
“उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है। — VaniSagar”
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பக்தியால், அவர் என்னை உண்மையாக அறிந்திருக்கிறார், நான் யார், என்ன என்று; பின்னர், என்னை உண்மையாக அறிந்தவுடன், அவர் உடனடியாக உச்சத்தில் நுழைகிறார்.
भक्ति से ऊ हमरा के सच्चाई से जानत बा, हम के हईं आ का हईं; तब हमरा के सच्चाई से जान के तुरंत परमात्मा में प्रवेश करेला।
ਭਗਤੀ ਦੁਆਰਾ, ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਸੱਚ ਵਿੱਚ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਮੈਂ ਕੌਣ ਅਤੇ ਕੀ ਹਾਂ; ਤਦ, ਮੈਨੂੰ ਸੱਚ ਨਾਲ ਜਾਣ ਕੇ, ਉਹ ਤੁਰੰਤ ਪਰਮ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਵੇਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ।
भक्ति सँ ओ हमरा सत्य मे जनैत छथि, हम के छी आ की छी; तखन हमरा सत्यतः जानि तुरन्त परमात्मा मे प्रवेश करैत छथि |
भक्ति कन्नै, ओह मिगी सच्चाई च जानदा ऐ, मैं कुन ते केह् आं; फिरी सच्चाई च मिगी जानने दे बाद तुरंत परमात्मा च प्रवेश करदा ऐ।
భక్తితో, అతను నన్ను సత్యంలో తెలుసుకుంటాడు, నేను ఎవరు మరియు ఏమిటి; అప్పుడు, నన్ను సత్యంగా తెలుసుకున్న తరువాత, అతను వెంటనే పరమాత్మలో ప్రవేశిస్తాడు.
भक्तिद्वारा, उहाँले मलाई सत्यमा जान्नुहुन्छ, म को र के हुँ; तब मलाई सत्यरूपमा चिनेर उहाँ तुरुन्त परममा प्रवेश गर्नुहुन्छ।
ಭಕ್ತಿಯಿಂದ, ಅವನು ನನ್ನನ್ನು ಸತ್ಯದಲ್ಲಿ ತಿಳಿದಿರುತ್ತಾನೆ, ನಾನು ಯಾರು ಮತ್ತು ಏನು; ನಂತರ, ಅವರು ನನ್ನನ್ನು ಸತ್ಯದಲ್ಲಿ ತಿಳಿದ ನಂತರ, ಅವರು ತಕ್ಷಣವೇ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ಪ್ರವೇಶಿಸುತ್ತಾರೆ.
ભક્તિ દ્વારા, તે મને સત્યમાં જાણે છે, હું કોણ અને શું છું; પછી, મને સત્યમાં ઓળખીને, તે તરત જ પરમમાં પ્રવેશ કરે છે.
ভক্তি দ্বারা, তিনি আমাকে সত্যে জানেন, আমি কে এবং কি; অতঃপর, আমাকে সত্যে চিনতে পেরে তিনি তৎক্ষণাৎ পরমে প্রবেশ করেন।
भक्तीने तो मला खऱ्या अर्थाने ओळखतो, मी कोण आणि काय आहे; मग, मला सत्याने ओळखून, तो लगेचच परमात्म्यात प्रवेश करतो.
ഭക്തിയാൽ, അവൻ എന്നെ സത്യത്തിൽ അറിയുന്നു, ഞാൻ ആരാണെന്നും എന്താണെന്നും; പിന്നെ, എന്നെ സത്യമായി അറിഞ്ഞ്, അവൻ ഉടനെ പരമാത്മലോകത്തിൽ പ്രവേശിക്കുന്നു.
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Swami Ramsukhdas
व्याख्या -- भक्त्या मामभिजानाति -- जब परमात्मतत्त्वमें आकर्षण? अनुराग हो जाता है? तब साधक स्वयं उस परमात्माके सर्वथा समर्पित हो जाता है? उस तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है। फिर उसका अलग कोई (स्वतन्त्र) अस्तित्व नहीं रहता अर्थात् उसके अहंभावका अतिसूक्ष्म अंश भी नहीं रहता। इसलिये उसको प्रेमस्वरूपा प्रेमाभक्ति प्राप्त हो जाती है। उस भक्तिसे परमात्मतत्त्वका वास्तविक बोध हो जाता है।,ब्रह्मभूतअवस्था हो जानेपर संसारके सम्बन्धका तो सर्वथा त्याग हो जाता है? पर मैं ब्रह्म हूँ? मैं शान्त हूँ? मैं निर्विकार हूँ? ऐसा सूक्ष्म अहंभाव रह जाता है। यह अहंभाव जबतक रहता है? तबतक परिच्छिन्नता और पराधीनता रहती है। कारण कि यह अहंभाव प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति पर है इसलिये पराधीनता रहती है। परमात्माकी तरफ आकृष्ट होनेसे? पराभक्ति होनेसे ही यह अहंभाव मिटता है । इस अहंभावके सर्वथा मिटनेसे ही तत्त्वका वास्तविक बोध होता है।यावान् -- सातवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको समग्ररूप सुननेकी आज्ञा दी कि मेरेमें जिसका मन आसक्त हो गया है? जिसको मेरा ही आश्रय है? वह अनन्यभावसे मेरे साथ दृढ़तापूर्वक सम्बन्ध रखते हुए मेरे जिस समग्ररूपको जान लेता है? उसको तुम सुनो। यही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके अन्तमें कही कि जरामरणसे मुक्ति पानके लिये जो मेरा आश्रय लेकर यत्न करते हैं? वे ब्रह्म? सम्पूर्ण अध्यात्म और सम्पूर्ण कर्मको अर्थात् सम्पूर्ण निर्गुणविषयको जान लेते हैं और अधिभूत? अधिदैव और अधियज्ञके सहित मुझको अर्थात् सम्पूर्ण सगुणविषयको जान लेते हैं।इस प्रकार निर्गुण और सगुणके सिवाय राम? कृष्ण? शिव? गणेश? शक्ति? सूर्य आदि अनेक रूपोंमें प्रकट होकर परमात्मा लीला करते हैं? उनको भी जान लेना -- यही पराभक्तिसे यावान् अर्थात् समग्ररूपको जानना है।यश्चास्मि तत्त्वतः -- वे ही परमात्मा अनेक रूपोंमें? अनेक आकृतियोंमें? अनेक शक्तियोंको साथ लेकर? अनेक कार्य करनेके लिये बारबार प्रकट होते हैं? और वे ही परमात्मा अनेक सम्प्रदायोंमें अपनीअपनी भावनाके अनुसार अनेक इष्टदेवोंके रूपमें कहे जाते हैं। वास्तवमें परमात्मा एक ही हैं। इस प्रकार मैं जो हूँ -- इसे तत्त्वसे जान लेता है।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् -- ऐसा मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात् मेरे साथ भिन्नताका जो भाव था? वह सर्वथा मिट जाता है।तत्त्वसे जाननेपर उसमें जो अनजानपना था? वह सर्वथा मिट जाता है और वह उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है। यही पूर्णता है और इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है।विशेष बातजीवका परमात्मामें प्रेम (रति? प्रीति या आकर्षण) स्वतः है। परन्तु जब यह जीव प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है? तब वह परमात्मासे विमुख हो जाता है और उसका संसारमें आकर्षण हो जाता है। यह आकर्षण ही वासना? स्पृहा? कामना? आशा? तृष्णा आदि नामोंसे कहा जाता है।इस वासना आदिका जो विषय (प्रकृतिजन्य पदार्थ) है? वह क्षणभङ्गुर और परिवर्तनशील है तथा यह जीवात्मा स्वयं? नित्य और अपरिवर्तनशील है। परन्तु ऐसा होते हुए भी प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे यह परिवर्तनशीलमें आकृष्ट हो जाता है। इससे इसको मिलता तो कुछ नहीं? पर कुछ मिलेगा -- इस भ्रम? वासनाके कारण यह जन्ममरणके चक्करमें पड़ा हुआ महान् दुःख पाता रहता है। इससे छूटनेके लिये भगवान्ने योग बताया है। वह योग जडतासे सम्बन्धविच्छेद करके परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव करा देता है।गीतामें मुख्यरूपसे तीन योग कहे हैं -- कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग। इन तीनोंपर विचार किया जाय तो भगवान्का प्रेम तीनों ही योगोंमें है। कर्मयोगमें उसको कर्तव्यरति कहते हैं अर्थात् वह रति कर्तव्य होती है -- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः (18। 45)। [कर्मयोगकी यह रति अन्तमें आत्मरतिमें परिणत हो जाती है (गीता 2। 55 3। 17) और जिस कर्मयोगीमें भक्तिके संस्कार हैं? उसकी यह रति भगवद्रतिमें परिणत हो जाती है।] ज्ञानयोगमें उसी प्रेमको आत्मरति कहते हैं अर्थात् वह रति स्वरूपमें होती है -- योऽन्तःसुखोऽन्तरारामः (5। 24)। और भक्तियोगमें उसी प्रेमको भगवद्रति कहते हैं अर्थात् वह रति भगवान्में होती है -- तुष्यन्ति च रमन्ति च (10। 9)। इस प्रकार इन तीनों योगोंमें रति होनेपर भी गीतामें भगवद्रति की विशेषरूपसे महिमा गायी गयी है।तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे भी योगी (समतावाला) श्रेष्ठ है (गीता 6। 46)। तात्पर्य यह है कि जडतासे सम्बन्ध रखते हुए बड़ा भारी तप करनेपर? बहुतसे शास्त्रोंका (अनेक प्रकारका) ज्ञानसम्पादन करनेपर और यज्ञ? दान? तीर्थ आदिके बड़ेबड़े अनुष्ठान करनेपर जो कुछ प्राप्त होता है? वह सब अनित्य ही होता है? पर योगीको नित्यतत्त्वकी प्राप्ति होती है। अतः तपस्वी? ज्ञानी और कर्मी -- इन तीनोंसे योगी श्रेष्ठ है। इस प्रकारके कर्मयोगी? ज्ञानयोगी? हठयोगी? लययोगी आदि सब योगियोंमें भी भगवान्ने भक्तियोगी को सर्वश्रेष्ठ बताया है (गीता 6। 47)। यही भक्तियोगी भगवान्के समग्ररूपको जान लेता है। सांख्ययोगी भी पराभक्तिके द्वारा उस समग्ररूपको जान लेता है। उसी समग्ररूपका वर्णन यहाँ यावान् पदसे हुआ है ।इस प्रकरणके आरम्भमें अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक जिस प्रकार ब्रह्मको प्राप्त होता है -- यह कहनेकी प्रतिज्ञा की और बताया कि ध्यानयोगके परायण होनेसे वह वैराग्यको प्राप्त होता है। वैराग्यसे अहंकार आदिका त्याग करके ममतारहित होकर शान्त होता है। तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है। पात्र होते ही उसकी ब्रह्मभूतअवस्था हो जाती है। ब्रह्मभूतअवस्था होनेपर संसारके सम्बन्धसे जो रागद्वेष? हर्षशोक आदि द्वन्द्व होते थे? वे सर्वथा मिट जाते हैं तो वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है। सम होनेपर,पराभक्ति प्राप्त हो जाती है। वह पराभक्ति ही वास्तविक प्रीति है। उस प्रीतिसे परमात्माके समग्ररूपका बोध हो जाता है। बोध होते ही उस तत्त्वमें प्रवेश हो जाता है -- विशते तदनन्तरम्।अनन्यभक्तिसे तो मनुष्य भगवान्को तत्त्वसे जान सकता है? उनमें प्रविष्ट हो सकता है और उनके दर्शन भी कर सकता है (गीता 11। 54) परन्तु सांख्ययोगी भगवान्को तत्त्वसे जानकर उनमें प्रविष्ट तो होता है? पर भगवान् उसको दर्शन देनेमें बाध्य नहीं होते। कारण कि उसकी साधना पहलेसे ही विवेकप्रधान रही है? इसलिये उसको दर्शनकी इच्छा नहीं होती। दर्शन न होनेपर भी उसमें कोई कमी नहीं रहती अतः कमी माननी नहीं चाहिये।यहाँ उस तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाना ही अनिर्वचनीय प्रेमकी प्राप्ति है। इसी प्रेमको नारदभक्तिसूत्रमें प्रतिक्षण वर्धमान कहा है । इस प्रेममें सर्वथा पूर्णता हो जाती है अर्थात् उसके लिये करना? जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता। इसलिये न करनेका राग रहता है? न जाननेकी जिज्ञासा रहती है? न जीनेकी आशा रहती है? न मरनेका भय रहता है और न पानेका लालच ही रहता है।जबतक भगवान्में पराभक्ति अर्थात् परम प्रेम नहीं होता? तबतक ब्रह्मभूतअवस्थामें भी मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंकार रहता है। जबतक लेशमात्र भी अहंकार रहता है? तबतक परिच्छिन्नताका अत्यन्त अभाव नहीं होता। परन्तु मैं ब्रह्म हूँ यह सूक्ष्म अहंभाव तबतक जन्ममरणका कारण नहीं बनता? जबतक उसमें प्रकृतिजन्य गुणोंका सङ्ग नहीं होता क्योंकि गुणोंका सङ्ग होनेसे ही बन्धन होता है -- कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। उदाहरणार्थ -- गाढ़ नींदसे जगनेपर साधारण मनुष्यमात्रको सबसे पहले यह अनुभव होता है कि मैं हूँ। ऐसा अनुभव होते ही जब नाम? रूप? देश? काल जाति आदिके साथ स्वयंका सम्बन्ध जुड़ जाता है? तब मैं हूँ यह अहंभाव शुभअशुभ कर्मोंका कारण बन जाता है? जिससे जन्ममरणका चक्कर चल पड़ता है। परन्तु जो ऊँचे दर्जेका साधक होता है अर्थात् जिसकी निरन्तर ब्रह्मभूतअवस्था रहती है? उसके सात्त्विक ज्ञान (18। 20) में सब जगह ही अपने स्वरूपका बोध रहता है। परन्तु जबतक साधकका सत्त्वगुणके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक नींदसे जगनेपर तत्काल मैं ब्रह्म हूँ अथवा सब कुछ एक परमात्मा ही है -- ऐसी वृत्ति पकड़ी जाती है और मालूम होता है कि नींदमें यह वृत्ति छूट गयी थी? मानो उसकी भूल हो गयी थी और अब पीछे उस तत्त्वकी जागृति हो गयी है? स्मृति आ गयी है। गुणातीत हो जानेपर अर्थात् गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर विस्मृति और स्मृति -- ऐसी दो अवस्थाएँ नहीं होतीं अर्थात् नींदमें भूल हो गयी और अब स्मृति आ गयी -- ऐसा अनुभव नहीं होता? प्रत्युत नींद तो केवल अन्तःकरणमें आयी थी? अपनेमें नहीं? अपना स्वरूप तो ज्योंकात्यों रहा -- ऐसा अनुभव रहता है। तात्पर्य यह है कि निद्राका आना और उससे जगना -- ये दोनों प्रकृतिमें ही हैं? ऐसा उसका स्पष्ट अनुभव रहता है। इसी अवस्थाको चौदहवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा है कि प्रकाश अर्थात् नींदसे जगना और मोह अर्थात् नींदका आना -- इन दोनोंमें गुणातीत पुरुषके किञ्चिन्मात्र भी रागद्वेष नहीं होते। सम्बन्ध -- पहले श्लोकमें अर्जुनने संन्यास और त्यागके तत्त्वके विषयमें पूछा तो उसके उत्तरमें भगवान्ने चौथेसे बारहवें श्लोकतक कर्मयोगका और इकतालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक कर्मयोगका तथा संक्षेपमें भक्तियोगका वर्णन किया और तेरहवेंसे चालीसवें श्लोकतक विचारप्रधान सांख्ययोगका तथा उन्चासवेंसे पचपनवें श्लोकतक ध्यानप्रधान सांख्ययोगका एवं संक्षेपमें पराभक्तिकी प्राप्तिका वर्णन किया। अब भगवान् शरणागतिकी प्रधानतावाले भक्तियोगका वर्णन आरम्भ करते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
उसके बाद उस ज्ञानलक्षणा --, भक्तिसे मैं जितना हूँ और जो हूँ? उसको तत्त्वसे जान लेता है। अभिप्राय यह है कि मैं जितना हूँ? यानी उपाधिकृत विस्तारभेदसे जितना हूँ और जो हूँ? यानी वास्तवमें समस्त उपाधिभेदसे रहित? उत्तमपुरुष और आकाशकी तरह ( व्याप्त ) जो मैं हूँ? उस अद्वैत? अजर? अमर? अभय और निधनरहित मुझको तत्त्वसे जान,लेता है। फिर मुझे इस तरह तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझमें ही प्रवेश कर जाता है। यहाँ ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इस कथनसे ज्ञान और उसके अनन्तर प्रवेशक्रिया? यह दोनों भिन्नभिन्न विवक्षित नहीं हैं। तो क्या है फलान्तरके अभावका ज्ञानमात्र ही विवक्षित है क्योंकि क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही समझ ऐसे कहा गया है। पू0 -- यह कहना विरुद्ध है कि ज्ञानकी जो परा निष्ठा है उससे मुझे जानता है। यदि कहो कि विरुद्ध कैसे है तो बतलाते हैं? जब ज्ञाताको जिस विषयका ज्ञान होता है? वह उसी समय उस विषयको जान लेता है? ज्ञानकी बारम्बार आवृत्ति करनारूप ज्ञाननिष्ठाकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये वह ( ज्ञेय पदार्थको ) ज्ञानसे नहीं जानता? ज्ञानावृत्तिरूप ज्ञाननिष्ठासे जानता है यह कहना विरुद्ध है। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अपनी उत्पत्ति और परिपाकके हेतुओंसे युक्त एवं विरोधरहित ज्ञानका जो अपने स्वरूपानुभवमें निश्चयरूपसे पर्यवसान -- स्थित हो जाना है? उसीको निष्ठा शब्दसे कहा गया है। अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्ति और परिपाकके हेतु? जो विशुद्धबुद्धि आदि और अमानित्वादि सहकारी कारण हैं? उनकी सहायतासे? शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुआ? जो मैं कर्ता हूँ? मेरा यह कर्म है इत्यादि कारकभेदबुद्धिजनित समस्त कर्मोंके संन्याससहित क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताका ज्ञान है? उसका जो अपने स्वरूपके अनुभवमें निश्चयरूपसे स्थित रहना है? उसे परा ज्ञाननिष्ठा कहते हैं। वही यह ज्ञाननिष्ठा आर्त आदि तीन भक्तियोंकी अपेक्षासे चतुर्थ परा भक्ति कही गयी है। उस,( ज्ञाननिष्ठारूप ) परा भक्तिसे भगवान्को तत्त्वसे जानता है जिससे उसी समय ईश्वर और क्षेत्रज्ञविषयक भेदबुद्धि पूर्णरूपसे निवृत्त हो जाती है। इसलिये ज्ञाननिष्ठारूप भक्तिसे मुझे जानता है यह कहना विरुद्ध नहीं होता। ऐसा मान लेनेसे वेदान्त? इतिहास? पुराण और स्मृतिरूप समस्त निवृत्तिविधायक शास्त्र? सार्थक हो जाते हैं अर्थात् उन सबका अभिप्राय सिद्ध हो जाता है। आत्माको जानकर ( तीनों तरहकी एषणाओंसे ) विरक्त होकर फिर भिक्षाचरण करते हैं? पुरुषार्थका अन्तरंग साधन होनेके कारण संन्यास ही इन सब तपोंमें अधिक कहा गया है? अकेला संन्यास ही उन सबको उल्लंघन कर जाता है? कर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है? वेदोंको तथा इस लोक और परलोकको परित्याग करके? धर्मअधर्मको छोड़ इत्यादि शास्त्रवाक्य हैं। तथा यहाँ भी ( संन्यासपरक ) बहुतसे वचन दिखाये गये हैं। उन सब वचनोंको व्यर्थ मानना उचित नहीं और अर्थवादरूप मानना भी ठीक नहीं क्योंकि वे अपने प्रकरणमें स्थित हैं। इसके सिवा अन्तरात्माके अविक्रियस्वरूपमें निश्चयरूपसे स्थित हो जाना ही मोक्ष है। इसलिये भी,( पूर्वोक्त बात ही सिद्ध होती है ) क्योंकि पूर्वसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेका उसके प्रतिकूल पश्चिमसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेके साथ समान मार्ग नहीं हो सकता। अन्तरात्मविषयक प्रतीतिका निरन्तरता रखनेके आग्रहका नाम ज्ञाननिष्ठा है। उसका कर्मोंके साथ रहना,( पूर्वकी ओर जानेकी इच्छावालेके लिये ) पश्चिमसमुद्रकी ओर जानेकी मार्गकी भाँति विरुद्ध है। प्रमाणवेत्ताओने उनका पर्वत और राईके समान भेद निश्चित किया है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ही ज्ञाननिष्ठा करनी चाहिये।
Sri Anandgiri
ननु समाधिसाध्येन परमभक्त्यात्मकेन ज्ञानेन किमपूर्वमवाप्यते तत्राह -- तत इति। भक्त्या समाधिजन्यया मां ब्रह्माभिमुख्येन प्रत्यक्तया जानाति व्याप्नोतीत्यर्थः। तदेव ज्ञानं भक्तिपराधीनं विवृणोति -- यावानिति। आकाशकल्पत्वमनवच्छिन्नत्वमसङ्गत्वं च। चैतन्यस्य विषयसापेक्षत्वं प्रतिक्षिपति -- अद्वैतमिति। ये तु द्रव्यबोधात्मत्वमात्मनो मन्यन्ते तान्प्रत्युक्तं -- चैतन्यमात्रेति। आत्मनि तन्मात्रेऽपि धर्मान्तरमुपेत्य धर्मधर्मित्वं प्रत्याह -- एकरसमिति। सर्वविक्रियाराहित्योक्त्या कौटस्थ्यमात्मनो व्यवस्थापयति -- अजमिति। उक्तविक्रियाभावे तद्धेत्वज्ञानासंबन्धं हेतुमाह -- अभयमिति। तत्त्वज्ञानमनूद्य तत्फलं विदेहकैवल्यं लम्भयति -- तत इति। तत्त्वज्ञानस्य तस्मादनन्तरप्रवेशक्रियायाश्च भिन्नत्वं प्राप्तं प्रत्याह -- नात्रेति। भिन्नत्वाभावे का गतिर्भेदोक्तेरित्याशङ्क्यौपचारिकत्वमाह -- किं तर्हीति। प्रवेश इति शेषः। ब्रह्मप्राप्तिरेव फलान्तरमित्याशङ्क्य ब्रह्मात्मनोर्भेदाभावान्न ज्ञानातिरिक्ता तत्प्राप्तिरित्याह -- क्षेत्रज्ञं चेति। ज्ञाननिष्ठया परया भक्त्या मामभिजानातीत्युक्तमाक्षिपति -- नन्विति। विरुद्धत्वं स्फोरयितुं पृच्छति -- कथमिति। विरोधस्फुटीकरणं प्रतिजानीते -- उच्यत इति। तत्र ज्ञानस्योत्पत्तेरेव विषयाभिव्यक्तिरित्याह -- यदेति। एवकारनिरस्यं दर्शयति -- न ज्ञानेति। इत्यावयोः सिद्धमिति शेषः। ज्ञानस्योत्पत्तेरेव विषयाभिव्यक्तत्वेऽपि कथं प्रकृते विरोधधीत्याशङ्क्याह -- ततश्चेति। विरुद्धमिति शेषः। शङ्कितं विरोधं निरस्यति -- नैष दोष इति। उक्तमेव हेतुं प्रपञ्चयति -- शास्त्रेति। यो हि शास्त्रानुसार्याचार्योपदेशस्तेन ज्ञानोत्पत्तिःआचार्यवान्पुरुषो वेद इति श्रुतेः। तस्याश्च परिपाकः संशयादिप्रतिबन्धध्वंसस्तत्र हेतुभूतमुपदेशस्यैव सहकारिकारणं यद्बुद्धिशुद्ध्यादि तदपेक्ष्य तस्मादेवोपदेशाज्जनितं यदैक्यज्ञानं तस्य कारकभेदबुद्धिनिबन्धनानि यानि सर्वाणि कर्माणि तेषां संन्यासेन सहितस्य फलरूपेण स्वात्मन्येव सर्वप्रकल्पनारहिते यदवस्थानं सा ज्ञानस्य परा निष्ठेति व्यवह्रियते प्रामाणिकैरित्यर्थः। यदि यथोक्ता परा ज्ञाननिष्ठा कथं तर्हि सा चतुर्थी भक्तिरित्युक्तेति तत्राह -- सेयमिति। यथोक्तया भक्त्या भगवत्तत्त्वज्ञानं सिध्यतीत्याह -- तयेति। तत्त्वज्ञानस्य फलमाह -- यदनन्तरमिति। ज्ञाननिष्ठारूपाया भगवद्भक्तेस्तत्त्वज्ञानानतिरेकात्तत्फलस्य चाज्ञाननिवृत्तेस्तन्मात्रत्वाद्भेदोक्तेश्चौपचारिकत्वात्प्रकृतं वाक्यमविरुद्धमित्युपसंहरति -- अत इति। औपदेशिकैक्यज्ञानस्य सर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वरूपावस्थानात्मकस्य परमपुरुषार्थौपयिकत्वमित्यस्मिन्नर्थे मानमाह -- अत्र चेति। तदेव शास्त्रमुदाहरति -- विदित्वेत्यादिना। दर्शितानि वाक्यानि सर्वकर्माणि मनसेत्यादीनि। नन्वेषां वाक्यानामविवक्षितार्थत्वान्नास्ति स्वार्थे प्रामाण्यमित्याशङ्क्याध्ययनविध्युपात्तत्वाद्वेदवाक्यानां तदनुरोधित्वाच्चेतरेषां नैवमित्याह -- नचेति। तथापि सोऽरोदीदित्यादिवन्न स्वार्थे मानतेत्याशङ्क्याह -- नचार्थवादत्वमिति। इतश्च मुमुक्षोरपेक्षितमोक्षौपयिकज्ञाननिष्ठस्य संन्यासेऽधिकारो न कर्मनिष्ठायामित्याह -- प्रत्यगिति। ज्ञाननिष्ठस्य कर्मनिष्ठाविरुद्धेत्यत्र दृष्टान्तमाह -- नहीति। ज्ञाननिष्ठास्वरूपानुवादपूर्वकं कर्मनिष्ठया तस्याः सहभावित्वं विरुद्धमिति दार्ष्टान्तिकमाह -- प्रत्यगात्मेति। कथं ज्ञानकर्मणोर्विरोधधीरित्याशङ्क्य कर्मणां ज्ञाननिवर्त्यत्वस्य श्रुतिस्मृतिसिद्धत्वादित्याह -- पर्वतेति। अन्तरवानुभयोरेकधर्मिनिष्ठत्वेन साङ्कर्याभावसंपादकभेदवानित्यर्थः। ज्ञानकर्मणोरसमुच्चये फलितमुपसंहरति -- तस्मादिति।
Sri Dhanpati
ततश्च ज्ञानलक्षणया भक्त्या मामभिजनाति यावानहमुपाधिकृतवस्थारभेदो यश्चास्मि विध्वस्तसर्वोपाधिभेद उत्तमः पुरुष आकाशवदसङ्गो निर्विकारस्तं मामद्वैतचैतन्यमात्रैकरसमजरममरमभयमनिधनं भक्त्या तत्त्वतोऽभिजानाति ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मामेव विशते प्राप्नोति। अत्र ज्ञानप्रवेशक्रिये भिन्ने न विवक्षिते। भेदोक्तिस्त्वौपचारिकी ततो मामेवं तत्त्वतो ज्ञात्वा तदनन्तरं मामेव विशते प्राप्नोति। अत्र ज्ञानप्रवेशक्रिये भिन्ने न विवक्षिते। भेदोक्तित्वौपचारिकी बोध्या। ब्रह्मप्राप्तिस्तु ज्ञानान्नातिरिच्यते। क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धीति ब्रह्मात्मनोरभेदस्योक्तत्वात्। भक्त्या निदिध्यासनात्मिकया मामद्वितीयमात्मानमभिजानाति साक्षात्करोति तदनन्तरं बलवत्प्रारब्धकर्मभोगेन देहपातानन्तरं नतु ज्ञानान्तरमेव। क्त्वाप्रत्येनैव तल्लाभे तदनन्तरमित्यस्य वैयर्थ्यापातादिति केचित्। इतरे तु विशत्यात्मनि स्वसिद्धयेऽनिर्वचनीयसंबन्धेनेति विशत् सर्वानर्थमूलमज्ञानं तस्मै तत्सविलासमुन्मूलयितुं ज्ञात्वाऽपरोक्षीकृत्य तदनन्तरं अनतरं भेदस्तच्छून्यं शाश्वतं पदमव्ययमाप्राप्नोतीत्युत्तर श्लोकस्थानुषङ्गेण व्याख्येयमिति वदन्ति। तत्तवतो याथात्म्येन ज्ञात्वा साक्षात्कृत्य ततो व्याप्तः ब्रह्मभावं गतो भवतीत्यर्थः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। यद्वा तत इति कारणब्रह्मभावापत्तिः सार्वात्भ्यरुपा प्रथममुक्ता। अनन्तरं कारणभावापत्तेरनुपदमेव तद्ब्रह्म तत्पदाभिधेयं शुद्धं ब्रह्म विशते। दर्पणाद्यपाये प्रतिबिम्बो विम्बमिव प्रविशतीत्यर्थ इत्यन्ये। तदेतद्य्वाख्यानत्रयमपि सर्वज्ञैराचार्यैः ध्यानयोगपरो नित्यमित्यत्र निदिध्यासनस्योक्तत्वाद्भक्तिं इत्यस्य परामिति विशेषणस्य च वैयर्थ्यं तच्छब्देनाप्रस्तुतपरामर्शस्यानुषङ्गाध्याहारादिक्लेशव्याप्तायाः कुकल्पनायाश्चानौचित्यमभिप्रेत्य त्यक्त्वादुपेक्ष्यम्। तथाचायमर्थःआचार्यावान्पुरुषो वेद इति श्रुत्या शास्त्रानुसार्याचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिः। तस्य च परिपाके असंभावनादिप्रध्वंसे हेतुभूतमुपदेशस्यैव महकारिकारणं बुद्धिविशुद्धत्वादि अमानित्वादिगणं चापेक्ष्य तस्मादेवोपदेशाज्जनितस्य क्षेत्रज्ञपरात्मैकत्वज्ञानस्य कारकभेदबुद्धिनिबन्धनसर्वकर्मसंन्याससहितस्य स्वात्मानुभवरुपेण स्वात्मन्येव सर्वकल्पनारहितस्य यदवस्थानं सा ज्ञानस्य परा निष्ठेत्युच्यते? सेयं ज्ञाननिष्ठा आर्तदिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिरित्युक्त्वा तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतोऽभिजानाति यदनन्तमेवेश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिरशेषं ततो निवर्तते। क्त्वाप्रत्ययेनोक्तमानन्तर्यमव्यवहितं नतु किंचिद्य्ववधानयुक्तमिति बोधनायानन्तरमित्युक्तमिति।
Word-by-Word Lexicon
| Original Word | Contextual Meaning |
|---|---|
| bhaktyā | by loving devotion |
| mām | me |
| abhijānāti | one comes to know |
| yāvān | as much as |
| yaḥ cha asmi | as I am |
| tattvataḥ | in truth |
| tataḥ | then |
| mām | me |
| tattvataḥ | in truth |
| jñātvā | having known |
| viśhate | enters |
| tat | anantaram |
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वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar
मेरा आश्रय लेनेवाला भक्त सदा सब कर्म करता हुआ भी मेरी कृपासे शाश्वत अविनाशी पदको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar
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“उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है। — VaniSagar”
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
Frequently Asked Questions
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 55 का हिंदी अर्थ क्या है?
Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 55 का हिंदी अर्थ: "उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।
What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 55?
Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 55 translates to: "By devotion, he knows Me in truth, who and what I am; then, having known Me in truth, he immediately enters into the Supreme. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.
"भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदन" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?
यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 55 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।
What does the mantra "bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaśh chāsmi tattvataḥ" mean in English?
"bhaktyā mām abhijānāti yāvān yaśh chāsmi tattvataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 55. By devotion, he knows Me in truth, who and what I am; then, having known Me in truth, he immediately enters into the Supreme. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.