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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar

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TamilIND

நிலையற்ற, மோசமான, வளைந்து கொடுக்காத, வஞ்சகமான, தீங்கிழைக்கும், சோம்பேறி, விரக்தி மற்றும் தள்ளிப்போடும்-அத்தகைய முகவர் தாமசிக் என்று அழைக்கப்படுகிறது.

MarathiIND

अस्थिर, असभ्य, लवचिक, कपटी, दुर्भावनापूर्ण, आळशी, निराश आणि विलंब - अशा एजंटला तामसिक म्हणतात.

SindhiIND

غير مستحڪم، بدمعاش، لچڪدار، فريب، بدڪردار، سست، مايوس، ۽ دير سان، اهڙي ايجنٽ کي تاماسڪ سڏيو ويندو آهي.

KannadaIND

ಅಸ್ಥಿರ, ಅಸಭ್ಯ, ಬಗ್ಗದ, ಮೋಸದ, ದುರುದ್ದೇಶಪೂರಿತ, ಸೋಮಾರಿ, ಹತಾಶೆ ಮತ್ತು ಮುಂದೂಡುವ-ಅಂತಹ ಏಜೆಂಟ್ ಅನ್ನು ತಾಮಸಿಕ್ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

PunjabiIND

ਅਸਥਿਰ, ਅਸ਼ਲੀਲ, ਲਚਕੀਲਾ, ਧੋਖੇਬਾਜ਼, ਬਦਨੀਤੀ, ਆਲਸੀ, ਨਿਰਾਸ਼ਾਜਨਕ ਅਤੇ ਢਿੱਲ-ਮੱਠ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਅਜਿਹੇ ਏਜੰਟ ਨੂੰ ਤਾਮਸਿਕ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

BengaliIND

অস্থির, অশ্লীল, অনমনীয়, ছলনাময়, দূষিত, অলস, হতাশাগ্রস্ত এবং বিলম্বিত - এই জাতীয় এজেন্টকে তামাসিক বলা হয়।

NepaliIND

अस्थिर, असभ्य, लचक, कपटी, द्वेषपूर्ण, अल्छी, हताश र ढिलाई - यस्तो कारकलाई तामसिक भनिन्छ।

MalayalamIND

അസ്ഥിരവും, അശ്ലീലവും, വഴക്കമില്ലാത്തതും, വഞ്ചനാപരവും, ക്ഷുദ്രഭാവമുള്ളതും, അലസവും, നിരാശയും, നീട്ടിവെക്കുന്നതും-അത്തരമൊരു ഏജൻ്റിനെ തമസിക് എന്ന് വിളിക്കുന്നു.

TeluguIND

అస్థిరమైన, అసభ్యకరమైన, వంచని, మోసపూరితమైన, హానికరమైన, సోమరితనం, నిరుత్సాహపరుడు మరియు వాయిదా వేయడం-అలాంటి ఏజెంట్‌ను తామసిక్ అంటారు.

MizoIND

Mi nghet lo, mi rilru na tak, inthlak danglam thei lo, bum hmang, mi sual, rilru hah, beidawng, leh tihkhawtlai—chutiang agent chu Tamasic an ti a.

KonkaniIND

अस्थीर, अश्लील, अस्थिर, फटोवपी, दुर्भावनापूर्ण, आळशी, निराश आनी आडखळ घालपी-अशा एजंटाक तामॅसिक म्हण्टात.

BhojpuriIND

अस्थिर, फूहड़, अनम्य, धोखेबाज, दुर्भावनापूर्ण, आलसी, निराश आ टालमटोल करे वाला-अइसन एजेंट के तामासिक कहल जाला।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अयुक्तः -- तमोगुण मनुष्यको मूढ़ बना देता है (गीता 14। 8)। इस कारण किस समयमें कौनसा काम करना चाहिये किस तरह करनेसे हमें लाभ है और किस तरह करनेसे हमें हानि है -- इस विषयमें तामस मनुष्य सावधान नहीं रहता अर्थात् वह कर्तव्य और अकर्तव्यके विषयमें सोचता ही,नहीं। इसलिये वह अयुक्त अर्थात् असावधान कहलाता है।प्राकृतः -- जिसने शास्त्र? सत्सङ्ग? अच्छी शिक्षा? उपदेश आदिसे न तो अपने जीवनको ठीक बनाया है और न अपने जीवनपर कुछ विचार ही किया है? माँबापसे जैसा पैदा हुआ है? वैसाकावैसा ही कोरा अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यकी शिक्षासे रहित रहा है? ऐसा मनुष्य प्राकृत अर्थात् अशिक्षित कहलाता है।स्तब्धः -- तमोगुणकी प्रधानताके कारण उसके मन? वाणी और शरीरमें अकड़ रहती है। इसलिये वह अपने वर्णआश्रममें बड़ेबूढ़े माता? पिता? गुरु? आचार्य आदिके सामने कभी झुकता नहीं। वह मन? वाणी और शरीरसे कभी सरलता और नम्रताका व्यवहार नहीं करता? प्रत्युत कठोर व्यवहार करता है। ऐसा मनुष्य स्तब्ध अर्थात् ऐंठअकड़वाला कहलाता है।शठः -- तामस मनुष्य अपनी एक जिद होनेके कारण दूसरोंकी दी हुई अच्छी शिक्षाको? अच्छे विचारोंको नहीं मानता। उसको तो मूढ़ताके कारण अपने ही विचार अच्छे लगते हैं। इसलिये वह शठ अर्थात् जिद्दी कहलाता है ।अनैष्कृतिकः -- जिनसे कुछ उपकार पाया है? उनका प्रत्युपकार करनेका जिसका स्वभाव होता है? वह नैष्कृतिक कहलाता है। परन्तु तामस मनुष्य दूसरोंसे उपकार पा करके भी उनका उपकार नहीं करता? प्रत्युत उनका अपकार करता है? इसलिये वह अनैष्कृतिक कहलाता है।अलसः -- अपने वर्णआश्रमके अनुसार आवश्यक कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जानेपर भी तामस मनुष्यको मूढ़ताके कारण वह कर्म करना अच्छा नहीं लगता? प्रत्युत सांसारिक निरर्थक बातोंको पड़ेपड़े सोचते रहना अथवा नींदमें पड़े रहना अच्छा लगता है। इसलिये उसे आलसी कहा गया है।विषादी -- यद्यपि तामस मनुष्यमें यह विचार होता ही नहीं कि क्या कर्तव्य होता है और क्या अकर्तव्य होता है तथा निद्रा? आलस्य? प्रमाद आदिमें मेरी शक्तिका? मेरे जीवनके अमूल्य समयका कितना दुरुपयोग हो रहा है? तथापि अच्छे मार्गसे और कर्तव्यसे च्युत होनेसे उसके भीतर स्वाभाविक ही एक विषाद (दुःख? अशान्ति) होता रहता है। इसलिये उसे विषादी कहा गया है।दीर्घसूत्री -- अमुक काम किस तरीकेसे बढ़िया और जल्दी हो सकता है -- इस बातको वह सोचता ही नहीं। इसलिये वह किसी काममें अविवेकपूर्वक लग भी जाता है तो थोड़े समयमें होनेवाले काममें भी बहुत ज्यादा समय लगा देता है और उससे काम भी सुचारुरूपसे नहीं होता। ऐसा मनुष्य दीर्घसूत्री कहलाता है।कर्ता तामस उच्यते -- उपर्युक्त आठ लक्षणोंवाला कर्ता तामस कहलाता है।विशेष बातछब्बीसवें? सत्ताईसवें और अट्ठाईसवें श्लोकमें जितनी बातें आयीं हैं? वे सब कर्ताको लेकर ही कही गयी हैं। कर्ताके जैसे लक्षण होते हैं? उन्हींके अनुसार कर्म होते हैं। कर्ता जिन गुणोंको स्वीकार करता है? उन गुणोंके अनुसार ही कर्मोंका रूप होता है। कर्ता जिस साधनको करता है? वह साधन कर्ताका रूप हो जाता है। कर्ताके आगे जो करण होते हैं? वे भी कर्ताके अनुरूप होते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसा कर्ता होता है? वैसे ही कर्म? करण आदि होते हैं। कर्ता सात्त्विक? राजस अथवा तामस होगा तो कर्म आदि भी सात्त्विक? राजस अथवा तामस होंगे।सात्त्विक कर्ता अपने कर्म? बुद्धि आदिको सात्त्विक बनाकर सात्त्विक सुखका अनुभव करते हुए असङ्गतापूर्वक परमात्मतत्त्वसे अभिन्न हो जाता है -- दुःखान्तं च निगच्छति (गीता 18। 36)। कारण कि सात्त्विक कर्ताका ध्येय परमात्मा होता है। इसलिये वह कर्तृत्वभोक्तृत्वसे रहित होकर चिन्मय तत्त्वसे अभिन्न हो जाता है क्योंकि वह तात्त्विक स्वरूपसे अभिन्न ही था। परन्तु राजसतामस कर्ता राजसतामस कर्म? बुद्धि आदिके साथ तन्मय होकर राजसतामस सुखमें लिप्त होता है। इसलिये वह परमात्मतत्त्वसे अभिन्न नहीं हो सकता। कारण कि राजसतामस कर्ताका उद्देश्य परमात्मा नहीं होता और उसमें जडताका बन्धन भी अधिक होता है।अब यहाँ शङ्का हो सकती है कि कर्ताका सात्त्विक होना तो ठीक है? पर कर्म सात्त्विक कैसे होते हैं इसका समाधान यह है कि जिस कर्मके साथ कर्ताका राग नहीं है? कर्तृत्वाभिमान नहीं है? लेप (फलेच्छा) नहीं है? वह कर्म सात्त्विक हो जाता है। ऐसे सात्त्विक कर्मसे अपना और दुनियाका बड़ा भला होता है। उस सात्त्विक कर्मका जिनजिन वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? वायुमण्डल आदिके साथ सम्बन्ध होता है? उन सबमें निर्मलता आ जाती है क्योंकि निर्मलता सत्त्वगुणका स्वभाव है -- तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् (गीता 14। 6)।दूसरी बात? पतञ्जलि महाराजने रजोगुणको क्रियात्मक ही माना है -- प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्। (योगदर्शन 2। 18)। परन्तु गीता रजोगुणको क्रियात्मक मानते हुए भी मुख्यरूपसे रागात्मक ही मानती है -- रजो रागात्मकं विद्धि (14। 7)। वास्तवमें देखा जाय तो राग ही बाँधनेवाला है? क्रिया नहीं।गीतामें कर्म तीन प्रकारके बताये गये हैं -- सात्त्विक? राजस और तामस (18। 23 -- 25)। कर्म करनेवालेका भाव सात्त्विक होगा तो वे कर्म सात्त्विक हो जायँगे? भाव राजस होगा तो वे कर्म राजस हो जायँगे और भाव तामस होगा तो वे कर्म तामस हो जायँगे। इसलिये भगवान्ने केवल क्रियाको रजोगुणी नहीं माना है। सम्बन्ध -- सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मोंके विचारमें बुद्धि और धृति -- इन कर्मसंग्राहक करणोंकी प्रधानता होनेसे अब आगे उनके भेद बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो कर्ता अयुक्त है -- जिसका चित्त समाहित नहीं है? जो बालकके समान प्राकृत -- अत्यन्त संस्कारहीन बुद्धिवाला है? जो स्तब्ध है -- दण्डकी भाँति किसीके सामने नहीं झुकता? जो शठ अर्थात् अपनी सामर्थ्यको गुप्त रखनेवाला कपटी है? जो नैष्कृतिक -- दूसरोंकी वृत्तिका छेदन करनेमें तत्पर और आलसी है -- जिसका कर्तव्यकार्यमें भी प्रवृत्त होनेका स्वभाव नहीं है? जो विषादी -- सदा शोकयुक्त स्वभाववाला और दीर्घसूत्री है -- कर्तव्यमें बहुत विलम्ब करनेवाला है अर्थात् आज या कल कर लेनेयोग्य कार्यको महीनेभरमें भी समाप्त नहीं कर पाता? जो ऐसा कर्ता है वह तामस कहा जाता है।

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Sri Anandgiri

दीर्घं सूत्रयितुं शीलमस्येति व्युत्पत्तिं गृहीत्वा विवक्षितमर्थमाह -- कर्तव्यानामिति। एवं क्रियमाणे सत्यनिष्टमिदं कथंचिदापद्येत यदा पुनरेवं क्रियते तदा त्वनिष्टमेव संभावनोपनीतमिति चिन्तापरंपरायां मन्थरप्रवृत्तिरित्यर्थः। तदेव स्पष्टयति -- यदद्येति।

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Sri Dhanpati

एवं राजसं कर्तारमुदाहृत्य तामसं तमाह -- अयुक्तो विषयेषु विक्षिप्तचित्तत्वादसमाहितः? प्राकृतोऽत्यन्तासंस्कृतबुद्धिर्बालिशः? स्तब्धः कस्मैचिद्दण्डवन्न नमति सर्वदाऽनम्रो मन्दस्वभावः? शठः शक्तिगूहनकारी मायावी? नैकृतिकः परवृत्तिच्छेदनपरः? अलसः कर्तव्येष्वप्रवृत्तिशीलः? विषादी सर्वदा खिन्नस्वभावः? दीर्धं सूत्रायुतुं शीलमस्येति दीर्घसूत्री कर्तव्यानां दीर्घप्रसारणस्वभावः एवं क्रियमाणे सत्यनिष्टमिदं कथंचिदापद्येत? यदा पुनरेवं क्रियते तदात्वनिष्टमेव संभावानोपनीतमित्येवं शङ्कासहस्त्रव्याप्तचित्तत्वेनातिमन्थरप्रवृत्तिशीलः यदद्य श्वो वा कर्तव्यं तन्मासेनापि न करोति एवंविधो यः कर्ता स तामस उच्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ayuktaḥundisciplined
prākṛitaḥvulgar
stabdhaḥobstinate
śhaṭhaḥcunning
naiṣhkṛitikaḥdishonest or vile
alasaḥslothful
viṣhādīunhappy and morose
dīrghasūtrī
chaand
kartāperformer
tāmasaḥin the mode of ignorance
uchyateis said to be
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Bhagavad Gita · 18.27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः

जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय

हे धनञ्जय ! अब तू गुणोंके अनुसार बुद्धि और धृतिके भी तीन प्रकारके भेद अलग-अलगरूपसे सुन, जो कि मेरे द्वारा पूर्णरूपसे कहे जा रहे हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 28
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते

जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 28 translates to: "Unsteady, vulgar, inflexible, deceitful, malicious, lazy, despondent, and procrastinating—such an agent is called Tamasic. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः।विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्य" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, ऐंठ-अकड़वाला, जिद्दी, उपकारीका अपकार करनेवाला, आलसी, विषादी और दीर्घसूत्री है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ" mean in English?

"ayuktaḥ prākṛitaḥ stabdhaḥ śhaṭho naiṣhkṛitiko ‘lasaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 28. Unsteady, vulgar, inflexible, deceitful, malicious, lazy, despondent, and procrastinating—such an agent is called Tamasic. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.