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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं। — VaniSagar

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TamilIND

ஓ அர்ஜுனா, குணங்களின்படி, புத்தி மற்றும் உறுதியின் மூன்று மடங்கு பிரிவை நான் முழுமையாகவும் தெளிவாகவும் கூறுவதைக் கேளுங்கள்.

MalayalamIND

ഹേ അർജ്ജുനാ, ഗുണങ്ങൾക്കനുസരിച്ച് ബുദ്ധിയുടെയും ദൃഢതയുടെയും ത്രിതല വിഭജനം ഞാൻ പൂർണ്ണമായും വ്യക്തമായും പ്രഖ്യാപിക്കുന്നത് കേൾക്കൂ.

GujaratiIND

હે અર્જુન, તું બુદ્ધિ અને દૃઢતાના ત્રિવિધ વિભાજનને સાંભળો, જેમ કે હું તેમને સંપૂર્ણ અને સ્પષ્ટ રીતે જાહેર કરું છું.

MarathiIND

हे अर्जुना, मी पूर्ण आणि स्पष्टपणे सांगितल्याप्रमाणे, बुद्धी आणि दृढता या गुणांच्या त्रिविध विभागणी ऐक.

BengaliIND

হে অর্জুন, আমি পূর্ণ ও সুস্পষ্টভাবে ঘোষণা করছি, গুণ অনুসারে বুদ্ধি ও দৃঢ়তার ত্রিবিধ বিভাজন শুনুন।

NepaliIND

हे अर्जुन, मैले पूर्ण र स्पष्ट रूपमा घोषणा गरे अनुसार, गुणका अनुसार बुद्धि र दृढताको त्रिविध विभाजन सुन।

PunjabiIND

ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਤੂੰ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਅਨੁਸਾਰ, ਬੁੱਧੀ ਅਤੇ ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਦੇ ਤਿੰਨ ਗੁਣਾਂ ਦੀ ਵੰਡ ਨੂੰ ਸੁਣ, ਜਿਵੇਂ ਕਿ ਮੈਂ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਅਤੇ ਸਪਸ਼ਟ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਬਿਆਨ ਕਰਦਾ ਹਾਂ।

TeluguIND

గుణాల ప్రకారం బుద్ధి మరియు దృఢత్వం అనే త్రివిధ విభజనలను నేను పూర్తిగా మరియు స్పష్టంగా ప్రకటిస్తున్నాను, ఓ అర్జునా.

OdiaIND

ଗୁଣା ଅନୁଯାୟୀ, ତୁମେ ବୁଦ୍ଧି ଏବଂ ଦୃ ness ତାର ତିନିଗୁଣ ବିଭାଜନ ଶୁଣ, ଯେହେତୁ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ପୃଥକ ଭାବରେ ଘୋଷଣା କରେ, ହେ ଅର୍ଜୁନ |

KannadaIND

ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ನಾನು ಗುಣಗಳ ಪ್ರಕಾರ ಬುದ್ಧಿ ಮತ್ತು ದೃಢತೆಯ ತ್ರಿವಿಧ ವಿಭಾಗವನ್ನು ನಾನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ಮತ್ತು ಸ್ಪಷ್ಟವಾಗಿ ಘೋಷಿಸಿದಂತೆ ಕೇಳು.

BhojpuriIND

बुद्धि आ दृढ़ता के त्रिगुणा विभाजन सुनऽ, गुणन के अनुसार, जइसे हम पूरा आ स्पष्ट रूप से घोषित करत बानी, हे अर्जुन।

MaithiliIND

बुद्धि आ दृढ़ता के त्रिविध विभाजन सुनु गुण के अनुसार, जेना हम पूर्ण आ स्पष्ट घोषणा करैत छी, हे अर्जुन |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [इसी अध्यायके अठारहवें श्लोकमें कर्मसंग्रहके तीन हेतु बताये गये हैं -- करण? कर्म और कर्ता। इनमेंसे कर्म करनेके जो इन्द्रियाँ आदि करण हैं? उनके सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीन भेद नहीं होते। उन इन्द्रियोंमें बुद्धिकी ही प्रधानता रहती है और सभी इन्द्रियाँ बुद्धिके अनुसार ही काम करती हैं। इसलिये यहाँ बुद्धिके भेदसे करणोंके भेद बता रहे हैं।बुद्धिके निश्चयको? विचारको दृढ़तासे ठीक तरह रखनेवाली और अपने लक्ष्यसे विचलित न होने देनेवाली धारणशक्तिका नाम धृति है। धारणशक्ति अर्थात् धृतिके बिना बुद्धि अपने निश्चयपर दृढ़ नहीं रह सकती। इसलिये बुद्धिके साथहीसाथ धृतिके भी तीन भेद बताने आवश्यक हो गये ।मनुष्य जो कुछ भी करता है? बुद्धिपूर्वक ही करता है अर्थात् ठीक सोचसमझकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। उस कार्यमें प्रवृत्त होनेपर भी उसको धैर्यकी बड़ी भारी आवश्यकता होती है। उसकी बुद्धिमें विचारशक्ति तेज है और उसे धारण करनेवाली शक्ति -- धृति श्रेष्ठ है? तो उसकी बुद्धि अपने निश्चित किये हुए लक्ष्यसे विचलित नहीं होती। जब बुद्धि अपने लक्ष्यपर दृढ़ रहती है? तब मनुष्यका कार्य सिद्ध हो जाता है।अभी साधकोंके लिये कर्मप्रेरक और कर्मसंग्रहका जो प्रकरण चला है? उसमें ज्ञान? कर्म और कर्ताकी ही खास आवश्यकता है। ऐसे ही साधक अपनी साधनामें दृढ़तापूर्वक लगा रहे? इसके लिये बुद्धि और धृतिके भेदको जाननेकी विशेष आवश्यकता है क्योंकि उनके भेदको ठीक जानकर ही वह संसारसे ऊँचा उठ सकता है। किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिको धारण करके साधक संसारसे ऊँचा उठ सकता है और किस प्रकारकी बुद्धि और धृतिके रहनेसे उसे ऊँचा उठनेमें बाधा लग सकती है -- यह जानना साधकके लिये बहुत जरूरी है। इसलिये भगवान्ने उन दोनोंके भेद बताये हैं। भेद बतानेमें भगवान्का भाव यह है कि सात्त्विकी बुद्धि और धृतिसे ही साधक ऊँचा उठ सकता है? राजसीतामसी बुद्धि और धृतिसे नहीं।]धनञ्जय -- जब पाण्डवोंने राजसूय यज्ञ किया था? तब अर्जुन अनेक राजाओंको जीतकर बहुतसा धन लेकर आये थे। इसीसे उनका नाम धनञ्जय पड़ा था। अब भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि अपनी साधनामें सात्त्विकी बुद्धि और धृतिको ग्रहण करके गुणातीत तत्त्वकी प्राप्ति करना ही वास्तविक धन है इसलिये तुम इस वास्तविक धनको धारण करो? इसीमें तुम्हारे धनञ्जय नामकी सार्थकता है।बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि भी एक है और धृति भी एक है परन्तु गुणोंकी प्रधानतासे उस बुद्धि और धृतिके भी सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनतीन भेद हो जाते हैं। उनका मैं ठीकठीक विवेचन करूँगा और थोड़ेमें बहुत विशेष बात कहूँगा? उनको तुम मन लगाकर? ध्यान देकर ठीक तरहसे सुनो।धृति श्रोत्रादि करणोंमें नहीं आयी है। इसलिये भगवान् चैव पदका प्रयोग करके कह रहे हैं कि जैसे बुद्धिके तीन भेद बताऊँगा? ऐसे ही धृतिके भी तीन भेद बताऊँगा। साधारण दृष्टिसे देखनेपर तो धृति भी बुद्धिका ही एक गुण दीखती है। बुद्धिका एक गुण होते हुए भी धृति बुद्धिसे अलग और विलक्षण है क्योंकि धृति स्वयं अर्थात् कर्तामें रहती है। उस धृतिके कारण ही मनुष्य बुद्धिका ठीकठीक उपयोग कर सकता है। धृति जितनी श्रेष्ठ अर्थात् सात्त्विकी होगी? साधककी (साधनमें) बुद्धि उतनी ही स्थिर रहेगी। साधनमें बुद्धिकी स्थिरताकी जितनी आवश्यकता है? उतनी आवश्यकता मनकी स्थिरताकी नहीं है। हाँ? एक अंशमें अणिमा आदि सिद्धियोंकी प्राप्तिमें मनकी स्थिरताकी आवश्यकता है परन्तु पारमार्थिक उन्नतिमें तो बुद्धिके अपने उद्देश्यपर स्थिर रहनेकी ही ज्यादा आवश्यकता है । साधककी बुद्धि भी सात्त्विकी हो और धृति भी सात्त्विकी हो? तभी साधक अपने साधनमें दृढ़तासे लगा रहेगा। इसलिये इन दोनोंके ही भेद जाननेकी आवश्यकता है।पृथक्त्वेन -- उनके भेद अलगअलग ठीक तरहसे कहूँगा अर्थात् बुद्धि और धृतिके विषयमें भी क्याक्या भेद होते हैं? उनको भी कहूँगा।प्रोच्यमानमशेषेण -- भगवान् कहते हैं कि बुद्धि और धृतिके विषयमें जाननेकी जोजो आवश्यक बाते हैं? उन सबको मैं पूरापूरा कहूँगा? जिसके बाद फिर जानना बाकी नहीं रहेगा।, सम्बन्ध -- अब भगवान् सात्त्विकी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

हे धनञ्जय बुद्धिके और धृतिके भी सत्त्वादि गुणोंके अनुसार तीनतीन प्रकारके भेद तू विभागपूर्वक सम्पूर्णतासे यथावत् कहे हुए सुन। यह सूत्ररूपसे कहना है। दिग्विजयके समय अर्जुनने मनुष्योंका और देवोंका बहुतसा धन जीता था? इसलिये उसका नाम धनञ्जय हुआ।

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Sri Anandgiri

ज्ञानादीनां प्रत्येकं त्रैविध्यमुक्त्वा वृत्तिमत्या बुद्धेस्तद्वृत्तेश्च धृत्याख्यायास्त्रैविध्यं सूचयति -- बुद्धेरिति। सूत्रविवरणं प्रतिजानीते -- प्रोच्यमानमिति। अर्जुनस्य धनंजयत्वं व्युत्पादयति -- दिगिति।

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Sri Dhanpati

एवं ज्ञानस्य बुद्धिवृत्तेः कर्मणः क्रियायाः कर्तुः बुद्ध्युपहितस्य च त्रैविध्यमुक्त्वा वृत्तिमत्या बुद्धेस्तदृत्तेश्च धृत्याख्यायास्त्रैविध्यं वक्तुमारभते। बुद्धेर्वृत्तिमत्या धृतेश्च तदृत्तेर्गुणतः सात्त्वादिगुणतस्त्रिविधभेदं मया प्रोच्यमानं कथ्यमानमशेषेण निःशेषतः पृथक्त्वेन हेयोपादेयविवेकतः श्रुणु श्रोतुं सावधानो भव। दिग्विजये मानुषं दैवं च प्रभूतं धनं यया बुद्य्धा धृत्या च त्वं जितवानसि सा त्वयान्यैश्च तनादिसमस्तपुरुषार्थसिद्धये विजयहेतुभूता उपादेयेति बोधनाय मया प्रोज्यमानं बुद्धेर्धृतेश्च त्रिविधं भेदं श्रृण्विति द्योतनाय संबोधयति धनंजयेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
buddheḥof intellect
bhedamthe distinctions
dhṛiteḥof determination
chaand
evacertainly
guṇataḥ trividham
śhṛiṇuhear
prochyamānamdescribed
aśheṣheṇain detail
pṛithaktvenadistinctly
dhanañjayaconqueror of wealth, Arjun
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.30
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी

हे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 29
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 29 translates to: "Hear thou the threefold division of intellect and firmness, according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "buddher bhedaṁ dhṛiteśh chaiva guṇatas tri-vidhaṁ śhṛiṇu" mean in English?

"buddher bhedaṁ dhṛiteśh chaiva guṇatas tri-vidhaṁ śhṛiṇu" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 29. Hear thou the threefold division of intellect and firmness, according to the Gunas, as I declare them fully and distinctly, O Arjuna. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.