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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

ஒவ்வொரு நபரும் தங்கள் சொந்த கடமையை அர்ப்பணித்து முழுமையை அடைகிறார்கள். அவர்கள் தங்கள் சொந்தக் கடமையில் ஈடுபட்டு எப்படி முழுமையை அடைகிறார்கள், இப்போது கேளுங்கள்.

SindhiIND

هر هڪ پنهنجي فرض ۾ سرشار ٿي ڪمال حاصل ڪري ٿو. پنهنجي فرض شناسي ۾ ڪيئن ڪمال حاصل ڪن ٿا، هاڻي ٻڌو.

BengaliIND

নিজ নিজ কর্তব্যে নিবেদিত প্রত্যেক ব্যক্তিই পূর্ণতা লাভ করে। নিজ দায়িত্বে নিয়োজিত থাকতে তারা কীভাবে পূর্ণতা লাভ করে, এখন শুনুন।

NepaliIND

आ-आफ्नो कर्तव्यमा समर्पित प्रत्येक व्यक्ति पूर्णता प्राप्त गर्दछ। आफ्नो कर्तव्यमा लागेर कसरी सिद्धि प्राप्त हुन्छ, अब सुन्नुहोस्।

MarathiIND

स्वतःच्या कर्तव्यात वाहून घेतलेली प्रत्येक व्यक्ती परिपूर्णतेला प्राप्त होते. ते स्वतःच्या कर्तव्यात मग्न असताना कसे पूर्णत्व मिळवतात ते आता ऐका.

BhojpuriIND

अपना कर्तव्य में समर्पित हर व्यक्ति पूर्णता के प्राप्ति करेला। कइसे ऊ लोग अपना कर्तव्य में लागल रहत सिद्धि प्राप्त करेला, अब सुनीं.

DogriIND

अपने कर्तव्य च समर्पित हर इक माह्नू सिद्धता हासल करदा ऐ। अपने कर्तव्य च लगे दे होई किस चाल्ली सिद्धि हासल करदे न, अज्जै सुनो।

AssameseIND

নিজৰ কৰ্তব্যৰ প্ৰতি নিষ্ঠাবান প্ৰতিজন ব্যক্তিয়ে সিদ্ধতা লাভ কৰে। নিজৰ কৰ্তব্যত নিয়োজিত হৈ তেওঁলোকে কেনেকৈ সিদ্ধতা লাভ কৰে, এতিয়াই শুনা।

ManipuriIND

ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯊꯧꯗꯥꯡꯗꯥ ꯀꯠꯊꯣꯛꯂꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯈꯨꯗꯤꯡꯃꯛꯅꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯐꯪꯏ꯫ ꯃꯈꯣꯌ ꯃꯁꯥꯒꯤ ꯗ꯭ꯌꯨꯇꯤꯗꯥ ꯂꯦꯞꯂꯒꯥ ꯃꯇꯧ ꯀꯔꯝꯅꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯐꯪꯂꯤꯕꯅꯣ, ꯍꯧꯖꯤꯛ ꯇꯥꯕꯤꯌꯨ꯫

GujaratiIND

પોતાના કર્તવ્યમાં સમર્પિત દરેક વ્યક્તિ પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરે છે. તેઓ પોતાની ફરજમાં વ્યસ્ત રહીને કેવી રીતે પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરે છે, હવે સાંભળો.

TeluguIND

తన స్వంత కర్తవ్యానికి అంకితమైన ప్రతి వ్యక్తి పరిపూర్ణతను పొందుతాడు. తమ స్వంత కర్తవ్యంలో నిమగ్నమై ఉన్నప్పుడు వారు ఎలా పరిపూర్ణతను పొందుతారో, ఇప్పుడు వినండి.

KannadaIND

ತಮ್ಮ ಕರ್ತವ್ಯಕ್ಕೆ ಮೀಸಲಾದ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬ ವ್ಯಕ್ತಿಯು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ. ತಮ್ಮ ಸ್ವಂತ ಕರ್ತವ್ಯದಲ್ಲಿ ತೊಡಗಿರುವಾಗ ಅವರು ಹೇಗೆ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ, ಈಗ ಕೇಳಿ.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः -- गीताके अध्ययनसे ऐसा मालूम होता है कि मनुष्यकी जैसी स्वतःसिद्ध स्वाभाविक प्रकृति (स्वभाव) है? उसमें अगर वह कोई नयी उलझन पैदा न करे? रागद्वेष न करे तो वह प्रकृति उसका स्वाभाविक ही कल्याण कर दे। तात्पर्य है कि प्रकृतिके द्वारा प्रवाहरूपसे अपनेआप होनेवाले जो स्वाभाविक कर्म हैं? उनका स्वार्थत्यागपूर्वक प्रीति और तत्परतासे आचरण करे परन्तु कर्मोंके प्रवाहके साथ न राग हो? न द्वेष हो और न फलेच्छा हो। रागद्वेष और फलेच्छासे रहित होकर क्रिया करनेसे करनेका वेग शान्त हो जाता है और कर्ममें आसक्ति न होनेसे नया वेग पैदा नहीं होता। इससे प्रकृतिके पदार्थों और क्रियाओँके साथ निर्लिप्तता (असंगता) आ जाती है। निर्लिप्तता होनेसे प्रकृतिकी क्रियाओंका प्रवाह स्वाभाविक ही चलता रहता है और उनके साथ अपना कोई सम्बन्ध न रहनेसे साधककी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है? जो कि प्राणिमात्रकी स्वतःस्वाभिवक है। अपने स्वरूपमें स्थिति होनेपर उसका परमात्माकी तरफ स्वाभाविक आकर्षण हो जाता है। परन्तु यह सब होता है कर्मोंमें अभिरति होनेसे? आसक्ति होनेसे नहीं।कर्मोंमें एक तो अभिरति होती है और एक आसक्ति होती है। अपने स्वाभाविक कर्मोंको केवल दूसरोंके हितके लिये तत्परता और उत्साहपूर्वक करनेसे अर्थात् केवल देनेके लिये कर्म करनेसे मनमें जो प्रसन्नता होती है? उसका नाम अभिरति है। फलकी इच्छा से कुछ करना अर्थात् कुछ पानेके लिये कर्म करना आसक्ति है। कर्मोंमें अभिरतिसे कल्याण होता है और आसक्तिसे बन्धन होता है।इस प्रकरणके स्वे स्वे कर्मणि? स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य? स्वभावनियतं कर्म? सहजं कर्म आदि पदोंमें कर्म शब्द एकवचनमें आया है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य प्रीति और तत्परतापूर्वक चाहे एक कर्म करे? चाहे अनेक कर्म करे? उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक ही होती है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको लेकर मनुष्य जितने भी कर्म करता है? वे सब कर्म अन्तमें उसी उद्देश्यमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् उसी उद्देश्यकी पूर्ति करनेवाले हो जाते हैं। जैसे गङ्गाजी हिमालयसे निकलकर गङ्गासागरतक जाती हैं तो नद? नदियाँ? झरने? सरोवर? वर्षका जल -- ये सभी उसकी धारामें मिलकर गङ्गासे एक हो जाते हैं? ऐसे ही उद्देश्यवालेके सभी कर्म उसके उद्देश्यमें मिल जाते हैं। परन्तु जिसकी कर्मोंमें आसक्ति है? वह एक कर्म करके अनेक फल चाहता है अथवा अनेक कर्म करके एक फल चाहता है अतः उसका उद्देश्य एक परमात्माकी प्राप्तिका न होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक नहीं होती (गीता 2। 41)।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु -- अपने कर्मोंमें प्रीतिपूर्वक तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य परमात्माको जैसे प्राप्त होता है? वह सुनो अर्थात् कर्ममात्र परमात्मप्राप्तिका साधन है? इस बातको सुनो और सुन करके ठीक तरहसे समझो।विशेष बातमालिककी सुखसुविधाकी सामग्री जुटा देना? मालिकके दैनिक कार्योंमें अनुकूलता उपस्थित कर देना आदि कार्य तो वेतन लेनेवाला नौकर भी कर सकता है और करता भी है। परन्तु उसमें क्रिया की (कि इतना काम करना है) और समय की (कि इतने घंटे काम करना है) प्रधानता रहती है। इसलिये वह कामधंधा सेवा नहीं बन सकता। यदि मालिकका वह कामधन्धा आदरपूर्वक सेव्यबुद्धिसे? महत्त्वबुद्धिसे किया जाय तो वह सेवा हो जाता है।सेव्यबुद्धि? महत्त्वबुद्धि चाहे जन्मके सम्बन्धसे हो? चाहे विद्याके सम्बन्धसे चाहे वर्णआश्रमके सम्बन्धसे हो चाहे योग्यता? अधिकार? सद्गुणसदाचारके सम्बन्धसे। जहाँ महत्त्वबुद्धि हो जाती है? वहाँ सेव्यको सुखआराम कैसे मिले सेव्यकी प्रसन्नता किस बातमें है सेव्यका क्या रुख है क्या रुचि है -- ऐसे भाव होनेसे जो भी काम किया जाय? वह सेवा हो जाता है।सेव्यका वही काम पूजाबुद्धि? भगवद्बुद्धि? गुरुबुद्धि आदिसे किया जाय और पूज्यभावसे चन्दन लगाया जाय? पुष्प चढ़ाये जायँ? माला पहनायी जाय? आरती की जाय? तो वह काम पूजन हो जाता है। इससे सेव्यके चरणस्पर्श अथवा दर्शनमात्रसे चित्तकी प्रसन्नता? हृदयकी गद्गदता? शरीरका रोमाञ्चित होना आदि होते हैं और सेव्यके प्रति विशेष भाव प्रकट होते हैं। उससे सेव्यकी सेवामें कुछ शिथिलता आ सकती है परन्तु भावोंके बढ़नेपर अन्तःकरणशुद्धि? भगवत्प्रेम? भगवद्दर्शन आदि हो जाते हैं।मालिकका समयसमयपर कामधंधा करनेसे नौकरको पैसे मिल जाते हैं और सेव्यकी सेवा करनेसे सेवकको अन्तःकरणशुद्धिपूर्वक भगवत्प्राप्ति हो जाती है परन्तु पूजाभावके बढ़नेसे तो पूजकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि चरणचाँपी तो नौकर भी करता है? पर उसको सेवाका आनन्द नहीं मिलता क्योंकि उसकी दृष्टि पैसोंपर रहती है। परन्तु जो सेवाबुद्धिसे चरणचाँपी करता है? उसको सेवामें विशेष आनन्द मिलता है क्योंकि उसकी दृष्टि सेव्यके सुखपर रहती है। पूजामें तो चरण छूनेमात्रसे शरीर रोमाञ्चित हो जाता है और अन्तःकरणमें एक पारमार्थिक आनन्द होता है। उसकी दृष्टि पूज्यकी महत्तापर और अपनी लघुतापर रहती है। ऐसे देखा जाय तो नौकरके कामधंधेसे मालिकको आराम मिलता है? सेवामें सेव्यको विशेष आराम तथा सुख मिलता है और पूजामें पूजकके भावसे पूज्यको प्रसन्नता होती है। पूजामें शरीरके सुखआरामकी प्रधानता नहीं होती।अपने स्वभावज कर्मोंके द्वारा पूजा करनेसे पूजकका भाव बढ़ जाता है तो उसके स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली (चेष्टा? चिन्तन? समाधि आदि) सभी छोटीबड़ी क्रियाएँ सब प्राणियोंमें व्यापक परमात्माकी पूजनसामग्री बन जाती है। उसकी दैनिकचर्या अर्थात् खानापीना आदि सब क्रियाएँ भी पूजनसामग्री बन जाती हैं।जैसे ज्ञानयोगीका मैं कुछ भी नहीं करता हूँ यह भाव हरदम बना रहता है? ऐसे ही अनेक प्रकारकी,क्रियाएँ करनेपर भी भक्तके भीतर एक भगवद्भाव हरदम बना रहता है। उस भावकी गाढ़तामें उसका अहंभाव भी छूट जाता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु दूसरे कारणसे ( उनका प्रकारान्तरसे अनुष्ठान करनेपर ) यह अब बतलाया जानेवाला फल होता है --, कर्माधिकारी मनुष्य? उक्त लक्षणोंवाले अपनेअपने कर्मोंमें अभिरत -- तत्पर हुआ? संसिद्धि लाभ करता है अर्थात अपने कर्मो का अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका क्षय होनेपर? शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है। तो क्या अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे ही साक्षात् संसिद्धि मिल जाती है नहीं। तो किस तरह मिलती है अपने कर्मोंमें तत्पर हुआ मनुष्य? जिस प्रकार सिद्धि लाभ करता है? वह तू सुन।

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Sri Anandgiri

शमादिपरिचर्यान्तकर्मणां विभज्योक्तानामभ्युदयं फलमादावुपन्यस्यति -- एतेषामिति। स्वभावतो विहितत्वादेव मोक्षापेक्षामन्तरेणानुष्ठानादित्यर्थः। तत्र प्रमाणमाह -- वर्णा इति। शेषशब्देन भुक्तकर्मणोऽतिरिक्तं कर्मानुशयशब्दितमुच्यते? प्रत्येकं देशादिभिर्विशिष्टशब्दः संबध्यते? आदिशब्देनतद्यथाम्रे फलार्थे निमिते,छायागन्धाद्यनूत्पद्यत एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इति स्मृतिर्गृह्यते। इतश्चोक्तानां कर्मणां स्वर्गफलत्वं युक्तमित्याह -- पुराणे चेति। उक्तंहियस्तु सम्यक्करोत्येवं गृहस्थः परमं विधिम्। तद्वर्णबन्धमुक्तोऽसौ लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् इति।यस्त्वेतां नियतश्चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः। स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च शाश्वतान् इति। मोक्षाश्रमो यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितबुद्धियुक्तः। अनिन्धनज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इति च।सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति इति श्रुतिश्चकारार्थः। यदि पुनर्मोक्षापेक्षयोक्तानि कर्माण्यनुष्ठीयेरंस्तदा मोक्षफलत्वं तेषां सेत्स्यतीत्याह -- कारणान्तरादिति। तदेव कारणान्तरं यन्मोक्षापेक्षया तेषामनुष्ठानं मोक्षोपायेषु शमादिषु सात्त्विकेषु ब्राह्मणधर्मेषु क्षत्रियादीनामनधिकाराद्ब्राह्मणानामेव मोक्षो न क्षत्रियादीनामित्याशङ्क्याह -- स्वे स्व इति। यथा स्वे कर्मण्यभिरतस्य बुद्धिशुद्धिद्वारा ज्ञाननिष्ठायोग्यतया प्राप्तज्ञानस्य मोक्षोपपत्तेर्ब्राह्मणातिरिक्तस्यापि ज्ञानवतो मुक्तिरिति मत्वा पूर्वार्धं व्याचष्टे -- स्वे स्वे इत्यादिना। संसिद्धिशब्दस्य मोक्षार्थत्वं गृहीत्वा स्वधर्मनिष्ठत्वमात्रेण तल्लाभे तादर्थ्येन संन्यासादिविधानानर्थक्यमिति मन्वानः शङ्कते -- किमिति। न तावन्मात्रेण साक्षान्मोक्षो ज्ञाननिष्ठायोग्यता वेति परिहरति -- नेति। तर्हि कथं स्वधर्मनिष्ठस्य संसिद्धिरिति पृच्छति -- कथं तर्हीति। उत्तरार्धेनोत्तरमाह -- स्वकर्मेति। तच्छृणु तं प्रकारमेकाग्रचेता भूत्वा श्रुत्वावधारयेत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

एतेषां जातिविहितानां कर्मणां सभ्यगनुतिष्ठानां मोक्षापेक्षामन्तरेण विहितत्वादेवानुष्ठानात्स्वर्गप्राप्तिः फलंसर्व एते पुण्यलोका भवन्ति वर्णा आश्रमाः स्वकर्मनिष्ठाः प्रत्येकं कर्मफलमनुभूय ततः शेषेण विशिष्टदेशजातिकुलधर्मायुःश्रुतवृत्तवित्तसुखमेधसो जन्म प्रतिपद्यन्तेयस्तु सभ्यक्करोत्येतं गृहस्थः परमं विधम्। तद्वर्णबन्धमुक्तोऽसौ लोकानाप्नोत्यनुत्तमान्। यस्त्वेतां नियतं चर्यां वानप्रस्थश्चरेन्मुनिः। स दहत्यग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च,शाश्वतान्। मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः सुसंकल्पितबुद्धियुक्तः। अर्निधनं ज्योतिरिव प्रशान्तं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः इत्यादिश्रुतिस्मृतिपुराणेभ्यः। एतेषामेव मोक्षापेक्षया सभ्यगनुष्ठितानां यत्फलं तद्वक्तुभारभते। स्वेस्वे यथोक्तभेदे कर्मम्यभिरतः तत्परोऽधिकृतः पुरुषः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानादशुद्धिक्षये सति कायेन्द्रियमनसां ज्ञानानिष्ठायोग्यतालक्षणां लभते प्राप्नोति। कथं लभते इत्यपेक्षायामाह -- स्वकर्मनिरतः यथा येन प्रकारेण सिद्धिमुक्तलक्षणां विन्दति लभते तत्तथा श्रुणु।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
sve sverespectively
karmaṇiwork
abhirataḥfulfilling
sansiddhimperfection
labhateachieve
naraḥa person
svakarma
nirataḥengaged
siddhimperfection
yathāas
vindatiattains
tatthat
śhṛiṇuhear
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.44
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्

खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः

जिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 45
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 45
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु

अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 45 का हिंदी अर्थ: "अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 45?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 45 translates to: "Each person devoted to their own duty attains perfection. How they attain perfection while being engaged in their own duty, hear now. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 45 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "sve sve karmaṇy abhirataḥ sansiddhiṁ labhate naraḥ" mean in English?

"sve sve karmaṇy abhirataḥ sansiddhiṁ labhate naraḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 45. Each person devoted to their own duty attains perfection. How they attain perfection while being engaged in their own duty, hear now. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.