Bhagavad Gita 18.51 — Commentary
19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च
buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya cha śhabdādīn viṣhayāns tyaktvā rāga-dveṣhau vyudasya cha
"Endowed with a pure intellect, controlling the self through firmness, relinquishing sound and other objects and abandoning attraction and hatred."
Scholar Commentaries (19)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
,बुद्ध्या अध्यवसायलक्षणया विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः? धृत्या धैर्येण आत्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य च नियमनं कृत्वा वशीकृत्य? शब्दादीन् शब्दः आदिः येषां तान् विषयान् त्यक्त्वा? सामर्थ्यात् शरीरस्थितिमात्रहेतुभूतान् केवलान् मुक्त्वा ततः अधिकान् सुखार्थान् त्यक्त्वा इत्यर्थः? शरीरस्थित्यर्थत्वेन प्राप्तेषु रागद्वेषौ व्युदस्य च परित्यज्य च।।ततः --,
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
बुद्ध्या विशुद्धया यथावस्थितात्मतत्त्वविषयया युक्तः? धृत्या आत्मानं नियम्य च,विषयविमुखीकरणेन योगयोग्यं मनः कृत्वा? शब्दादीन् विषयान् त्यक्त्वा असन्निहितान् कृत्वा? तन्निमित्तौ च रागद्वेषौ व्युदस्य? विविक्तसेवी सर्वैः ध्यानविरोधिभिः विविक्ते देशे वर्तमानः लघ्वाशी अत्यशनानशनरहितः? यतवाक्कायमानसः ध्यानाभिमुखीकृतकायवाङ्मनोवृत्तिः? ध्यानयोगपरो नित्यम् एवं भूतः सन् आप्रयाणाद् अहरहः ध्यानयोगपरः? वैराग्यं समुपाश्रितः ध्येयतत्त्वव्यतिरिक्तविषयदोषावमर्शेन तत्र विरागतां वर्धयन् अहंकारम्? अनात्मनी आत्माभिमानं बलं तद्विवृद्धिहेतुभूतं वासनाबलं तन्निमित्तं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहं विमुच्य? निर्ममः सर्वेषु अनात्मीयेषु आत्मीयबुद्धिरहितः शान्तः आत्मानुभवैकसुखः? एवंभूतो ध्यानयोगं कुर्वन् ब्रह्मभूयाय कल्पते ब्रह्मभावाय कल्पते सर्वबन्धविनिर्मुक्तो यथावस्थितम् आत्मानम् अनुभवति इत्यर्थः।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
विशुद्ध बुद्धि से युक्त अर्थात् जिसका अन्तकरण शुद्ध है। विषयार्जन और विषयोपभोग की वासनाओं से मुक्त अन्तकरण ही शुद्ध कहलाता है। विशुद्ध बुद्धि से तात्पर्य सात्त्विकी बुद्धि से भी है।ध्यानाभ्यास के समय साधक का आन्तरिक सामञ्जस्य और शान्ति दो कारणों से नष्ट हो सकती है। (1) इन्द्रियों द्वारा विषय ग्रहण से? अथवा (2) मन द्वारा पूर्वानुभूत भोगों के स्मरण अर्थात् भोगस्मृति से। साधक को सात्त्विकी धृति से मन को संयमित करना चाहिए अर्थात् ध्यान के समय विषयभोगों का स्मरण नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार? शब्दस्पर्शरूपरसगन्ध इन विषयों को त्यागने का अर्थ यह है कि यदि इन्द्रिय द्वारा कोई विषय ग्रहण किया भी जाता है? तो उसका चिन्तन प्रारम्भ नहीं करना चाहिए। यह तभी संभव होगा? जब साधक अपने व्यक्तिगत रागद्वेषों से मुक्त होगा। इन सबको सम्पादित करने के लिए मन के चारों ओर ज्ञान की प्राचीर (दीवार) निर्म्ात करनी चाहिए। ज्ञान से ही मन को अपने वश में किया जा सकता है। मनसंयम और इन्द्रियसंयम को क्रमश शम और दम भी कहते हैं।ध्यानाभ्यास के साधक के विषय में? और आगे कहते हैं
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
18.51 बुद्ध्या with an intellect? विशुद्धया pure? युक्तः endowed? धृत्या by firmness? आत्मानम् the self? नियम्य controlling? च and? शब्दादीन् sound and other? विषयान् senseobjects? त्यक्त्वा relinishing? रागद्वेषौ attraction and hatred? व्युदस्य abandoning? च and.Commentary The lower self should be controlled with firmness by the Self of pure intellect. The turbulent senses and the mind should be subdued with the help of the pure intellect or reason. Pure reason is a great power. Whenever the senses raise their heads and hiss? they should be hammered by the powerful rod of pure intellect or reason. Reason is the faculty of determination.Pure intellect The intellect that is free from lust? anger? greed? pride? doubt? misconception? etc. It is like a clear mirror. A pure intellect is Brahman Itself. It can be easily merged in Brahman. When the pure intellect is merged in Brahman? the reflected intelligence? Chidabhasa or Jiva? is also absorbed in Brahman. The Jiva becomes identical with Brahman? just as the ether in the pot becomes one with the universal ether when the pot is broken.The self The aggregate of the body and the senses.The aspirant withdraws the senses from their respective objects again and again through the repeated practice of Pratyahara (abstraction) and Dama (selfrestraint). Gradually the senses are fixed in the Self. Their outgoing tendencies are totally curbed. The aspirant attains supreme control of the senses by constant meditation? by the practice of dispassion he coners Raga (attachment)? and through the practice of pure love or cosmic love or divine Preme he coners hatred.He abandons all luxuries. He keeps only those objects which are necessary for the bare maintenance of the body. He has neither attachment nor hatred even for those objects which are necessary for that purpose.
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या -- बुद्ध्या विशुद्धया युक्तः -- जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है? उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता 18। 30) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफसाफ हो? उसमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह न हो।इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है? वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।वैराग्यं समुपाश्रितः -- जैसे संसारी लोग रागपूर्वक वस्तु? व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं? उनको अपना आश्रय? सहारा मानते हैं? ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय? स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।विविक्तसेवी -- सांख्ययोगके साधकका स्वभाव? उसकी रुचि स्वतःस्वाभाविक एकान्तमें रहनेकी होती है। एकान्तसेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है? पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकान्त न मिलनेपर मनमें विक्षेप? हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकान्त न मिले? प्रत्युत समुदाय मिले? खूब हल्लागुल्ला हो? तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धिअसिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा? उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकान्तमें रहनेका ही होना चाहिये? पर एकान्त न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है? जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।एकान्तमें रहनेसे साधन अधिक होगा? मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा अन्तःकरण निर्मल बनेगा -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु एकान्तमें हल्लागुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी? वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा? वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा? एकान्तमें रहनेसे लोग भी ज्यादा मानबड़ाई? आदर करेंगे -- इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है? वह साधनमें बाधक होती है क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुखसुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये? प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।लघ्वाशी -- साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित? मित और मेध्य -- ये तीन बातें बतायी गयी हैं। हित का तात्पर्य है -- भोजन शरीरके अनुकूल हो। मितका तात्पर्य है -- भोजन न तो अधिक करे और न कम करे? प्रत्युत जितने भोजनसे शरीरनिर्वाह की जाय? उतना भोजन करे (गीता 6। 16)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा -- ऐसे भावसे भोजन न करे? प्रत्युत केवल औषधकी तरह क्षुधानिवृत्तिके लिये ही भोजन करे? जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। मेध्यका तात्पर्य है -- भोजन पवित्र हो।धृत्यात्मानं नियम्य च -- सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना -- ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता 18। 33) के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।यतवाक्कायमानसः -- शरीर? वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता 17। 14 -- 16)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे? देखनेसुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे? आवश्यक होनेपर ही बोले? असत्य न बोले? निन्दाचुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे? प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा -- ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं? जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है? उन शब्द? स्पर्श? रूप? रस और गन्ध -- पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेंगी और विषयोंका चिन्तन होगा।रागद्वेषौ व्युदस्य च -- सांसारिक वस्तु महत्त्वशाली है? अपने काममें आनेवाली है? उपयोगी है -- ऐसा जो भाव है? उसका नाम राग है। तात्पर्य है कि अन्तःकरणमें असत् वस्तुका जो रंग चढ़ा हुआ है? वह राग है। असत् वस्तु आदिमें राग रहते हुए कोई उनकी प्राप्तिमें बाधा डालता है? उसके प्रति द्वेष हो जाता है।असत् संसारके किसी अंशमें राग हो जाय तो दूसरे अंशमें द्वेष हो जाता है -- यह नियम है। जैसे? शरीरमें राग हो जाय तो शरीरके अनुकूल वस्तुमात्रमें राग हो जाता है और प्रतिकूल वस्तुमात्रमें द्वेष हो जाता है।संसारके साथ रागसे भी सम्बन्ध जुड़ता है और द्वेषसे भी सम्बन्ध जुड़ता है। रागवाली बातका भी चिन्तन होता है और द्वेषवाली बातका भी चिन्तन होता है। इसलिये साधक न राग करे और न द्वेष करे।ध्यानयोगपरो नित्यम् -- साधक नित्य ही ध्यानयोगके परायण रहे अर्थात् ध्यानके सिवाय दूसरा कोई साधन न करे। ध्यानके समय तो ध्यान करे ही? व्यवहारके समय अर्थात् चलतेफिरते? खातेपीते? कामधंधा करते समय भी यह ध्यान (भाव) सदा बना रहे कि वास्तवमें एक परमात्माके सिवाय संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं (गीता 18। 20)।अहंकारं बलं दर्पं ৷৷. विमुच्य -- गुणोंको लेकर अपनेमें जो एक विशेषता दीखती है? उसे अहंकार कहते हैं। जबर्दस्ती करके? विशेषतासे मनमानी करनेका जो आग्रह (हठ) होता है? उसे बल कहते हैं। जमीनजायदाद आदि बाह्य चीजोंकी विशेषताको लेकर जो घमंड होता है? उसे दर्प कहते हैं। भोग? पदार्थ तथा अनुकूल परिस्थिति मिल जाय? इस इच्छाका नाम काम है। अपने स्वार्थ और अभिमानमें ठेस लगनेपर दूसरोंका अनिष्ट करनेके लिये जो जलनात्मक वृत्ति पैदा होती है? उसको क्रोध कहते हैं। भोगबुद्धिसे? सुखआरामबुद्धिसे चीजोंका जो संग्रह किया जाता है? उसे परिग्रह कहते हैं।साधक उपर्युक्त अहंकार? बल? दर्प? काम? क्रोध और परिग्रह -- इन सबका त्याग कर देता है।निर्ममः -- अपने पास निर्वाहमात्रकी जो वस्तुएँ हैं और कर्म करनेके शरीर? इन्द्रियाँ आदि जो साधन हैं? उनमें ममता अर्थात् अपनापन न हो । अपना शरीर? वस्तु आदि जो हमें प्रिय लगते हैं? उनके बने रहनेकी इच्छा न होना निर्मम होना है।जिन व्यक्तियों और वस्तुओंको हम अपनी मानते हैं? वे आजसे सौ वर्ष पहले भी अपनी नहीं थीं और सौ वर्षके बाद भी अपनी नहीं रहेंगी। अतः जो अपनी नहीं रहेंगी? उनका उपयोग या सेवा तो कर सकते हैं? पर उनको,अपनी मानकर अपने पास नहीं रख सकते। अगर उनको अपने पास नहीं रख सकते तो वे अपने नहीं हैं ऐसा माननेमें क्या बाधा है उनको अपनी न माननेसे अधिक निर्मम हो जाता है।शान्तः -- असत् संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही अन्तःकरणमें अशान्ति? हलचल आदि पैदा होते हैं। जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर अशान्ति कभी पासमें आती ही नहीं। फिर रागद्वेष न रहनेसे साधक हरदम शान्त रहता है।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- ममतारहित और शान्त मनुष्य (सांख्ययोगका साधक) परमात्मप्राप्तिका अधिकारी बन जाता है अर्थात् असत्का सर्वथा सम्बन्ध छूटते ही उसमें ब्रह्मप्राप्तिकी योग्यता? सामर्थ्य आ जाती है। कारण कि जबतक असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध रहता है? तबतक परमात्मप्राप्तिकी सामर्थ्य नहीं आती। सम्बन्ध -- उपर्युक्त साधनसामग्रीसे निष्ठा प्राप्त हो जानेपर क्या होता है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
वह ज्ञानकी परा निष्ठा किस प्रकार करनी चाहिये सो कहते हैं --, विशुद्ध -- कपटरहित निश्चयात्मिका बुद्धिसे संपन्न पुरुष? धैर्यसे कार्यकरणके संघातरूप आत्माको,( शरीरको ) संयम करके -- वशमें करके शब्दादि विषयोंको? अर्थात् शब्द जिनका आदि है ऐसे सभी विषयोंको छोड़कर? प्रकरणके अनुसार यहाँ यह अभिप्राय है कि केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये जिन विषयोंकी आवश्यकता है? उनसे अतिरिक्त सुखभोगके लिये जो अधिक विषय हैं? उन सबको छोड़कर तथा शरीरस्थितिके निमित्त प्राप्त हुए विषयोंमें भी? रागद्वेषका अभाव करकेत्याग करके।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
ब्रह्मज्ञानस्य परां निष्ठां प्रतिष्ठापितामनूद्य श्लोकान्तरमवतारयितुं पृच्छति -- सेयमिति। येयं ब्रह्मज्ञानस्य परा निष्ठा समारोपिता तद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तिर्ज्ञानसंतानरूपोच्यते सा कार्या सुसंपाद्येति यदुक्तं तत्कथं केनोपायेनेति प्रश्नार्थः। पृष्टमुपायभेदमुदाहरति -- बुद्ध्येति। अध्यवसायो ब्रह्मात्मत्वनिश्चयः? मायारहितत्वं संशयविपर्ययशून्यत्वम्। शब्दादिसमस्तविषयत्यागे देहस्थितिरपि दुःस्था स्यादित्याशङ्क्याह -- सामर्थ्यादिति। विषयमात्रत्यागे देहस्थित्यनुपपत्तेर्ज्ञाननिष्ठासिद्धिप्रसङ्गादित्यर्थः। देहस्थित्यर्थत्वेनानुज्ञातेष्वर्थेषु प्राप्तं रागादि ज्ञाननिष्ठाप्रतिबन्धकं व्युदस्यति -- शरीरेति। परित्यज्य विविक्तसेवी स्यादिति संबन्धः। बुद्धेर्वैशारद्यं यत्नेन कार्यं करणनियमनम्।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
ब्रह्मप्राप्तेः ब्रह्मज्ञानस्य परस्याः निष्ठायाः समापोपिताऽतद्धर्मनिवृत्तिद्वारा ब्रह्मणि परिसमाप्तेः सुसंपाद्यायाः प्रतिज्ञातं क्रमं दर्शयति। बुद्य्धा व्यवसायात्मिकया व्यवसायश्च ब्रह्मात्मज्ञानादेव मोक्षः सचावश्यं संपादनीय इति निश्चयः। विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः धृत्या धैर्यणात्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य वशीकृत्य षष्ठाध्यायादावुक्तानामनुक्तानां ततोऽधिकान्सुखार्थास्त्यक्त्वेत्यर्थः। विषयमात्रेत्यागे देहस्थित्यनुपपत्त्या ज्ञाननिष्ठाया असिद्धिप्रसङ्गात्। स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यनेन वा संबन्धः।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
तमेव ब्रह्मप्राप्तिप्रकारमाह त्रिभिः -- बुद्ध्येति। बुद्ध्या वेदान्तश्रवणमननपरिपाकोत्थयाऽहं ब्रह्मास्मीति परोक्षनिश्चयरूपया विशुद्धया सर्वभूतेषु मैत्र्यादिभावनया सम्यग्विशोधितया। धृत्या धैर्येण योगक्षेमादिनिमित्तवैयग्र्यराहित्येन। आत्मानं देहेन्द्रियसंघातं नियम्य। दृढासनो भूत्वेत्यर्थः। चकारात्प्राणं च नियम्य। शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा। तत इन्द्रियाणि प्रत्याहृत्येत्यर्थः। प्रत्याहृतकरणोऽप्यन्तर्मनसैव विषयान्स्मरति तत्परित्यागमाह -- रागद्वेषौ व्युदस्य चेति। संकल्पं त्यक्त्वेत्यर्थः। स हि विषयं परिकल्प्य तत्र रागं जनयतीति प्रसिद्धम्। यथाचाक्षपादाचार्यसूत्रंदोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः संकल्पकृताः इति। दोषो रागादिः। चकारादयमहमस्मीत्येतमपि भावं व्युदस्येति ज्ञेयम्। ततो ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभावाय तं प्राप्तुं कल्पते योग्यो भवतीति तृतीयेन संबन्धः।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
तदेवाह -- बुद्ध्येति। उक्तेन प्रकारेण विशुद्धया पूर्वोक्तया सात्त्विक्या बुद्ध्या युक्तः? धृत्या सात्त्विक्या आत्मानं तामेव बुद्धिं नियम्य निश्चलां कृत्वा? शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा तद्विषयौ रागद्वेषौ च व्युदस्यबुद्ध्या विशुद्धया युक्तः इत्यादीनांब्रह्मभूयाय कल्पते इति तृतीयेनान्वयः।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
बुद्धिशब्दोऽत्र प्रस्तुतब्रह्मशब्दाभिप्रेतविषयबुद्धिगोचरः? तस्याः शुद्धिश्चासमग्रविषयत्वसंशयविपर्ययरूपदोषराहित्यमित्याहयथावस्थितात्मतत्त्वविषययेति।धृत्या इति पूर्वोक्तसप्रकारसात्त्विकधृतिपरामर्शमाहविषयविमुखीकरणेनेति। अत्र धृत्या मनोनियमनं कर्मोक्तम् अपि च पूर्वमेव त्यक्तविषयस्य कोऽसौ तदानीन्तनस्त्यागः इत्यत्राऽऽहअसन्निहितान् कृत्वेति। विषयसन्निधिर्हि विजितेन्द्रियमपि क्षोभयेदिति भावः।रागद्वेषौ व्युदस्य इति वैषयिकरागद्वेषयोर्व्युदासस्यापि तादात्विकविषयत्वायवैराग्यं समुपाश्रितः इत्यनेन पुनरुक्तिपरिहाराय चाऽऽहतन्निमित्ताविति। एतेन विषयासन्निधानफलप्रदर्शनम्। यद्वा विप्रकृष्टेष्वपि सूक्ष्मसङ्गो निरोद्धव्य इति भावः।,विविक्तत्वं रहितत्वम् तत्प्रकृतोपयोगेन विशिनष्टि -- सर्वैर्ध्यानविरोधिभिर्विविक्ते देश इति।लघ्वाशी इत्यनेन पूर्वोक्तंनात्यश्नतः [6।16] इत्यादिकं स्मार्यत इत्यत्राऽऽहअत्यशनानशनरहित इति।धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च इत्यादिनायतवाक्कायमानसः इत्यस्य पुनरुक्तिपरिहारायाहध्यानाभिमुखीकृतकायवाङ्मनोवृत्तिरिति। कायस्याभिमुखीकरणं स्थिरासनादिपरिग्रहः वाचस्तु प्रणवादिव्यतिरिक्तवर्जनम् मनसस्तु शुभाश्रयालम्बनम्। उक्तानां ध्यानयोगशेषत्वमाहएवम्भूतः सन्निति। नित्यशब्दविवक्षितमाहआप्रयाणादहरहरितिरागद्वेषौ व्युदस्य इति वैषयिकरागद्वेषयोर्व्युदासोक्तेःवैराग्यं समुपाश्रितः इत्येतदाभिमानिकविषयम्? तत्र सम्यगुपाश्रयणं पूर्वसिद्धस्यापि सम्यगवस्थापनमित्यभिप्रायेणविरागतां वर्धयन्नित्युक्तम्। एवमहङ्कारादिविमोचनेऽपि द्रष्टव्यम्।शरीरमनःप्राणादिबलानां योगविरोधित्वाभावात्वासनाबलमिति विशेषितम्। दर्पोऽत्राहङ्कारबलहेतुकोऽङ्गीकर्तव्यानङ्गीकारः। योगित्वशान्तत्वादिनिमित्तोऽपि दर्पस्त्याज्यःहृष्टो दृप्यति दृप्तो धर्ममतिक्रामति [आ.ध.सू.1।13।4] इति स्मरणात्। मनोवाक्कायव्यापारनिवृत्त्यादेरुक्तत्वाच्छान्तशब्दोऽत्र शमहेतुविशेषपर इत्यत्राऽऽहआत्मानुभवैकसुख इति। इन्द्रियव्यापारोपरतिः क्रोधादिनिवृत्तिश्च बाह्यसुखनिस्स्पृहत्वात्? तच्च प्रभूतात्मस्वसुखलाभादिति भावः। उक्तेषु सर्वेषु ध्यानयोगस्याङ्गित्वमाहएवम्भूतो ध्यानयोगं कुर्वन्निति। ध्यानमेवात्र योगः? ध्यानेन वा योगः। अनन्तरश्लोकार्थपरामर्शेन ब्रह्मशब्दस्यात्र शुद्धात्मविषयतामाहसर्वबन्धेति।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
सेयं ज्ञाननिष्ठा सप्रकारोच्यते -- बुद्ध्येति। विशुद्धया सर्वसंशयविपर्ययशून्यया बुद्ध्याऽहं ब्रह्मास्मीति वेदान्तवाक्यजन्यया बुद्धिवृत्त्या युक्तः सदा तदन्वितो धृत्या धैर्येणात्मानं शरीरेन्द्रियसङ्घातं नियम्योन्मार्गप्रवृत्तेर्निवार्यात्मप्रवणं कृत्वा। चशब्देन योगशास्त्रोक्तं साधनान्तरं समुच्चीयते। शब्दादीञ्शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात् विषयान्भोगेन बन्धहेतून् सामर्थ्याज्ज्ञाननिष्ठार्थशरीरस्थितिमात्रप्रयोजनानुपयुक्ताननिषिद्धानपि त्यक्त्वा शरीरस्थितिमात्रार्थेषु च तेषु रागद्वेषौ व्युदस्य परित्यज्य चकारादन्यदपि ज्ञानविक्षेपकं परित्यज्य। विविक्तसेवीत्यत्र स्यादित्यध्याहृतेन ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यन्तेनान्वयः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
तदेवाऽऽह -- बुद्ध्येति। विशुद्धया सर्वसङ्गरहितमदेकनिष्ठया बुद्ध्या युक्तो धृत्या मदिच्छाज्ञाने दुःखाद्याभासेऽपि मल्लीलाज्ञानात्मकधैर्येण आत्मानं जीवं नियम्य वशीकृत्य -- चकारेणाऽचलं कृत्वा -- शब्दादीन् विषयान् इन्द्रियेभ्यस्त्यक्त्वा च पुनः रागद्वेषौ मित्रशत्रुज्ञानरूपौ व्युदस्य दूरीकृत्य ब्रह्मभूयाय कल्पत इति तृतीयश्लोकेनान्वयः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
तथा हि बुद्ध्येति त्रिभिः। बुद्ध्या यथोक्तकर्मफलादित्यागाद्विशुद्धया साङ्ख्यमार्गीयया युक्तः योगेनाव्यभिचारिण्या धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च स्वान्तर्यामिध्यानैकनिष्ठः सर्वत्रानात्मत्वदृष्ट्या वैराग्यं समुपाश्रितः कर्मस्वहम्ममत्वरहितः शान्त इति पूर्वसूत्रितस्य भाष्यं फलितं तथाभूत आनन्दांशाविर्भूतो ब्रह्मभूयाय अक्षरब्रह्मात्मभावाय कल्पते? स्वात्मानंब्रह्माहमस्मि इति यथावदनुभवतीत्यर्थः। इतीयं स्वज्ञानस्य परा निष्ठा भगवद्गुणसाराविर्भावात्तद्व्यपदेशः प्राज्ञवदिति।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
18.51 Yuktah, being endowed; buddhya, with an intellect-which is identical with the faculty of determination; visuddhaya, pure, free from maya (delusion); and niyamya, controlling, subduing; atmanam, oneself, the aggregate of body and organs; dhrtya, with fortitude, with steadlines; tyaktva, rejecting; visayan, the objects; sabdadin, beginning from sound -from the context it follows that 'rejecting the objects' means rejecting all things which are meant for pleasure and are in excess of those meant only for the mere maintenance of the body; and vyudasya, eliminating; raga-dvesau, attachment and hatred with regard to things which come to hand for the maintenance of the body-. Therefore,
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
18.51 - 18.53 'Endowed with a purified understanding' means endowed with the Buddhi capable of understanding the self as it is in reality; 'subduing the mind by steadiness' means making the mind fit for meditation by turning away from external and internal objects; 'relinishing sound and other objects of senses' means keeping them far away, casting aside love and hate occasioned by them (i.e., the sense objects). 'Resorting to solitude' means living in a lonely place free from hindrances to meditation; 'eat but little' means eating neither too much nor too little; 'restraining speech, body and mind' means directing the operations of body, speech and mind to meditation; 'ever engaged in the Yoga of meditation' means being like this, i.e., constantly engaged in the Yoga of meditation day after day until death; 'taking refuge in dispassion' means developing aversion to all objects except the one entity to be meditated upon, by considering the imperfections of all objects and thus cultivating detachment to everything. Forsaking 'egoism' means abandoning the tendency to consider what is other than the self, as well as neutralising the power of forcible Vasnas (tendencies) which nourish (egoism), and the resulting pride, desire, wrath and possessiveness. 'With no feeling of mine' means free from the notion that what does not belong to oneself belongs to oneself; 'Who is tranil' means, who finds sole happiness in experiencing the self. One who has become like this and performs the Yoga of meditation becomes worthy for the state of Brahman. The meaning is that, freed from all bonds, he experiences the self as It really is.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 18.51?
,बुद्ध्या अध्यवसायलक्षणया विशुद्धया मायारहितया युक्तः संपन्नः? धृत्या धैर्येण आत्मानं कार्यकरणसंघातं नियम्य च नियमनं कृत्वा वशीकृत्य? शब्दादीन् शब्दः आदिः येषां तान् विषयान् त्यक्त्वा? सामर्थ्यात् शरीरस्थितिमात्रहेतुभूतान् केवलान् मुक्त्वा ततः अधिकान् सुखार्थान् त्यक्त्वा इत्यर्थः? शरीरस्थित्यर्थत्वेन प्राप्तेषु रागद्वेषौ व्युदस्य च परित्यज्य च।।ततः --,
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 18.51, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.