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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है। — VaniSagar

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TamilIND

ஓ அர்ஜுனா, இருளில் சூழ்ந்துள்ள, அதர்மத்தை தர்மமாகவும், எல்லாவற்றையும் புரட்டுவதாகவும் பார்க்கும் அந்த புத்தி, தாமசி (இருள்) ஆகும்.

TeluguIND

ఓ అర్జునా, చీకటిలో ఆవరించి ఉన్న మరియు అధర్మాన్ని ధర్మంగా మరియు అన్నిటినీ వికృతంగా చూసే ఆ తెలివి తామసికం (చీకటి).

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, അന്ധകാരത്തിൽ പൊതിഞ്ഞിരിക്കുന്നതും അധർമ്മത്തെ ധർമ്മമായി കാണുന്നതും എല്ലാറ്റിനെയും വികൃതമാക്കിയതുമായ ബുദ്ധി താമസമാണ് (ഇരുട്ടാണ്).

MarathiIND

हे अर्जुना, जी बुद्धी अंधारात गुरफटलेली आहे आणि अधर्माला धर्म आणि सर्व गोष्टी विकृत पाहते आहे, ती तामसिक आहे.

BhojpuriIND

ऊ बुद्धि हे अर्जुन, जवन अन्हार में लिपटल बा आ अधर्म के धर्म आ सब चीजन के विकृत देखेले, ऊ तामसी (अंधेरा) ह।

MaithiliIND

ओ बुद्धि, हे अर्जुन, जे अन्हार मे आच्छादित अछि आ अधर्म केँ धर्म आ सब वस्तु केँ विकृत देखैत अछि, ओ तामसी (अन्धकार) अछि |

AssameseIND

হে অৰ্জুন, যি বুদ্ধি অন্ধকাৰত আবৃত হৈ আধৰ্মক ধৰ্ম আৰু সকলো বস্তু বিকৃত বুলি দেখে, সেই বুদ্ধি তামসিক (আন্ধাৰ)।

BengaliIND

হে অর্জুন, যে বুদ্ধি অন্ধকারে আচ্ছন্ন এবং অধর্মকে ধর্ম এবং সমস্ত কিছুকে বিকৃত বলে দেখে, তা হল তামসিক (অন্ধকার)।

GujaratiIND

તે બુદ્ધિ, હે અર્જુન, જે અંધકારમાં ઘેરાયેલો છે અને અધર્મને ધર્મ તરીકે જુએ છે અને બધી વસ્તુઓ વિકૃત છે, તે તામસિક છે.

PunjabiIND

ਉਹ ਬੁੱਧੀ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਜੋ ਹਨੇਰੇ ਵਿੱਚ ਲਿਪੀ ਹੋਈ ਹੈ ਅਤੇ ਅਧਰਮ ਨੂੰ ਧਰਮ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਵੇਖਦੀ ਹੈ ਅਤੇ ਸਾਰੀਆਂ ਚੀਜ਼ਾਂ ਨੂੰ ਵਿਗਾੜਦੀ ਹੈ, ਤਾਮਸਿਕ ਹੈ।

NepaliIND

हे अर्जुन, जो अन्धकारमा डुबेको र अधर्मलाई धर्म र सबै कुरालाई विकृत देख्ने त्यो बुद्धि तामसिक हो।

KannadaIND

ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಕತ್ತಲೆಯಲ್ಲಿ ಆವೃತವಾಗಿರುವ ಮತ್ತು ಅಧರ್ಮವನ್ನು ಧರ್ಮವಾಗಿ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲವನ್ನೂ ವಿಕೃತವಾಗಿ ಕಾಣುವ ಆ ಬುದ್ಧಿಯು ತಾಮಸಿಕವಾಗಿದೆ (ಕತ್ತಲೆ).

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता -- ईश्वरकी निन्दा करना शास्त्र? वर्ण? आश्रम और लोकमर्यादाके विपरीत काम करना मातापिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना सन्तमहात्मा? गुरुआचार्य आदिका अपमान करना झूठ? कपट? बेईमानी? जालसाजी? अभक्ष्य भोजन? परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंको धर्म मानना -- यह सब अधर्मको धर्म मानना है।अपने शास्त्र? वर्ण? आश्रमकी मर्यादामें चलना मातापिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तनमनधनसे सेवा करना संतमहात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना धार्मिक ग्रन्थोंका पठनपाठन करना दूसरोंकी सेवाउपकार करना शुद्धपवित्र भोजन करना आदि शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना -- यह धर्मको अधर्म मानना है।तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि शास्त्रकारोंने? ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और,तरहतरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया? जिससे भारत परतन्त्र हो गया जबतक ये शास्त्र रहेंगे? ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी? तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा? भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा? आदिआदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।सर्वार्थान्विपरीतांश्च -- आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना दूसरोंको मूर्ख समझकर अपनेको ही पढ़ालिखा? विद्वान् समझना जितने संतमहात्मा हो गये हैं? उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना -- यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।बुद्धिः सा पार्थ तामसी -- तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म? धर्मको अधर्म और अच्छेको बुरा? सुलटेको उलटा मानती है? वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

हे पार्थ जो तमोगुणसे आवृत हुई बुद्धि अधर्मको -- निषिद्ध कार्यको? धर्म मान लेती है? यानी शास्त्रविहित मान लेती है? तथा जाननेयोग्य अन्यान्य समस्त पदार्थोंको भी? जो विपरीत ही समझती है? वह तामसी है।

VaniSagar Research Vault
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Sri Anandgiri

धर्मशब्दो नपुंसकलिङ्गोऽपीत्यभिप्रेत्य धर्ममित्युक्तम्। तमसावृता अविवेकेन वेष्टितेत्यर्थः। कार्याकार्यादीनुक्ताननुक्तांश्च संग्रहीतुं सर्वार्थानित्युक्तं तद्व्याचष्टे -- सर्वानेवेति। विपरीतांश्चेति चकारमवधारणे गृहीत्वा विपरीतानेवेत्युक्तम्।

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Sri Dhanpati

राजसीं बुद्धिमुक्त्वा तामसीं तामाह -- अधर्मं प्रतिषिद्धं धर्मं विहितमिति या मन्यते जानाति तमसाऽविवेकेनावृता वेष्टिता सती सर्वार्थानेव ज्ञेयपदार्थान् विपरीतांश्च विपरीतमेव विजानाति साबद्धिस्तामसी। पार्थ? तव नेयमुचितेति संबोधनाशयः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
adharmamirreligion
dharmamreligion
itithus
which
manyateimagines
tamasaāvṛitā
sarvaarthān
viparītānopposite
chaand
buddhiḥintellect
that
pārthaArjun, the son of Pritha
tāmasīof the nature of ignorance
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Bhagavad Gita · 18.31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.33
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी

हे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 32
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ: "हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 32?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 32 translates to: "That intellect, O Arjuna, which is enveloped in darkness and sees Adharma as Dharma and all things perverted, is Tamasic (dark). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ ताम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 32 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā" mean in English?

"adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 32. That intellect, O Arjuna, which is enveloped in darkness and sees Adharma as Dharma and all things perverted, is Tamasic (dark). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.