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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी

हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है। — VaniSagar

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TamilIND

ஓ அர்ஜுனா, ஒரு முட்டாள் மனிதன் தூக்கம், பயம், துக்கம், விரக்தி, அகந்தை ஆகியவற்றைக் கைவிடாத அந்த உறுதியே தாமஸமாகும்.

TeluguIND

ఓ అర్జునా, మూర్ఖుడు నిద్ర, భయం, దుఃఖం, వైరాగ్యం మరియు అహంకారాన్ని విడిచిపెట్టని దృఢత్వం తామసికం.

KannadaIND

ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಯಾವ ಮೂರ್ಖನು ನಿದ್ರೆ, ಭಯ, ದುಃಖ, ಹತಾಶೆ ಮತ್ತು ಅಹಂಕಾರವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವುದಿಲ್ಲವೋ ಅದು ತಾಮಸಿಕವಾಗಿದೆ.

PunjabiIND

ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਉਹ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਇੱਕ ਮੂਰਖ ਮਨੁੱਖ ਨੀਂਦ, ਡਰ, ਸੋਗ, ਨਿਰਾਸ਼ਾ ਅਤੇ ਹੰਕਾਰ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਤਿਆਗਦਾ, ਉਹ ਤਾਮਸਿਕ ਹੈ।

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, മൂഢനായ മനുഷ്യൻ ഉറക്കം, ഭയം, ദുഃഖം, നിരാശ, അഹങ്കാരം എന്നിവ ഉപേക്ഷിക്കാത്ത ആ ദൃഢതയാണ് താമസം.

SindhiIND

اُها مضبوطي، اي ارجن، جنهن سان بيوقوف ماڻهو ننڊ، خوف، غم، نااميدي ۽ هٺ کي نه ڇڏي، اهو تامسڪ آهي.

BhojpuriIND

ऊ दृढ़ता हे अर्जुन, जवना से मूर्ख आदमी नींद, भय, शोक, निराशा, आ अभिमान के ना छोड़ेला, ऊ तामसी ह।

MaithiliIND

ओ दृढ़ता हे अर्जुन, जाहि सँ मूर्ख मनुष्य निद्रा, भय, शोक, निराशा, अभिमान केँ नहि छोड़ैत अछि, ओ तामस थिक |

AssameseIND

সেই দৃঢ়তা, হে অৰ্জুন, যাৰ দ্বাৰা মূৰ্খ মানুহে টোপনি, ভয়, শোক, হতাশা, অহংকাৰক পৰিত্যাগ নকৰে, সেয়া তামসিক।

ManipuriIND

ꯃꯔꯥꯜ ꯂꯩꯔꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯅꯥ ꯇꯨꯝꯕꯥ, ꯑꯀꯤꯕꯥ, ꯁꯣꯀꯄꯥ, ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯋꯥꯈꯜ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯊꯥꯗꯣꯛꯂꯣꯏꯗꯕꯥ ꯑꯗꯨꯒꯨꯝꯂꯕꯥ ꯑꯆꯦꯠꯄꯥ ꯑꯗꯨ, ꯍꯦ ꯑꯔꯖꯨꯟ, ꯃꯁꯤ ꯇꯥꯃꯁꯤꯛꯅꯤ |

DogriIND

ओह दृढ़ता, हे अर्जुन, जिसदे कन्नै मूर्ख मनुक्ख नींद, भय, दुख, निराशा, अभिमान गी नेईं त्यागदा, ओह् तामसी ऐ।

MarathiIND

हे अर्जुना, ज्या दृढतेने मूर्ख मनुष्य निद्रा, भय, शोक, निराशा आणि अहंकार सोडत नाही, ती तामसिक आहे.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यया स्वप्नं भयं ৷৷. सा पार्थ तामसी -- तामसी धारणशक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा? बाहर और भीतरका भय? चिन्ता? दुःख और घमण्ड -- इनका त्याग नहीं करता? प्रत्युत इन सबमें रचापचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है? कभी मृत्यु? बीमारी? अपयश? अपमान? स्वास्थ्य? धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है? कभी शोकचिन्तामें डूबा रहता है? कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।निद्रा? भय? शोक आदिके सिवाय प्रमाद? अभिमान? दम्भ? द्वेष? ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा? दूसरोंका अपकार करना? उनको कष्ट देना? उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचोंको भी एव च पदोंसे मान लेना चाहिये।इस प्रकार निद्रा? भय आदिको और दुर्गुणदुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।भगवान्ने तैंतीसवेंचौंतीसवें श्लोकोंमें धारयते पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण,करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्टा है? जिसकी बुद्धिमें अज्ञता? मूढता भरी हुई है? ऐसा मिलन अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा? भय? शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचापचा रहता है।सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतिमें तो क्रमशः फलाकाङ्क्षी और दुर्मेधाः पदसे कर्ताका उल्लेख किया है? पर सात्त्विकी धृतिमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतिमें कर्ता निर्लिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता परन्तु राजसी और तामसी धृतिमें कर्ता लिप्त होता है।विशेष बातमानवशरीर विवेकप्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है? उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है? त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति(धारणशक्ति) में यह विवेक साफसाफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतिमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता फिर भी इस लोकमें सुखआराम? मानआदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले? भोग मिले -- इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामस भावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा? भय आदि तामसभावोंमें ही रचापचा रहता है।पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें? चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है? यह सब क्रिया ही है। क्रिया तो शरीरोंमें होती है? पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है -- ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं(चेतनस्वरूप) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा लक्ष्य होता है? उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है? वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार पार्थ सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि पृथानन्दन लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजसतामसभाव न आने पायें -- इसके लिये निरन्तर सजग रहो, सम्बन्ध -- मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुखकर्मसंग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जिस धृतिके द्वारा मनुष्य स्वप्न -- निद्रा? भय -- त्रास? शोक -- दुःख और मदको नहीं छोड़ता। अर्थात् विषयसेवनको ही अपने लिये बहुत बड़ा पुरुषार्थ मानकर उन्मत्तकी भाँति मदको ही मनमें सदा कर्तव्यरूपसे समझता हुआ जो कुत्सित बुद्धिवाला मनुष्य इन सबको नहीं छोड़ता। यानी धारण ही किये रहता है। उसकी जो धृति है? वह तामसी मानी गयी है।

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Sri Anandgiri

तामसीं धृतिं व्याचष्टे -- ययेति। शोकं प्रियवियोगनिमित्तं संतापम्। विषण्णतामिन्द्रियाणां ग्लानिम्। विषयसेवा कुमार्गप्रवृत्तेरुपलक्षणमुक्तं? स्वप्नादिमदान्तं सर्वमेव कर्तव्यतयात्मनो बहु मन्यमानो मनसि नित्यमेव कुर्वन्दुर्मेधा न विमुञ्चति किंतु धारयत्येवेति योजना।

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Sri Dhanpati

राजसीं धुतिं व्युत्पाद्य तामसीं तां व्युत्पादयति -- ययेत्ति। दुर्मेधाः दुष्टा कुत्सिता मेधा बुद्धिर्यस्य स दुर्बुद्धिर्यया धृत्या स्वप्नं निद्रां भयं त्रासं शोकं प्रियवियोगनिमित्तं संतापं विषादं विषण्णतामिन्द्रियखिन्नतां विषयेसेवात्मनो बहुमन्यमानो मत्त इव यो मदमेव च मनसि नित्यमेव कर्तव्यरुपतया कुर्वन्न विमुञ्चति धारयत्येव सा धृतिः पार्थ? तामसी।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yayāin which
svapnamdreaming
bhayamfearing
śhokamgrieving
viṣhādamdespair
madamconceit
evaindeed
chaand
nanot
vimuñchatigive up
durmedhāunintelligent
dhṛitiḥresolve
that
pārthaArjun, the son of Pritha
tāmasīin the mode of ignorance
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.34
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेऽर्जुन।प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी

हे पृथानन्दन अर्जुन ! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा धर्म, काम (भोग) और अर्थको अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धारण करता है, वह धृति राजसी है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.36
सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 35
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 35
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी

हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 35 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 35?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 35 translates to: "That firmness, O Arjuna, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair, and conceit, is Tamasic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 35 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृतिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्डको भी नहीं छोड़ता, वह धृति तामसी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yayā svapnaṁ bhayaṁ śhokaṁ viṣhādaṁ madam eva cha" mean in English?

"yayā svapnaṁ bhayaṁ śhokaṁ viṣhādaṁ madam eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 35. That firmness, O Arjuna, by which a stupid man does not abandon sleep, fear, grief, despair, and conceit, is Tamasic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.