Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

பிரம்மனாக, சுயத்தில் சாந்தமாகி, அவன் வருத்தப்படுவதில்லை, ஆசைப்படுவதில்லை; அவர் எல்லா உயிரினங்களுக்கும் ஒரே மாதிரியானவர், மேலும் என்னிடம் உயர்ந்த பக்தியைப் பெறுகிறார்.

TeluguIND

బ్రహ్మంగా మారి, ఆత్మలో నిర్మలంగా, అతను దుఃఖించడు లేదా కోరుకోడు; అతను అన్ని జీవులకు ఒకేలా ఉన్నాడు మరియు నా పట్ల అత్యున్నత భక్తిని పొందుతాడు.

BengaliIND

ব্রহ্ম হয়ে, আত্মার মধ্যে নির্মল, তিনি দুঃখ করেন না বা কামনা করেন না; তিনি সকল প্রাণীর সমান, এবং আমার প্রতি পরম ভক্তি লাভ করেন।

ManipuriIND

ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ ꯑꯣꯏꯔꯀꯄꯥ, ꯃꯁꯥꯗꯥ ꯅꯤꯡꯊꯤꯖꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ, ꯃꯍꯥꯛꯅꯥ ꯁꯣꯀꯄꯥ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯑꯄꯥꯝꯕꯥ ꯇꯧꯗꯦ; ꯃꯍꯥꯛ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯇꯥ ꯑꯃꯒꯥ ꯑꯃꯒꯥ ꯃꯥꯟꯅꯩ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯩꯉꯣꯟꯗꯥ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯚꯛꯇꯤ ꯐꯪꯏ꯫

KannadaIND

ಬ್ರಹ್ಮನಾಗುತ್ತಾನೆ, ಆತ್ಮದಲ್ಲಿ ಪ್ರಶಾಂತನಾಗುತ್ತಾನೆ, ಅವನು ದುಃಖಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಬಯಸುವುದಿಲ್ಲ; ಅವನು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳಿಗೆ ಒಂದೇ, ಮತ್ತು ನನಗೆ ಪರಮ ಭಕ್ತಿಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

NepaliIND

ब्रह्म बनेर, आत्मामा निर्मल भएर, न त शोक गर्छ, न चाहना नै; उहाँ सबै प्राणीमा समान हुनुहुन्छ र मप्रति परम भक्ति प्राप्त गर्नुहुन्छ।

PunjabiIND

ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਬਣ ਕੇ, ਆਪਣੇ ਆਪ ਵਿੱਚ ਸ਼ਾਂਤ, ਉਹ ਨਾ ਤਾਂ ਸੋਗ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਇੱਛਾਵਾਂ; ਉਹ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਲਈ ਇਕੋ ਜਿਹਾ ਹੈ ਅਤੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਪਰਮ ਭਗਤੀ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

MalayalamIND

ബ്രഹ്മമായി, ആത്മാവിൽ ശാന്തനായി, അവൻ ദുഃഖിക്കുകയോ ആഗ്രഹിക്കുകയോ ചെയ്യുന്നില്ല; അവൻ എല്ലാ ജീവികൾക്കും ഒരുപോലെയാണ്, എന്നോടുള്ള പരമമായ ഭക്തി നേടുന്നു.

GujaratiIND

બ્રહ્મ બનીને, આત્મામાં નિર્મળ, તેને ન તો દુઃખ થાય છે કે ન ઈચ્છાઓ; તે બધા જીવો માટે સમાન છે, અને મારી પરમ ભક્તિ મેળવે છે.

SindhiIND

برهمڻ بڻجي، نفس ۾ سڪون، هو نه غمگين آهي نه خواهشون؛ هو سڀني مخلوقن لاءِ هڪ جهڙو آهي، ۽ مون لاءِ اعليٰ عقيدت حاصل ڪري ٿو.

MarathiIND

ब्रह्म बनून, आत्म्यामध्ये निर्मळ, त्याला ना दु:ख होत नाही आणि इच्छाही नाही; तो सर्व प्राणिमात्रांसाठी सारखाच आहे आणि माझ्यावर परम भक्ती प्राप्त करतो.

KonkaniIND

ब्रह्म जावन आत्म्यांत निश्चल जावन तो ना शोक करता ना इत्सा करता; तो सगळ्या भूतांक एकूच, ​​आनी माझ्याकडेन परम भक्ती मेळयता.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ब्रह्मभूतः -- जब अन्तःकरणमें विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब अन्तःकरणकी अहंकार? घमंड आदि वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं अर्थात् उनका त्याग हो जाता है। फिर अपने पास जो वस्तुएँ हैं? उनमें भी ममता नहीं रहती। ममता न रहनेसे सुख और भोगबुद्धिसे वस्तुओंका संग्रह नहीं होता। जब सुख और भोगबुद्धि मिट जाती है? तब अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक ही शान्ति आ जाती है।इस प्रकार साधक जब असत्से ऊपर उठ जाता है? तब वह ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बन जाता है। पात्र बननेपर उसकी ब्रह्मभूतअवस्था अपनेआप हो जाती है। इसके लिये उसको कुछ करना नहीं पड़ता। इस अवस्थामें मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ और ब्रह्म मेरा स्वरूप है ऐसा उसको अपनी दृष्टिसे अनुभव हो जाता है। इसी अवस्थाको यहाँ (और गीता 5। 24 में भी) ब्रह्मभूतः पदसे कहा गया है।प्रसन्नात्मा -- जब अन्तःकरणमें असत् वस्तुओंका महत्त्व हो जाता है? तब उन वस्तुओंको प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है और अशान्ति (हलचल) पैदा हो जाती है। परन्तु जब असत् वस्तुओंका महत्त्व मिट जाता है? तब साधकके चित्तमें स्वाभाविक ही प्रसन्नता रहती है। अप्रसन्नताका कारण मिट जानेसे फिर कभी अप्रसन्नता होती ही नहीं। कारण कि सांख्ययोगी साधकके अन्तःकरणमें अपनेसहित संसारका अभाव और परमात्मतत्त्वका भाव अटल रहता है।न शोचति न काङ्क्षति -- उस प्रसन्नताकी पहचान यह है कि वह शोकचिन्ता नहीं करता। सांसारिक कितनी ही बड़ी हानि हो जाय? तो भी वह शोक नहीं करता और अमुक परिस्थिति प्राप्त हो जाय -- ऐसी इच्छा भी नहीं करता। तात्पर्य है कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाली तथा आनेजानेवाली परिवर्तनशील परिस्थिति? वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ आदिके बननेबिगड़नेसे उसपर कोई असर ही नहीं पड़ता। जो परमात्मामें अटलरूपसे स्थित है? उसपर आनेजानेवाली परिस्थितियोंका असर हो ही कैसे सकता हैसमः सर्वेषु भूतेषु -- जबतक साधकमें किञ्चिन्मात्र भी हर्षशोक? रागद्वेष आदि द्वन्द्व रहते हैं? तबतक वह सर्वत्र व्याप्त परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव नहीं कर सकता। अभिन्नताका अनुभव न होनेसे वह अपनेको सम्पूर्ण भूतोंमें सम नहीं देख सकता। परन्तु जब साधक हर्षशोकादि द्वन्द्वोंसे सर्वथा रहित हो जाता है? तब परमात्माके साथ स्वतःस्वाभाविक अभिन्नता (जो कि सदासे ही थी) का अनुभव हो जाता है। परमात्माके साथ अभिन्नता होनेसे? अपना कोई व्यक्तित्व (व्यक्तित्व उसे कहते हैं? जिसमें मनुष्य अपनी सत्ता अलग मानता है और जिससे बन्धन होता है) न रहनेसे अर्थात् मैं हूँ इस रूपसे अपनी कोई अलग सत्ता न रहनेसे वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम है -- समोऽहं सर्वभूतेषु (गीता 9। 29)? ऐसे ही वह भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम हो जाता है।वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम किस प्रकार होता है जैसे -- मनोराज्य और स्वप्नमें जो नाना सृष्टि होती है? उसमें मन ही अनेक रूप धारण करता है अर्थात् वह सृष्टि मनोमयी होती है। मनोमयी होनेसे जैसे सब सृष्टिमें मन है और मनमें सब सृष्टि है? ऐसे ही सब प्राणियोंमें (आत्मरूपसे) वह है और उसमें सम्पूर्ण प्राणी हैं (गीता 6। 29)। इसीको यहाँ समः सर्वेषु भूतेषु कहा है।मद्भक्तिं लभते पराम् -- जब समरूप परमात्माके साथ अभिन्नताका अनुभव होनेसे साधकका सर्वत्र समभाव हो जाता है? तब उसका परमात्मामें प्रतिक्षण वर्धमान एक विलक्षण आकर्षण? खिंचाव? अनुराग हो जाता है। उसीको यहाँ पराभक्ति कहा है।पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें जैसे ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद ब्रह्मनिर्वाणकी प्राप्ति बतायी है -- स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति? ऐसे ही यहाँ ब्रह्मभूतअवस्थाके बाद पराभक्तिकी प्राप्ति बतायी है। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें पराभक्तिका फल बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस क्रमसे --, ब्रह्मको प्राप्त हुआ? प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष? न शोक करता है और न आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके? या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है। न शोचति न काङ्क्षति इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है। क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकाङ्क्षा बन ही नहीं सकती। अथवा न काङ्क्षति की जगह,न हृष्यति ऐसा पाठ समझना चाहिये। तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है। इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है क्योंकि वह तो भक्त्या मामभिजानाति इस पदसे आगे कहा जायगा। ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष? मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है? अर्थात् चतुर्विधा भजन्ते माम् इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अपेक्षितं पूरयन्नुत्तरश्लोकमवतारयति -- अनेनेति। बुद्ध्या विशुद्धयेत्यादिरत्र क्रमः? ब्रह्मप्राप्तो जीवन्नेव निवृत्ताशेषानर्थो निरतिशयानन्दं ब्रह्मात्मत्वेनानुभवन्नित्यर्थः। अध्यात्मं प्रत्यगात्मा तस्मिन्प्रसादः सर्वानर्थनिवृत्त्या परमानन्दाविर्भावः स लब्धो येन जीवन्मुक्तेन स तथा। न शोचतीत्यादौ तात्पर्यमाह -- ब्रह्मभूतस्येति। प्राप्तव्यपरिहार्याभावनिश्चयादित्यर्थः। स्वभावानुवादमुपपादयति -- नहीति। तस्याप्राप्तविषयाभावान्नापि परिहार्यापरिहारप्रयुक्तः शोकः परिहार्यस्यैवाभावादित्यर्थः। पाठान्तरे तु रमणीयं प्राप्य न प्रमोदते तदभावादित्यर्थः। विवक्षितं समदर्शनं विशदयति -- आत्मेति। ननु सर्वेषु भूतेष्वात्मनः समस्य निर्विशेषस्य दर्शनमत्राभिप्रेतं किं नेष्यते तत्राह -- नात्मेति। उक्तविशेषणवतो जीवन्मुक्तस्य ज्ञाननिष्ठा प्रागुक्तक्रमेण प्राप्ता सुप्रतिष्ठिता भवतीत्याह -- एवंभूत इति। श्रवणमनननिदिध्यासनवतः शमादियुक्तस्याभ्यस्तैः श्रवणादिभिर्ब्रह्मात्मन्यपरोक्षं मोक्षफलं ज्ञानं सिध्यतीत्यर्थः। आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया ज्ञानलक्षणा भक्तिश्चतुर्थीत्युक्ता। तत्र सप्तमस्थवाक्यमनुकूलयति -- चतुर्विधा इति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अनेन क्रमेण ब्रह्मभूतः ब्रह्मभवनसमर्थत्वाद् ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा प्रसन्नः कर्तत्वादिविनिर्मुक्तः आविर्भूतानन्द आत्मा प्रत्यगात्मा यस्य स लब्धात्मप्रसादः न शोचति किंचिदर्थवैकल्यमात्मनो वैगुण्यं चोद्दिश्य न शोचति न संतप्यते। न काङ्क्षति अप्राप्तं वस्तु ब्रह्मभूतस्य शोकाकाङ्क्षयोरनुपपन्नत्वात्तस्य स्वभावोऽनुद्यते न शोचति न काङ्क्षतीति। न हृष्यतीति वा पाठः। रमणीयं प्राप्य न प्रमोदते तस्य मिथ्यात्वेन निश्चयादित्यर्थः। सर्वेषु भूतेषु समः सुखं दुःखं वा आत्मौपम्येन सभमेव पश्यतीत्यर्थः। नत्वात्मसमदर्शनमिह ग्राह्यम्। भक्त्या मामभिजानातीति तस्य वक्ष्यमाणत्वात्। य एवंभूतः स मद्विषयां भक्तिं,आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी चेत्यत्रोक्तां चतुर्थी ज्ञानलक्षणाम्।तेषां ज्ञानी नित्युक्त एकभक्तिर्विशिष्यते इत्युक्तां परामनुत्तमां लभते प्राप्नोति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
brahmabhūtaḥ
prasannaātmā
naneither
śhochatigrieving
nanor
kāṅkṣhatidesiring
samaḥequitably disposed
sarveṣhutoward all
bhūteṣhuliving beings
matbhaktim
labhateattains
parāmsupreme
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.53
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते

जो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.55
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्

उस पराभक्तिसे मेरेको, मैं जितना हूँ और जो हूँ -- इसको तत्त्वसे जान लेता है तथा मेरेको तत्त्वसे जानकर फिर तत्काल मेरेमें प्रविष्ट हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 54
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 54
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्

वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 54 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 54 का हिंदी अर्थ: "वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 54?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 54 translates to: "Becoming Brahman, serene in the Self, he neither grieves nor desires; he is the same to all beings, and obtains supreme devotion to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 54 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। वह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śhochati na kāṅkṣhati" mean in English?

"brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śhochati na kāṅkṣhati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 54. Becoming Brahman, serene in the Self, he neither grieves nor desires; he is the same to all beings, and obtains supreme devotion to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.