
“सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। — VaniSagar”
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எல்லாக் கடமைகளையும் கைவிட்டு என்னிடமே அடைக்கலம் புகுங்கள்; நான் உன்னை எல்லா பாவங்களிலிருந்தும் விடுவிப்பேன்; வருத்தப்பட வேண்டாம்.
सर्व कर्तव्ये सोडून फक्त माझाच आश्रय घ्या; मी तुला सर्व पापांपासून मुक्त करीन; दु:ख करू नका.
સર્વ કર્તવ્યોનો ત્યાગ કરીને એકલા મારામાં શરણ લે; હું તમને બધા પાપોમાંથી મુક્ત કરીશ; શોક કરશો નહીં.
সমস্ত কর্তব্য পরিত্যাগ করে একমাত্র আমারই আশ্রয় গ্রহণ কর; আমি তোমাকে সমস্ত পাপ থেকে মুক্ত করব; দুঃখ করবেন না
सब कर्तव्य त्यागि हमरा असगर शरण मे जाउ; हम अहाँकेँ सभ पापसँ मुक्त कऽ देब। शोक नहि करू।
सारे कर्त्तब्बें गी त्यागिये अकेले मेरी शरण लैओ; मैं तुगी सारे पापें कोला मुक्त करगा; शोक मत करो।
ꯊꯧꯗꯥꯡ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛ ꯊꯥꯗꯣꯛꯇꯨꯅꯥ ꯑꯩ ꯈꯛꯇꯗꯥ ꯉꯥꯀꯄꯤꯌꯨ; ꯑꯩꯅꯥ ꯅꯈꯣꯌꯕꯨ ꯄꯥꯞ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛꯇꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯀꯍꯅꯒꯅꯤ; ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯐꯥꯑꯣꯒꯅꯨ꯫
সকলো কৰ্তব্য পৰিত্যাগ কৰি কেৱল মোৰ আশ্ৰয় লোৱা; মই তোমাক সকলো পাপৰ পৰা মুক্ত কৰিম; শোক নকৰিবা।
सगळीं कर्तव्यां सोडून फकत माझ्याच आलाशिरो घे; हांव तुका सगळ्या पातकांतल्यान मुक्त करतलों; दुख्ख करुंक नाका.
ಎಲ್ಲಾ ಕರ್ತವ್ಯಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸಿ ಮತ್ತು ನನ್ನಲ್ಲಿ ಮಾತ್ರ ಆಶ್ರಯ ಪಡೆಯಿರಿ; ನಾನು ನಿನ್ನನ್ನು ಎಲ್ಲಾ ಪಾಪಗಳಿಂದ ಬಿಡುಗಡೆ ಮಾಡುತ್ತೇನೆ; ದುಃಖಿಸಬೇಡ.
అన్ని విధులను విడిచిపెట్టి, నన్ను మాత్రమే ఆశ్రయించండి; నేను నిన్ను అన్ని పాపాల నుండి విముక్తి చేస్తాను; దుఃఖించకు.
എല്ലാ കടമകളും ഉപേക്ഷിച്ച് എന്നെ മാത്രം ശരണം പ്രാപിക്കുക; ഞാൻ നിന്നെ എല്ലാ പാപങ്ങളിൽനിന്നും മോചിപ്പിക്കും; ദുഃഖിക്കരുത്.
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय? धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है -- इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा।स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना -- यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता जैसे -- पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सारसँभाल भी पतिके नाते? पतिके लिये ही करती है। वह घर? कुटुम्ब? वस्तु? पुत्रपुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती? प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है? उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र? जाति? नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क हो जाता है।गीताके अनुसार यहाँ धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक स्वभावज कर्म शब्द आये हैं? फिर सैंतीलीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें स्वधर्म शब्द आया है। उसके बाद? सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें कर्म शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें कर्म शब्द आया है और बीचमें स्वधर्म शब्द आया है तो इससे स्वतः ही धर्म शब्द कर्तव्यकर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है।अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि सर्वधर्मान्परित्यज्य पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्यकर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसङ्गके अनुसार ही ठीक है क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुनने कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं किया है? प्रत्युत करिष्ये वचनं तव (18। 73) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्यकर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है? प्रत्युत अपने क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धि भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ? दान? तप और अपनेअपने वर्णआश्रमोंके जो कर्तव्य हैं? उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये? प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये ।गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्यकर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्यकर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (2। 5) परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (2। 3138)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोंका त्याग नहीं है।अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना -- दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बारबार जन्ममरणको प्राप्त होते हैं -- एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है।अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ? तबतक तुम ठहर जाओ क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हूआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो? इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है। कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कितुम्हारेजैसे आततायीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है पाप नहीं और अभीअभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ? यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है? पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता? उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है। ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया।इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी।अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (2। 6)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थपरम्परा ही बढ़ेगी (2। 40 -- 44)। दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है? क्या धर्म है और क्या अधर्म है? इस पचड़ेमें तू क्यों पड़ता है तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही सर्वधर्मान्परित्यज्य का तात्पर्य है।मामेकं शरणं व्रज -- इन पदोंमें एकम् पद माम् का विशेषण नहीं हो सकता माम् (भगवान्) एक ही हैं? अनेक नहीं। इसलिये एकम् पदका अर्थ अनन्य लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात? अर्जुनने तदेकं वद निश्चित्य (3। 2) और यच्छ्रेय एतयोरेकम् (5। 1) पदोंमें भी एकम् पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी एकम् पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताना चाहते हैं कि सांख्ययोग? कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं? उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है।गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है।भगवान्ने गीतामें जगहजगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे? दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है (7। 14) अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ (8। 14) परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिसे ही होती है (8। 22) अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (9। 22) अनन्य भक्तिसे ही भगवान्को जाना? देखा तथा प्राप्त किया जा सकता है (11। 54) अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (12। 37) गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (14। 26)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। तात्पर्य है कि उपाय और उपेय? साधन और साध्य मैं ही हूँ।मामेकं शरणं व्रज का तात्पर्य मनबुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है? प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं? अलग नहीं रहते।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः -- यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं? उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता यक्तिसंगत नहीं है क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं? तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये,प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ? पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है? शरणागत होनेके बाद नहीं। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा -- इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों? वृत्तियों? आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ भगवत्प्रेम? भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता? अनधिकारिता? निर्बलता आदि मालूम होती है? तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्यशरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना? उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस? एक ही काम है वह काम है -- निर्भय? निःशोक? निश्चिन्त और निःशङ्क होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना परन्तु अगर तेरेमें भय? चिन्ता? वहम आदि दोष आ जायँगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायँगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलङ्क है।जैसे? विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं? तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्रह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारापीटा? पर वे मरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोंसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदरसत्कार किया और कहा कि महाराज इसने ब्रह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा? पर यह मरा नहीं। भगवान् रामने कहा कि हे ब्राह्मणों विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है? वह कैसे मारा जा सकता है और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें । भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्यर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली।तात्पर्य यह हुआ कि मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस अपनेपनके समान योग्यता? पात्रता?,अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटासा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये।, मा शुचः का तात्पर्य है -- (1) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है? यह मेरे प्रति अपराध है? तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कलङ्क है।मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास? भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ? अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे? छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है? चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है? प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय है और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त,है और चिन्ता करता है भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कलङ्क आता है मेरेपर? मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे।(2) तेरे भाव? वृत्तियाँ? आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा।(3) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धनधान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है? यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है(4) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोकपरलोक? सद्गतिदुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है --, दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्। अवधीरितशारदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि।। हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें? चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें? वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें? वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद् ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्युजैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।,शरणागतिसम्बन्धी विशेष बातशरणागत भक्त मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है? स्वीकार कर,लेता है तो उसके भय? शोक? चिन्ता? शङ्का आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तिकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखतापर ही टिके रहते हैं।भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं? जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं (टिप्पणी 973.1)। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है भय? शोक? चिन्ता? शङ्का? परीक्षा ओर विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।(1) निर्भय होना -- आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे भय पैदा होता है और साँप? बिच्छू? बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं? पतञ्जलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है और जो बड़ेबड़े विद्वानोंको भी होता है वह भय भी सर्वथा मिट जाता है ।अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी -- ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये क्योंकि मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ? अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है -- ममता मल जरि जाइ (मानस 7। 117क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका अब तो केवल भगवान्की कृपाहीकृपा है भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है यह बड़ी खुशीकी? बड़ी प्रसन्नताकी बात है,कई ऐसी शङ्का करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त -- ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है -- द्वितीयाद्वै भयं भवति (बृहदारण्यक0 1। 4। 2)। पर यह शङ्का निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है? पर आत्मीय से भय नहीं होता अर्थात भय दूसरेसे होता है? अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीरसंसार द्वितीय है? इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्नभिन्न है जैसे एक जड है और एक चेतन? एक विकारी है और एक निर्विकारी? एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील? एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक? इत्यादि।भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है? उनका स्वरूप है। अतः भगवान्के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है? पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान्का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है? पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं।(2) निःशोक होना -- जो बात बीत चुकी है? उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है क्योंकि जो हुआ है? वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है? वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है? वह ठीकठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है? फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है । प्रभुके इस मङ्गलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।(3) निश्चिन्त होना -- जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर देता है? तब उसको लौकिकपारलौकिक किञ्चिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवननिर्वाह कैसे होगा कहाँ रहना होगा मेरी क्या दशा होगी क्या गति होगी आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं । भगवान्के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी अर्थात् नहीं आयी क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं। वास्तवमें मेरी वृत्तियाँ है ऐसा मानना ही दोष है? वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? शरीर आदिमें जो मेरापन है -- यही गलती है क्योंकि जब मैं भगवान्के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया? तो फिर मन? बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं हैं -- ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसेहे मेरे नाथ हे मेरे प्रभो बचाओ बचाओ बचाओ ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं? मेरे सर्वप्रथम प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ और भगवान्ने भी कह दिया है कितू चिन्ता मत कर (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान्के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे -- हे नाथ यह सब आपके हाथकी बात है? आप जानें।सर्वप्रथम प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें -- ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब,भगवान् यह कहते हैं किमैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा? तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा मैं तो बस? आपका हूँ। हे भगवन् मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ शरीर? इन्द्रियाँ? प्राण? मन? बुद्धि -- ये कभी मेरे दीखें ही नहीं परन्तु हे नाथ सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभीकभी मेरे दीख जाते हैं अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये -- ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।(4) निःशङ्क होना -- भगवान्के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान्का हुआ या नहीं भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं प्रत्युत इस बातको देखे किमैं तो अनादिकालसे भगवान्का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग -- विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ? तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है -- मम एव अंशः (गीता 15। 7)। इस प्रकारमैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं -- इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शङ्काएँ -- सन्देह मिट जाते हैं? शङ्काओं -- सन्देहोंके लिये किञ्चिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।(5) परीक्षा न करना -- भगवान्के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे किजब मैं भगवान्के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसेऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसेऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान्के शरण कहाँ हुआ प्रत्युतअद्वेष्टा आदि (गीता 12। 13 -- 19) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी। ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी? मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वेष्टा आदि गुण जितने कम थे? उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं? वे सब बिना प्रयत्न किये जाते हैं।(6) विपरीत धारणा न करना -- भगवान्के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है किमैं भगवान्का नहीं हूँ क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान्का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है? वह अटूट है? अखण्ड है? नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया? यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी? तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती हैजो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिको स्वीकार कर लेता है? उसमें भय? शोक? चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है जैसेविवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्धविच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादीपरदादी बन जाती है? तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्दण्डता करती है? खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है? तब भगवान्के ही अंश इस प्राणीका भगवान्के साथ जो नित्य सम्बन्ध है? वह दृढ़ हो जाय -- इसमें आश्चर्य ही क्या है वास्तवमें भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धों का त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव? आचरण आदिकी किञ्चित कमी रह जाय? कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किञ्चित् कोई दुष्कर्म हो जाय? तो उसके हृदयमें जलन पैदा हो जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं ।भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं? गुणों और अवगुणोंको नहीं अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं? उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है? वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगन्तुक होनेसे आतेजाते रहते हैं और वह नित्य निरन्तर ज्योंकात्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे? कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है? तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेकी मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे? पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं? उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी? तभी केशोंको बाँधूँगी परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है? भगवान् चट आ चाते हैं क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं -- (1) भगवान् मेरे हैं और (2) मैं भगवान् का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भीभगवान् मेरे हैं -- इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा है किभगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते परन्तुमैं भगवान्का हूँ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलता की इच्छा नहीं हो सकती क्योंकिमैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें? वैसा ही निःसंकोच होकर करें। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे? भगवान्पर अपना किञ्चित भी आधिपत्य न माने? प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीँ भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता? प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है। शरणागत भक्त शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर दिया जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने? कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिनसेकठिन और भयंकरसेभंयकर घटना? परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है मस्त रहता है। जैसे? गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मणशरीरकी कथा सुनायी? जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं? प्रत्युत मनहीमन बोल उठे -- उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन (मानस 7। 113। 1)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी? तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यारा भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया -- मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध? अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे? वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे? उसमें एक योजनापर्यन्त मायाका कण्टक किञ्चिन्मात्र भी नहीं आयेगा आदिआदि। इस प्रकार बहुतसे आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई किहे ऋषे तुमने जो कुछ कहा? वह सब सच्चा होगा? यह मन? वाणी? कर्मसे मेरा भक्त है। इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है --, भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।। (मानस 7। 114 ख)यहाँभजन प्रताप शब्दोंका अर्थ है -- भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीतसेविपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिकसेअधिक बढ़ती रहती है क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है? सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं -- सब मम प्रिय सब मम उपजाए (मानस 7। 86। 2) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ? यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण? अखणडितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना -- इन तीन बातोंके लिये समयसमयपर अवतार लेते हैं (गीता 4। 8)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है? नहीं तो भक्तोंकी रक्षा? दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता? कृपालुता? प्रियता? हितैषिता? सुहृत्ता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है? और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं -- मद्भक्तो भव? मन्मना भव? मद्याजी भव? मां नमस्कुरु। इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है? जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ क्योंकि दुःख? संताप? बारबार जन्मनामरना? मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं? वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं -- बस? भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय? तो फिर उसके लिये क्या करना बाकी रहा जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़पन है? इसीलिये भगवान् सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं -- सुहृदं सर्वभूतानाम् (5। 29) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं? उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख? संताप,आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग? ज्ञानयोग? भक्तियोग? अष्टाङ्गयोग? लययोग? हठयोग? राजयोग? मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं? वे सबकेसब भगवान्के द्वारा और भगवत्तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं । अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओतप्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है? पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए? भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ? अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुईँ? आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदेफाँदे? किधर भी जाय? बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें? प्रेम दें या न दें? वृत्तियोंको ठीक करें या न करें? हमें शुद्ध बनायें या न बनायें -- यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे? चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथपैर समेटकर केवल भगवान्का चिन्तन? नामजप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है? उसमें परम प्रसन्न रहता है? अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।जैसे? कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी? फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ? सकोरा? मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये? उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी? मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है? भगवत्कृपा उसको अपनेआप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है? अपना बल मानता है? उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण? विचित्र? अखण्ड? अटूट कृपा आती है? अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है? वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया(संसार) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मतेमरते रहते हैं परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं? वे मायाको तर जाते हैं -- मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते (गीता 7। 14)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है? तभी तो वे कहते हैं -- मामेकं शरणं व्रज। जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायासे फँस जाते हैं।जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है? उस कीलके आसपास रहनेवाले दाने ज्योंकेत्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्ममरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सबकेसब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं,परन्तु जिसके आधारपर संसारचक्र चलता है? उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है -- कोई हरिजन ऊबरे? कील माकड़ी पास। परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है? वही जन्ममरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।संसार और भगवान् -- इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है? गुलाम बनाता है? पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है? चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिककिसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है? यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या? बुद्धि? धनसम्पत्ति? त्याग? वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता? दासता ही है। जैसे? कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई? खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है? पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है? उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं? पददलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है? उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं? प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता? विलक्षणता? विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें? तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती? अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता? उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसीकिसीमें यहाँ तक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये? अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छोटासा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये।ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्धविच्छेद करके? असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है? तब उसके शरीर? इन्द्रियाँ? मन? प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती? तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उतर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ? लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है? पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं।भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है? पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभुशरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है वे कितना अधिक प्यार करती हैं? इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।दूसरी बात? प्रेमभावसे परिपूरित प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं? तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं? जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता,है परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है? तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं? पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उनका बड़ा भारी पतन हो जाता है क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है? इसलिये वह महान् अधम है।तीसरी बात? जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है? वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं? पर जहाँ केवल लक्ष्मीकी चाहना है? वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायँ -- यह नियम नहीं है।शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी? रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे। उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमलकोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयीनयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले -- देखो हनुमान् यह लता कितनी सुन्दर है वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है यह लता अपने सुन्दरसुन्दर फल? सुगन्धित फूल और हरीभरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख,रहा है इतना ही नहीं? इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशुपक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लताभगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रसंशा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं -- देखो बेटा हनुमान् तुमने खयाल किया कि नहीं देखो? इस लताका ऊपर चढ़ जाना? फूलपत्तोंसे छा जाना? तन्तुओंका फैल जाना -- ये सब वृक्षके आश्रित हैं? वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण हैं। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है कैसे छा सकती है अब बोलो हनुमान् तुम्हीं बातओ? महिमा वृक्षकी ही हुई न रामजीने कहा -- क्यों हनुमान् यह महिमा तो लताकी ही हुई न, हनुमान्जी बोले -- हमें तीसरी ही बात सूझती है। सीताजीने पूछा -- वह क्या है बेटा हनुमान्जीने कहा -- माँ वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया(चरणोंके आश्रय) में रहना ही अच्छा लगता हैसेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। (मानस 4। 3। 2)ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति -- दोनों ही एकदूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है? कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति -- दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है।एक बार एक प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारेकिनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमे गिर पड़े।,हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं? अब तैरें तो किधर तैरें भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चले पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है? उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय? उसीमें वह प्रसन्न रहता है।बहुतसी भेड़बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरतेचरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामें निकलनेमें बहुत देर लगी? तबतक अन्य सब भेड़बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमतेघूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गीली जमीनपर सिंहका एक चरणचिन्ह अङ्कित था। वह उस चरणचिन्हके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार? भेड़िया? बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया किपहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ? तब मुझे खाना वे चिन्हको देखकर कहने लगे -- अरे? यह तो सिंहके चरणचिन्हके शरण है? जल्दी भागो यहाँसे सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा। इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें जिसका चरणचिन्ह था? वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला -- तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है बकरीने कहा -- यह चरणचिन्ह देख लेना? फिर बात करना। जिसका यह चरणचिन्ह है? उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ। सिंहने देखा किओह यह तो मेरा ही चरण चिन्ह है? यह,बकरी तो मेरे ही शरण हुई सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत? निर्भय होकर रहो।रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा -- तू इस बकरीको पीठपर चढ़ा ले इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर? नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ मार डालूँगा सिंहकी बात सुनकर हाथी थरथर काँपने लगा उसने अपनी सूँडसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठेबैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती। खोज पकड़ सैंठे रहो? धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े? निर्भय कोंपल खाय।।ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है? उनके चरणोंका सहारा ले लेता है? तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे? विघ्नबाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता? उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो जाको शरणो गहै? ताकहँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले? बह्यो जात गजराज।।भगवान्के साथ काम? भय? द्वेष? क्रोध? स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय? वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है । तात्पर्य यह हुआ कि काम? भय? द्वेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया? उनका तो उद्धार हो ही गया? पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा? उदासीन ही रहे? वे भगवत्प्राप्तिसे वञ्चित रह गये भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा --, नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः। (नारदभक्तिसूत्र 72)उन भक्तोंमें जाति? विद्या? रूप? कुल? धन? क्रिया आदिका भेद नहीं है।तात्पर्य यह है कि स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति? विद्या आदि भेद हो सकते हैं? वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं । कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं -- यतस्तदीयाः (नारदभक्तिसूत्र 73)? संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वेअच्युत गोत्र के ही कहलाते हैं ।शरणागतिका रहस्यशरणागतिका रहस्य क्या है -- इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है? उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं? इसलिये ऐसी बातको कहनेसुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं --, (1) मामेकं शरणं व्रज (18। 66)अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। (2) स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत (15। 19)वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है? तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत (18। 62)तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।हम भगवान्के शरण कैसे हो जायँ केवल एक भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् भगवान्के गुण? ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायँ अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं? प्रभाव हैं? तत्त्व हैं? रहस्य हैं? महिमा है? लीलाएँ हैं? नाम हैं? धाम हैं भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है? माधुर्य है? सौन्दर्य है -- इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है किमैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं। अगर वह गुण? प्रभाव आदिकी तरफ देखकर भगवान्की शरण लेता है? तो वास्तवमें वह गुण? प्रभाव आदिके ही शरण हुआ? भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।उलटा अर्थ लगाना क्या है भगवान्के गुण? प्रभाव? नाम? धाम? ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है? इनकी तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं? न भजन करना है? न भगवान्के गुण? प्रभाव? लीला आदि सुननी है? न भगवान्के धाममें जाना है -- यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है -- केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्यसम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर? कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं? तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं? मेरे हैं । भगवान् की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य? गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे? ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे? तो हमारी असली शरणागति होगी।जहाँ गुण? प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं? वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते? प्रत्युत गुण? प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं जैसे -- कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं? रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं? मिनिस्टरी(पद) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है? उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति(धनी आदि) का आदर करे तो इससे धनीका धन या मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी -- यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण? प्रभाव आदि चले जायँगे -- ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये? उनके गुणों आदिपर नहीं।सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सद्गुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा? तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया -- महादेव अवगुन भवन विष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।। (मानस 1। 80)ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी --, ऊधौ मन माने की बात। दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल? बिषकीरा बिष खात।। जो चकोर को दै कपूर कोउ?, तजि अंगार अघात। मधुप करत घर कोरे काठमें?, बँधत कमल के पात।। ज्यों पतंग हित जान आपनो?, दीपक सों लपटात। सूरदास जाको मन जासों? ताको सोइ सुहात।।भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको? उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति? ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है? पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं? वह प्रेमीभक्त भगवान्को बाँध भी सकता है? उनकी बिक्री भी कर सकता है भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है? मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं? तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उन कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है? तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायँगे? भगवान्के अपने हो जायँगे।पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले? वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है? उसे,तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है? उस मैयाको भगवान् क्या दें तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये? उन्हें अपनेआपको ही दे दिया मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने रग जाते हैं कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव? ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्से मुक्ति चाहता है? उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं? पर जो कुछ भी नहीं चाहता? उसे भगवान् अपनेआपको ही दे देते हैं।सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है? इन्द्रियाँ वशमें हैं? मन शुद्धनिर्मल है? बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं? हम पढ़ेलिखे हैं? हम यशस्वी हैं? हमारा संसारमें मान है -- इस प्रकारहम भी कुछ हैं ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये हमारा मन ऐसा होना चाहिये हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये हमारे जीवनमें ऐसे लक्षण आने चाहिये हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथाकीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगें? कण्ठ गद्गद हो जाय पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए आदिआदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण हो जाता है? वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है मन चञ्चल है कि स्थिर है बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है योग्यता है कि अयोग्यता है आदि। इन सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ाकरकट हैं? जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया? पर भक्तोंके गुण (गीता 12। 13 -- 19) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराशा हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैरविरोध करें? चाहे द्वेष करें? चाहे ममता करें? चाहे जो कुछ करें यह अर्थ बिलकुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सबकेसब गुण अपनेआप ही आयेंगे? पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचेऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसेऐसे होते हैं? तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसेऐसे होते हैं।प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया उसपर दुःख क्यों आ गया उसका बेटा क्यों मर गया उसका धन क्यों चला गया उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया उसका निरादर क्यों हो गया आदिआदि। ऐसी कसौटी लगाना बिलकुल फालतू बात है? बड़े नीचे दर्जेकी बात है। ऐसे लोगोंको क्या समझायें वे सत्सङ्गके नजदीक ही नहीं आये? इसीलिये उनको इस बातका पता ही नहीं है कि भक्ति क्या होती है शरणागति क्या होती है वे इन बातोंको समझ ही नहीं सकते। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भगवान्का भक्त दरिद्र होता ही है? उसका संसारमें अपमान होती ही है? उसकी निन्दा होती ही है। शरणागत भक्तको तो निन्दाप्रशंसा? रोगनिरोगअवस्था आदिसे कोई मतलब ही नहीं होता। इनकी तरफ वह देखता ही नहीं। वह यही देखता है कि मैं हूँ और भगवान् हैं? बस। अब संसारमें क्या है? क्या नहीं है? त्रिलोकीमें क्या है? क्या नहीं है? प्रभु ऐसे हैं? वे उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय करनेवाले हैं -- इन बातोंकी तरफ उसकी दृष्टि जाती ही नहीं।किसीने एक सन्त से पूछा -- आप किस भगवान्के भक्त हैं जो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय करते हैं? उनके भक्त हैं क्या तो उस सन्तने उत्तर दिया -- हमारे भगवान्का तो उत्पत्ति? स्थिति? प्रलयके साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं। यह तो हमारे प्रभुका ऐश्वर्य है। यह कोई विशेष बात नहीं है। शरणागत भक्तको ऐसा होना चाहिये। ऐश्वर्य आदिकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं होनी चाहिये।ऋषिकेशमें गङ्गाजीके किनारे शामको सत्सङ्ग हो रहा था। गरमी पड़ रही थी। उधरसे गङ्गाजीकी ठण्डी हवाकी लहर आयी तो एक सज्जनने कहा -- कैसी ठण्डी हवाकी लहर आ रही है पास बैठे दूसरे सज्जनने उनसे कहा -- हवाको देखनेके लिये तुम्हें समय कैसे मिल गया यह ठण्डी हवा आयी? यह गरम हवा आयी -- इस तरफ तुम्हारा खयाल कैसे चला गया भगवान्के भजनमें लगे हो तो हवा ठण्डा आयी या गरम आयी? सुख आया या दुःख आया -- इस तरफ जब तक खयाल है? तबतक भगवान्की तरफ खयाल कहाँ इसी विषयमें हमने एक कहानी सुनी है। कहानी तो नीचे दर्जेकी है पर उसका निष्कर्ष बड़ा अच्छा है।एक कुलटा स्त्री थी। उसको किसी पुरुषसे संकेत मिला कि इस समय अमुक स्थानपर तुम आ जाना। अतः वह समयपर अपने प्रेमीके पास जा रही थी। रास्तेमें एक मस्जिद पड़ती थी। मस्जिदकी दीवारें छोटीछोटी थीं। दीवारके पास ही वहाँका मौलवी झुककर नमाज पढ़ रहा था। वह कुलटा अनजानेमें उसके ऊपर पैर,रखकर निकल गयी। मौलवीको बड़ा गुस्सा आया कि कैसी औरत है यह इसने मेरेपर जूतीसहित पैर रखकर मेरेको नापाक (अशुद्ध) बना दिया वह वहीं बैठकर उसको देखता रहा कि कब आयेगी। जब वह कुलटा पीछे लौटकर आयी? तब मौलवीने उसको धमकाया किकैसी बेअक्ल हो तुम हम परवरदिगारकी बंदगीमें बैठे थे? नमाज पढ़ रहे थे और तुम हमारेपर पैर रखकर चली गयी तब वह बोली -- मैं नरराची ना लखी? तुम कस लख्यो सुजान। पढ़ि कुरान बौरा भया? राच्यो नहिं रहमान।।अर्थात् एक पुरुषके ध्यानमें रहनेके कारण मेरेको इसका पता ही नहीं लगा कि सामने दीवार है या कोई मनुष्य है? पर तू तो भगवान्के ध्यानमें था? फिर तूने मेरेको कैसे पहचान लिया कि वह यही थी तू केवल कुरान पढ़पढ़कर बावला हो गया है। अगर तू भगवान्के ध्यानमें रचा हुआ होता तो क्या मुझे पहचान लेता कौन आया? कैसे आया? मनुष्य था कि पशुपक्षी था? क्या था? क्या नहीं था? कौन ऊपर आया? कौन नीचे आया? किसने पैर रखा -- इधर तेरा खयाल ही क्यों जाता तात्पर्य है कि एक भगवान्को छोड़कर किसीकी तरफ ध्यान ही कैसे जाय दूसरी बातोंका पता ही कैसे लगे जबतक दूसरी बातोंका पता लगता है? तबतक वह शरण कहाँ हुआकौरवपाण्डव जब बालक थे? तब वे अस्त्रशस्त्र सीख रहे थे। सीखकर जब तैयार हो गये? तब उनकी परीक्षा ली गयी। एक वृक्षपर एक बनावटी चिड़िया बैठा दी गयी और सबसे कहा गया कि उस चिड़ियाके कण्ठपर तीर मारकर दिखाओ। एकएक करके सभी आने लगे। गुरुजी पहले सबसे अलगअलग पूछते कि बताओ? तुम्हें वहाँ क्या दीख रहा है कोई कहता कि हमें तो वृक्ष दीखता है? कोई कहता कि हमें तो टहनी दीखती है? कोई कहता है हमें तो चिड़िया दीखती है? चोंच भी दीखती है? पंख भी दीखते हैं। ऐसा कहनेवालोंको वहाँसे हटा दिया गया। जब अर्जुनकी बारी आयी? तब उनसे पूछा गया कि तुमको क्या दीखता है? तो अर्जुनने कहा कि मेरेको तो केवल कण्ठ ही दीखता है और कुछ भी नहीं दीखता। तब अर्जुनसे बाण मारनेके लिये कहा गया। अर्जुनने अपने बाणसे उस चिड़ियाका कण्ठ वेध दिया क्योंकि उनकी लक्ष्यपर दृष्टि ठीक थी। अगर चिड़िया दीखती है? वृक्ष? टहनी आदि दीखते हैं तो लक्ष्य कहाँ सधा है अभी तो दृष्टि फैली हुई है। लक्ष्य होनेपर तो वही दीखेगा? जो लक्ष्य होगा। लक्ष्यके सिवाय दूसरा कुछ दीखेगा ही नहीं। इसी प्रकार जबतक मनुष्यका लक्ष्य एक नहीं हुआ है? तबतक वह अनन्य कैसे हुआ अव्यभीचारीअनन्ययोग होना चाहिये -- मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी (गीता 13। 10)।अन्ययोग,नहीं होना चाहिये अर्थात् शरीर? मन? बुद्धि? अहम् आदिकी सहायता नहीं होनी चाहिये। वहाँ तो केवल एक भगवान् ही होने चाहिये।गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजसे किसीने कहा -- आप जिन रामललाकी भक्ति करते हैं? वे तो बारह कलाके अवतार हैं? पर सूरदासजी जिन भगवान् कृष्णकी भक्ति करते हैं? सोलह कलाके अवतार हैं। यह सुनते ही गोस्वामीजी महाराज उसके चरणोंमें गिर पड़े और बोले -- ओह आपने बड़ी भारी कृपा कर दी मैं तो रामको दशरथजीके लाड़ले कुँवर समझकर ही भक्ति करता था। अब पता लगा कि वे बारह कलाके अवतार हैं इतने बड़े हैं वे आपने आज नयी बात बताकर बड़ा उपकार किया। अब कृष्ण सोलह कलाके अवतार हैं -- यह बात उन्होंने सुनी ही नहीं? इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं गया।भगवान्के प्रति भक्तोंके अलगअलग भाव होते हैं। कोई कहता है कि दशरथजीकी गोदमें खेलनेवाले जो रामलला हैं? वे ही हमारे इष्ट हैं -- इष्टदेव मम बालक रामा (मानस 7। 75। 3) राजाधिराज रामचन्द्रजी नहीं? छोटासा रामलला। कोई भक्त कहता है कि हमारे इष्ट तो लड्डूगोपाल हैं? नन्दके लाला हैं। वे भक्त अपने रामललाको? नन्दललाको सन्तोंसे आशीर्वाद दिलाते हैं? तो भगवान्को वह बहुत प्यारा लगता है।,तात्पर्य है कि भक्तोंकी दृष्टि भगवान्के ऐश्वर्यकी तरफ जाती ही नहीं। या ब्रजरज की परस से? मुकति मिलत है चार। वा रज को नित गोपिका? डारत डगर बुहार।।आँगनकी जिस रजमें कन्हैया खेलते हैं? वह रज कोई ले ले तो उसको चारों प्रकारकी मुक्ति मिल जाय। पर यशोदा मैया उसी रजको बुहारकर बाहर फेंक देती हैं। मैयाके लिये तो वह कूड़ाकरकट है। अब मुक्ति किसको चाहिये मैयाकी केवल कन्हैयाकी तरफ ही दृष्टि है। न तो कन्हैयाके ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि है और न योग्यताकी तरफ ही दृष्टि है।सन्तोंने कहा है कि अगर भगवान्से मिलना हो तो साथमें साथी भी नहीं होना चाहिये और सामान भी नहीं होना चाहिये अर्थात् साथी और सामानके बिना उनसे मिलो। जब साथी? सहारा साथमें है? तो तुम क्या मिले भगवान्से और मन? बुद्धि? विद्या? धन आदि सामान साथमें बँधा रहेगा तो उसका परदा (व्यवधान) रहेगा। परदेमें मिलन थोड़े ही होता है वहाँ तो कपड़ेका भी व्यवधान होता है। कपड़ा ही नहीं? माला भी आड़में आ जाय तो मिलन क्या हुआ इसलिये साथमें कोई साथी और सामान न हो फिर भगवान्से जो मिलन होगा? वह बड़ा विलक्षण और दिव्य होगा।एक महात्माजीको खेतमें काम करनेवाला एक व्रजवासी ग्वाला मिल गया। वह भगवान्का भक्त था। महात्माजीने उससे पूछा -- तुम क्या करते हो उसने कहा -- हम तो अपने लाला कन्हैयाका काम करते हैं। महात्माजीने कहा -- हम भगवान्के अनन्य भक्त हैं? तुम क्या हो उसने कहा -- हम फनन्य भक्त हैं। महात्माजीने पूछा -- फनन्य भक्त क्या होता है तो उसने भी पूछा -- अनन्य भक्त क्या होता है महात्माजीने कहा -- अनन्य भक्त वह होता है जो सूर्य? शक्ति? गणेश? ब्रह्मा आदि किसीको भी न माने? केवल हमारे कन्हैयाको ही माने। उसने कहा -- बाबाजी? हम तो इन ससुरोंका नाम भी नहीं जानते कि ये क्या होते हैं? क्या नहीं होते हमें इनका पता ही नहीं है तो हम फनन्य हो गये कि नहीं इस प्रकार ब्रह्म क्या होता है आत्मा क्या होती है सगुण और निर्गुण क्या होता है साकार और निराकार क्या होता है आदि बातोंकी तरफ शरणागत भक्तकी दृष्टि ही नहीं जानी चाहिये।व्रजकी एक बात है। एक सन्त कुएँपर किसीसे बात कर रहे थे कि ब्रह्म है? परमात्मा है? जीवात्मा है आदि। वहाँ एक गोपी जल भरने आयी। उसने कान लगाया कि बाबाजी क्या बात कर रहे हैं। जब वह गोपी दूसरी,गोपीसे मिली तो उससे पूछा -- अरी सखी यह ब्रह्म क्या होता है उसने कहा -- हमारे लालाका ही कोई अड़ोसीपड़ोसी? सगासम्बन्धी होगा हमलोग तो जानती नहीं सखी ये लोग उसीकी धुनमें लगे हैं न इसलिये सब जानते हैं। हमारे तो एक नन्दके लाला ही हैं। कोई काम हो तो नन्दबाबासे कह देंगी? गिरिराजसे कह देंगी कि महाराज आप कृपा करो। कन्हैया तो भोलाभाला है? वह क्या समझेगा और क्या करेगा कन्हैयासे क्या मिलेगा अरी सखी वह कन्हैया हमारा है? और क्या मिलेगा हम भी अकेली हैं और वह कन्हैया भी अकेला है। हमारे पास भी कुछ समान नहीं? और उसके पास भी कुछ सामान नहीं? बिलकुल नंगधड़ंग बाबा -- नगन मूरतिबाल गुपालकी? कतरनी बरनी जगजालकी। अब ऐसे कन्हैयासे क्या मिलेगायशोदा मैया दाऊजीसे कहती हैं -- देख दाऊ यह कन्हैया बहुत भोलाभाला है? तू इसका खयाल रखा कर कि कहीं यह जंगलमें दूर न चला जाय। जंगलमें मेले साथ चलतेचलते कोई साँपका बिन देखता है तो उसमें हाथ डाल देता है? अब इसे कोई साँप काट ले तो मैया कहती है -- बेटा अभी वह छोटासा अबोध बालक है? तू बड़ा है? इसलिये इसकी निगाह रखा कर। ग्वालबालोंसे कोई कहे कि कन्हैया तो सब दुनियाका पालन करता है? तो वे यही कहेंगे कि तुम्हारा ऐसा भगवान् होगा? जो सब दुनियाका पालन करता होगा। हमारा तो ऐसा नहीं है। हमारा छोटासा कन्हैया दुनियाका क्या पालन करेगाएक बाबाजीकी गोपियोंसे बातचीत चली। वे बाबाजी बात करतेकरते कहने लगे कि कृष्ण इतने ऐश्वर्यशाली हैं? उनका इतना माधुर्य है? उनके पास ऐश्वर्यका इतना खजाना है? आदि। तो गोपियाँ कहने लगीं -- महाराज उस खजानेकी चाबी तो हमारे पास है कन्हैयाके पास क्या है उसके पास तो कुछ भी नहीं है। कोई उससे माँगेगा तो वह कहाँसे देगा इसलिये किसीको कुछ चाहिये तो वह कन्हैया पास न जाये। कन्हैयाके पास? उसकी शरणमें तो वही जाये? जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये। किसी भी अवस्थामें कुछ भी चाहनेका भाव न हो अर्थात् विपत्ति? मौत आदिकी अवस्थामें भीमेरी थोड़ी सहायता कर दो? रक्षा कर दोऐसा भाव भी नहीं होभगवान् श्रीरामसे वाल्मीकिजी कहते हैं --, जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।। (मानस 2। 131)कुछ भी चाहनेका भाव न होनेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्यारे लगते हैं? मीठे लगते हैं -- तुम्ह सन सहज सनेहु। जिसमें चाह नहीं है? वह भगवान्का खास घर है -- सो राउर निज गेहु। यदि चाहना भी साथमें रखें और भगवान्को भी साथमें रखें तो वह भगवान्का खास घर नहीं है। भगवान्के साथसहज स्नेह हो? स्नेहमें कोई मिलावट न हो अर्थात् कुछ भी चाहना न हो। वहाँ तो आसक्ति? वासना? मोह? ममता ही होते हैं। इसलिये गोपियाँ सावधान करती हुई कहती हैं --, मा यात पान्थाः पथिभीमरथ्यां दिगम्बरः कोऽपि तमालनीलः। विन्यस्तहस्तोऽपि नितम्बबिम्बे धूतः समाकर्षति चित्तवित्तम्।।अरे पथिको उस गलीसे मत जाना? वह बड़ी भयावनी है। वहाँ अपने नितम्बविम्बपर दोनों हाथ रखे जो तमालके समान नीले रंग का एक नंगधड़ंग बालक खड़ा है? वह केवल देखनेमात्रका अवधूत है। वास्तवमें तो वह अपने पासमें होकर निकलनेवाले किसी भी पथिकके चित्तरूपी धनको लूटे बिना नहीं रहता।वह जो कालाकाला नंगधड़ंग बालक खड़ा है न उससे तुम लुट जाओगे? रीते रह जाओगे वह ऐसा चोर है कि सब खत्म कर देगा। उधर जाना ही मत? पहले ही खयाल रखना। अगर चले गये तो फिर सदाके,लिये ही चले गये इसलिये कोई अच्छी तरहसे जीना चाहे तो उधर मत जाय। उसका नाम कृष्ण है न कृष्ण कहते हैं खींचनेवालेको। एक बार खींच ले तो फिर छोड़े ही नहीं। उससे पहचान न हो? तबतक तो ठीक है। अगर उससे पहचान हो गयी तो फिर मामला खत्म। फिर किसी कामको नहीं रहोगे? त्रिलोकीभरमें निकम्मे हो जाओगे नारायन बौरी भई डोलै? रही न काहू काम की।। जाहि लगन लगी घनस्याम की।हाँ? जो किसी कामका नहीं होता? वह सबके लिये सब कामका होता है। परन्तु उनको उसी कामसे कोई मतलब नहीं होता।शरणागत भक्तको भजन भी करना नहीं पड़ता। उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक भजन होता है। भगवान्का नाम उसे स्वाभाविक ही बड़ा मीठा? प्यारा लगता है। अगर कोई पूछे कि तुम श्वास क्यों लेते हो यह हवाको भीतरबाहर करनेका क्या धंधा शुरू कर रखा है तो यही कहेंगे कि भाई यह धंधा नहीं है? इसके बिना हम जी ही नहीं सकते। ऐसे ही शरणागत भक्त भजनके बिना रह ही नहीं सकता। जिसको सब कुछ अर्पण कर दिया? उसके विस्मरणमें परम व्याकुलता? महान् छटपटाहट होने लगती है -- तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति (नारदभक्तिसूत्र 19)। ऐसे भक्तसे अगर कोई कहे कि आधे क्षणके लिये भगवान्को भूल जानेसे त्रिलोकीका राज्य मिलेगा? तो वह इसे भी ठुकरा देगा। भागवतमें आया है -- त्रिभुवनविभवहेतवेऽप्यकुण्ठ स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्। न चलति भगवत्पदारविन्दा ल्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाग्र्यः।। (श्रीमद्भा0 11। 2। 53)तीनों लोकोंके समस्त ऐश्वर्यके लिये भी उन देवदुर्लभ भगवच्चारणकमलोंका जो आधे निमेषके लिये भी त्याग नहीं कर सकते? वे ही श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्। न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा मय्यार्पितात्मेच्छति मद् विनान्यत्।। (श्रीमद्भा0 11। 14। 14)भगवान् कहते हैं किस्वयंको मेरे अर्पित करनेवाला भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्माका पद? इन्द्रका पद? सम्पूर्ण पृथ्वीका राज्य? पातालादि लोकोंका राज्य? योगकी समस्त सिद्धियाँ और मोक्षको भी नहीं चाहता।भरतजी कहते हैं -- अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान। जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।। (मानस 2। 204) सम्बन्ध -- अब पूर्वश्लोकमें कहे अत्यन्त गोपनीय वचनको अनाधिकारियोंके सामने कहनेका निषेध करत हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
कर्मयोगनिष्ठाके परम रहस्य ईश्वरशरणागतिका उपसंहार करके? उसके पश्चात् अब कर्मयोगनिष्ठाका फलस्वरूप? समस्त वेदान्तोंमें कहा हुआ यथार्थ ज्ञान कहना है? इसलिये ( भगवान् ) बोले --, समस्त धर्मोंको? अर्थात् जितने भी धर्म हैं उन सबको? यहाँ नैष्कर्म्य ( कर्माभाव ) का प्रतिपादन करना है? इसलिये धर्म शब्दसे अधर्मका भी ग्रहण किया जाता है। जो बुरे चरित्रोंसे विरक्त नहीं हुआ धर्म और अधर्म दोनोंको छोड़ इत्यादि श्रुतिस्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है। सब धर्मोंको छोड़कर -- सर्व कर्मोंका संन्यास करके? मुझ एककी शरणमें आ? अर्थात् मैं जो कि सबका आत्मा? समभावसे सर्व भूतोंमें स्थित? ईश्वर? अच्युत तथा गर्भ? जन्म? जरा और मरणसे रहित हूँ? उस एकके इस प्रकार शरण हो। अभिप्राय यह कि मुझ परमेश्वरसे अन्य कुछ है ही नहीं ऐसा निश्चय कर। तुझ इस प्रकार निश्चयवालेको मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराके? समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापोंसे मुक्त कर दूँगा। पहले कहा भी है कि -- मैं हृदयमें स्थित हुआ प्रकाशमय ज्ञानदीपकसे (अज्ञानजनित अन्धकारका) नाश करता हूँ इसलिये तू शोक न कर अर्थात् चिन्ता मत कर।( शास्त्रके उपसंहारका प्रकरण ), यह विचार करना चाहिये कि इस गीताशास्त्रमें निश्चय किया हुआ? परम कल्याण ( मोक्ष ) का साधन ज्ञान है या कर्म? अथवा दोनों पू0 -- यह सन्देह क्यों होता है उ0 -- जिसको जानकर अमरता प्राप्त कर लेता है तदनन्तर मुझे तत्त्वसे जानकर मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है इत्यादि वाक्य तो केवल ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति दिखला रहे हैं तथा तेरा कर्ममें ही अधिकार है तू कर्म ही कर इत्यादि वाक्य कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यता दिखला रहे हैं। इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनोंकी कर्तव्यताका उपदेश होनेसे ऐसा संशय भी हो सकता है कि सम्भवतः दोनों समुच्चित ( मिलकर ) ही मोक्षके साधन होंगे। पू0 -- परंतु इस मीमांसाका फल क्या होगा उ0 -- यही कि इन तीनोंमेंसे किसी एकको ही परम कल्याणका साधन निश्चय करना। अतः इसकी विस्तारपूर्वक मीमांसा कर लेनी चाहिये।( सिद्धान्तका प्रतिपादन ), केवल आत्मज्ञान ही परम कल्याण ( मोक्ष ) का हेतु ( साधन ) है क्योंकि भेदप्रतीतिका निवर्तक होनेके कारण? कैवल्य ( मोक्ष ) की प्राप्ति ही उसकी अवधि है। आत्मामें क्रिया? कारक और फलविषयक भेदबुद्धि अविद्याके कारण सदासे प्रवृत्त हो रही है। कर्म मेरे हैं? मैं उनका कर्त्ता हूँ? मैं अमुक फलके लिये यह कर्म करता हूँ यह अविद्या अनादिकालसे प्रवृत्त हो रही है। यह केवल? ( एकमात्र ) अकर्ता? क्रियारहित और फलसे रहित आत्मा मैं हूँ? मुझसे भिन्न और कोई भी नहीं है ऐसा आत्मविषयक ज्ञान इस अविद्याका नाशक है क्योंकि यह उत्पन्न होते ही? कर्मप्रवृत्तिकी हेतुरूप भेदबुद्धिका नाश करनेवाला है। उपर्युक्त वाक्यमें तु शब्द दोनों पक्षोंकी निवृत्तिके लिये है अर्थात् मोक्ष न तो केवल कर्मसे मिलता है और न ज्ञानकर्मके समुच्चयसे ही। इस प्रकार तु शब्द दोनों पक्षोंका खण्डन करता है। मोक्ष अकार्य अर्थात् स्वतःसिद्ध है? इसलिये कर्मोंको उसका साधन मानना नहीं बन सकता क्योंकि कोई भी नित्य ( स्वतःसिद्ध ) वस्तु कर्म या ज्ञानसे उत्पन्न नहीं की जाती।, पू0 -- तब तो केवल ज्ञान भी व्यर्थ ही है उ0 -- यह बात नहीं है क्योंकि अविद्याका नाशक होनेके कारण उसकी मोक्षप्राप्तिरूप फलपर्यन्तता प्रत्यक्ष है। अर्थात् जैसे दीपकके प्रकाशका? रज्जु आदि वस्तुओंमें होनेवाली सर्पादिकी भ्रान्तिको और अन्धकारको? नष्ट कर देना ही फल है और जैसे उस प्रकाशका फल सर्पविषयक विकल्पको हटाकर? केवल रज्जुको प्रत्यक्ष कराके? समाप्त हो जाता है? वैसे ही अविद्यारूप अन्धकारके नाशक आत्मज्ञानका भी फल? केवल,आत्मस्वरूपको प्रत्यक्ष कराके ही समाप्त होता देखा गया है। जिनका फल प्रत्यक्ष है? ऐसी जो लकड़ीको चीरना अथवा अरणीमन्थनद्वारा अग्नि उत्पन्न करना आदि क्रियाएँ हैं? उनमें लगे हुए कर्ता आदि कारकोंकी? जैसे अलगअलग टुकड़े हो जाना? अथवा अग्नि प्रज्वलित हो जाना आदि फलसे अतिरिक्त किसी अन्य फल देनेवाले कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती? वैसे ही जिसका फल प्रत्यक्ष है? ऐसी ज्ञाननिष्ठारूप क्रियामें लगे हुए ज्ञाता आदि कारकोंकी भी आत्मकैवल्यरूप फलसे अतिरिक्त फलवाले किसी अन्य कर्ममें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः ज्ञाननिष्ठा कर्मसहित नहीं हो सकती। यदि कहो कि भोजन और अग्निहोत्र आदि क्रियाओंके समान ( इसमें भी समुच्चय ) हो सकता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं क्योंकि जिसका फल कैवल्य ( मोक्ष ) है? उस ज्ञानके प्राप्त होनेके पश्चात् कर्मफलकी इच्छा नहीं रह सकती? जैसे सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके प्राप्त हो जानेपर कूपतालाब आदिकी जलके लिये चाह नहीं रहता? उसी प्रकार मोक्ष जिसका फल है? ऐसे ज्ञानकी प्राप्ति होनेके बाद क्षणिक सुखरूप फलान्तरकी या उसकी साधनभूत क्रियाकी इच्छुकता नहीं रह सकती। क्योंकि जो मनुष्य राज्य प्राप्त करा देनेवाले कर्ममें लगा हुआ है उसकी प्रवृत्ति? क्षेत्रप्राप्ति ही जिसका फल है ऐसे कर्ममें नहीं होती और उस कर्मके फलकी इच्छा भी नहीं होता। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि परम कल्याणका साधन न तो कर्म है और न ज्ञानकर्मका समुच्चय ही है तथा कैवल्य ( मोक्ष ) ही जिसका फल है? ऐसे ज्ञानको कर्मोंकी सहायता भी अपेक्षित नहीं है क्योंकि ज्ञान अविद्याका नाशक है इसलिये उसका कर्मोंसे विरोध है। यह प्रसिद्ध ही है कि अन्धकारका नाशक अन्धकार नहीं हो सकता। इसलिये केवल ज्ञान ही परम कल्याणका साधन है। पू0 -- यह सिद्धान्त ठीक नहीं क्योंकि नित्यकर्मोंके न करनेसे प्रत्यवाय होता है और मोक्ष नित्य है। भाव यह कि -- पहले जो यह कहा गया कि केवल ज्ञानसे ही मोक्ष मिलता है? ठीक नहीं क्योंकि वेदशास्त्रमें कहे हुए नित्यकर्मोंके न करनेसे नरकादिकी प्राप्तिरूप प्रत्यवाय होगा। यदि कहो कि ऐसा होनेसे तो कर्मोंसे छुटकारा ही न होगा? अतः मोक्षके अभावका प्रसङ्ग आ जायगा? तो ऐसा दोष नहीं है क्योंकि मोक्ष नित्यसिद्ध है। नित्यकर्मोंका आचरण करनेसे तो प्रत्यवाय न होगा? निषिद्ध कर्मोंका सर्वथा त्याग कर देनेसे अनिष्ट ( बुरे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी? काम्यकर्मोंका त्याग कर देनेके कारण इष्ट ( अच्छे ) शरीरोंकी प्राप्ति न होगी तथा वर्तमान शरीरको उत्पन्न करनेवाले कर्मोंका? फलके उपभोगसे क्षय हो जानेपर? इस शरीरका नाश हो जानेके पश्चात्? दूसरे शरीरकी उत्पत्तिका कोई कारण नहीं रहनेसे तथा शरीरसम्बन्धी आसक्ति आदिके न करनेसे? जो स्वरूपमें स्थित हो जाना है वही कैवल्य है? अतः बिना प्रयत्नके ही कैवल्य सिद्ध हो जायगा। उ0 -- किंतु भूतपूर्व अनेक जन्मोंके किये हुए जो स्वर्गनरक आदिकी प्राप्तिरूप फल देनेवाले अनेक अनारब्धफल -- सञ्चित कर्म हैं? उनके फलका उपभोग न होनेके कारण? उनका तो नाश नहीं होगा -- ऐसा कहें तो पू0 -- यह बात नहीं है क्योंकि नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखभोगको? उस कर्मोंके फलका उपभोग माना जा सकता है। अथवा प्रायश्चित्तकी भाँति नित्य कर्म भी पूर्वकृत पापका नाश करनेवाले मान लिये जायँगे तथा प्रारब्धकर्मका फलभोगसे नाश हो जायगा? फिर नये कर्मोंका आरम्भ न करनेसे कैवल्य,बिना यज्ञके सिद्ध हो जायगा। उ0 -- यह सिद्धान्त ठीक नहीं है क्योंकि उस ( परमात्मा ) को जानकर ही मनुष्य मृत्युसे तरता है मोक्षप्राप्तिके लिये दूसरा मार्ग नहीं है इस प्रकार मोक्षके लिये विद्याके अतिरिक्त अन्य मार्गका अभाव बतलानेवाली श्रुति है तथा जैसे चमड़ेकी भाँति आकाशको लपेटना असम्भव है? उसी प्रकार अज्ञानीकी मुक्ति असम्भव बतलानेवाली भी श्रुति है? एवं पुराण और स्मृतियोंमें भी यही कहा गया है कि ज्ञानसे ही कैवल्यकी प्राप्ति होती है। इसके सिवा ( उस सिद्धान्तमें ) जिनका फल मिलना आरम्भ नहीं हुआ ऐसे पूर्वकृत पुण्योंके नाशकी उत्पत्ति न होनेसे भी? यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार पूर्वकृत सञ्चित पुण्योंका होना सम्भव है? उसी प्रकार सञ्चित पापोंका होना भी सम्भव है ही अतः देहान्तरको उत्पन्न किये बिना उनका क्षय सम्भव न होनेसे ( इस पक्षके अनुसार ) मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा। इसके सिवा? पुण्यपापके कारणरूप राग? द्वेष और मोह आदि दोषोंका? बिना आत्मज्ञानके मूलोच्छेद होना सम्भव न होनेके कारण भी? पुण्यपापका उच्छेद होना सम्भव नहीं। तथा श्रुतिमें नित्यकर्मोंका पुण्यलोककी प्राप्तिरूप फल बतलाया जानेके कारण और अपने कर्मोंमें स्थित वर्णाश्रमावलम्बी इत्यादि स्मृतिवाक्योंद्वारा भी यही बात कही जानेके कारण भी कर्मोंका क्षय ( मानना ) सिद्ध नहीं होता। तथा जो यह कहते हैं कि नित्यकर्म दुःखरूप होनेके कारण पूर्वकृत पापोंका फल ही है? उनका अपने स्वरूपसे अतिरिक्त और कोई फल नहीं है क्योंकि श्रुतिमें उनका कोई फल नहीं बतलाया गया तथा उनका,विधान जीवननिर्वाह आदिके लिये किया गया है। उनका कहना ठीक नहीं है क्योंकि जो कर्म फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए? उनका फल होना असम्भव है और नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम? अन्य कर्मका फलविशेष है यह बात भी सिद्ध नहीं की जा सकेगी। तुमने जो यह कहा? कि पूर्वजन्मकृत पापकर्मोंका फल? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखके द्वारा भोगा जाता है? सो ठीक नहीं क्योंकि मरनेके समय जो कर्म भविष्यमें फल देनेके लिये अङ्कुरित नहीं हुए उनका फल दूसरे कर्मोंद्वारा उत्पन्न हुए शरीरमें भोगा जाता है? यह कहना युक्तियुक्त नहीं है। यदि ऐसा न हो तो स्वर्गरूप फलका भोग करनेके लिये अग्निहोत्रादि कर्मोंसे उत्पन्न हुए जन्ममें? नरकके कारणभूत कर्मोंका फल भोगा जाना भी? युक्तिविरुद्ध नहीं होगा। इसके सिवा यह ( नित्यकर्मके अनुष्ठानमें होनेवाला परिश्रमरूप दुःख ) पापोंकी फलरूप दुःखविशेष सिद्ध न हो सकनेके कारण भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं है क्योंकि भिन्नभिन्न प्रकारके दुःखसाधनरूप फल देनेवाले? अनेक ( सञ्चित) पापोंके होनेकी सम्भावना होते हुए भी? नित्यकर्म अनुष्ठानके परिश्रममात्रको ही उन सबका फल मान लेनेपर? शीतोष्णादि द्वन्द्वोंकी अथवा रोगादिकी पीड़ासे होनेवाले दुःखोंको पापोंका फल नहीं माना जा सकेगा तथा यह हो भी कैसे सकता है कि नित्यकर्मके अनुष्ठानका परिश्रम ही पूर्वकृत पापोंका फल है? सिरपर पत्थर आदि ढोनेका दुःख उसका फल नहीं इसके सिवा? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख पूर्वकृत पापोंका फल है? यह कहना प्रकरणविरुद्ध भी है। पू0 -- कैसे उ0 -- जो पूर्वकृत पाप? फल देनेके लिये अङ्कुरित नहीं हुए हैं? उनका क्षय नहीं हो सकता ऐसा प्रकरण है? उसमें तुमने? फल देनेके लिये प्रस्तुत हुए पूर्वकृत पापोंका ही फल? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख बतलाया है? जो कर्म फल देनेके लिये प्रस्तुत नहीं हुए हैं उनका फल नहीं बतलाया। यदि तुम यह मानते हो? कि पूर्वकृत सभी पाप कर्म? फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुके हैं? तो फिर नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख ही उनका फल है? यह विशेषण देना अयुक्त ठहरता है। और नित्यकर्मविधायक शास्त्रको भी व्यर्थ माननेका प्रसङ्ग आ जाता है। क्योंकि फल देनेके लिये अङ्कुरित हुए पापोंका तो उपभोगसे ही क्षय हो जायगा ( उनके लिये नित्यकर्मोंकी क्या आवश्यकता है )। इसके सिवा ( वास्तवमें ) वेदविहित नित्यकर्मोंसे होनेवाला परिश्रमरूप दुःख यदि कर्मका फल हो तो वह उन ( विहित नित्यकर्मों ) का ही फल होना चाहिये क्योंकि वह व्यायाम आदिकी भाँति? उनके ही अनुष्ठानसे होता हुआ दिखलायी देता है? अतः यह कल्पना करना कि वह किसी अन्य कर्मका फल है युक्तियुक्त नहीं है। नित्यकर्मोंका विधान जीवनादिके लिये किया गया है इसलिये भी नित्यकर्मोंको प्रायश्चित्तकी भाँति पूर्वकृत पापोंका फल मानना युक्तियुक्त नहीं है। जिस पापकर्मके लिये जो प्रायश्चित विहित है? वह उस पापका फल नहीं है। तथापि यदि ऐसा मानें? कि प्रायश्चित्तरूप दुःख ( जिसके लिये प्रायश्चित्त किया जाय ) उस पापरूप निमित्तका ही फल होता है? तो जीवनादिके लिये किये जानेवाले नित्यकर्मोंका परिश्रमरूप दुःख भी? जीवन आदि हेतुओंका ही फल सिद्ध होगा क्योंकि नित्य और प्रायश्चित्त ये दोनों ही किसीनकिसी निमित्तसे किये जानेवाले हैं? इनमें कोई भेद नहीं है। इसके सिवा दूसरा दोष यह भी है कि नित्यकर्मके परिश्रमकी और काम्यअग्निहोत्रादि कर्मके परिश्रमकी समानता होनेके कारण? नित्यकर्मका परिश्रम ही पूर्वकृत पापका फल है? काम्यकर्मानुष्ठानका परिश्रमरूप दुःख उसका फल नहीं है? ऐसा माननेके लिये कोई विशेष कारण नहीं है? अतः वह काम्यकर्मका परिश्रमरूप दुःख भी? पूर्वकृत पापका ही फल माना जायगा। ऐसा होनेसे नित्यकर्मोंका फल नहीं बतलाया गया है और उनके अनुष्ठानका विधान किया गया है? उस विधानकी अन्य प्रकारसे उपपत्ति न होनेके कारण? नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाला दुःख? पूर्वकृत पापोंका ही फल है? इस प्रकारकी जो अर्थापत्तिकी कल्पना की गयी थी? उसका खण्डन हो गया। इस तरह प्रकारान्तरसे नित्यकर्मोंके विधानकी अनुपपत्ति होनेसे और नित्यकर्मोंका अनुष्ठानसम्बन्धी परिश्रमरूप दुःखके सिवा दूसरा फल होता है? ऐसा अनुमान होनेसे भी ( यह पक्ष खण्डित हो जाता है )। इसके सिवा ऐसा माननेमें विरोध होनेके कारण भी ( यह पक्ष कट जाता है )। नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करते हुए दूसरे कर्मोंका फल भोगा जाता है? ऐसा मान लेनेसे यह कहना होता है कि वह उपभोग ही नित्यकर्मका फल है। और साथ ही यह भी प्रतिपादन करते जाते हो कि नित्यकर्मका फल नहीं है अतः यह कथन परस्पर विरुद्ध होता है। इसके अतिरिक्त ( तुम्हारे मतानुसार ) काम्यअग्निहोत्रादिका अनुष्ठान करते हुए तन्त्रसे नित्यअग्निहोत्रादि भी उन्हींके साथ अनुष्ठित हो जाते हैं। अतः उस परिश्रमरूप दुःखभोगसे ही काम्यअग्निहोत्रादिका फल भी क्षीण हो जायगा क्योंकि वह उसके अधीन है। यदि ऐसा मानें कि काम्यअग्निहोत्रादिका स्वर्गादि प्राप्तिरूप दूसरा ही फल होता है तो उनके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखको भी नित्यकर्मके परिश्रमसे भिन्न मानना आवश्यक होगा। परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध होनेके कारण यह नहीं हो सकता। क्योंकि काम्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाले परिश्रमरूप दुःखसे? केवल नित्यकर्मअनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखका भेद नहीं है। इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि जो कर्म न विहित हो और न प्रतिषिद्ध हो? वही तत्काल फल देनेवाला होता है? शास्त्रविहित या प्रतिषिद्ध कर्म तत्काल फल देनेवाला नहीं होता। यदि ऐसा होता तो स्वर्ग आदि लोकोंका प्रतिपादन करनेमें और अदृष्ट फलोंके बतलानेमें शास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होती। कर्मत्वमें किसी प्रकारका भेद न होनेपर तथा अंग और इतिकर्तव्यता आदिकी कोई विशेषता न होनेपर भी? केवल नित्यअग्निहोत्रादिका फल तो अनुष्ठानजनित परिश्रमरूप दुःखके उपभोगसे क्षय हो जाता है और फलेच्छुकतामात्रकी अधिकतासे काम्यअग्निहोत्रादिका स्वर्गादि महाफल होता है? ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। सुतरां नित्यकर्मोंका अदृष्ट फल नहीं होता यह बात कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अविद्यापूर्वक होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्मोंका? अशेषतः नाश करनेवाला हेतु? विद्या ( ज्ञान ) ही है? नित्यकर्मका अनुष्ठान नहीं। क्योंकि सभी कर्म अविद्या और कामनामूलक हैं। ऐसा ही हमने सिद्ध किया है? कि अज्ञानीका विषय कर्म है और ज्ञानीका विषय सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा है। उभौ तौ न विजानीतः वेदाविनाशिनं नित्यम् ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् तत्त्ववित्तु गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते, नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इत्यादि वाक्योंके अर्थसे यही सिद्ध होता है? कि अज्ञानी ही,मैं कर्म करता हूँ ऐसा मानता है ( ज्ञानी नहीं )। आरुरुक्षुके लिये कर्म कर्तव्य बतलाये हैं और आरूढके लिये अर्थात् योगस्थ पुरुषके लिये उपशम कर्तव्य बतलाया है। तथा ( ऐसा भी कहा है कि ) तीनों प्रकारके अज्ञानी भक्त भी उदार हैं? पर ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है? ऐसा मैं मानता हूँ। कर्म करनेवाले सकाम अज्ञानी लोग आवागमनको प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त नित्ययुक्त होकर चिन्तन करते हुए आत्मस्वरूप? आकाशके सदृश? मुझ निष्पाप परमात्माकी उपासना किया करते हैं। उनको मैं वह बुद्धियोग देता हैं जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म करनेवाले अज्ञानी भगवान्को प्राप्त नहीं होते। भगवदर्थ कर्म करनेवाले जो युक्ततम होनेपर भी कर्मी होनेके नाते अज्ञानी हैं? वे चित्तसमाधानसे लेकर कर्मफलत्यागपर्यन्त उत्तरोत्तर हीन बतलाये हुए साधनोंसे युक्त होते हैं। तथा जो अनिर्देश्य अक्षरके उपासक हैं वे अद्वेष्टा सर्वभूतानाम् आदिसे लेकर? बारहवें अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त बतलाये हुए साधनोंसे सम्पन्न और तेरहवें अध्यायसे लेकर तीन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञानसाधनोंसे भी युक्त होते हैं। अधिष्ठानादि पाँच जिसके कारण हैं? ऐसे समस्त कर्मोंका जो संन्यास करनेवाले हैं? जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्वको जाननेवाले हैं? जो ज्ञानकी परानिष्ठामें स्थित हो गये हैं? जो भगवत्स्वरूप और आत्माके एकत्वज्ञानकी शरण हो चुके हैं ऐसे भगवान्के तत्त्वको जाननेवाले परमहंस परिव्राजकोंको इष्टअनिष्ट और मिश्र -- ऐसा त्रिविध कर्मफल नहीं मिलता। इनसे अन्य जो संन्यास न करनेवाले कर्म परायण अज्ञानी हैं उनको कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है यही गीताशास्त्रमें कहे हुए कर्तव्य और अकर्तव्यका विभाग है। पू0 -- सभी कर्मोंको अविद्यामूलक मानना युक्तिसङ्गत नहीं है। उ0 -- नहीं? ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्मोंकी भाँति ( सभी कर्म अविद्यामलूक हैं ) नित्यकर्म यद्यपि शास्त्रप्रतिपादित हैं तो भी वे अविद्यायुक्त पुरुषके ही कर्म हैं। जैसे प्रतिषेधशास्त्रसे कहे हुए भी अनर्थके कारणरूप ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्म अविद्या और कामनादि दोषोंसे युक्त पुरुषके द्वारा ही हो सकते हैं क्योंकि दूसरी तरह उनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उसी प्रकार नित्यनैमित्तिक और काम्य आदि कर्म भी? अविद्या और कामनासे युक्त मनुष्यसे ही हो सकते हैं। पू0 -- परंतु आत्माको शरीरसे पृथक् समझे बिना नित्यनैमित्तिक आदि कर्मोंमें प्रवृत्तिका होना असम्भव है। उ0 -- यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि आत्मा जिसका कर्ता नहीं है ऐसे चलनरूप कर्ममें ( अज्ञानियोंकी ) मैं करता हूँ ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है। यदि कहो कि शरीर आदिमें जो अहंभाव है वह गौण है? मिथ्या नहीं है। तो ऐसा कहना ठीक नहीं? क्योंकि ऐसा माननेसे उनके कार्यमें भी गौणता सिद्ध होगी। पू0 -- जैसे हे पुत्र तू मेरा आत्मा ही है इस श्रुतिवाक्यके अनुसार? अपने पुत्रमें अहंभाव होता है तथा संसारमें भी जैसे यह गौ मेरा प्राण ही है इस प्रकार प्रिय वस्तुमें अहंभाव होता देखा जाता है? उसी प्रकार अपने शरीरादि संघातमें भी अहंभाव गौण ही है। यह प्रतीति मिथ्या नहीं है। मिथ्या प्रतीति तो वह है कि जो स्थाणु और पुरुषके भेदको न जानकर स्थाणुमें पुरुषकी प्रतीति होती है। उ0 -- ( यह कहना ठीक नहीं? क्योंकि ) गौण प्रयोग लुप्तोपमा शब्दद्वारा अधिकरणकी स्तुति करनेके लिये होता है? इसलिये गौण प्रतीतिसे मुख्यके कार्यकी सिद्धि नहीं होती। जैसे कोई कहे कि देवदत्त सिंह है? या बालक अग्नि है? तो उसका यह कहना? देवदत्त सिंहके सदृश क्रूर और बालक अग्निके समान पिङ्गल ( गौर ) वर्ण? इस प्रकारकी समानताके कारण देवदत्त और बालकरूप अधिष्ठानकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि गौण शब्द या गौण ज्ञानसे कोई सिंहका कार्य ( किसीको भक्षण कर जाना ) या अग्निका कार्य ( किसीको जला डालना ) सिद्ध नहीं किया जा सकता। परंतु मिथ्या प्रत्ययका कार्य ( जन्ममरणरूप ) अनर्थ? ( मनुष्य ) अनुभव कर रहा है। इसके सिवा गौण प्रतीतिके विषयको मनुष्य ऐसा जानता भी है कि वास्तवमें यह देवदत्त सिंह नहीं है और यह बालक अग्नि नहीं है। ( यदि उपर्युक्त प्रकारसे शरीरादि संघातमें भी आत्मभाव गौण होता तो ) शरीरादिके संघातरूप गौण आत्माद्वारा किये हुए कर्म? अहंभावके मुख्य विषय आत्माके किये हुए नहीं माने जाते। क्योंकि गौण सिंह,( देवदत्त ) और गौण अग्नि ( बालक ) द्वारा किये हुए कर्म मुख्य सिंह और अग्निके नहीं माने जाते। तथा उस क्रूरता और पिङ्गलताद्वारा कोई मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता? क्योंकि वे केवल स्तुतिके लिये कहे हुए होनेसे हीनशक्ति हैं। जिनकी स्तुति की जाती है वे ( देवदत्त और बालक ) भी यह जानते हैं कि मैं सिंह नहीं हूँ? मैं अग्नि नहीं हूँ तथा सिंहका कर्म मेरा नहीं है? अग्निका कर्म मेरा नहीं है। इसी प्रकार ( यदि शरीर आदिमें गौण भावना होती तो ) संघातके कर्म मुझ मुख्य आत्माके नहीं हैं -- ऐसी ही प्रतीति होनी चाहिये थी? ऐसी नहीं कि मैं कर्ता हूँ? मेरे कर्म हैं ( सुतरां यह सिद्ध हुआ कि शरीरमें आत्मभाव गौण नहीं? मिथ्या है )। जो ऐसा कहते हैं कि अपने स्मृति? इच्छा और प्रयत्न इन कर्महेतुओंके द्वारा आत्मा कर्म किया करता है? उनका कथन ठीक नहीं क्योंकि ये सब मिथ्या प्रतीतिपूर्वक ही होनेवाले हैं। अर्थात् स्मृति? इच्छा और प्रयत्न आदि सब मिथ्या प्रतीतिसे होनेवाले? इष्टअनिष्टरूप अनुभूत कर्मफलजनित संस्कारोंको? लेकर ही होते हैं। जिस प्रकार इस वर्तमान जन्ममें धर्म? अधर्म और उनके फलोंका अनुभव ( सुखदुःख ) शरीरादि संघातमें आत्मबुद्धि और रागद्वेषादिद्वारा किये हुए होते हैं? वैसे ही भूतपूर्व जन्ममें और उससे पहलेके जन्मोंमें भी थे।इस न्यायसे यह अनुमान करना चाहिये कि यह बीता हुआ और आगे होनेवाला ( जन्ममरणरूप ) संसार अनादि एवं अविद्याकर्तृक ही है। इससे यह सिद्ध होता है? कि ज्ञाननिष्ठामें सर्वकर्मोंके संन्याससे संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है क्योंकि देहाभिमान अविद्यारूप है अतः उसकी निवृत्ति हो जानेपर शरीरान्तरकी प्राप्ति न होनेके कारण,( जन्ममरणरूप ) संसारकी प्राप्ति नहीं हो सकती। शरीरादि संघातमें जो आत्माभिमान है वह अविद्यारूप है क्योंकि संसारमें भी मैं गौ आदिसे अन्य हूँ और गौ आदि वस्तुएँ मुझसे अन्य हैं ऐसा जाननेवाला कोई भी मनुष्य उनमें ऐसी बुद्धि नहीं करता कि यह मैं हूँ। न जाननेवाला ही स्थाणुमें पुरुषकी भ्रान्तिके समान अविवेकके कारण? शरीरादि संघातमें मैं हूँ ऐसा आत्मभाव कर सकता है पर विवेकपूर्वक जाननेवाला नहीं कर सकता। तथा पुत्रमें जो हे पुत्र तू मेरा आत्मा ही है ऐसी आत्मबुद्धि है? वह जन्यजनकसम्बन्धके कारण होनेवाली गौण बुद्धि है? उस गौण आत्मा ( पुत्र ) से भोजन आदिकी भाँति कोई मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। जैसे कि गौण सिंह और गौण अग्निरूप देवदत्त और बालकद्वारा? मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता। पू0 -- स्वर्गादि अदृष्ट पदार्थोंके लिये कर्मोंका विधान करनेवाली श्रुतिका प्रमाणत्व होनेसे? यह सिद्ध होता है कि शरीरइन्द्रिय आदि गौण आत्माओंके द्वारा मुख्य आत्माके कार्य किये जाते हैं। उ0 -- ऐसा कहना ठीक नहीं? क्योंकि उनका आत्मत्व अविद्याकर्तृक है। अर्थात् शरीर? इन्द्रिय आदि गौण आत्मा नहीं हैं ( किंतु मिथ्या हैं )। पू0 -- तो फिर ( इनमें आत्मभाव ) कैसे होता है उ0 -- मिथ्या प्रतीतिसे ही सङ्गरहित आत्माकी सङ्गति मानकर? इनसे आत्मभाव किया जाता है क्योंकि उस मिथ्याप्रतीतिके रहते हुए ही उनमें आत्मभावकी सत्ता है? उसके अभावसे आत्मभावनाका भी अभाव हो जाता है। अभिप्राय यह कि मूर्ख अज्ञानियोंका ही अज्ञानकालमें मैं बड़ा हूँ ? मैं गौर हूँ इस प्रकार शरीरइन्द्रिय आदिके संघातमें आत्माभिमान देखा जाता है। परंतु मैं शरीरादि संघातसे अलग हूँ ऐसा समझनेवाले विवेकशीलोंकी? उस समय शरीरादि संघातमें अहंबुद्धि नहीं होती। सुतरां? मिथ्याप्रतीतिके अभावसे देहात्मबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण? यह सिद्ध होता है कि शरीरादिमें आत्मबुद्धि अविद्याकृत ही है? गौण नहीं। जिनकी समानता और विशेषता अलगअलग समझ ली गयी है? ऐसे सिंह और देवदत्तमें या अग्नि और बालक आदिमें ही गौण प्रतीति या गौण शब्दका प्रयोग हो सकता है जिनकी समानता और विशेषता नहीं समझी गयी उनमें नहीं। तुमने जो कहा कि श्रुतिको प्रमाणरूप माननेसे यह पक्ष सिद्ध होता है कि वह भी ठीक नहीं क्योंकि उसकी प्रमाणता अदृष्टविषयक है। अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध न होनेवाले अग्निहोत्रादिके? साध्य? साधन और सम्बन्धके विषयमें ही श्रुतिकी प्रमाणता है प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध हो जानेवालेविषयोंमें नहीं। क्योंकि श्रुतिकी प्रमाणता अदृष्ट विषयको दिखलानेके लिये ही है ( अर्थात् अप्रत्यक्ष विषयको बतलाना ही उसका काम है )। सुतरां देहादिसंघातमें? प्रत्यक्ष ही मिथ्या ज्ञानसे होनेवाली अहंप्रतीतिको? गौण मानना नहीं बन सकता। क्योंकि अग्नि ठण्डा है या अप्रकाशक है ऐसा कहनेवाली सैकड़ों श्रुतियाँ भी प्रमाणरूप नहीं मानी जा सकतीं। यदि श्रुति ऐसा कहे कि अग्नि ठण्डा है अथवा अप्रकाशक है तो ऐसा मान लेना चाहिये कि श्रुतिको कोई और ही अर्थ अभीष्ट है। क्योंकि अन्य प्रकारसे उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती। परंतु प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके विरुद्ध या श्रुतिके अपने वचनोंके विरुद्ध श्रुतिके अर्थकी कल्पना करना उचित नहीं। पू0 -- कर्म मिथ्या ज्ञानयुक्त पुरुषद्वारा ही किये जानेवाले हैं? ऐसा माननेसे वास्तवमें कर्ताका अभाव हो जानेके कारण श्रुतिकी अप्रमाणता ( अनर्थकता ) ही सिद्ध होती है ऐसा कहें तो उ0 -- नहीं? क्योंकि ब्रह्मविद्यामें उसकी सार्थकता सिद्ध होती है। पू0 -- कर्मविधायक श्रुतिकी भाँति ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिकी अप्रमाणताका प्रसङ्ग आ जायगा? ऐसा माने तो उ0 -- यह ठीक नहीं? क्योंकि उसका कोई बाधक प्रत्यय नहीं हो सकता। अर्थात् जैसे ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिद्वारा आत्मसाक्षात्कार हो जानेपर? देहादि संघातमें आत्मबुद्धि बाधित हो जाती है? वैसे आत्मामें ही होनेवाला आत्मभावका बोध किसीके द्वारा किसी भी कालमें किसी प्रकार भी बाधित नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह आत्मज्ञान स्वयं ही फल है? उससे भिन्न किसी अन्यफलकी प्राप्ति नहीं है? जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है। इसके सिवा ( वास्तवमें ) कर्मविधायक श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है? क्योंकि वह पूर्वपूर्व ( स्वाभाविक ) प्रवृत्तियोंको रोकरोककर उत्तरोत्तर नयीनयी ( शास्त्रीय ) प्रवृत्तिको उत्पन्न करती हुई ( अन्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा साधकको ) अन्तरात्माके सम्मुख करनेवाली प्रवृत्ति उत्पन्न करती है। अतः उपाय मिथ्या होते हुए भी? उपेयकी सत्यतासे? उसकी सत्यता ही है जैसे कि विधिवाक्यके अन्तमें कहे जानेवाले अर्थवादवाक्योंकी सत्यता मानी जाती है। लोकव्यवहारमें भी ( देखा जाता है कि ) उन्मत्त और बालक आदिको दूध आदि पिलानेके लिये चोटी बढ़ने आदिकी बात कही जाती है। तथा आत्मज्ञान होनेसे पहले? देहाभिमाननिमित्तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके प्रमाणत्वकी भाँति प्रकारान्तरमें स्थित,( कर्मविधायक ) श्रुतियोंकी साक्षात् प्रमाणता भी सिद्ध होती है। तुम जो यह मानते हो? कि आत्मा स्वयं क्रिया न करता हुआ भी सन्निधिमात्रसे कर्म करता है? यही आत्माका मुख्य कर्तापन है। जैसे राजा स्वयं युद्ध न करते हुए भी सन्निधिमात्रसे ही अन्य योद्धाओंके युद्ध करनेसे राजा युद्ध करता है ऐसे कहा जाता है तथा वह जीत गया? हार गया ऐसे भी कहा जाता है। इसी प्रकार सेनापति भी केवल वाणीसे ही आज्ञा करता है। फिर भी राजा और सेनापतिका उस क्रियाके फलसे सम्बन्ध होता देखा जाता है। तथा जैसे ऋत्विक्के कर्म यजमानके माने जाते हैं? वैसे ही देहादि संघातके कर्म आत्मकृत हो सकते हैं? क्योंकि उनका फल आत्माको ही मिलता है। तथा जैसे भ्रामक ( भ्रमण करानेवाला चुम्बक ) स्वयं क्रिया नहीं करता? तो भी वह लोहेका चलानेवाला है? इसलिये उसीका मुख्य कर्तापन है? वैसे ही आत्माका मुख्य कर्तापन है। ऐसा मानना ठीक नहीं? क्योंकि ऐसा माननेसे न करनेवालेको कारक माननेका प्रसङ्ग आ जायगा। यदि कहो कि कारक तो अनेक प्रकारके होते हैं? तो भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं क्योंकि राजा आदिका मुख्य कर्तापन भी देखा जाता है। अर्थात् राजा अपने निजी व्यापारद्वारा भी युद्ध करता है। तथा योद्धाओंसे युद्ध कराने और उन्हें धन देनेसे भी निःसन्देह उसका मुख्य कर्तापन है? उसी प्रकार जयपराजय आदि फलभोगोंमें भी उसकी मुख्यता है। वैसे ही यजमानका भी प्रधान आहुति स्वयं देनेके कारण और दक्षिणा देनेके कारण निःसन्देह मुख्य कर्तृत्व है। इससे यह निश्चित होता है कि क्रियारहित वस्तुमें जो कर्तापनका उपचार है वह गौण है। यदि राजा और यजमान आदिमें स्वव्यापाररूप मुख्य कर्तापन न पाया जाता तो उनका सन्निधिमात्रसे भी मुख्य कर्तापन माना जा सकता था? जैसे कि लोहेको चलानेमें चुम्बकका सन्निधिमात्रसे मुख्य कर्तापन माना जाता है? परंतु चुम्बककी भाँति राजा और यजमानका स्वव्यापार उपलब्ध न होता होऐसी बात नहीं है। सुतरां सन्निधिमात्रसे जो कर्तापन है वह भी गौण ही है। ऐसा होनेसे उसके फलका सम्बन्ध भी गौण ही होगा? क्योंकि गौण कर्ताद्वारा मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। अतः यह मिथ्या ही कहा जाता है कि निष्क्रिय आत्मा देहादिकी क्रियासे कर्ताभोक्ता हो जाता है। परंतु भ्रान्तिके कारण सब कुछ हो सकता है। जैसे कि स्वप्न और मायामें होता है। परंतु शरीरादिमें,आत्मबुद्धिरूप अज्ञानसन्ततिका विच्छेद हो जानेपर? सुषुप्ति और समाधि आदि अवस्थाओंमें कर्तृत्व? भोक्तृत्व आदि अनर्थ उपलब्ध नहीं होता। इससे यह सिद्ध हुआ? कि यह संसारभ्रम मिथ्या ज्ञाननिमित्तक ही है? वास्तविक नहीं? अतः पूर्ण तत्त्वज्ञानसे उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है।
Sri Anandgiri
वृत्तमनूद्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- कर्मयोगेति। धर्मविशेषणादधर्मानुज्ञां वारयति -- धर्मेति। ज्ञाननिष्ठेन मुमुक्षुणा धर्माधर्मयोस्त्याज्यत्वे श्रुतिस्मृती उदाहरति -- नाविरत इति। मामेकमित्यादेस्तात्पर्यमाह -- न मत्तोऽन्यदिति। अर्जुनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायां मुख्यानधिकारेऽपि तं पुरस्कृत्याधिकारिभ्यस्तस्योपदिदिक्षितत्वादविरोधमभिप्रेत्याह -- अहं त्वेति। उक्तेऽर्थे दाशमिकं वाक्यमनुकूलयति -- उक्तंचेति। ईश्वरस्य त्वदीयबन्धननिरसनद्वारा त्वत्पालयितृत्वान्न ते शोकावकाशोऽस्तीत्याह -- अत इति।
Sri Dhanpati
परमेश्वरयजनात्मकं कर्मयोगं तन्निष्ठायाः परमरहस्यं ईश्वरशरणतालक्षणं भक्तियोगं चोपसंहृत्याथेदानीमुभयफलभूतं सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तप्रतिपादितं तत्रतत्र विस्तरेम प्रोक्तमुपसंहरति -- सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माश्च सर्वधर्माः तान्। धर्मशब्देनात्राधर्मोऽपि गृह्यते। नैष्कर्म्यस्य विवक्षिकत्वात्नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि पज्ञानेनैनमाप्नुयात्त्यज धर्ममधर्मं च इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः सर्वधर्मान् सर्वाणि कर्माणि परित्यज्य संन्यस्य मामेकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थमीश्वरमच्युतं गर्भजन्मजरावर्जितमहमेवैतादृशः परमात्मैत्येवमेकं शरणं व्रज। न मत्तोऽन्यदस्तीत्यवधारयेत्यर्थः। अहं त्वामेवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वेभ्यो धर्माधर्मबन्धनरुपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्मभावप्रकाशकरणेन। उक्तंच दशमेनाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानादीपेन भास्वता इति। अतो मा शुचः शोकं माकार्षीरित्यर्थः। यत्तु कश्चित्प्रललापस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इत्यत्र कर्मनिष्ठा कर्मसंन्यासपर्यन्तोपसंहृताततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इत्यत्र,संन्यासपूर्वकश्रवणादिपरिपाकसहितज्ञाननिष्ठोपसंहृता। अधुना तुईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठतितमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन इति यदुक्तं तद्विवृण्वन् भगवद्भक्तिनिष्ठामुभयसाधनत्वादुभयफलभूतत्वाच्चान्ते उपसंहरति -- सर्वधर्मोनिति। सर्वान्वर्णाश्रमादिधर्मानविद्यमानान् विद्यमानान्वा परित्यज्य शरणत्वेनानादृत्य मामीश्वरमेकमद्वितीयं सर्वधर्माणामधिष्ठातारं फलदातारं च शरणं व्रज। धर्माः सन्तु न सन्तु वा कुं तैरन्यमापेक्षैः। भगवदनुग्रहादेव अन्यनिरपेक्षादहं कृतार्थो भविष्यामिति निश्चयेन परमानन्दधनमूर्तिमनन्तं श्रीवासुदेवमेव भगवन्तमनुक्षणभावनया भजस्व। इदमेव परमं तत्त्वं नातोऽधिकमस्तीति विचारपूर्वकेण प्रेमप्रकर्षेण सर्वानात्मचिन्ताशून्यया मनोवृत्त्या तैलधारावदनविच्छिन्नया सततं चिन्तयेत्यर्थः। अत्र मामेकं शरणं व्रजेति सर्वशरणतापरित्यागे लब्धे सर्वधर्मान्परित्यज्येति निषेधानुवादस्तत्कार्यकारितालाभाव। यज्ञायज्ञीये साम्निऐरं कृत्वाद्गेयम् इत्यत्रन गिरागिरेति ब्रूयात् इचिवत् तथाच ममैव सर्वधर्मकारित्वान्मदेकशरणस्य नास्ति धर्मापेक्षेत्यर्थः। एतेनेदमपास्तम्। सर्वधर्मान्परित्यज्येत्युक्तेनाधर्माणां परित्यागो न लभ्यतेऽतो धर्मपदं कर्मपरमिति। न ह्यत्र कर्मत्यागो विधीयतेऽपितु विद्यमानेऽपि कर्मणि तत्रानादरेण भगवदेकशरणतामात्रं ब्रह्मचारिगृहस्थावानप्रस्थभिक्षूणां साधारण्येन विधीयते। तत्र सर्वधर्मान्परित्यज्येति तेषां स्वधर्मादरसंभवेन तन्निवारणार्थे अधर्मे चानर्थफले कस्याप्यादरामावात् त्यागवचनमनर्थकमेव शास्त्रान्तरप्राप्तत्वाच्च तस्मात्सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनुवादएव सर्वेषां तच्छास्त्राणां परमरहस्यमीश्वरशरणतैवेति तत्रैव परिसमाप्तिर्भगवता कृता। तामन्तरेण संन्यासस्यापि स्वफलापर्यवसायित्वात् अर्जुनं च क्षत्रियं संन्यासनधिकारिणंप्रति संन्यासोपदेशायोगात्। अर्जुनव्याजेनान्यस्योपदेशे तु वक्ष्यामि ते हितं त्वा मोक्षयिष्यासि सर्वपापेभ्यस्त्वं माशुचः इत्युपक्रमोपसंहारौ न स्याताम्। तस्मात्संन्यासधर्मेष्वप्यनादरेण भगवदेकशरणतामात्रे तात्पर्यं भगवतः। यस्मात्त्वं मदेकशरणः। सर्वधर्मानादरेणातोऽहं सर्वकार्यकारित्वात्त्वां सर्वपापेभ्यो बन्धुवधादिनिमित्तेभ्यः संसारहेतुभ्यो मोक्षयिष्यामि प्रायश्चित्तं विनैवधर्मेण पापमपनुदति इतिश्रुतेर्धर्मस्थानीयत्वाच्च मम। अतो माशुचः युद्धे प्रवृत्तस्य मम बन्धुवधादिनिमित्तप्रत्यवायात्कथं निस्तारः स्यादिति शोकं माकार्षीरित्यादि तन्नादर्तव्यम्। श्रीमतां सर्वज्ञानां भगवदात्मत्वात्? भगवदभिप्रायविदां भगवतां भाष्यकृतामभिप्रायापरिज्ञानविजृम्भितत्वात्। तथाहि सप्तदशाध्यायान्तगीताशास्त्रार्थोपसंहारत्मकेऽस्मिन्नध्याये प्रतिपादितेन कर्मादिना एतदध्यायन्तसमस्तशास्त्रोपसंहारो नोपपद्यते। नहिस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः इत्यत्र कर्मनिष्टानिरुपणस्य समाप्तिर्द्दश्यतेसर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्य्वपाश्रयः। चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः इत्युक्तत्वात्तस्मात्तत्रतत्र प्रतिपादितं कर्मयोगं भक्तियोगं ज्ञानं चास्मिन्नध्याये संग्रहेणोपपाद्य सर्वशास्त्रन्त उपसंहरतीत्येवयुक्तम्। अन्यथाबुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चितः मततं भव। मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तारिष्यसि इत्यत्र भक्तियोग उपसंहृत इत्यपि कुतो न स्यात्। तस्मात्कर्मयोगादिप्रतिपादनपरिसमाप्तावेव यथासंभवं उपसंहारवर्णनं युक्तं नतु यत्रकुत्रचित्।तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। तदामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते। नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।इदं तु ते गुह्यतमंनैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासंनाधिगच्छति इत्यादिना प्रतिपादितायाः समस्तवेदान्ततात्पर्यभूतायाः कर्मयोगभक्तियोगफलभूतायाः संन्यासपूर्वकायाः ज्ञाननिष्ठाया उपसंहारस्य शास्त्रान्ते कर्तव्यत्वावश्यकत्वेन सर्वधर्मान्परित्यज्येत्यनेन सर्वकर्मसंन्यासस्य स्पष्टतया प्रतीयमानत्वेन च तादृशज्ञाननिष्ठोपसंहारस्य युक्ततामभिप्रतेयाचार्यैः सैवास्मिन्श्लोक उपसंहृता। ईश्वराभिप्राय ईश्वरेणैव ज्ञायते नतु वराकैरस्मदादिभि। विष्णुशिवयोरेकात्मत्वं परमात्मत्वं च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादिसिद्धम्। तमेव शरणं गच्छेत्यस्य विवरणमनेन क्रियत इत्यपि न। असंदिग्धार्थस्य संदिग्धार्थेन विवरणायोगात्। सर्वधर्मान्परित्यजयेति तु तत्रतत्रार्जुनं निमित्तीकृत्य संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाप्रतिपादनमिवार्जनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायामनधिकारेऽपि तु तत्रतत्रार्जुनं निमित्तीकृत्य संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाप्रतिपादनमिवार्जनस्य क्षत्रियत्वादुक्तसंन्यासद्वारा ज्ञाननिष्ठायामनाधिकारेऽपि तं पुरस्कृत्याधिकारिभ्यस्तस्योपदिदिक्षितत्वान्न विरुध्यतेऽर्जुनं निमित्तीकृत्य लोकोपकाराय भगवतः प्रवृत्तिरिति संमतम्। अन्यथा क्षत्रियस्यार्जुनस्य श्रोतुर्यस्मिन्नधिकारस्तस्यैव वक्तव्यत्वे संन्यासपूर्विकायाः ज्ञाननिष्ठायाः वर्णनमनर्थकं स्यात्। वस्तुतोऽर्जुनस्य स्वविग्रहस्य सर्वज्ञत्वोनोपदेशानर्थक्यं च भवेत्। अपिच तं प्रति सर्वधर्मपरितायगकथनं भगवतः पूर्वापरविरुद्धम्।कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि।कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयःन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्रुतेस्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरःस्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणुस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवःश्रेयान्तस्वधर्मो विगुणःसहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्य्वपाश्रयःस्वभावजेन कौन्तेय इत्यादिना तत्रतत्र कर्मापरित्यागमत्याग्रहेण प्रतिपाद्यत्रैवं कथने परस्परविरोधस्य स्पष्टत्वात्। एतेन सर्वधर्मान्परित्यज्य शरणत्वेनानादृत्य धर्माः सन्तु न सन्तु वा किंतौरित्यादिवर्णनमपास्तम्।यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणांमत्कर्मकृन्मत्परमःस्वकर्मणा तमभ्यर्च्य इत्यादिवचनानां विरोधस्यास्मिन्नश्रुतकल्पनेऽपि तुल्यत्वात्। कर्माधिकृतेनाज्ञेन वेदविहितं धर्ममनादृत्य मद्रूपोपासनं कार्यमिति सर्वस्मिन्गीताशास्त्रे क्वाप्यनुक्तत्वेन तदुपसंहारवर्णनस्यानुचितत्वाच्च।अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायांरताःमामनुस्मर युध्य चश्रुतिस्मृती ममैवाज्ञे ते,उल्लङ्घन प्रवर्तते। आज्ञानङ्गो मम द्रोहो मद्भक्तोऽपि न वैष्णवः।।र्णआश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यस्तत्तोषकारणम्। तस्मात्सदाचारवता पुरुषेण जनार्दनः। आराध्याते स्ववर्णोक्तधर्मानुष्ठानकारिणा इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः कर्मसमुच्चितोपासनायां वैशिष्ट्यबोधनाच्च। यत्र तु कर्मणो निन्दा पुराणादिषु श्रुयते न सा भगवदाराधनलक्षणस्य निष्कामकर्मणो वेदविहितस्य नियतस्यापितु भगवत्पराङ्गुस्वेनानुष्ठानस्य सकामस्य। तस्मादर्जुनेन सर्वकर्मत्यागाः कर्तव्य इति भगवतो नाभिप्रेतम् किंतु त्यागाधिकारिभिः कर्ममात्रं संन्यस्याहमेव भगवान्स वासुदेवः नतु मत्तोऽन्योस्तीति ज्ञाननिष्ठा सम्यक् संपादनीयेति वक्ष्यामि ते हितं त्वां मोक्षयिष्यामि सर्वपापेभ्यस्त्वं माशुच इति चोपक्रमोपसंहारात्।तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्षयन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः इत्यादिवत् अर्जुनव्याजेनान्यस्ंयोपदेशेति न विरुध्यते। यदपि सर्वपापेभ्यः बन्धुवादिनिमित्तेभ्य इत्यादि तदपि साहसमात्रम्।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादो अग्नीषोमीयपशुहिंसावद्युद्धे सत्रुहननरुपाया विहिताया हिंसायाः पापजनकत्वाभावस्यात्याग्रहेण स्वेनैव स्थापित्वात्। यदप्यत्रेत्यादि तदपि बालविमोहनमात्रम्। उक्तयुक्त्या मामेकं शरणं व्रजेत्यत्राचार्योक्तार्थस्यैव विवक्षितत्वात्। मामेकं शरणं व्रज स्वधर्माचरणादिना मामेवाराधय नतु देवतान्तरमित्यर्थस्यापि संभवेन सर्वधर्मत्यागस्य लाभायोगाच्च। यदप्येते नेदमपास्तमित्यादि तदपि तुच्छमेव।नाविरतो दुश्चरितात्त्यज धर्मधर्में च इति भाष्योदाहृतश्रुतिस्मृत्यनवलोकनविजृम्भितत्वात्। तथाच सर्वस्याप्यज्ञस्य कामिनो विषयरागावशादधर्माचरणं दृश्यते शरीरस्थतिमात्रविषयकामनया तदाचरणं संन्यासाधिकारिणोऽपि संभाव्य तत्परित्यागवचनस्य श्रुतिस्मृत्यनुरोधेन सार्थक्यम्। अधर्मेऽनर्थफले कस्याप्यादरो नास्तीति वक्तुमशक्यं लोके तदादरस्योपलभ्यमानत्वादन्यथा न सुरां पिबेत् न कलञ्जं भजयेदित्यादि निषेधवाक्यानां वैयर्थ्यं स्यात्। तस्मादत्रार्जुनं निमित्तीकृत्याधिकारिभ्यो वेदविहितकर्मत्यागो गीताशास्त्रे उपपाद्य तदन्ते उपसंह्नियते। भगवदेकशरणतायाः तमेव शरणं गच्छेत्यनेनोक्तत्वात्।मन्मना भव भद्भक्तो मद्याजी त्यनेन भक्तियोगस्य कर्मयोगस्य चोपसंहृतत्वात्। यत्तु संन्यासशास्त्रेण प्रतिषिद्धशास्त्रेण च लब्धत्वान्नात्र सर्वधर्मत्यागो विधीयते इति तत्र विधिनिषेधरुपेण वेदेन प्राप्तत्वात्। तदर्थप्रतिपादकस्मृतीतिहासपुराणानां वैयर्थ्यप्रसङ्गदित्यास्तां तावत्। एवमन्येषामपि कुकल्पना भाष्यविरुद्धाः सभ्यग्विचार्य नराकर्तव्याः।गोभाराहरणार्थिना सुविहता वेदार्थनाशे रता येऽनाद्यं जगतां निदानममलं शास्त्रस्य योनिं विभुम्। यत्कारुण्यकटाक्षतोऽभिलषितं पूर्णं ममाप्यद्भूतं तं वन्दे परमामृतं शिवमहं कृष्णं गुरुणां गुरुम्।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| sarva | dharmān |
| parityajya | abandoning |
| mām | unto me |
| ekam | only |
| śharaṇam | take refuge |
| vraja | take |
| aham | I |
| tvām | you |
| sarva | all |
| pāpebhyaḥ | from sinful reactions |
| mokṣhayiṣhyāmi | shall liberate |
| mā | do not |
| śhuchaḥ | fear |
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तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar
यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना। — VaniSagar
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“सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 66 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 66 का हिंदी अर्थ: "सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 66?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 66 translates to: "Abandon all duties and take refuge in Me alone; I will liberate you from all sins; do not grieve. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 66 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja" mean in English?
"sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 66. Abandon all duties and take refuge in Me alone; I will liberate you from all sins; do not grieve. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.