Bhagavad Gita 2.15 — Commentary
20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते
yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate
"That firm man, whom surely these afflictions do not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality."
Scholar Commentaries (20)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
यं हि पुरुषं समे दुःखसुखे यस्य तं समदुःखसुखं सुखदुःखप्राप्तौ हर्षविषादरहितं धीरं धीमन्तं न व्यथयन्ति न चालयन्ति नित्यात्मदर्शनाद् एते यथोक्ताः शीतोष्णादयः स नित्यात्मस्वरूपदर्शननिष्ठो द्वन्द्वसहिष्णुः अमृतत्वाय अमृतभावाय मोक्षायेत्यर्थः कल्पते समर्थो भवति।। इतश्च शोकमोहौ अकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तं यस्मात्
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
यं पुरुषं धैर्ययुक्तम् अवर्जनीयदुःखं सुखवन्मन्यमानम् अमृतत्वसाधनतया स्ववर्णोचितं युद्धादिकर्म अनभिसंहितफलं कुर्वाणं तदन्तर्गताः शस्त्रपातादिमृढुक्रूरस्पर्शा न व्यथयन्ति स एव अमृतत्वं साधयति न त्वादृशो दुःखासहिष्णुः इत्यर्थः। अतः आत्मनां नित्यत्वाद् एतावद् अत्र कर्तव्यम् इत्यर्थः।यत्तु आत्मनां नित्यत्वं देहानां स्वाभाविकं नाशित्वं च शोकानिमित्तिम् उक्तम्गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः (गीता 2।11) इति तद् उपपादयितुम् आरभते
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
अतः प्रयोजनमाह यं हीति। यमेते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति। पुरिशयमेव सन्तं शरीरसम्बधाभावे सर्वेषां व्यथाभावात्पुरुषमिति विशेषणम्। कथं न व्यथयन्ति समदुःखसुखत्वात् तत्कथं धैर्येण।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
सुख और दुख को शान्त भाव से सहन करने का नाम तितिक्षा है जो उपनिषदों के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिये एक आवश्यक गुण है। इसी को ध्यान में रखकर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की तितिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।यहाँ मोक्ष का तात्पर्य अमृतत्व शब्द से किया है। इस शब्द से स्थूल शरीर का मोक्ष नहीं समझना चाहिये। यहाँ इस शब्द का उपयोग उसके व्यापक अर्थ में किया गया है। शरीर मन और बुद्धि तथा इनके द्वारा प्राप्त सभी अनुभव र्मत्य और अनित्य ही हैं। इन उपाधियों के साथ हमारा तादात्म्य होने से इनके जन्ममरणादि धर्मों से हम प्रभावित होकर दुखी होते हैं। अमृतत्व का अर्थ है जो पुरुष अपने नित्य आत्मस्वरूप को पहचान लेता है वह इन सब अनुभवों को प्राप्त कर उनके मध्य रहता हुआ भी शोकमोह को प्राप्त नहीं होता। उसे अपने अमृतस्वरूप का विस्मरण नहीं होता।गीता के द्वारा महान् कवि व्यास जी भगवान् श्रीकृष्ण के माध्यम से हमें हमारे जीवन का लक्ष्य बताते हैं पूर्णत्व की प्राप्ति। अल्पकाल के लिये प्राप्त इस जीवन में हमको इस लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिये। चिन्तित हुये बिना प्रसन्नतापूर्वक जीवन में आने वाले सुखदुखादि कष्टों को सहन करने की सर्वोच्च साधना करने का इन परिस्थितियों में हमें अवसर मिलता है।तितिक्षा का अर्थ निराश उदास भाव से जो हो रहा है उसको सहन करना ऐसा नहीं है। यहाँ विशेष रूप से कहा है कि शीतोष्णादि द्वन्द्वों में जिसका मन समभाव में स्थित रहता है वह धीर पुरुष मोक्ष का अधिकारी होता है। यहाँ प्रयोजन निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में उसे हर्षातिरेक नहीं होता और न दुख में अत्यन्त विषाद।जब तक देह के साथ हमारी अत्यन्त आसक्ति रहती है तब तक उसमें होने वाली पीड़ाओं से हम विलग नहीं हो सकते और हम व्यथित हो जाते हैं। हृदय में प्रेम अथवा घृणा के भाव के प्रादुर्भाव से यदि शारीरिक कष्ट सहने की आवश्यकता पड़ती है तो वह क्षमता हममें आ जाती है। पुत्र के प्रति प्रेम के कारण उसको शिक्षा आदि देने के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम बड़ी प्रसन्नता से अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का त्याग करने के लिए तैयार हो जाते हैं। वह असुविधा हमें कष्ट नहीं पहुँचाती। इसी प्रकार बुद्धिनिष्ठ आदर्शों की प्राप्ति के लिए शरीर और मन के आरामों को भी हम त्याग देते हैं। विश्व के अनेक देशभक्त क्रान्तिकारियों ने अपने देश की स्वतन्त्र्ाता के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट सहन करके अपने प्राणों की आहुति दी है।निम्नलिखित कारणों से भी तुम्हारे लिए उचित है कि शोक और मोह को छोड़ कर तुम शान्तिपूर्वक शीतादि को सहन करो। क्योंकि
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
2.15 यम् whom? हि surely? न व्यथयन्ति afflict not? एते these? पुरुषम् man? पुरुषर्षभ chief among men? समदुःखसुखम् same in pleasure and pain? धीरम् firm man? सः he? अमृतत्वाय for immortality? कल्पते is fit.Commentary -- Dehadhyasa or identification of the Self with the body is the cause of pleasure and pain. The more you are able to identify yourself with the immortal? allpervading Self? the less will you be affected by the pairs of opposites (Dvandvas? pleasure and pain? etc.)Titiksha or the power of endurance develops the willpower. Calm endurance in pleasure and pain? and heat and cold is one of the alifications of an aspirant on the path of Jnana Yoga. It is one of the Shatsampat or sixfold virtues. It is a condition of right knowledge. Titiksha by itself cannot give you Moksha or liberation? but still? when coupled with discrimination and dispassion? it becomes a means to the attainment of Immortality or knowledge of the Self. (Cf.XVII.53)
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या-- 'पुरुषर्षभ'-- मनुष्य प्रायः परिस्थितियोंको बदलनेका ही विचार करता है, जो कभी बदली नहीं जा सकतीं और जिनको बदलना सम्भव ही नहीं। युद्धरूपी परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अर्जुनने उसको बदलनेका विचार न करके अपने कल्याणका विचार कर लिया है। यह कल्याणका विचार करना ही मनुष्योंमें उनकी श्रेष्ठता है। 'समदुःखसुखं धीरम्'-- धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम होता है। अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही सुख और दुःख ये दोनों अलगअलग दीखते हैं। सुख-दुःखके भोगनेमें पुरुष (चेतन) हेतु है और वह हेतु बनता है प्रकृतिमें स्थित होनेसे (गीता 13। 2021)। जब वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है तब सुख-दुःखको भोगनेवाला कोई नहीं रहता। अतः अपने-आपमें स्थित होनेसे वह सुख-दुःखमें स्वाभाविक ही सम हो जाता है।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
शीतउष्णादि सहन करनेवालेको क्या ( लाभ ) होता है सो सुन सुखदुःखको समान समझनेवाले अर्थात् जिसकी दृष्टिमें सुखदुःख समान हैं सुखदुःखकी प्राप्तिमें जो हर्षविषादसे रहित रहता है ऐसे जिस धीर बुद्धिमान् पुरुषको ये उपर्युक्त शीतोष्णादि व्यथा नहीं पहँचा सकते अर्थात् नित्य आत्मदर्शनसे विचलित नहीं कर सकते। वह नित्य आत्मदर्शननिष्ठ और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेवाला पुरुष मृत्युसे अतीत हो जानेके लिये यानी मोक्षके लिये समर्थ होता है।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
अधिकारिविशेषणं तितिक्षुत्वं नोपयुक्तं केवलस्य तस्य पुमर्थाहेतुत्वादिति शङ्कते शीतेति। विवेकवैराग्यादिसहितं तन्मोक्षहेतुज्ञानद्वारा तदर्थमिति परिहरति श्रृण्विति। तितिक्षमाणस्य विवक्षितं लाभमुपलम्भयति यं हीति। हर्षविषादरहितमित्यत्र शमादिसाधनसंपन्नत्वमुच्यते धीमन्तमिति। नित्यानित्यविवेकभागित्वमेतच्चोभयं वैराग्यादेरुपलक्षणम्। नित्यात्मदर्शनं त्वमर्थज्ञानं साधनचतुष्टयवन्तमधिकारिणमनूद्य त्वंपदार्थज्ञानवतस्तस्य मोक्षौपयिकवाक्यार्थज्ञानयोग्यतामाह स नित्येति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
तितिक्षायाः फलमाह यमिति। समे सुखदुःखे यस्य तं धीरं धीमन्तं नित्यात्मज्ञानवन्तं नित्यात्मज्ञानादेते शीतोष्णादयो न चालयन्ति यद्यप्येते मात्रास्पर्शा इति वक्तुमुचितं तथापि शीतादिकमदत्त्वा न व्यथयन्ति इत्यतो भाष्यकृद्भिरेतच्छब्देन शीतादीनामेव परामर्शः कृतः। स साधनचतुष्टसंपन्नो नित्यात्मदर्शननिष्ठोऽमृतत्वाय मोक्षाय समर्थो भवति। पुरुषं न व्यथयन्ति त्वं तु पुरुषर्षभ इति सूचयन्नाह पुरुषर्षभेति। अत्र केचिद्वर्णयन्ति। नन्वात्मनो नित्यत्वे विभुत्वे च न विवदामः। प्रतिदेहमेकत्वं तु न सहामहे। तथाहिबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाख्यनवविशेषगुणवन्तः प्रतिदेहं भिन्ना एव नित्या विभवश्चात्मानः इति वैशेषिका मन्यन्ते। इममेव पक्षं तार्किकमीमांसकादयोऽपि प्रतिपन्नाः। सांख्यास्तु विप्रतिपद्यमाना अप्यात्मनो गुणवत्त्वे प्रतिदेहं भेदे न विप्रतिपद्यन्ते। अन्यथा सुखदुःखादिसंकरप्रसङ्गात्। तथाच भीष्मादिभिन्नस्य मम नित्यत्वे विभुत्वेऽपि सुखदुःखादियोगि त्वात् भीष्मादिबन्धुदेहविच्छेदे सुखवियोगो दुःखसंयोगश्च स्यादिति कथं शोकमोहौ नानुचितावित्यर्जुनाभिप्रायमाशङ्क्य लिङ्गशरीरविवेकमाह मात्रेति। मात्रास्पर्शा उत्पत्तिविनाशवतोऽन्तःकरणस्यैव शीतादिद्वारा सुखदुःखदा नतु नित्यस्य विभोरात्मनः। तथाचान्तःकरणभेदान्न सांख्योक्तः संकरप्रसङ्गः। वैशेषिकादयश्च भ्रान्त्यैवात्मनो विकारित्वं भेदं चाङ्गीकृतवन्त इत्यर्थः। अन्तःकरणस्यानित्यत्वाद्दृश्यत्वाञ्च नित्यदृग्रूपत्वात्त्वत्तो भिन्नस्य सुखादिजनका ये मात्रास्पर्शास्तेऽप्यनित्यास्तांस्तितिक्षस्व नैते मम किंचित्करा इति विवेकेनोपेक्षस्व। दुःखितादात्म्येनात्मानं दुःखिनं मा ज्ञासीरित्यर्थः। नन्वन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वे तस्यैव कर्तृत्वादिना चेतनत्वमभ्युपेयम्। तथाच तद्य्वतिरिक्ते तद्भासके भोक्तरि मानाभावान्नाममात्रे विवादः स्यात्तदभ्युपगमे च बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः अन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वेन बद्धत्वात् आत्मनश्च तद्य्वतिरिक्तस्य मुक्तत्वादित्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह यमिति। यं स्वप्रकाशत्वेन स्वतएव प्रसिद्धं पुरुषं पूर्णत्वेन पुरि शयानं समे सुखदुःखे अनात्मधर्मतया भास्यतया च यस्य तं धीरं धियं प्रेरयतीति व्युत्पत्त्या चिदाभासद्वारा धीतादात्म्याध्यासेन धीप्रेरकं धीसाक्षिणमित्यर्थः। एतेन बन्धप्रसक्तिर्दर्शिता। एते सुखदुःखदा मात्रास्पर्शा यस्मान्न व्यथयन्ति परमार्थतो न विकुर्वन्ति स पुरुषोऽमृतत्वाय मोक्षाय योग्यो भवतीत्यर्थः। अतः सर्वधर्मासंसर्गिणोऽप्यात्मन उपाधिवशात्तत्संसर्गित्वप्रतिभासो बन्धः स्वरुपज्ञानेन स्वरुपाज्ञानतत्कार्यबुद्य्धाद्युपाधिनिवृत्त्या तन्निमित्तनिखिलभ्रमनिवृत्तौ निर्मृष्टनिखिलभास्योपरागतया शुद्धस्य स्वप्रकाशपरमानन्दतया पूर्णस्यात्मनः स्वतएव कैवल्यं मोक्ष इति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः। अतएव नाममात्रे विवाद इत्यपास्तम्। भास्यभासकयोरेकत्वानुपपत्तेः। पुरुषर्षभेति संबोधयन्स्वप्रकाशचैतन्यरुपत्वेन पुरुषत्वं परमानन्दरुपत्वेनात्मन ऋषभत्वं सर्वद्वैतापेक्षया श्रेष्ठत्वमजानन्नेव शोचसि। अतः स्वरुपज्ञानादेव तव शोकनिवृत्तिः सुकरातरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरिति सूचयतीति। अत्रेदमवधेयम् शोतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यसंगतम्। सर्वेषां मात्रास्पर्शानां सुखादिदातृत्वे शीतोष्णयोर्द्वारत्वाभावात्। शीतोष्णग्रहणं त्रिविधसुखदुःखोपलक्षणार्थं शीतमुष्णं च कदाचित्सुखं कदाचिद्दुःखं सुखदुःखे तु न कदाचिद्विपरीते इति तयोः पृथङ्निर्देश इति स्वपरग्रन्थविरोधाच्च। शीतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यस्य शीतोष्णद्वारा साक्षाच्च सुखदुःखदा इत्यर्थ इति यदि कश्चिद्ब्रूयात्तर्हि भाष्य एवास्यार्थस्यान्तर्भावः। तस्मात् शीतं चोष्णं च सुखं च दुखं च प्रयच्छन्तीति भाष्यकृध्वाख्यानमेवर्जु। एतेनागमापायिनोऽन्तःकरणस्येत्यपास्तम्। वाक्यार्थस्य सत्यपि सभ्यक्संभवे विशेष्याध्याहारानौचित्यात्। तितिक्षस्वेति वाक्यशेषस्य मुख्यार्थत्यागापत्तेश्च। एतेनोत्तरश्लोकव्याख्यानमप्यपास्तम्। यं पुरुषमित्येतावतैव निर्वाहे समे इत्यादिविशेषणद्वयस्यानर्थक्यापत्तेश्च। बन्धप्रसक्तिरपि पुरिषु तादात्म्याध्यासं कृत्वा शेत इत्यर्थकेन पुरुषशब्देनैव लभ्यते। एतेन सुखादेः क्षेत्रधर्मत्वस्य वक्ष्यमाणत्वाच्चास्य व्याख्यानस्याकरणे भाष्यकृतां न्यूनता न शङ्कनीया। एवमन्येषामपि मूलतद्भाष्यवहिर्भूताः कल्पनाः सभ्यग्विचार्य निराकर्तव्याः। अस्माभिस्तु विस्तरभयान्नोद्धाठ्य निराक्रियन्ते।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
तितिक्षाफलं प्रत्यक्षमेवेत्याह यं हीति। एते मात्रास्पर्शाः प्राग्व्याख्यातरीत्या त्रिविधा अपि यं जाग्रति स्वप्नेऽसंप्रज्ञातसमाधौ वा न व्यथयन्ति स्वास्थ्यान्न प्रच्यावयन्ति। पुरुषं पूर्षु अष्टासु वसतीति पुरुषस्तम्। पुरश्चकर्मेन्द्रियाणि खलु पञ्च तथा पराणि ज्ञानेन्द्रियाणि मन आदि चतुष्टयं च। प्राणादिपञ्चकमथो वियदादिकं च कामश्च कर्म च तमः पुनरष्टमी पूः। इति प्रसिद्धाः। यद्वा स्थूलसूक्ष्मोपाधिमध्ये एव इतरासामन्तर्भावादत्र पूरिति तम एव ग्राह्यम्। तेन कारणोपाधेरप्यात्मनो विविक्तत्वं दर्शितम्। पुरुषर्षभेति त्वमप्येतदनुभवितुं योग्योऽसि सर्वपुरुषश्रेष्ठत्वादिति सूचयति। उपाधित्रयत्यागादेव समे दुःखसुखे यस्य तम्। नहि समाधिस्थस्य सुखाय दुःखाय वा शीतोष्णस्पर्शौ भवत इति युक्तमस्य समदुःखसुखत्वम्। धीरं ध्यायिनं योगिनं न व्यथयन्ति। सोऽमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते योग्यो भवति।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
तत्प्रतीकारप्रयत्नादपि तत्सहनमेवोचितं महाफलत्वादित्याह यमिति। एते मात्रास्पर्शाः यं पुरुषं न व्यथयन्ति नाभिभवन्ति। समे सुख दुःखे यस्य तम्। स तैरविक्षिप्यमाणो धर्मज्ञानद्वारा अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते योग्यो भवति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
तत्क्षमा किमर्थेति किं दृष्टार्थत्वात् उतादृष्टार्थत्वात् उत स्वरसवाहित्वेनावर्जनीयत्वात्। न प्रथमः दुःखरूपतयोपलम्भात् न द्वितीयः गुरुवधकुलक्षयादिरूपाधर्मबहुलत्वात् न तृतीयः युद्धान्निवृत्त्यैव शस्त्रपाताद्यभावादिति भावः। तितिक्षार्हत्वद्योतनायधीरम् इति पदम्। सुखदुःखवैषम्याज्ञत्वभ्रमं तयोः समपरिमाणत्वादिभ्रमं च व्युदस्यन् किमर्थेति शङ्कां च प्रतिवदति अवर्जनीयदुःखं सुखवन्मन्यमानमिति। यथा ह्यारोग्यताम औषधादिक्लेशं सुखसाधनत्वात्सुखवन्मत्वा प्रवर्तते यथा चार्थार्थी समुद्रतरणादिक्लेशम् तथा तापत्रयनिवृत्तिं निरतिशयानन्दं च लिप्सुः तदुपायनान्तरीयकदुःखं सुखवदेव मन्येतेति भावः। तस्करादिष्वपि सम्भावितस्य द्वन्द्वतितिक्षामात्रस्य मोक्षे हेतुत्वव्युदासायोक्तंअमृतत्वसाधनतयेत्यादि।एते इत्यस्य तात्पर्यमवर्जनीयत्वं च दर्शयितुमुक्तंतदन्तर्गता इति। व्यथयन्ति अप्राप्तत्वधिया परितापेन चालयन्तीत्यर्थः न तु पीडयन्तीति।मृदुक्रूरस्पर्शा इति। मृदुस्पर्शस्याप्युपाद्रानात्। यत्तच्छब्दरूपपरोक्षनिर्देशेनपुरुषर्षभ इति विपरीतकाक्वा च फलितमाह स एवेति।त्वादृशः अस्थानस्नेहाद्याकुलः। अनन्तरश्लोकार्थप्रसङ्गायात्मनाशप्रतीकारनैरपेक्ष्याय च निगमयति आत्मनां नित्यत्वादिति।एतावदिति तितिक्षामात्रं न तु शोकादि।अत्रेति आगमापायिनां तत्त्वज्ञानेन निवर्तिष्यमाणसन्तानानां अमृतत्वलक्षणपरमपुरुषार्थोपायानुष्ठानेऽवर्जनीयसन्निधीनां सन्नपातादिदुःखानामागतावित्यर्थः।कर्तव्यमिति अकरणे त्वपवर्गरूपफलाभावः स्वधर्मपरित्यागेन प्रत्यवायः धैर्याद्यभावनिमित्ताकीर्त्यादिप्रसङ्गश्च स्यादिति भावः।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
अतो मात्रास्पर्शानां विफलीकरणतो भवत्प्रयोजनमाह अत इति। दुःखाभावस्य युद्धाकरणेनैव सम्भवात्किं तत्कृत्वा प्रसक्तदुःखाभावायाभिमानत्यागेनेत्येतदाशङ्कापरिहारायेति शेषः। पूर्वश्लोके तितिक्षस्वेतिपदं सहस्वेति कैश्चिद्व्याख्यातम् तदसत्। तदनुवादे विफलीकरणस्यैव प्रतीतेरिति भावेनाद्यपादं व्याख्याति यमि ति। न व्यथयन्ति न चालयन्ति न शीतोष्णसुखदुःखलक्षणवैषम्यवन्तं कुर्वन्तीत्यर्थः। स्त्रीणामप्येवंविधानां मैत्रेयीप्रमुखानाममृतत्वश्रवणात्पुरुषमिति विशेषणमयुक्तमित्यतोऽन्यथा व्याचष्टे पुरी ति शरीरसबन्धिनमेव सन्तं शरीरदर्शनवन्तमित्यर्थः। एतदपि किमर्थं विशेषणमित्यत आह शरीरे ति। सुप्त्यादौ सर्वेषां प्राकृतानामप्यभिमानाभावेन व्यथाभावादमृतत्वप्रसक्तिरित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमित्यर्थः। ननु यस्य देहादावभिमानो नास्ति तस्य दुःखं सुखं च नास्तीत्युक्तं तस्य कथंसमदुःखसुखं धीरं इति विशेषणद्वयम् अस्य पूर्वकक्ष्यागतत्वादित्याशङ्क्य तदुपायप्रदर्शनार्थं पूर्वावस्थानुवादोऽयमिति क्रमेण पृच्छापूर्वकमाशयमाह कथमि ति। येनाभिमानत्यागेन मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति स कथं केनोपायेन भवतीत्यर्थः। दुःखं यथानुपादेयमपुरुषार्थत्वात् तथा वैषयिकं सुखमप्यमृतत्वविरोधित्वादनुपादेयं यस्य स समदुःखसुखः। एवम्भावे च कथं सुखहेतुषु शोभनाध्यासलक्षणस्तद्विरोधिषु द्वेषलक्षणोऽभिमान स्यादिति भावः। तत्समदुःखसुखत्वमेव कथं केनोपायेन भवतीत्यर्थः धैर्येणे ति सुखे दुःखे च प्राप्ते सति तत्कार्ययोरुत्सेकविषादयोः स्तम्भकेन प्रयत्नेनेत्यर्थः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
नन्वन्तःकरणस्य सुखदुःखाद्याश्रयत्वे तस्यैव कर्तृत्वेन भोक्तृत्वेन च चेतनत्वमभ्युपेयम् तथाच तद्व्यतिरिक्ते तद्भासके भोक्तरि मानाभावान्नाममात्रे विवादः स्यात् तदभ्युपगमे च बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः अन्तःकरणस्य सुखदुःखाश्रयत्वेन बद्धत्वात् आत्मनश्च तद्व्यतिरिक्तस्य मुक्तत्वादित्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह भगवान् यं स्वप्रकाशत्वेन स्वतएव प्रसिद्धंअत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति इति श्रुतेः। पुरुषं पूर्णत्वेन पुरि शयानंस वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैतेन किंचनानावृतं नैतेन किंचनासंवृतम् इति श्रुतेः। समदुःखसुखं समे दुःखसुखे अनात्मधर्मतया भास्यतया च यस्य निर्विकारस्य स्वयंज्योतिषस्तम्। सुखदुःखग्रहणमशेषान्तःकरणपरिणामोपलक्षणार्थम्।एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् इति श्रुत्या वृद्धिकनीयस्तारूपयोः सुखदुःखयोः प्रतिषेधात्। धीरं धियमीरयतीति व्युत्पत्त्या चिदाभासद्वारा धीतादात्म्याध्यासेन धीप्रेरकम्। धीसाक्षिणमित्यर्थः।स धीरः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति इति श्रुतेः। एतेन बन्धप्रसक्तिर्दर्शिता। तदुक्तम्यतो मानानि सिध्यन्ति जाग्रदादित्रयं तथा। भावाभावविभागश्च स ब्रह्मास्मीति बोध्यते इति। एते सुखदुःखदा मात्रास्पर्शाः हि यस्मान्न व्यथयन्ति परमार्थतो न विकुर्वन्ति सर्वविकारभासकत्वेन विकारायोग्यत्वात्सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः इति श्रुतेः। अतः स पुरुषः स्वस्वरूपभूतब्रह्मात्मैक्यज्ञानेन सर्वदुःखोपादानतदज्ञाननिवृत्त्युपलक्षिताय निखिलद्वैतानुपरक्तस्वप्रकाशपरमानन्दरूपाय अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते। योग्यो भवतीत्यर्थः। यदि ह्यात्मा स्वाभाविकबन्धाश्रयः स्यात्तदा स्वाभाविकधर्माणां धर्मिनिवृत्तिमन्तरेणानिवृत्तेर्न कदापि मुच्येत। तथाचोक्तम्आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्मा काङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम्। नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः।। इति। प्रागभावासहवृत्तेर्युगपत्सर्वविशेषगुणनिवृत्तेर्धर्मिनिवृत्तेर्नान्तरीयकत्वदर्शनात्। अथात्मनि बन्धो न स्वाभाविकः किंतु बुद्ध्याद्युपाधिकृतःआत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः इति श्रुतेः। तथाच धर्मिसद्भावेऽपि तन्निवृत्त्या मुक्त्युपपत्तिरितिचेत् हन्त तर्हि यः स्वधर्ममन्यनिष्ठतया भासयति स उपाधिरित्यभ्युपगमाद्बुद्ध्यादिरुपाधिः स्वधर्ममात्मनिष्ठतया भासयतीत्यायातम्। तथाचायातं मार्गे बन्धस्यासत्यत्वाभ्युपगमात् नहि स्फटिकमणौ जपाकुसुमोपधाननिमित्तो लोहितिमा सत्यः अतः सर्वसंसारधर्मासंसर्गिणोऽप्यात्मन उपाधिवशात्तत्संसर्गित्वप्रतिभासो बन्धः। स्वस्वरूपज्ञानेन तु स्वरूपाज्ञानतत्कार्यबुद्ध्याद्युपाधिनिवृत्त्या तन्निमित्तनिखिलभ्रमनिवृत्तौ निर्मृष्टनिखिलभास्योपरागतया शुद्धस्य स्वप्रकाशपरमानन्दतया पूर्णस्यात्मनः स्वत एव कैवल्यं मोक्ष इति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः। अतएवनाममात्रे विवादः इत्यपास्तम् भास्यभासकयोरेकत्वानुपपत्तेः।दुःखी स्वव्यतिरिक्तभास्यः भास्यत्वात् घटवत् इत्यनुमानात् भास्यस्य भासकत्वादर्शनात् एकस्यैव भास्यत्वे भासकत्वे च कर्तृकर्मविरोधादात्मनः कथमिति चेत्। न। तस्य भासकत्वमात्राभ्युपगमात्। अहं दुःखीत्यादिवृत्तिसहिताहंकारभासकत्वेन तस्य कदापि भास्यकोटावप्रवेशात्। अतएवदुःखी न स्वातिरिक्तभासकापेक्षः भासकत्वात् दीपवत् इत्यनुमानमपि न। भास्यत्वेन स्वातिरिक्तभासकसाधकेन प्रतिरोधात्। भासकत्वं च भानकरणत्वं स्वप्रकाशभानरूपत्वं वा। आद्ये दीपस्येव करणान्तरानपेक्षत्वेऽपि स्वातिरिक्तभानसापेक्षत्वं दुःखिनो न व्याहन्यते। अन्यथा दृष्टान्तस्य साध्यवैकल्यापत्तेः। द्वितीये त्वसिद्धो हेतुरित्यधिकबलतया भास्यत्वहेतुरेव विजयते बुद्धिवृत्त्यतिरिक्तभानानभ्युपगमात्। बुद्धिरेव भानरूपेतिचेत्। न। भानस्य सर्वदेशकालानुस्यूततया भेदकधर्मशून्यतया च विभोर्नित्यस्यैकस्य चानित्यपरिच्छिन्नानेकरूपबुद्धिपरिणामात्मकत्वानुपपत्तेः उत्पत्तिविनाशादिप्रतीतेश्चावश्यकल्प्यविषयसंबन्धविषयतयाप्युपपत्तेः। अन्यथा तत्तज्ज्ञानोत्पत्तिविनाशभेदादिकल्पनायामतिगौरवापत्तेरित्याद्यन्यत्र विस्तरः। तथाच श्रुतिःनहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःमहद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवतदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यभयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः इत्याद्या विभुनित्यस्वप्रकाशज्ञानरूपतामात्मनो दर्शयति। एतेनाविद्यालक्षणादप्युपाधेर्व्यतिरेकः सिद्धः। अतोऽसत्योपाधिनिबन्धनबन्धभ्रमस्य सत्यात्मज्ञानान्निवृत्तौ मुक्तिरिति सर्वमवदातम्। पुरुषर्षभेति संबोधयन्स्वप्रकाशचैतन्यरूपत्वेन पुरुषत्वं परमानन्दरूपत्वेन चात्मन ऋषभत्वं सर्वद्वैतापेक्षया श्रेष्ठत्वमजानन्नेव शोचसि अतः स्वस्वरूपज्ञानादेव तव शोकनिवृत्तिः सुकरातरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरिति सूचयति। अत्र पुरुषमित्येकवचनेन सांख्यपक्षो निराकृतः। तैः पुरुषबहुत्वाभ्युपगमात्।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
नन्वेतेषां सहनं किंफलकमित्याकाङ्क्षायामाह यं हि न व्यथयन्त्येत इति। हे पुरुषर्षभ पुरुषश्रेष्ठ स्वतन्त्रमोक्षसाधनकारणसमर्थ यं पुरुषं समदुःखसुखं समे दुःखसुखे वियोगसंयोगौ यस्य एतादृशं धीरं तत्सहनसमर्थमेते मात्रास्पर्शाः न व्यथयन्ति न पराभवन्ति स पुरुषः अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते। यद्वा मोक्षभावाय भक्त्यर्थं कल्पते योग्यो भवति। भक्तिप्राप्तियोग्यो भवतीत्यर्थः। समदुःखत्वेन तदिच्छया सर्वमानन्दरूपमेवाभाति इति व्यञ्जितम्।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
सहनमेवाऽमृतत्वे हेतुरित्याह यं हीति। न व्यथयन्ति धीरं सोऽमृतत्वाय क्षमो भवति।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
2.15 What will happen to one who bears cold and heat? Listen: Verily, the person৷৷.,'etc. (O Arjuna) hi, verily; yam purusam, the person whom; ete, these, cold and heat mentioned above; na, do not; vyathayanti, torment, do not perturb; dhiram, the wise man; sama-duhkha-sukham, to whom sorrow and happiness are the same, who is free from happiness and sorrow when subjected to pleasure and pain, because of his realization of the enternal Self; sah, he, who is established in the realization of the enternal Self, who forbears the opposites; kalpate, becomes fit; amrtattvaya, for Immortality, for the state of Immortality, i.e. for Liberation.
Dr. S. Sankaranarayan
20th century CE · Academic / Shaiva
Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.
2.15 But, because all these different situations are of the nature of coming and going, on that account itself are they not to be lamented on ? It is not so. As for instance : What is this which is termed 'coming' ? If it is 'birth', what is that 'birth' itself ? It is wrong to say that is the same as gaining the self by what is non-existent. For, to be of the nature of non-existence, is indeed to be devoid of every inherent nature and to be devoid of the very self. If a thing is devoid of the self and devoid of every nature, how is it possible to convert it into what has an intrinsic nature ? Surely, it is impossible to convert the non-blue into blue. For, it is faulty and undesirable to covert the non-blue into blue. For, it is faulty and undesirable to conclude that a thing with certain in nature changes to be of a different nature. Hence the scritpure goes - 'The intrinsic nature of beings would not cease to exist, e.g., the heat of the sun'. On the other hand, if the 'birth' signifies the gaining of self just by what [really] exists, even then, why the lamentability on its coming ? For, what has gained a self, could never be non-existent and conseently it would be eternal. Likewise, is the act of 'going' also meant for the existent or the non-existent ? What is non-existent is just non-existent [for ever.] How can there be a non-existence-nature even in the case of that which is of the existence-nature ? If it is said that it is of the non-existence-nature in the second moment; [since its birth], then it should be so even in the first moment; and so nothing would be existent. For, the intrinsic nature [ever] remains unabandoned. But is it not that the destruction of it (i.e., of a given thing, like a pot) is brought about by the stroke of a hammer etc.? Yet, if that destruction is altogether different [from the existent one i.e. the pot], then what does it matter for what is existent ? But, it is not be seen [at that time] ? Yet, what is actually existent (pot) may not be seen just as when it is covered with a cloth; but it has not turned to be altogether different. In fact, it has been said [in the scriptures] that this is not different [from the existent]. Summarising all these, [the Lord] says -
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
2.15 That person endowed with courage, who considers pain as inevitable as pleasure, and who performs war and such other acts suited to his station in life without attachment to the results and only as a means of attaining immortality - one whom the impact of weapons in war etc., which involve soft or harsh contacts, do not trouble, that person only attains immortality, not a person like you, who cannnot bear grief. As the selves are immortal, what is to be done here, is this much only. This is the meaning. Because of the immortality of the selves and the natural destructibility of the bodies, there is no cause for grief. It was told (previously): 'The wise grieve neither for the dead nor for the living' (2. 11). Now the Lord elucidates the same view.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 2.15?
यं हि पुरुषं समे दुःखसुखे यस्य तं समदुःखसुखं सुखदुःखप्राप्तौ हर्षविषादरहितं धीरं धीमन्तं न व्यथयन्ति न चालयन्ति नित्यात्मदर्शनाद् एते यथोक्ताः शीतोष्णादयः स नित्यात्मस्वरूपदर्शननिष्ठो द्वन्द्वसहिष्णुः अमृतत्वाय अमृतभावाय मोक्षायेत्यर्थः कल्पते समर्थो भवति।। इतश्च शोकमोहौ अकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तं यस्मात्
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 2.15, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.