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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

தர்மத்தையும் அதர்மத்தையும், எதைச் செய்ய வேண்டும், எதைச் செய்யக் கூடாது என்பதைத் தவறாகப் புரிந்து கொண்டால் - அர்ஜுனா, அந்த புத்தி ராஜாசிக் (உணர்ச்சி) கொண்டது.

PunjabiIND

ਜਿਸ ਦੁਆਰਾ ਧਰਮ ਅਤੇ ਅਧਰਮ ਨੂੰ ਗਲਤ ਤਰੀਕੇ ਨਾਲ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਇਹ ਵੀ ਕਿ ਕੀ ਕੀਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਕੀ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਜਾਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ - ਉਹ ਬੁੱਧੀ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਰਾਜਸੀ (ਭਾਵੁਕ) ਹੈ।

SindhiIND

اهو جنهن جي ذريعي هڪ غلط طور تي دھرم ۽ ادھارم کي سمجهي ٿو، ۽ اهو پڻ ڇا ڪرڻ گهرجي ۽ ڇا نه ڪرڻ گهرجي- اهو عقل، اي ارجن، راجاسڪ (پرجوش) آهي.

MarathiIND

ज्याद्वारे धर्म आणि अधर्म हे चुकीचे समजतात आणि काय करावे आणि काय करू नये - हे अर्जुना, बुद्धी राजसिक (उत्साही) आहे.

NepaliIND

जसद्वारा धर्म र अधर्मलाई गलत बुझिन्छ, र के गर्नु हुँदैन र के गर्नु हुँदैन - त्यो बुद्धि, हे अर्जुन, राजसिक (उत्साही) हो।

BengaliIND

যার দ্বারা কেউ ভুলভাবে ধর্ম ও অধর্ম বোঝে এবং কী করা উচিত এবং কী করা উচিত নয় - সেই বুদ্ধি, হে অর্জুন, রাজসিক (আবেগপূর্ণ)।

KannadaIND

ಯಾವುದರಿಂದ ಒಬ್ಬನು ಧರ್ಮ ಮತ್ತು ಅಧರ್ಮವನ್ನು ತಪ್ಪಾಗಿ ಅರ್ಥಮಾಡಿಕೊಂಡಿದ್ದಾನೆ, ಮತ್ತು ಏನು ಮಾಡಬೇಕು ಮತ್ತು ಏನು ಮಾಡಬಾರದು-ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಆ ಬುದ್ಧಿಯು ರಾಜಸಿಕವಾಗಿದೆ (ಉತ್ಸಾಹ).

KonkaniIND

ज्यावरवीं धर्म आनी अधर्म चुकीचें समजता आनी तशेंच कितें करपाक जाय आनी कितें करचें न्हय तें समजता- ती बुध्दी अर्जुन राजसी (रागात्मक) आसता.

AssameseIND

যাৰ দ্বাৰা ধৰ্ম আৰু ধৰ্ম ভুলকৈ বুজি পায়, আৰু লগতে কি কৰা উচিত আৰু কি কৰা উচিত নহয়— সেই বুদ্ধি, হে অৰ্জুন, ৰাজসিক (আবেগিক)।

BhojpuriIND

जवना से धर्म आ धर्म के गलत तरीका से समझल जाला, आ इहो कि का करे के चाहीं आ का ना करे के चाहीं- ऊ बुद्धि हे अर्जुन राजसी (भावुक) होला।

GujaratiIND

જેના દ્વારા ધર્મ અને અધર્મને ખોટી રીતે સમજાય છે અને શું કરવું જોઈએ અને શું ન કરવું જોઈએ - તે બુદ્ધિ, હે અર્જુન, રાજસિક (ઉત્સાહી) છે.

MaithiliIND

जाहि सँ धर्म आ धर्म केँ गलत बुझल जाइत छैक, आ संगहि की करबाक चाही आ की नहि करबाक चाही—ओ बुद्धि राजसी (भावुक) अछि।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यया धर्ममधर्मं च -- शास्त्रोंने जो कुछ भी विधान किया है? वह धर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा दी है और जिससे परलोकमें सद्गति होती है? वह धर्म है। शास्त्रोंने जिसका निषेध किया है? वह अधर्म है अर्थात् शास्त्रोंने जिसकी आज्ञा नहीं दी है और जिससे परलोकमें दुर्गति होती है? वह अधर्म है। जैसे? अपने मातापिता? बड़ेबूढ़ोंकी सेवा करनेमें? दूसरोंको सुख पहुँचानेमें? दूसरोंका हित करनेकी चेष्टामें अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार? सामर्थ्य आदिको लगा देना धर्म है। ऐसे ही कुआँबावड़ी खुदवाना? धर्मशालाऔषधालय बनवाना? प्याऊसदावर्त चलाना देश? ग्राम? मोहल्लेके अनाथ तथा गरीब बालकोंकी और समाजकी उन्नतिके लिये अपनी कहलानेवाली चीजोंको आवश्यकतानुसार उनकी ही समझकर निष्कामभावसे उदारतापूर्वक खर्च करना धर्म है। इसके विपरीत अपने स्वार्थ? सुख? आरामके लिये दूसरोंकी धनसम्पत्ति? हक? पद? अधिकार छीनना दूसरोंका अपकार? अहित? हत्या आदि करना अपने तन? मन? धन? योग्यता? पद? अधिकार आदिके द्वारा दूसरोंको दुःख देना अधर्म है।वास्तवमें धर्म वह है? जो जीवका कल्याण कर दे और अधर्म वह है? जो जीवको बन्धनमें डाल दे।कार्यं चाकार्यमेव च -- वर्ण? आश्रम? देश? काल? लोकमर्यादा? परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रोंने हमारे लिये जिस कर्मको करनेकी आज्ञा दी है? वह कर्म हमारे लिये कर्तव्य है। अवसरपर प्राप्त हुए कर्तव्यका पालन न करना तथा न करनेलायक कामको करना अकर्तव्य है। जैसे? भिक्षा माँगना यज्ञ? विवाह आदि कराना और उनमें दानदक्षिणा लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये तो कर्तव्य हैं? पर क्षत्रिय? वैश्य और शूद्रके लिये अकर्तव्य हैं। इसी प्रकार शास्त्रोंने जिनजिन वर्ण और आश्रमोंके लिये जोजो कर्म बताये हैं? वे सब उनउनके लिये कर्तव्य हैं और जिनके लिये निषेध किया है? उनके लिये वे सब अकर्तव्य हैं।जहाँ नौकरी करते हैं? वहाँ ईमानदारीसे अपना पूरा समय देना? कार्यको सुचारुरूपसे करना? जिस तरहसे मालिकका हित हो? ऐसा काम करना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये कर्तव्य हैं। अपने स्वार्थ? सुख और आराममें फँसकर कार्यमें पूरा समय न लगाना? कार्यको तत्परतासे न करना? थोड़ीसी घूस (रिश्वत) मिलनेसे मालिकका बड़ा नुकसान कर देना? दसपाँच रुपयोंके लिये मालिकका अहित कर देना -- ये सब कर्मचारियोंके लिये अकर्तव्य हैं।राजकीय जितने अफसर हैं? उनको राज्यका प्रबन्ध करनके लिये? सबका हित करनेके लिये ही ऊँचे पदपर,रखा जाता है। इसीलिये अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके जिस प्रकार सब लोगोंका हित हो सकता है? सबको सुख? आराम? शान्ति मिल सकती है -- ऐसे कामोंको करना उनके लिये कर्तव्य है। अपने तुच्छ स्वार्थमें आकर राज्यका नुकसान कर देना? लोगोंको दुःख देना आदि उनके लिये अकर्तव्य है।सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्तिनिवृत्ति? भयअभय और बन्धमोक्षको भी यहाँ एव च पदोंसे ले लेना चाहिये।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी -- राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ? पक्षपात? विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्मअधर्म? कार्यअकार्य? भयअभय? बन्धमोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीकठीक नहीं जान सकती। अतः किसी वर्णआश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौनसा धर्म कहा जाता है और कौनसा अधर्म कहा जाता है वह धर्म किस वर्णआश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है इन बातोंको जो बुद्धि ठीकठीक नहीं जान सकती? वह बुद्धि राजसी है।जब सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? क्रिया? पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है? तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है? उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और द्वेष -- इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो? चाहे ज्ञानसे हो।परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधलीसी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती? ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता? निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्मअधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिसजिस विषयमें प्रवेश करता है? उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुणदोषोंको ठीकठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता। सम्बन्ध -- अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

हे पार्थ जिस बुद्धिके द्वारा मनुष्य शास्त्रविहित धर्मको और शास्त्रप्रतिषिद्ध अधर्मको? एवं पूर्वोक्त कर्तव्य और अकर्तव्यको? यथार्थरूपसे -- सर्वतोभावसे निर्णयपूर्वक? नहीं जानता? वह बुद्धि राजसी है।

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Sri Anandgiri

कार्याकार्ययोर्धर्माधर्माभ्यां पौनरुक्त्यं परिहरति -- पूर्वोक्ते इति। पूर्वश्लोके कार्याकार्यशब्दाभ्यां दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणां करणाकरणे निर्दिष्टे तयोरेवात्रापि ग्रहान्न धर्माधर्माभ्यां पूर्वपर्यायाभ्यां गतार्थतेत्यर्थः। या (सा) बुद्धिर्यया बुद्ध्या बोद्धा निर्णयेन न जानातीत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

सात्त्विकीं बुद्धिमुक्त्वा राजसीं तामाह -- यया बुद्य्धा धर्मं शास्त्रचोदितं अधर्म च तत्प्रतिषिद्धं कार्यं च,कर्तव्यमकार्यमेव चाकर्तव्यं अयथावत् न यथावत्प्रजानाति सर्वतो निर्णयेन न प्रजानाति सा बुद्धिः पार्थ? राजसी। पृथापुत्रस्य तव नेयं युक्तेति संबोधनाशयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yayāby which
dharmamrighteousness
adharmamunrighteousness
chaand
kāryamright conduct
chaand
akāryamwrong conduct
evacertainly
chaand
ayathāvat
prajānātidistinguish
buddhiḥintellect
that
pārthaArjun, the son of Pritha
rājasīin the mode of passion
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी

हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी

हे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी

हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 31 translates to: "That by which one wrongly understands dharma and adharma, and also what ought to be done and what ought not to be done—that intellect, O Arjuna, is rajasic (passionate). — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha" mean in English?

"yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 31. That by which one wrongly understands dharma and adharma, and also what ought to be done and what ought not to be done—that intellect, O Arjuna, is rajasic (passionate). — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.