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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते

जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

பற்றுதல் இல்லாதவர், அகங்காரம் இல்லாதவர், உறுதியும் உற்சாகமும் கொண்டவர், வெற்றி தோல்வியால் பாதிக்கப்படாதவர், சாத்வீக (தூய்மையான) இயல்புடையவராகக் கருதப்படுகிறார்.

PunjabiIND

ਇੱਕ ਏਜੰਟ ਜੋ ਮੋਹ ਤੋਂ ਮੁਕਤ, ਅਹੰਕਾਰੀ, ਦ੍ਰਿੜਤਾ ਅਤੇ ਉਤਸ਼ਾਹ ਨਾਲ ਸੰਪੰਨ ਹੈ, ਅਤੇ ਸਫਲਤਾ ਜਾਂ ਅਸਫਲਤਾ ਤੋਂ ਪ੍ਰਭਾਵਿਤ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਇੱਕ ਸਾਤਵਿਕ (ਸ਼ੁੱਧ) ਸੁਭਾਅ ਵਾਲਾ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

જે એજન્ટ આસક્તિથી મુક્ત હોય, અહંકારી હોય, મક્કમતા અને ઉત્સાહથી સંપન્ન હોય અને સફળતા કે નિષ્ફળતાથી પ્રભાવિત ન હોય, તે સાત્વિક (શુદ્ધ) સ્વભાવનો ગણાય છે.

BhojpuriIND

जवन कारक आसक्ति से मुक्त, गैर अहंकारी, दृढ़ता आ उत्साह से संपन्न होखे आ सफलता भा असफलता से अप्रभावित होखे, ओकरा के सात्विक (शुद्ध) प्रकृति के मानल जाला।

ManipuriIND

ꯑꯦꯇꯦꯆꯃꯦꯟꯇꯇꯒꯤ ꯅꯥꯟꯊꯣꯀꯄꯥ, ꯅꯟ-ꯏꯒꯣꯏꯁ꯭ꯇꯤꯛ, ꯆꯦꯠꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯊꯋꯥꯏ ꯌꯥꯑꯣꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯥꯌ ꯄꯥꯀꯄꯥ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯃꯥꯌ ꯄꯥꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗꯕꯅꯥ ꯁꯣꯀꯍꯟꯗꯕꯥ ꯑꯦꯖꯦꯟꯇ ꯑꯃꯕꯨ ꯁꯥꯠꯠꯕꯤꯛ (ꯁꯨꯡꯕꯥ) ꯃꯑꯣꯡꯒꯤ ꯃꯤꯑꯣꯏꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯂꯧꯅꯩ꯫

MaithiliIND

जे कारक आसक्ति मुक्त, अहंकारी, दृढ़ता आ उत्साह सँ सम्पन्न हो, आ सफलता वा असफलता सँ अप्रभावित हो, ओकरा सात्विक (शुद्ध) प्रकृतिक मानल जाइत अछि |

DogriIND

जेह् ड़ा एजेंट लगाव थमां मुक्त, गैर-अहंकारी, दृढ़ता ते उत्साह कन्नै संपन्न, ते सफलता जां असफलता थमां अप्रभावित ऐ, उसी सात्विक (शुद्ध) प्रकृति दा मन्नेआ जंदा ऐ।

NepaliIND

आसक्तिरहित, अहंकाररहित, दृढता र उत्साहले सम्पन्न र सफलता वा असफलताबाट प्रभावित नहुने व्यक्तिलाई सात्विक (शुद्ध) स्वभावको मानिन्छ।

KannadaIND

ಬಾಂಧವ್ಯದಿಂದ ಮುಕ್ತನಾದ, ​​ಅಹಂಕಾರವಿಲ್ಲದ, ದೃಢತೆ ಮತ್ತು ಉತ್ಸಾಹದಿಂದ ಕೂಡಿದ ಮತ್ತು ಯಶಸ್ಸು ಅಥವಾ ವೈಫಲ್ಯದಿಂದ ಪ್ರಭಾವಿತನಾಗದ ಏಜೆಂಟ್ ಅನ್ನು ಸಾತ್ವಿಕ (ಶುದ್ಧ) ಸ್ವಭಾವ ಎಂದು ಪರಿಗಣಿಸಲಾಗುತ್ತದೆ.

OdiaIND

ଏକ ଏଜେଣ୍ଟ ଯିଏ ସଂଲଗ୍ନରୁ ମୁକ୍ତ, ଅହଂକାରୀ, ଦୃ firm ତା ଏବଂ ଉତ୍ସାହ ସହିତ ସମର୍ପିତ, ଏବଂ ସଫଳତା କିମ୍ବା ବିଫଳତା ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଭାବିତ ନୁହେଁ, ସେ ଏକ ସତ୍ୟଭିକ୍ (ଶୁଦ୍ଧ) ପ୍ରକୃତିର ବିବେଚନା କରାଯାଏ |

SindhiIND

اهڙو ايجنٽ جيڪو وابستگي کان آزاد هجي، غير انا پرست هجي، پختگي ۽ جوش سان نوازيو هجي ۽ ڪاميابي يا ناڪامي کان متاثر نه هجي، ساتوڪ (خالص) طبيعت جو سمجهي وڃي ٿو.

TeluguIND

అటాచ్మెంట్ లేని, అహంభావం లేని, దృఢత్వం మరియు ఉత్సాహంతో ఉండే ఏజెంట్ మరియు విజయం లేదా వైఫల్యం ప్రభావితం చేయని వ్యక్తి సాత్విక (స్వచ్ఛమైన) స్వభావం కలిగి ఉంటాడు.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- मुक्तसङ्गः -- जैसे सांख्ययोगीका कर्मोंके साथ राग नहीं होता? ऐसे सात्त्विक कर्ता भी रागरहित होता है।कामना? वासना? आसक्ति? स्पृहा? ममता आदिसे अपना सम्बन्ध जोड़नेके कारण ही वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? परिस्थिति? घटना आदिमें आसक्ति लिप्तता होती है। सात्त्विक कर्ता इस लिप्ततासे सर्वथा रहित होता है।अनहंवादी -- पदार्थ? वस्तु? परिस्थिति आदिको लेकर अपनेमें जो एक विशेषताका अनुभव करना है -- यह अहंवदनशीलता है। यह अहंवदनशीलता आसुरीसम्पत्ति होनेसे अत्यन्त निकृष्ट है। सात्त्विक कर्तामें यह अहंवदनशीलता? अभिमान तो रहता ही नहीं? प्रत्युत मैं इन चीजोंका त्यागी हूँ? मेरेमें यह अभिमान नहीं है? मैं निर्विकार हूँ? मैं सम हूँ? मैं सर्वथा निष्काम हूँ? मैं संसारके सम्बन्धसे रहित हूँ -- इस तरहके अहंभावका भी उसमें अभाव रहता है।धृत्युत्साहसमन्वितः -- कर्तव्यकर्म करते हुए विघ्नबाधाएँ आ जायँ? उस कर्मका परिणाम ठीक न निकले? लोगोंमें निन्दा हो जाय? तो भी विघ्नबाधा आदि न आनेपर जैसा धैर्य रहता है? वैसा ही धैर्य विघ्नबाधा आनेपर भी नित्यनिरन्तर बना रहे -- इसका नाम धृति है और सफलताहीसफलता मिलती चली जाय? उन्नति होती चली जाय? लोगोंमें मान? आदर? महिमा आदि बढ़ते चले जायँ -- ऐसी स्थितिमें मनुष्यके मनमें जैसी उम्मेदवारी? सफलताके प्रति उत्साह रहता है? वैसी ही उम्मेदवारी इससे विपरीत अर्थात् असफलता? अवनति? निन्दा आदि हो जानेपर भी बनी रहे -- इसका नाम उत्साह है। सात्त्विक कर्ता इस प्रकारकी धृति और उत्साहसे युक्त रहता है।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः -- सिद्धि और असिद्धिमें अपनेमें कुछ भी विकार न आये? अपनेपर कुछ भी असर न पड़े अर्थात् कार्य ठीक तरहसे साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाय अथवा पूरा उद्योग करते हुए अपनी शक्ति? समझ? समय? सामर्थ्य आदिको पूरा लगाते हुए भी कार्य पूरा न हो फल प्राप्त हो अथवा न हो? तो भी अपने अन्तःकरणमें प्रसन्नता और खिन्नता? हर्ष और शोकका न होना ही सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार रहना है।कर्ता सात्त्विक उच्यते -- ऐसा आसक्ति तथा अहंकारसे रहित? धैर्य तथा उत्साहसे युक्त और सिद्धिअसिद्धिमें निर्विकार कर्ता सात्त्विक कहा जाता है।इस श्लोकमें छः बातें बतायी गयी हैं -- सङ्ग? अहंवदनशीलता? धृति? उत्साह? सिद्धि और असिद्धि। इनमेंसे पहली दो बातोंसे रहित? बीचकी दो बातोंसे युक्त और अन्तकी दो बातोंमें निर्विकार रहनेके लिये कहा गया है। सम्बन्ध -- अब राजस कर्ताके लक्षण बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो कर्ता मुक्तसङ्ग है -- जिसने आसक्तिका त्याग कर दिया है? जो निरहंवादी है -- जिसका मैं कर्ता हूँ ऐसे कहनेका स्वभाव नहीं रह गया है? जो धृति और उत्साहसे युक्त है -- धृति यानी धारणाशक्ति,और उत्साह यानी उद्यम -- इन दोनोंसे जो युक्त है? तथा जो किये हुए कर्मके फलकी सिद्धि होने या न होनेमें निर्विकार है। जो ऐसा कर्ता है? वह सात्त्विक कहा जाता है। जो केवल शास्त्रप्रमाणसे ही कर्ममें प्रयुक्त होता है? फलेच्छा या आसक्ति आदिसे नहीं? वह निर्विकार कहा जाता है।

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Sri Anandgiri

इदानीं कर्तृत्रैविध्यं ब्रुवन्नादौ सात्त्विकं कर्तारं दर्शयति -- मुक्तेति। सङ्गो नाम फलाभिसन्धिर्बा कर्तृत्वाभिमानो वा? नाहंवदनशीलः कर्ताहमिति वदनशीलो न भवतीत्यर्थः। धारणं धैर्यम्। क्रियमाणस्य कर्मणो यदि फलानभिसन्धिस्तर्हि नानुष्ठानविश्रम्भः संभवेदित्याशङ्क्याह -- केवलमिति। फलरागादिनेत्यादिशब्देन कर्मरागो गृह्यते। अयुक्त इति च्छेदः।

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Sri Dhanpati

अधुना कर्तृत्रैविध्यं विभजन्नादौ सात्त्विकं कर्तारमाह -- मुक्तसङ्गो मुक्तः परित्यक्तः सङ्गः फलाभिसंधिर्येन सः अनहंवादी नाहंवदनशीलः कर्ताहमेतादृशगुणसंपन्नः सर्वोत्तम इति वदनशीलो न भवति। धृतिर्विघ्नाद्युपस्थानेऽपि कायादेर्धारणं धैर्यमिति यावत्। उत्साह उद्यमस्ताभ्यां सम्यगन्वितः कदापि कथमपि धृत्युत्साहरहितो न भवतीत्यर्थः। सिद्य्धसिद्य्धोः क्रियमाणस्य कर्मणः फलसिद्धौ सदसिद्धौ च निर्विकारः हर्षविषादशून्यः केवलं शास्त्रप्रमाणप्रयुक्तो न फलरागा दिना यः कर्ता स सात्त्विक उच्यते।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
muktasaṅgaḥ
anahamvādī
dhṛitistrong resolve
utsāhazeal
samanvitaḥendowed with
siddhiasiddhyoḥ
nirvikāraḥunaffected
kartāworker
sāttvikaḥin the mode of goodness
uchyateis said to be
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न देखकर मोहपूर्वक आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः

जो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते

जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 26 translates to: "An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is considered to be of a Sattvic (pure) nature. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्व" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ" mean in English?

"mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 26. An agent who is free from attachment, non-egoistic, endowed with firmness and enthusiasm, and unaffected by success or failure, is considered to be of a Sattvic (pure) nature. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.