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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे

तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

உன் மனதை என்னில் நிலைநிறுத்து, என்னிடம் பக்தி செலுத்து, எனக்காக தியாகம் செய், என்னை வணங்கு. நீங்கள் என்னிடம் வருவீர்கள்; நீங்கள் எனக்கு மிகவும் பிரியமானவர் என்பதால் இதை நான் உங்களுக்கு உண்மையிலேயே உறுதியளிக்கிறேன்.

TeluguIND

నీ మనస్సును నాపై స్థిరపరచుము, నాకు అంకితము చేయుము, నాకు త్యాగము చేయుము, నాకు నమస్కరించుము. మీరు నా దగ్గరకు వస్తారు; నేను మీకు నిజంగా వాగ్దానం చేస్తున్నాను, ఎందుకంటే మీరు నాకు ప్రియమైనవారు.

BengaliIND

আমার উপর তোমার মন স্থির কর, আমার প্রতি নিবেদিত হও, আমাকেই উৎসর্গ কর, আমাকে প্রণাম কর। তুমি আমার কাছে আসবে; আমি আপনাকে এই প্রতিশ্রুতি দিচ্ছি, কারণ আপনি আমার প্রিয়।

SindhiIND

مون تي ڌيان ڪر، مون لاءِ وقف ڪر، مون لاءِ قربان ٿيو، مون کي سجدو ڪر. تون مون وٽ ايندين؛ مان توهان سان سچ پچ اهو واعدو ڪريان ٿو، ڇو ته توهان مون کي پيارا آهيو.

PunjabiIND

ਮੇਰੇ ਉੱਤੇ ਆਪਣਾ ਚਿੱਤ ਜੋੜ, ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਸਦਕੇ ਹੋ, ਮੇਰੇ ਉਤੋਂ ਕੁਰਬਾਨ ਹੋ, ਮੇਰੇ ਅੱਗੇ ਸਿਰ ਨਿਵਾਜਾ। ਤੁਸੀਂ ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਆਵੋਗੇ; ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਸੱਚਮੁੱਚ ਇਹ ਵਾਅਦਾ ਕਰਦਾ ਹਾਂ, ਕਿਉਂਕਿ ਤੁਸੀਂ ਮੈਨੂੰ ਪਿਆਰੇ ਹੋ।

GujaratiIND

તમારા મનને મારામાં સ્થિર કરો, મારી ભક્તિ કરો, મારા માટે ત્યાગ કરો, મને પ્રણામ કરો. તમે મારી પાસે આવશો; હું તમને ખરેખર આ વચન આપું છું, કારણ કે તમે મને પ્રિય છો.

MarathiIND

माझे चित्त माझ्यावर स्थिर करा, माझ्यावर एकनिष्ठ व्हा, माझ्यासाठी त्याग करा, मला नमन करा. तू माझ्याकडे येशील; मी तुम्हाला हे वचन देतो, कारण तू मला प्रिय आहेस.

MalayalamIND

എന്നിൽ മനസ്സുറപ്പിക്കുക, എന്നിൽ അർപ്പിക്കുക, എനിക്ക് ത്യാഗം ചെയ്യുക, എന്നെ വണങ്ങുക. നീ എൻ്റെ അടുക്കൽ വരും; ഞാൻ ഇത് നിങ്ങൾക്ക് ശരിക്കും വാഗ്ദാനം ചെയ്യുന്നു, കാരണം നിങ്ങൾ എനിക്ക് പ്രിയപ്പെട്ടവരാണ്.

NepaliIND

ममा मन लगाउ, मप्रति समर्पण गर, ममा त्याग गर, मलाई नतमस्तक गर। तिमी मकहाँ आउनेछौ; म तपाईंलाई यो प्रतिज्ञा गर्छु, किनकि तपाईं मलाई प्रिय हुनुहुन्छ।

KannadaIND

ನಿಮ್ಮ ಮನಸ್ಸನ್ನು ನನ್ನ ಮೇಲೆ ಇರಿಸಿ, ನನಗೆ ಸಮರ್ಪಿತರಾಗಿ, ನನಗೆ ತ್ಯಾಗ ಮಾಡಿ, ನನಗೆ ನಮಸ್ಕರಿಸಿ. ನೀನು ನನ್ನ ಬಳಿಗೆ ಬರುವೆ; ನಾನು ನಿಮಗೆ ಇದನ್ನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಭರವಸೆ ನೀಡುತ್ತೇನೆ, ಏಕೆಂದರೆ ನೀವು ನನಗೆ ಪ್ರಿಯರು.

DogriIND

मन मेरे पर टिको, मेरे प्रति भक्त हो, मेरे को बलिदान करो, मेरे सामने प्रणाम करो। तुस मेरे कोल औगे; मैं तुंदे कन्ने सच्ची वादा करदा हां, कीजे तुस मेरे कन्ने प्यारे ओ।

MizoIND

I rilru chu Ka chungah nghat la, Ka tan inpe la, Ka hnenah inthawi la, Ka hmaah chibai buk rawh. Ka hnenah i lo kal ang; Hei hi ka tiam tak zet che a ni, Ka tan chuan i duh em em a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- मद्भक्तः -- साधकको सबसे पहले मैं भगवान्का हूँ इस प्रकार अपनी अहंता(मैंपन) को बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन सुगमतासे नहीं होता।,अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे? स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले मद्भक्तः होना चाहिये।किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल देता है कि मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ। विवाह हो जानेपर कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि मैं तो ससुरालकी ही हूँ ? और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है। ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है। [अहंताके बदलनेपर ममता भी अपनेआप बदल जाती है।]मन्मना भव -- उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है? वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है? वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम? गुण? प्रभाव? लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।मद्याजी -- अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपनेआपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था? वही काम अब भगवान्का,काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्योंज्यों दृढ़ होता जाता है? त्योंहीत्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे? चाहे घरका काम करे? चाहे शरीरका काम करे? चाहे ऊँचानीचा कोई भी काम करे? उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।मां नमस्कुरु -- भगवान्के चरणोंमें साष्टाङ्ग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ -- ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय? उसमें भगवान्का मङ्गलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे।भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा? वह मङ्गलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये -- यह बात दूसरी है? पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है? इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है? वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है? प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद होनेसे जो कुछ विधान करते हैं? वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्यपापोंका नाश करके? उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे -- भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे? मेरेमें मनवाला होनेसे? मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा -- ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्यारा है।प्रियोऽसि मे कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेंजें? चाहे नरकोंमें भेजें? उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है? यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर प्रियोऽसि मे वचन कहते हैं।जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार(धनसम्पत्ति? कुटुम्बी? शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि? प्राण आदि) को अपना मानने लगता है? जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह मान हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके? जिनसे हमारा वास्तविक और नित्यसम्बन्ध है? उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वे वचन कौनसे हैं सो कहते हैं --, तू मुझमें मनवाला अर्थात् मुझमें चित्तवाला हो? मेरा भक्त अर्थात् मेरा ही भजन करनेवाला हो और मेरा ही पूजन करनेवाला हो? तथा मुझे ही नमस्कार कर? अर्थात् नमस्कार भी मुझे ही किया कर। इस प्रकार करता हुआ? अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही ( अपने ) समस्त साध्य? साधन और प्रयोजनको समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा। इस विषयमें मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्रिय है। कहनेका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान्को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवान्की भक्तिका फल निःसन्देह -- ऐकान्तिक मोक्ष है -- यह समझकर? मनुष्यको केवल एकमात्र भगवान्की शरणमें ही तत्पर हो जाना चाहिये।

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Sri Anandgiri

तदेव प्रश्नद्वारा विवृणोति -- किं तदित्यादिना। उत्तरार्धं व्याचष्टे -- तत्रेति। एवमुक्तया रीत्या वर्तमानस्त्वं तस्मिन्नेव वासुदेवे भगवत्यर्पितसर्वभावो मामेवागमिष्यसीति संबन्धः। सत्यप्रतिज्ञाकरणे हेतुमाह -- यत इति। इदानीं वाक्यार्थं श्रेयोऽर्थिनां प्रवृत्त्युपयोगित्वेन संगृह्णाति -- एवमिति।

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Sri Dhanpati

किं तदित्यपेक्षायामाह -- मन्मना मयि भवति वासुदेवे मनो यस्य स मच्चित्तो भव सर्वदा मामेव चिन्तय। मद्भक्तो मच्छ्रवणकीर्तनादिमद्भजनो भव। मद्याजी मद्यजनशीलो भव। मां नमस्कुरु नमस्कारमपि मामेव कुरु। तत्रैव वर्तमानो मयि वासुदेव एव समर्पितसाध्यसाधनप्रयोजनो मामेवैष्यसि आगमिष्यसि मदभेदज्ञानं प्राप्यस्यसि। अस्मिन्नर्थे सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञां करोमि। यतः प्रियोऽसि मे। तथाच मम भगवतः सत्यप्रतिज्ञत्वं बुद्ध्वा मद्भक्तेरवश्भावि मत्प्राप्तिफलत्वमवधार्य मच्छरणैकपरायणो भवेति वाक्यार्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
matmanāḥ
bhavabe
matbhaktaḥ
matyājī
māmto me
namaskuruoffer obeisance
māmto me
evacertainly
eṣhyasiyou will come
satyamtruly
teto you
pratijāneI promise
priyaḥdear
asiyou are
meto me
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Bhagavad Gita · 18.64
सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्

सबसे अत्यन्त गोपनीय वचन तू फिर मेरेसे सुन। तू मेरा अत्यन्त प्रिय है, इसलिये मैं तेरे हितकी बात कहूँगा। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः

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Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 65
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 65
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे

तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 65 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 65 का हिंदी अर्थ: "तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 65?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 65 translates to: "Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. You will come to Me; I truly promise you this, for you are dear to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 65 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। तू मेरा भक्त हो जा, मेरेमें मनवाला हो जा, मेरा पूजन करनेवाला हो जा और मेरेको नमस्कार कर। ऐसा करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त हो जायगा -- यह मैं तेरे सामने सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा अत्यन्त प्रिय है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru" mean in English?

"man-manā bhava mad-bhakto mad-yājī māṁ namaskuru" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 65. Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. You will come to Me; I truly promise you this, for you are dear to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.