशेषचतुष्टयेन निराकरणं हेतुहेतुमद्भावविपर्ययश्च न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इति भाष्यात् तस्योपलक्षणार्थत्वाच्च सिध्यत इति न कोऽपि विरोधः। यत्तु तथाच श्रुतयः आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःवृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तम् इत्याद्याः।यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो योऽप्सु तिष्ठन्नद्य्भोन्तरो यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोन्तरो यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरः इत्याद्याश्च श्रुतयः सर्वगतस्य सर्वान्तर्यामितया तदविषयत्वं दर्शयन्ति। यो हि शस्त्रादौ न तिष्ठति तं शस्त्रादयश्छिन्दन्ति अयंतु शस्त्रादीनां सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन तत्प्रेरकस्तदन्तर्यामी अतः कथमेनं शस्त्रादीनि स्वव्यापारविषयीकुर्युरित्यभिप्राय इति केचिद्वर्णयन्ति। तत्रेदं वक्तव्यम् त्वंपदशोधनप्रकरणे तत्पदवाच्यान्तर्यामिप्रतिपादकश्रुत्युदाहरणमयुक्तम्।गतासूनगतासून इत्युपक्रमःदेहिनोऽस्मिन्अन्तवन्त इमे देहावासांसि जीर्णानि इत्यादिर्मध्यनिर्देशःदेही नित्यम् इत्युपसंहारः इत्येवंरुपतात्पर्यलिङ्गैस्त्वंपदनिरुपणप्रतीतेः स्पष्टत्वात्। आद्यषट्कुं त्वंपदशोधनपरमिति सर्वैः स्वेन च तथैव स्थापितत्वाच्च। अभेदस्तु नियम्यनियामकभावाभावविनिर्मुक्तयोः शुद्धचैतन्ययोर्वास्तवः। औपाधिकस्तु भेद एव। तथाच भाष्यंअविद्याप्रत्युपस्थाषितकार्यकरणोपाधिनिमित्तोऽयं शारीरान्तर्यामिणोर्भेदव्यपदेशो न पारमार्थिकः इति। एवंच येन शुद्धेन शुद्धस्यास्याभेदः स्य नियामकत्वाभावात् नान्तर्यामिश्रुत्युदाहरणं प्रकृत उपयुक्तम्। तथाचौपापाधिकभेदप्रतिपादकनि भगवतो वादरायणस्य सूत्राणिअन्तर्याभ्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात्नच स्मार्तमतद्धर्माभिलापात्शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इतिय इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतान्यन्तरो यमयति इत्युपक्रम्य श्रुयतेयः पृथिव्यां तिष्टन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति इत्यादि। अत्राधिदैवतमधिलोकमधिवेदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयितान्तर्यामीति श्रुयते सोऽधिदैवाद्यभिमानी कश्चिद्देवतात्मा स्यात् प्राप्ताणिमार्यैश्वर्यः कश्चिद्योगी वा स्यात् अर्थान्तरं किंचिद्वा स्यादितिप्राप्ते राद्धान्तः। योऽन्तर्याभ्यधिदैवादिषु श्रुयते स परमात्मैव स्यान्नान्यः। कुतः। तद्धर्मव्यपदेशात्तस्य परमात्मनो धर्माणमस्यां श्रुतौ व्यपदेशात्। नच स्मार्तं प्रधानमन्तर्यामिशब्दप्रतिपाद्यं भवितुमर्हति। कस्मात् अतद्धर्माभिलापाद्रष्टत्वादीनामप्रधानधर्माणां कथनात्। ननु शारीरोऽस्त्वत्वत आह शारीर इति। पूर्वसूत्रान्नेत्यनुर्वर्तते। शारीरश्च नान्तर्यामी स्यात्। हि यस्मादुभयेऽपि काण्वा माध्यन्दिनाश्चान्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदधिष्ठाननत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते यो विज्ञाने तिष्ठन्नति काण्वाः आत्मनि तिष्ठन्निति माध्यन्दिनाः तस्माच्छारीरादन्य आत्मान्तर्यामीति सिद्धम्। यत्तुयो हि शस्त्रादौ तिष्ठति न तं शस्त्रादयश्िछन्दन्ति इति तदपि न शस्त्रादौ स्थितस्यापि लोहादेस्तैश्छेदस्योपलब्धेः। तस्मात्सर्वज्ञैर्भाष्यकारैरुक्तो निरवयवत्वहेतुरेव समीचीन इति दिक्। न जायत इति श्लोकेनोक्तस्याप्यात्मज्ञानस्य दृष्टफलस्य व्रीह्यवहननस्यावृत्तिवद्दृष्टफलत्वाद्दुर्बोधत्वाच्च पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरुप्यते भगवता करुणानिधीना श्रीकृष्णेन कथंचिदपि संसारनिमग्नानां मुमुक्षूणां बुद्धिगोचरतामापन्नं स्पष्टतत्त्वं सत् संसारनिवृत्तये स्यादित्यभिप्रायवता इति न पौनरुक्त्यम्। तथाच भगवतो व्यासस्य सूत्रंआवृत्तिरसकृदुपदेशात् इति। अस्यार्थःआत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यःतमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्णःसोऽन्वेष्टव्यः स विजज्ञासितव्यः इत्यादि श्रुयते तत्र संशयः किं सकृत्प्रत्ययः कर्तव्य आहोस्विदावृत्त्येति। किं तावत्प्राप्तं सकृत्प्रत्ययः स्यात्प्रयाजादिवत् तावता शास्त्रस्य कृतार्थत्वात् अश्रूयमाणायामप्यावृत्तौ क्रियमाणायामशास्त्राथः कृतो भवेत्। नन्वसकृदुपदेशा उदाहृताः श्रोतव्य इत्यादयः। एवमपि यावच्छब्दमावर्तयेत् सकृच्छ्रवणमित्यादिनातिरिक्तमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः। प्रत्ययावृत्तिः कर्तव्या। कुतः असकृदुपदेशात्। श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य इत्येवंजातीयको ह्यसकृदुपदेशः प्रत्ययावृत्तिं सूचयति। ननूक्तं यावच्छब्दमेवावर्तयेन्नाधिकमिति न। दर्शनपर्यवसानत्वादेतेषाम्। दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानिं भवन्ति यथावघातादीनि तन्दुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि तद्वदिति।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

कुतो हेतोरस्य शस्त्रादीनि छेदादीन्न कुर्वन्तीत्याशङ्क्य तस्य छेदाद्ययोग्यत्वादित्याह अच्छेद्योऽयमिति। अत्राच्छेद्यत्वादौ पूर्वोक्तान्येवास्थूलत्वादीनि कारणानि ज्ञेयानि। एवमच्छेद्यत्वादिना स्थूलादीनभावरूपान् गुणानुक्त्वा भावरूपानपि गुणानाह नित्य इति। सर्वैर्विशेषणैरखण्डैकरसस्यैव वस्तुनो लक्ष्यत्वात् नित्यत्वादिभिरुत्पाद्यत्वादिकं निराक्रियते। यतो नित्यः अतो घटवदनुत्पाद्यः। यतः सर्वगतः अतो ग्रामवदप्राप्यः। यतः स्थाणुः पूर्वरूपापरित्यागेन स्थिरस्वभावः अतः क्षीरादिवदविकार्यः। अचलः यथा दर्पणः स्वतः स्वाच्छयादप्रच्युतोऽपि मलरूपेणावरणेन स्वाच्छयात्प्रच्याव्यते एवं स्वयं स्थाणुरपि अन्यसंयोगाच्चाञ्चल्यमश्नुवीत। स च दोषापकर्षणलक्षणं संस्कारमपेक्षते। अयं तु अचलत्वान्न तथा एवं च उत्पत्त्याप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपं चतुर्विधं क्रियाफलमात्मनि न संभवतीत्युक्तम्। तत्र हेतुः सनातन इति। सना इत्यव्ययं नैरन्तर्ये। तच्च देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छेदराहित्यम्। परमते परमाणूनां कालतः परिच्छेदाभावेऽपि देशतः परिच्छेदोऽस्ति। आकाशस्य तदुभयाभावेऽपि वस्तुतः परिच्छेदोऽस्ति। सोऽपि त्रिविधः सजातीयविजातीयस्वगतभेदरूपः। यथावृक्षस्य स्वगतो भेदः पत्रपुष्पफलादितः। वृक्षान्तरात्सजातीयो विजातीयः शिलादितः। ततश्च सना नैरन्तर्येण त्रिविधपरिच्छेदराहित्येन भवति अस्तीति सनातनोऽखण्डैकरसो यस्मात्तस्मात् नोत्पत्त्याद्याश्रय इत्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

तत्र हेतूनाह अच्छेद्य इति सार्धेन। निरवयवत्वादच्छेद्योऽयमक्लेद्यश्च। अमूर्तत्वात् अदाह्यो द्रवत्वाभावादशोष्य इति भावः। अतश्च छेदादियोग्यो न भवति। यतो नित्यः अविनाशी सर्वत्रगतः स्थाणुः स्थिरस्वभावः रूपान्तरापत्तिशून्यः अचलः पूर्वरूपापरित्यागी सनातनोऽनादिः।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

।। 2.24पूर्वोक्तेन पुनरुक्तिं दार्ढ्यसुखग्रहणरूपप्रयोजनभेदेन परिहरन्नैनम् इति श्लोकद्वयमवतारयति पुनरपीति।नैनम् इत्यादौ सार्धश्लोके वैशद्याय पृथगुक्तं करणासामर्थ्यं विषयायोग्यत्वं च परस्परप्रतियोगितया अन्यत्र इतरदन्तर्भवतीति भाष्ये पृथगनुपात्तम्।अच्छेद्यः इत्यादौ प्रत्ययोऽर्हार्थः। तेननैनं छिन्दन्ति इत्यादिष्वपि तदर्हत्वं शस्त्रादेः प्रतिषिध्यत इति दर्शयति न शक्नुवन्तीति। सर्वगतपदं पूर्वोक्तहेत्वनुवादतया व्याचष्टे सर्वगतत्वादात्मन इति। अणोरात्मनः कथं सर्वगतत्वं इत्याशङ्क्याह सर्वतत्त्वेति। नात्र बहुश्रुत्यादिविरुद्धं जीवविभुत्वं सर्वगतशब्देनोच्यते किन्त्वनुप्रवेशविशेषयोग्यतेति स्वभावशब्दं प्रयुञ्जानस्य भावः। व्यापित्वस्य पूर्वोक्तं हेतुत्वप्रकार प्रपञ्चयतिसर्वेभ्य इति।अत आत्मा नित्य इति सूक्ष्मत्वेन छेदनाद्ययोग्यत्वादात्मा नाशरहित इत्यर्थः।स्थिरेत्यादि।स्थाणुरचल इति पदद्वयं नित्यत्वप्रपञ्चनरूपम् नाशायोग्यत्वनाशकाविषयत्वपरं वा स्वाभाविकौपाधिकाविशदपरिणामराहित्यपरं वेति भावः।पुरातन इति। अत्र नित्यशब्देनानन्तत्वस्योक्तत्वात् सनातनशब्दोऽनादित्वपरतया सङ्कोचनीय इति भावः।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

नैनमित्यादि। नास्य नाशकारणं शस्त्रादि किंचित्करम्। चिदेकस्वभावस्य अनाश्रितस्य ( N K add निरपेक्षस्य after अनाश्रितस्य) निरंशस्य (N omits निरंशस्य S adds निरवयवस्य after निरंशस्य) स्वतन्त्रस्य स्वभावान्तरापत्त्याश्रयविनाशावयवविभाग विरोधिप्रादुर्भावादिक्रमेण (S प्रक्रमेण) नाशयितुमशक्यत्वात्। न च देहान्तरगमनमस्य अपूर्वम् देहान्वितोऽपि (N अपूर्वदेहान्नित्योऽपि) सततं देहान्तरं गच्छति तेन संबध्यते इत्यर्थः। देहस्य क्षणमात्रमप्यनवस्थायित्वात्। एवंभूतं विदित्वा एनमात्मानं शोचितुं नार्हसि।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

तर्ह्यच्छेद्योऽयमित्यादिपुनरुक्तमित्यत आह वर्तमाने ति। लटः प्रयोगेन वर्तमानस्यैव च्छेदादेर्निषेधादिदानीं दृश्यमानत्वेनात्मनः प्राग्विनाशाभावेऽप्युत्तरत्र शस्त्रादिना विनाशः स्यात् इति शङ्कायां च्छेदादियोग्यतैवात्मनो नास्तीति। प्रतिपादनायेदमुदितम्।अर्हे कृत्यतृचश्च अष्टा.3।3।169 इति कृत्यस्यार्हार्थत्वस्मरणादिति भावः। तर्हि तेनैवालं किमाद्येन श्लोकेन इत्यत आह वर्तमाने ति।प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते 1।20 इति वचनात्प्रसक्तौ सत्यामपि वर्तमानस्य च्छेदादेरदर्शनाच्छेदाद्ययोग्यत्वमात्मनो युक्तमिति दर्शयति प्रथमश्लोकेन। एवं तर्ह्यौत्तराधैर्यप्रसङ्ग इति चेत् न उपोद्धाताभिप्रायेण भगवतोक्तेऽभिप्रायमजानानस्य शङ्कामनूद्यावतारस्य कृतत्वात्। स्वाभिप्रायेण तूपोद्धातमुक्त्वा साध्यमाहेत्यवतारः कर्तव्यः।नित्यः सर्वगतः इत्यादिकं जीवेऽसम्भावितमित्याशङ्क्य तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकं व्याचष्टे कुत इति। वर्तमानच्छेदाद्यदर्शनमात्मनः च्छेदाद्ययोग्यतायां किं निश्चययुक्तिः उत सम्भावनायुक्तिः। नाद्यः कदाचिददृष्टस्यापि पश्चाद्दर्शनात्। द्वितीये तु कुतो योग्यतानिश्चयः इति शङ्कार्थः। नित्यसर्वगतेति भावप्रधानो निर्देशः। ईश्वरस्य तावच्छेदाद्ययोग्यत्वं सिद्धम् नित्यसर्वगतत्वादिविशेषणवत्त्वात्। नह्येवम्भूतस्य छेदादिकं सम्भवति अतस्तत्प्रतिबिम्बस्यापि जीवस्य तदयोग्यत्वमिति भावः। मन्त्रवर्णे कठो.1।2।18 शाश्वतः इतीश्वरविशेषणमुक्तम्। अत्र स्थाणुरिति तयोर्भेदमाह शाश्वत इति। एकरूपत्वमात्रं सामान्येनान्यथात्वाभावः तस्य सामान्यप्रकरणत्वात्।स्थाणुः इत्यस्य नैमित्तिकनिषेधप्रकरणत्वात्। अस्यार्थभेदकथनस्योत्तरत्रोपयोगं वक्ष्यामः। नित्य इतीश्वरविशेषणं प्रतिभाति तदन्यथा व्याचष्टे नित्यत्व मिति। भिन्नपदोक्तमपि विशिष्टस्य विशेषणं विशेषणमुपसंक्रामति। सन्निधानाच्च सर्वगतत्वमिति भावः। द्वयं पृथगीश्वरविशेषणं किं न स्यात् इत्यत आह अन्यथे ति।अजो नित्यः 2।20 इति नित्यत्वमीश्वरस्य प्रागुक्तं अप्रमेयस्येति सर्वगतत्वं च। अतस्ताभ्यां पुनरुक्तेरित्यर्थः। अस्याप्युत्तरत्रोपयोगः।ननु जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वमत्र बहुवारमुक्तम् अतः पुनरुक्तिरित्यत आह ऐक्योक्ता विति। जीवस्येश्वरैक्यविषये न पुनरुक्तिदोषः। कुतः ऐक्यमात्रस्य पुनःपुनरुक्तावपि पूर्वपूर्वानुक्तानां तत्र तत्रोपयुक्तानां ईश्वरविशेषणानां उत्तरत्रोपादानादिति। ऐक्यमत्र गौणं विवक्षितम्। विशेषणभेदाद्विशिष्टभेद इति भावः। ननु एतदपि नास्तिशाश्वतः 2।20 इत्युक्तस्यैव स्थाणुशब्देन ग्रहणादित्यादिशङ्कानिरासायशाश्वतः इत्येकरूपत्वमात्रमित्यादिकः प्राचीनो ग्रन्थः। ननु प्रतिबिम्बत्वं तत्तत्साध्यसिद्धये हेतुत्वेनोक्तम् न चैकस्यैव हेतोरनेकसाध्यसिद्ध्यर्थं पुनः पुनरुपन्यासे दोषोऽस्ति तत्कस्य हेतोः प्रमेयभेदात् अतः कथमियं शङ्केति उच्यते एकत्रोक्तमीश्वरप्रतिबिम्बत्वमन्यत्रापि हेतुत्वेन शिष्यैरेव ज्ञायतां किं स्वयं वचनेनेति शङ्कितुरभिप्रायः ईश्वरप्रतिबिम्बत्वमात्रस्य तत्तद्विशिष्टशङ्कानिरासासामर्थ्यात् तत्तदौपयिकविशेषणप्रदर्शनार्थं स्वयमुपादानमिति परिहाराभिप्रायः। नन्वीश्वरस्य नित्यसर्वगतत्वादिविशेषणवत्त्वात् अस्त्वच्छेद्यत्वादिकं जीवस्य तु कुतः तथाविधेश्वरप्रतिबिम्बत्वादिति चेत् नयो यत्प्रतिबिम्बः स तद्धर्मा इति नियमाभावादित्यत आह युक्ता इति। बिम्बधर्मा बिम्बसमानधर्माः। यो यत्प्रतिबिम्बः सोऽसति विरोधे तद्धर्मेति व्याप्तिरभिप्रेतेति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बता स्यात् सैव कुतः सिद्धेत्यत आह तत्ते ति। ननु जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वाङ्गीकारेअंशो नानाव्यपदेशात् ब्र.सू.2।3।43ममैवांशो जीवलोके 15।7 इत्यादिवाक्यसिद्धेन तदंशत्वेन विरोधः स्यात्। प्रतिबिम्बो हि बिम्बादत्यन्ताभिन्न इति केषाञ्चिन्मतं अत्यन्तभिन्न इत्यपरेषाम्। अंशस्तु तदेकदेशः तेन भिन्नाभिन्नः यथा पटांशस्तन्तुः पटेन। ततः पक्षद्वयेऽपि कथं न विरोध इत्यत आह न चे ति। जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वाङ्गीकारेऽपि न तदंशत्वविरोधः। कुत इत्यत आह तस्ये ति। प्रतिबिम्बत्वस्यैवांशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तत्वात्। अयं भावः अत्यन्तभिन्नस्य जीवस्य यदीश्वराधीनतत्सादृश्योपेतत्वं तत्प्रतिबिम्बत्वमुच्यते अभेदमतस्य निराकरिष्यमाणत्वात्। तदेव तदंशत्वमिति कुतो विरोधः इति। नन्वंशत्वं तदेकदेशत्वं तत्कथमुच्यते प्रतिबिम्बत्वमेवांशत्वं इति तत्राह न चेति । अंशता अंशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तम्। न केवलमेकदेशत्वमंशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तम् अपितु प्रतिबिम्बताऽपीति भावः। अस्तु नामानेकार्थत्वमंशशब्दस्य तथापिअंशो नाना ब्र.सू.2।3।43 इत्यादौ प्रतिबिम्बत्वमेवांशत्वमित्यत्र किं प्रमाणं तदेकदेशत्वं किं न स्यात् इत्यत आह प्रमाण मिति। जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वं तदंशत्वं च तावदुच्यते। नच परस्परविरुद्धः शास्त्रार्थो भवितुं युक्तः। तत्रानेकार्थस्यांशशब्दस्य विरुद्धार्थं परित्यज्यार्थान्तरं गृह्यत इत्यर्थापत्तिरेवात्र प्रमाणमिति भावः। स्यादेतत्। तथा प्रतिबिम्बत्वमेव तत्त्वं अंशशब्दस्यापि तदेव प्रवृत्तिनिमित्तमिति वचनद्वयविरोधशान्त्यर्थं कल्प्यते तथैकदेशत्वमेव तत्त्वं प्रतिबिम्बशब्दस्यापि तदेव प्रवृत्तिनिमित्तमिति कुतो न कल्प्यम् वचनद्वयविरोधस्यैवमपि शान्तेरित्यत आह न चे ति। अंशस्यांशत्वस्यैकदेशत्वस्य प्रतिबिम्बत्वं प्रतिबिम्बशब्दप्रवृत्तिनिमित्तत्वं कुतो न कल्प्यम् कुत इत्यत आह गाधी ति। गाध्यादिष्वंशशब्दाभिधेयेषु अंशत्वस्य बाहुरूप्यदृष्टेः। इतरत्र प्रतिबिम्बशब्दाभिधेयेषु सूर्यकादिषु प्रतिबिम्बत्वस्यानेकरूपत्वादृष्टेः। इदमुक्तं भवति इन्द्रांशो गाधीत्युच्यते। तत्र विशेष एवांशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं भेदाभेदादेः प्रमाणबाधितत्वात्।पटांशस्तन्तुः इत्यत्रैकदेशत्वंसूर्यांशश्चक्षुः इत्यत्रात्यन्तभिन्नस्य तदधीनसादृश्यम्। एवमंशशब्दोऽनेकार्थः प्रयोगेषु दृश्यते। तथा चोक्तं द्विरूपावंशकौ तस्य इत्यादि। नचैवं प्रतिबिम्बशब्दस्यानेकं प्रवृत्तिनिमित्तं दृश्यते। तथाच सावकाशस्यांशशब्दस्य निरवकाशेन प्रतिबिम्बशब्देन बाधो युक्तः न तु वैपरीत्यमिति।नन्वीश्वरस्य स्थाणुत्वं न युज्यते तदैक्षत छां.उ.6।2।3 सोऽकामयत बृ.उ.1।2।47 इत्यादिकर्तृत्वविरोधादित्यत आह स्थाणुत्वे ऽपीति। कुतः इति चेत् किं द्वयोः परस्परपरिहारेण वृत्तिदर्शनाद्विरोधश्चोद्यते उत सहादर्शनात्। नाद्यः कर्तृत्वरहितस्य कस्याप्यदर्शनात्। न द्वितीय इत्याह उभये ति। अन्यत्र सहादृष्टं स्थाणुत्वं कर्तृत्वं च कुतो भगवतीत्यत आह अचिन्त्ये ति। मायावादी तु कर्तृत्वं स्थाणुत्वयोरेकं कर्तृत्वं मायामयं स्थाणुत्वं तु पारमार्थिकम् काल्पनिकपारमार्थिकयोश्च गगने नीलत्वनीरूपत्वयोरिव न विरोध इति विरोधसमाधानं मन्यते तदसदित्याह न चे ति। कुत इत्यत आह त्वयी ति। ब्रह्मणि ईश्वर इति सम्पूर्णैश्वर्ये न योगित्वात् किन्तु ईश्वरत्वात्। कार्यकारणे सकलकार्योत्पादनसामर्थ्योपेते। इत्यादी ति क्रियाविशेषणम्। विरुद्धानामन्यत्र सहानवस्थितानां धर्माणां भगवत्यविरोधस्य सहावस्थानस्योक्तेः। तथा च बादरायणीयं मतमवलम्बमानस्यैवं विरोधसमाधानं असाम्प्रदायिकमिति भावः। इतश्च तदयुक्तमित्याह महातात्पर्याच्चे ति। सकलवेदानां परमेश्वरगुणोत्कर्षेमहातात्पर्यम्। तत्रेक्षितृत्वादीनां मिथ्यात्वकल्पने तद्विरोधः स्यादित्यर्थः। समस्तवेदानां भगवद्गुणोत्कर्षे तात्पर्यमित्येतदेव कुत इति चेत् उच्यते यस्य हि शास्त्रस्य यत्प्रयोजनं तत् यस्य ज्ञानाद्भवति स तस्य विषय इति नियमः। अन्यथा विषयप्रयोजनयोः सम्बन्धो न स्यात्। तथा च तत्र प्रेक्षावतां प्रवृत्तिर्न भवेत्। वेदस्य च मोक्षः प्रयोजनम्। स च गुणोत्कर्षज्ञानादेव भवतीति तत्रैव तस्य महातात्पर्यं युक्तमिति प्रतिपादयिष्यन् सर्ववेदानां मोक्षः प्रयोजनमित्येवासिद्धं न स्वर्गादेः फलान्तरमिति कैश्चिदङ्गीकृतत्वादित्यतस्तत्तावत्साधयति मोक्ष इति। वेदो हि महच्छास्त्रंवेदशास्त्रात्परं नास्ति इति वचनात्। तस्य च महापुरुषार्थेनैव प्रयोजनेन भवितुं युक्तम्। मोक्षश्च महापुरुषार्थः। अतः स एव तस्य प्रयोजनमिति भावः। मोक्षस्य महापुरुषार्थत्वं कुतः इत्यत आह तत्रापी ति। पुरुषार्थेष्वपि अत्र निर्धारणेन महत्त्वं गम्यते। अन्तेषु धर्ममोक्षेषु मध्येषु अर्थकामेषु अन्तयोरन्तरं मध्यम्। नैतावता धर्मो मोक्षसमः क्षयिफलत्वादित्याह पुण्ये ति। चितः प्राप्तः। अस्त्वेव ततः किं इत्यत आह स चे ति। मोक्षस्य भगवत्प्रसादसाध्यत्वं अन्यसाध्यत्वाभावश्चेति द्वे एते प्रमेये। तत्र यथायोगं वाक्यान्येतानि ज्ञातव्यानि। यदि निर्व्यलीकं छद्मना विना सर्वात्मना सर्वेण प्रकारेण आश्रितपदो भगवान्येषां दययेद्दयां कुर्यात् तर्हि येषां श्वश्रृगालभक्ष्ये देहेममाहं इति धीर्न भवति ते देवमायां देवस्य महिमानं विदन्ति अतितरन्ति च संसारमित्यर्थ। ऋते सत्ये। यद्यस्मात्। ईशेति सम्बुद्धिः। अतस्तवाङ्घ्रेश्छायां आश्रयेमेति सम्बन्धः। ज्ञानं प्रसादसाधनमित्यनुपदं वक्ष्यते। अतःतमेवं इत्याद्युदाहरणम् ततोऽपि किं इत्यत आह स चे ति। विष्णुप्रसादश्च लोके सत्पुरुषप्रसादो गुणोत्कर्षज्ञानसाध्यः प्रसिद्धः। तद्दृष्टान्तेनानुमानादित्यर्थः।नन्वीश्वरस्यानुमानाविषयत्वात्कथं तत्र लोकप्रसिद्धमङ्गीकार्यम् अन्यथाऽज्ञानादिकमङ्गीकार्यं स्यादिति अत आह लोके ति। अन्यथा मीमांसारम्भानुपपत्तिरिति भावः। नन्विन्द्रप्रसादकामोऽहल्यायै जारेति तन्निन्दामेव करोति। ततो भग्नव्याप्तिकमिदमनुमानमित्यत आह अहल्ये ति। अहल्याजारत्वादिप्रतिपादकं वाक्यमप्युत्कर्षमेव वक्ति। कथं दोषकृतोऽपि ते यस्तत्फलं बहुतरो लेपः स नासीदित्यस्यार्थस्य अनेन व्यञ्जनादित्यर्थः। कुत एतत् अत्यन्तालौकिककल्पनादेवं कल्पनस्य ज्यायस्त्वात् तत्फलं बहुतरो लेप इत्येतत्कुतः इत्यत आह बह्वि ति। असौ परनारीधर्षणदोषः। हीति सकलधर्मशास्त्रप्रसिद्धिं द्योतयति। स लेपस्तस्य नासीदित्येतत्कुतः इत्यत आह तस्ये ति। अहल्याधर्षणेन तस्येन्द्रस्य लोमापि न क्षीयते इत्यर्थः। भगवत्प्रसादस्तद्गुणोत्कर्षज्ञानसाध्य इत्येतन्न केवलमनुमानात्सिद्धं किं तर्हि तद्वचनाच्चेत्याह य इति। अत्रस सर्ववित् 15।19 इत्यादिस्तुत्या प्रसादोऽवगम्यते। तदेवं भगवद्गुणोत्कर्षे महातात्पर्यं सर्वागमानामिति प्रमितम्। ननु ब्रह्मरुद्रादीनां सर्वोत्कृष्टत्वप्रसिद्धेर्विष्णोः सर्वोत्कर्ष एव नास्ति कुतस्तत्र सर्वागमानां महातात्पर्यं इति चेत् न तत्प्रसिद्धेर्भ्रान्तित्वात्। तत्कुत इत्यत आह सत्यमि ति। सत्यं वक्ष्यमाणम्। तस्य लेशस्येति सर्वत्र सम्बध्यते। ननु पुराणविरोधाल्लौकिकी प्रसिद्धिरस्तु भ्रान्तिः पुराणेष्वेवान्येषां सर्वोत्कर्षो भगवदैक्यं च उच्यते तत्कथम् नहि पुराणस्य पुराणं बाधकम् साम्यादित्यत आह अन्ये ति। अन्योत्कर्ष ऐक्यं च पुराणेषु प्रतीतमपि महाभारतविरुद्धम् अतो न ग्राह्यमित्यर्थः। अत्रैक्यं प्रसङ्गादुक्तम्। महाभारतस्य पुराणबाधकत्वं कुत इत्यत उक्तं तथैवे ति। इत्यादिना ग्रन्थान्तरेण सिद्धः प्रमित उत्कर्षः सर्वशास्त्रोत्तमत्वं यस्य तत्तथोक्तम्। कथं महाभारतविरुद्धत्वमित्यत आह तत्र हीति। तत्र महाभारते इत्यादिषु वाक्येषु वक्ति भगवान्व्यासः इतोऽपि महाभारतस्य पुराणबोधकत्वं युक्तमित्युक्तं साधारणे ति।कः सर्वोत्कृष्टः इत्यादिसाधारणप्रश्नरूपेऽवसरे विष्णुप्रशंसामनुपक्रम्य स्वरूपकथनावसर इति यावत्। पुराणेऽप्येवमेवान्योत्कर्षाद्युक्तौ साम्यमेवेत्यत आह अन्यत्रे ति। अन्यत्र पुराणे यत्किंञ्चिदुक्तावप्यन्योत्कर्षाद्युक्तावप्यसाधारण एवावसरे तत्स्तुतिप्रसङ्गे तदुक्तमिति शेषः। असाधारणावसरोक्तमपि रुद्रादेरुत्कृष्टत्वादि कुतो दुर्बलं इत्यत आह तद्धी ति। यत्स्तुतिप्रस्तावोक्तं सर्वोत्कृष्टत्वं वेदादावग्न्यादेरप्यस्ति तस्यापि ग्राह्यत्वं स्यादित्यर्थः। इतश्च न पुराणोक्तं रुद्रादेरुत्कृष्टत्वं ग्राह्यमित्याह तद्ग्रन्थेति । तद्ग्रन्थः शैवपुराणम्।तत्कथमित्यत आह तथा ही ति। तद्ग्रन्थेत्युक्तप्रदर्शनाय शैव इत्युक्तम्।ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् अष्टा.6।3।63 इति जाह्नवीति ह्रस्वः। तत्रैव स्कान्द एव। शिवान्मुक्तिं निषिध्य। इतश्च न पुराणोक्तं शिवादेरुत्कृष्टत्वे ग्राह्यमित्याह समेति । समं शैववैष्णवपक्षयोःनाहं न च शिवोऽन्ये च इत्यादितद्वचनम्। अस्तु लौकिकीप्रसिद्धिर्भ्रान्तिः पुराणं च विप्रलम्भमूलं व्यामोहनार्थम् तथापिविश्वाधिको रुद्रः इत्यादिवेदविरोध इत्यत आह वेदश्चे ति। सङ्कुचिताद्यर्थो व्याख्यातव्यः कुत इत्यत आह यदी ति। इतिहासाद्यननुरुध्य यथाश्रुतवेदव्याख्यानेऽनिष्टमाह अनिर्णयाच्चे ति। न केवलं विश्वाधिक इत्यादिवेदो विष्णोः सर्वोत्कर्षस्याविरोधी किन्तु प्रत्युत तत्र वेदेऽस्मदिष्टस्य विष्णोः सर्वोत्कर्षस्य सिद्धिरपीत्याह तत्रापी ति। कुत इत्यत आह नामे ति। विष्णोर्नामभिर्वैशेष्याद्विशिष्टत्वाद्रुद्रादिसर्वनामवत्त्वादित्यर्थः।महातात्पर्याच्च इत्यादिनोक्तमर्थमुपसंहरति अत इति। अप्रामाणिकत्वात् प्रमाणविरुद्धत्वाच्चेत्यर्थः। अस्त्वेवं तथापि ईक्षितृत्वादेर्न मायामयत्वे तद्विरोधः। गुणोत्कर्षस्य सत्त्वे हि स स्यात्। नच वेदतात्पर्यविषयत्वमात्रेण सत्यता मोक्षापेक्षयेश्वरं प्रसादयितुमुक्तस्य राजाद्युत्कर्षस्येवासत्त्वसम्भवात्। संवादाभावेन सत्यत्वनिश्चयायोगादित्यत आह तथापी ति। फलापेक्षया प्रसादयितुं प्रतिपादितत्वेऽपि स्वतः प्रामाण्यात् संवादमनपेक्ष्य ज्ञानग्राहकेणैव प्रामाण्यस्य निश्चितत्वात्। नहि प्रामाण्यनिश्चये विषयासत्त्वशङ्का सम्भवति। एवं सति बौद्धाद्यागमविषयस्यापि सत्त्वं स्यादिति चेत् न प्रसक्तस्यापि तत्प्रामाण्यग्रहणस्य बलवद्विरोधेनापोदितत्वात्। नच तथाप्रकृतेऽपीत्याह अविरोधा दिति।नन्वन्यत्र पुरुषे सर्वोत्कर्षस्यादर्शनात्तद्दृष्टान्तेनेश्वरेऽपितदभावस्य साधयितुं शक्यत्वात् अनुमानविरोधोऽस्तीत्यत आह नचे ति। कालातीतमनुमानमिति भावः। प्रमाणविरुद्धस्याप्यनुमानत्वेऽतिप्रसङ्गं सूचयति धर्मे ति। धर्मैर्वैचित्र्यं धर्मवैचित्र्यम्। एवमनुमानेऽर्थानां धर्मवैचित्र्यं न स्यादिति भावः। यद्वाऽनेन ग्रन्थेनासम्भावनाविरोधं परिहर्तुं सम्भावनां दर्शयति। भवेदेवं यदि स्वत एव प्रामाण्यग्रहः स्यात् तदनङ्गीकारे किमुत्तरमित्यत आह स्वत इति। संवादाधीनः प्रामाण्यग्रह इत्यङ्गीकारे तु प्रामाण्यनिश्चयाय संवादकमानोक्तौ तस्याप्यदोषत्वं प्रामाण्यमन्यसंवादेन साधयेदित्यनवस्थालक्षणातिप्रसङ्ग इत्यर्थः। इतोऽपि न वेदतात्पर्यगोचरस्य भगवद्गुणोत्कर्षस्यासत्त्वं शङ्कनीयमित्याह अनन्ये ति। प्रयोजनापेक्षया चेत्यर्थः। तर्हि तत्परत्वमेव न सिद्ध्येत्। प्रयोजनपर्यालोचनया हि तत्प्राक्साधितमित्यत आह सिद्ध मिति। कथमित्यत आह नारायणे ति। प्रयोजनापेक्षया भगवद्गुणोत्कर्षपरत्वपक्षे प्रयोजनेन तत्साधनं कृतम् प्रयोजनानपेक्षापक्षे त्वागमैरेव तत्सिद्धम्। पक्षद्वयं चसर्वे वेदास्तु देवार्थाः इत्यादिवक्ष्यमाणप्रमाणसिद्धम्। एकस्यैव वाक्यस्य प्रयोजनसापेक्षत्वमनपेक्षत्वं च विरुद्धमित्यत आह नचे ति। प्रतिपत्तृभेदादिति भावः। ननु जडस्य वेदस्यैतान्प्रति एवं प्रतिपादयिष्याम्येतान्प्रत्येवमिति कथं चेतनवत्प्रवृत्तिरित्यत आह ईश्व रेति। अनादिर्वेद इत्युक्तम् तत्र कथमीश्वरस्य नियमनमित्यत आह अनादौ चे ति। अनादिपदार्थविषये नियामकत्वमन्यत्रादृष्टं कथमीश्वरस्येत्यत आह प्रयोजकत्वं त्वि ति। अनादेर्नियोजकत्वमीश्वरस्याचिन्त्यशक्त्या युक्तम्। अनन्यापेक्षया चेत्यादिनोक्तमुपसंहरति अत इति तथा च पक्षद्वयेऽपि महातात्पर्यविरोधान्नेश्वरस्येक्षितृत्वादिकं मायामयमिति भावः। अप्रामाणिकं च तन्मायामयत्वम्। तथा हि किं स्थाणुत्वे ईक्षितृत्वान्यथानुपपत्त्यैतत्कल्प्यते उत प्रमाणान्तरात्। नाद्यः अन्यथैवोपपत्तेरुक्तत्वादित्याह तच्चे ति। स्थाणोरपीक्षितृत्वम् अनन्यापेक्षा स्वतन्त्रा। न द्वितीयः तददर्शनादिति भावेनोपसंहरति अत इति।प्रकृतमनुसरन्अचलः इत्येतत्पदं यदन्यैः परिस्पन्दरहित इति व्याख्यातम् तदसदिति भावेनाह अचलत्व मिति। इत्यादिवद्व्याख्येयमिति शेषः। सत्यज्ञानानन्दस्वरूपं ब्रह्म अभ्युपगच्छता यथैतानि वाक्यानि व्याख्यायन्ते लौकिकसत्तादिरहितमिति तथाचल इत्येतदपि लौकिकक्रियाप्रतिषेधपरं व्याख्येयम्। सर्वथा परिस्पन्दाभावार्थत्वेऽप्रहर्षमित्यादेरपि सर्वथाऽनानन्दत्वादिकमर्थः स्यात्। अविशेषादिति भावः। ननु विषमोऽयमुपन्यासः विज्ञानमानन्दं ब्रह्म बृ.उ.3।9।28 सत्यं ज्ञानं तै.उ.2।1 इत्यादिभिरानन्दरूपत्वादेः प्रमितत्वेन तथाव्याख्यानोपपत्तेरिति चेत् समं प्रकृतेऽपीत्याह क्रिये ति। कुतः क्रियादृष्टिः इत्यत आह तप इति। तप आलोचनम्। विज्ञानमानन्दं इत्यादीनि निरवकाशानि क्रियावाक्यानि सावकाशानि सर्वस्य ब्रह्मधर्मस्य मायामयत्वात्। अतः पुनर्वैषम्यमित्यत आह अतश्चे ति। अतएव महातात्पर्यविरोधादेव। इतश्च नेश्वरधर्माणां मायामयत्वमित्याह ऐश्वर्यादी ति। सम्बोधनादीश्वरस्य अर्शआद्यजन्तोऽयं शब्द इत्येवकारेण व्यवच्छिनत्ति। नियामकाभावेनाश्रुतप्रत्ययकल्पनायोगात्। एवं सम्बोधने तत्स्वरूपत्वमेवैश्वर्यादीनां स्यात् नत्वमायामयत्वमित्यत आह स्वरूपत्वा दिति। अनन्तत्वस्वाभाविकत्वादिवचनाच्च नेश्वरशक्त्यादीनां मायामयत्वम्। मायामयस्यानन्तत्वाद्यनुपपत्तेरित्याह विज्ञाने ति।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

शस्त्रादीनां तन्नाशकत्वासामर्थ्ये तस्य तज्जनितनाशानर्हत्वे हेतुमाह यतोऽच्छेद्योऽयमतो नैनंच्छिन्दन्ति शस्त्राणि अदाह्योऽयं यतोऽतो नैनं दहति पावकः यतोऽक्लेद्योऽयमतो नैनं क्लेदयन्त्यापः यतोऽशोष्योऽयमतो नैनं शोषयति मारुत इति क्रमेण योजनीयम्। एवकारः प्रत्येकं संबध्यमानोऽच्छेद्यत्वाद्यवधारणार्थः। चः समुच्चये हेतौ वा। छेदाद्यनर्हत्वे हेतुमाहोत्तरार्धेन। नित्योऽयं पूर्वोपरकोटिरहितोऽतोऽनुत्पाद्यः। असर्वगतत्वे ह्यनित्यत्वं स्यात्यावद्विकारं तु विभागः इति न्यायात्पराभ्युपगतपरमाण्वादीनामनभ्युपगमात्। अयं तु सर्वगतो विभुरतो नित्य एव। एतेन प्राप्यत्वं पराकृतम्। यदि चायं विकारी स्यात्तदा सर्वगतो न स्यात् अयं तु स्थाणुरविकारी अतः सर्वगत एव। एतेन विकार्यत्वमपाकृतम्। यदि वायं चलः क्रियावान्स्यात्तदा विकारी स्याद्धटादिवत् अयं त्वचलोऽतो न विकारी। एतेन संस्कार्यत्वं निराकृतम्। पूर्वावस्थापरित्यागेनावस्थान्तरापत्तिर्विक्रिया। अवस्थैक्येऽपि चलनमात्रं क्रियति विशेषः। यस्मादेव तस्मात् सनातनोऽयं सर्वदैकरूपः। न कस्या अपि क्रियायाः कर्मेत्यर्थः। उत्पत्त्याप्तिविकृतिसंस्कृत्यन्यतरक्रियाफलयोगे हि कर्मत्वं स्यात्। अयं तु नित्यत्वान्नोत्पाद्यः अनित्यस्यैव घटादेरुत्पाद्यत्वात्। सर्वगतत्वान्न प्राप्यः परिच्छिन्नस्यैव घटादेः प्राप्यत्वात्। स्थाणुत्वादविकार्यः विक्रियावतो घृतादेरेव विकार्यत्वात्। अचलत्वादसंस्कार्यः सक्रियस्यैव दर्पणादेः संस्कार्यत्वात्। तथाच श्रुतयःआकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःवृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तम् इत्यादयः।यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरः इत्याद्या च श्रुतिः सर्वगतस्य सर्वान्तर्यामितया तदविषयत्वं दर्शयति। यो हि शस्त्रादौ न तिष्ठति तं शस्त्रादयश्छिन्दन्ति अयंतु शस्त्रादीनां सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन तत्प्रेरकस्तदन्तर्यामी। अतः कथमेनं शस्त्रादीनि स्वव्यापारविषयीकुर्युरित्यभिप्रायः। अत्रयेन सूर्यस्तदपि तेजसेद्धः इत्यादिश्रुतयोऽनुसन्धेयाः। सप्तमाध्याये च प्रकटीकरिष्यति श्रीभगवानिति दिक्।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

एते च्छेदनादिधर्मयुक्ता अपि मदिच्छां विना तन्न कुर्वन्ति मदिच्छयैव च त्याज्यदेहादिषु तथा कुर्वन्त्यतस्त्त्वमप्येतेष्वच्छेद्यादिधर्मान् ज्ञात्वा प्रवृत्तो भवेत्युक्त्वाऽच्छेद्यत्वादिधर्मानाह अच्छेद्य इति। अच्छेद्यादिधर्मवानयमित्यर्थः। अच्छेद्यादिधर्मवत्त्वे कारणमाह नित्यः अविनाशी सर्वगतः व्यापकः स्थाणुः स्थिरस्वभावः अचलः सर्वदैकरूपः सनातनः अनादिः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

अच्छेद्य इत्यर्द्धेन निगमनम्। कार्यत्वव्यावृत्त्यर्थं नित्य इति। सर्वगत इति व्यापकत्वम्। ब्रह्मभावाभिप्रायेण जीवस्तु व्यापकः न स्वरूपेण किन्तु स्वचैतन्यगुणेन भगवद्धर्मभूतत्वात् तदग्रे वक्ष्यते। स्थाणुरिति स्थिरत्वम्। अचल इति निष्क्रियत्वम्। नन्वेवं भूतमाकाशं प्रसिद्धं तदेव इति चेत् न इत्याह सनातन इति। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः तै.उ.2।1 इति तत्सम्भवश्रवणादित्यर्थः।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

2.24 Since this is so, therefore ayam, It; acchedyah, cannot be cut. Since the other elements which are the causes of destruction of one ano ther are not capable of destroying this Self, therefore It is nityah, eternal. Being eternal, It is sarva-gatah, omnipresent. Being omnipresent, It is sthanuh, stationary, i.e. fixed like a stump. Being fixed, ayam, this Self; is acalah, unmoving. Therefore It is sanatanah, changeless, i.e. It is not produced from any cause, as a new thing. It is not to be argued that 'these verses are repetive since eternality and changelessness of the Self have been stated in a single verse itself, "Never is this One born, and never does It die," etc. (20). Whatever has been said there (in verse 19) about the Self does not go beyond the meaning of this verse. Something is repeated with those very words, and something ideologically.' Since the object, viz the Self, is inscrutable, therefore Lord Vasudeva raises the topic again and again, and explains that very object in other words so that, somehow, the unmanifest Self may come within the comprehension of the intellect of the transmigrating persons and bring about a cessation of their cycles of births and deaths.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

2.23 - 2.24 Weapons, fire, water and air are incapable of cleaving, burning, wetting and drying the self; for, the nature of the self is to pervade all elements; It is present everywhere; for, It is subtler than all the elements; It is not capable of being pervaded by them; and cleaving, burning, wetting and drying are actions which can take place only by pervading a substance. Therefore the self is eternal. It is stable, immovable and primeval. The meaning is that It is unchanging, unshakable and ancient.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 2.24?

यस्मात् अन्योन्यनाशहेतुभूतानि एनमात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते अस्यादीनि तस्मात् नित्यः। नित्यत्वात् सर्वगतः। सर्वगतत्वात् स्थाणुः इव स्थिर इत्येतत्। स्थिरत्वात् अचलः अयम् आत्मा। अतः सनातनः चिरंतनः न कारणात्कुतश्चित् निष्पन्नः अभिनव इत्यर्थः।।नैतेषां श्लोकानां पौनरुक्त्यं चोदनीयम् यतः एकेनैव श्लोकेन आत्मनः नित्यत्वमविक्रियत्वं चोक्तम् न जायते म्रियते वा इत्यादिना। तत्र यदेव आत्मविषयं किञ्चिदुच्यते त

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 2.24, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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