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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

எவரிடமிருந்து எல்லா உயிர்களும் பரிணாமம் பெற்றதோ, யாரால் இவை அனைத்தும் வியாபித்திருக்கிறதோ, அவரைத் தன் கடமையாகக் கொண்டு வழிபடுகிறானோ, அவன் பூரணத்துவத்தை அடைகிறான்.

MalayalamIND

ആരിൽ നിന്നാണ് എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളും പരിണമിച്ചത്, ആരിലൂടെ ഇതെല്ലാം വ്യാപിച്ചിരിക്കുന്നുവോ, അവനെ സ്വന്തം കടമയോടെ ആരാധിക്കുന്നവൻ പൂർണത കൈവരിക്കുന്നു.

KannadaIND

ಯಾರಿಂದ ಎಲ್ಲ ಜೀವಿಗಳು ವಿಕಾಸಗೊಂಡಿವೆಯೋ ಮತ್ತು ಯಾರಿಂದ ಇದೆಲ್ಲವೂ ವ್ಯಾಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟಿದೆಯೋ, ಆತನನ್ನು ತನ್ನ ಕರ್ತವ್ಯದಿಂದ ಪೂಜಿಸುತ್ತಾನೋ ಅವನು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.

TeluguIND

ఎవరి నుండి సమస్త జీవులు ఉద్భవించాయో మరియు ఎవరిచేత అంతటా వ్యాపించి ఉన్నదో, అతనిని తన స్వంత కర్తవ్యంతో ఆరాధించినవాడు పరిపూర్ణతను పొందుతాడు.

NepaliIND

जसबाट सबै प्राणीको उत्पत्ति भएको छ र जसबाट यी सबै व्याप्त छन्, उहाँको आराधना आफ्नै कर्मले गर्दा नै पूर्णता प्राप्त हुन्छ।

BengaliIND

যাঁর থেকে সমস্ত প্রাণীর উদ্ভব হয়েছে এবং যাঁর দ্বারা এই সমস্ত বিস্তৃত, তাঁরই আরাধনা করে নিজের কর্তব্যে পূর্ণতা লাভ করে।

PunjabiIND

ਜਿਸ ਤੋਂ ਸਾਰੇ ਜੀਵ ਉਤਪੰਨ ਹੋਏ ਹਨ ਅਤੇ ਜਿਸ ਦੇ ਦੁਆਰਾ ਇਹ ਸਭ ਵਿਆਪਕ ਹੈ, ਉਸ ਦੀ ਆਪਣੇ ਕਰਤੱਵ ਨਾਲ ਭਗਤੀ ਕਰਨ ਨਾਲ ਮਨੁੱਖ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

જેનાથી સર્વ જીવો ઉત્ક્રાંતિ પામ્યા છે અને જેનાથી આ બધું વ્યાપેલું છે, તેને પોતાના કર્તવ્યથી ભજવાથી વ્યક્તિ પૂર્ણતાને પામે છે.

MarathiIND

ज्याच्यापासून सर्व प्राणी उत्क्रांत झाले आहेत आणि ज्याच्याद्वारे हे सर्व व्यापलेले आहे, त्याची स्वतःच्या कर्तुत्वाने पूजा केल्याने मनुष्य सिद्धीला प्राप्त होतो.

AssameseIND

যাৰ পৰা সকলো সত্তা বিকশিত হৈছে আৰু যাৰ দ্বাৰা এই সকলোবোৰ ব্যাপক হৈছে, তেওঁৰ নিজৰ কৰ্তব্যৰে তেওঁক পূজা কৰি, তেওঁ সিদ্ধতা লাভ কৰে।

MaithiliIND

जिनका सँ सब जीव विकसित भेल अछि आ जिनका द्वारा ई सब व्याप्त अछि, अपन कर्तव्य सँ हुनकर पूजा करैत, सिद्धि प्राप्त होइत अछि |

BhojpuriIND

जेकरा से सभ जीव के विकास भइल बा आ जेकरा से ई सब व्याप्त बा, अपना कर्तव्य से ओकर पूजा करत, सिद्धि के प्राप्ति होला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् -- जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है? जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है? जो सबका उत्पादक? आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था? जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है? उसी परमात्माका अपनेअपने स्वभावज (वर्णोचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य -- मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं -- स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना? स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ कराना तथा स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना (इनमें पढ़ाना? यज्ञ कराना और दान लेना -- ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना? यज्ञ करना और दान देना -- ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शमदम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खानापीना? उठनाबैठना आदि जितने भी कर्म हैं? उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे? उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं -- प्रजाकी रक्षा करना? दान देना? यज्ञ करना? अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना । इन पाँच कर्मों तथा शौर्य? तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खानापीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।वैश्य यज्ञ करना? अध्ययन करना? दान देना और ब्याज लेना तथा कृषि? गौरक्ष्य और वाणिज्य -- इन शास्त्रनियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित? स्वभावज और खानापीना? सोनाजागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे? भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवद्बुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जोजो कर्तव्यकर्म बताये गये हैं? वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है? तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती है। जैसे? पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया? जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटेछोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शरशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं -- युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है? जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है? परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं? घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलिमें लगी हुई है? इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मनबुद्धि लग जायँ ।,लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये? पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणोंउपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं? क्रियाओँ आदिमें ममता हो जाती है? वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे पूजासामग्री नहीं रहतीं (अपवित्र फल? फूर आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये मेरे पास जो कुछ है? वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है?,मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है -- इस भावसे जो कुछ किया जाय? वह सबकासब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओँ? वस्तुओँ आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है? उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ? वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वञ्चित रह जाती हैं।सिद्धिं विन्दति मानवः -- सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था? उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।यहाँ मानवः पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य? शूद्र और ब्रह्मचारी? गृहस्थ? वानप्रस्थ? संन्यास -- इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है? प्रत्युत हिन्दू? मुसलमान? ईसाई? बौद्ध? पारसी? यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति? सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हों? सबकेसब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं? पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरहतरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं? उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न होते हैं।इसी अध्यायके सत्तरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन करेगा? उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे? अध्ययन करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे ही जो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओँसे विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है? उसकी क्रियाओँको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं।विशेष बातकर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असङ्गता होती है और भक्तियोगमें संसारसे असङ्गतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।कर्मयोगी तो अपने पास शरीर? इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदि जो कुछ संसारका जडअंश है? उसको स्वार्थ? अभिमान? कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर उनसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है? और जो स्वतःस्वाभाविक असङ्गता है? वह प्रकट हो जाती है।भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समयसमयपर किये गये पारमार्थिक कर्मों(जप? ध्यान आदि) के द्वारा सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको सुख पहुँचानेमें लग जाता है? तो क्रियाओँको करनेका वेग मिटकर स्वयंमें असङ्गता आ जाती है और भक्तकी सम्पूर्ण क्रियाएँ परमात्माकी पूजनसामग्री बन जानेसे जडतासे विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम बढ़ जाता है।भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपनेआपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके,अनन्यतापूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खानापीना? कामधंधा आदि लौकिक और जप? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती हैं। उसकी लौकिकपारमार्थिक क्रियाओंमें केवल बाहरसे भेद देखनेमें आता है परन्तु वास्तवमें कोई भेद नहीं रहता।कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- ये दोनों अन्तमें एक हो जाते हैं। जैसे? कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है और ज्ञानयोगी विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और स्वयं असङ्ग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण करनेके प्रकारमें अन्तर है? पर असङ्गतामें दोनों एक हो जाते हैं । इस असङ्गतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी -- दोनों स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्मोंका बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्यपालनके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)? और ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं (गीता 4। 37)। परन्तु इस स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे जिसको उपरति हो जाती है? उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट हो सकता है। , सम्बन्ध -- स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय? तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये -- इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिस अन्तर्यामी ईश्वरसे समस्त प्राणियोंकी प्रवृत्ति यानी उत्पत्ति या चेष्टा होती है और जिस ईश्वरसे यह सारा जगत् व्याप्त है? उस ईश्वरको प्रत्येक वर्णके लिये पहले बतलाये हुए अपने कर्मोंद्वारा पूजकर -- उसकी आराधना करके मनुष्य केवल ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

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Sri Anandgiri

तमेव प्रकारं स्फुटयति -- यत इति। यतःशब्दार्थं यस्मादित्युक्तं व्यक्तीकरोति -- यस्मादिति। प्राणिनामुत्पत्तिर्यस्मादीश्वरात्तेषां चेष्टा च यस्मादन्तर्यामिणो येन च सर्वं व्याप्तं मृदेव घटादिकार्यस्य कारणातिरिक्तस्वरूपाभावात्तं स्वकर्मणाभ्यर्च्य मानवः संसिद्धिं विन्दतीति संबन्धः। नहि ब्राह्मणादीनां यथोक्तधर्मनिष्ठया साक्षान्मोक्षो लभ्यते तस्य ज्ञानैकलभ्यत्वात्किंतु तन्निष्ठानां शुद्धबुद्धीनां कर्म,सुफलमपश्यतामीश्वरप्रसादासादितविवेकवैराग्यवतां संन्यासिनां ज्ञाननिष्ठयोग्यतावतां ज्ञानप्राप्त्या मुक्तिरित्यभिप्रेत्याह -- केवलमिति।

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Sri Dhanpati

तमेव प्रकारं दर्शयति -- यतः यस्मात् जगज्जनकादन्तर्यामिणो भूतानां। प्रवृत्तिरुत्पत्तिश्चेष्टा वा स्यात्। येनेश्वरेण सर्वं कृत्स्त्रमिदं ततं व्याप्तं कार्यस्य कारणसत्तातिरिक्तसत्ताकत्वाभावात्। तं परमात्मानं स्वकर्मणा प्रतिवर्ण पूर्वोक्तेन अभ्यर्च्य सभ्यक् पूजयित्वा आराध्य मानवोऽधिकृतो मनुष्यः सिद्धिं केवलज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां विन्दति लभते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yataḥfrom whom
pravṛittiḥhave come into being
bhūtānāmof all living entities
yenaby whom
sarvamall
idamthis
tatampervaded
svakarmaṇā
tamhim
abhyarchyaby worshipping
siddhimperfection
vindatiattains
mānavaḥa person
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्

अच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 46
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 46 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 46 का हिंदी अर्थ: "जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 46?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 46 translates to: "He from whom all the beings have evolved and by whom all this is pervaded, worshipping Him with his own duty, one attains perfection. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 46 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam" mean in English?

"yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 46. He from whom all the beings have evolved and by whom all this is pervaded, worshipping Him with his own duty, one attains perfection. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.