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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

உண்மையில், ஒரு உடலமைப்பினால் செயல்களை முற்றிலுமாக கைவிடுவது சாத்தியமில்லை; இருப்பினும், செயல்களின் பலனைத் துறப்பவர் உண்மையிலேயே துறந்தவர் என்று அழைக்கப்படுகிறார்.

MalayalamIND

തീർച്ചയായും, ഒരു മൂർത്തീഭാവമുള്ള ഒരു വ്യക്തിക്ക് പ്രവർത്തനങ്ങളെ പൂർണ്ണമായും ഉപേക്ഷിക്കാൻ സാധ്യമല്ല; എന്നിരുന്നാലും, കർമ്മങ്ങളുടെ പ്രതിഫലം ഉപേക്ഷിക്കുന്നവനെ യഥാർത്ഥത്തിൽ പരിത്യാഗിയായ മനുഷ്യൻ എന്ന് വിളിക്കുന്നു.

KannadaIND

ವಾಸ್ತವವಾಗಿ, ಒಂದು ಸಾಕಾರ ಜೀವಿಯು ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಸಂಪೂರ್ಣವಾಗಿ ತ್ಯಜಿಸಲು ಸಾಧ್ಯವಿಲ್ಲ; ಆದಾಗ್ಯೂ, ಯಾರು ಕ್ರಿಯೆಗಳ ಪ್ರತಿಫಲವನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುತ್ತಾರೋ ಅವರನ್ನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ತ್ಯಜಿಸುವ ವ್ಯಕ್ತಿ ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

DogriIND

दरअसल, इक मूर्त प्राणी आस्तै कम्में गी पूरी चाल्ली त्यागना संभव नेईं ऐ; पर, जेह्ड़ा कम्में दे फल गी त्याग दिंदा ऐ, उसी सच्चें गै त्याग दा माह्नू आखेआ जंदा ऐ।

AssameseIND

সঁচাকৈয়ে মূৰ্ত সত্তাৰ বাবে কৰ্ম সম্পূৰ্ণৰূপে পৰিত্যাগ কৰাটো সম্ভৱ নহয়; কিন্তু যিজনে কৰ্মৰ পুৰস্কাৰ ত্যাগ কৰে তেওঁক সঁচাকৈয়ে ত্যাগী মানুহ বুলি কোৱা হয়।

KonkaniIND

खरेंच, मूर्त जीवाक कर्मां पुरायपणान सोडून दिवप शक्य ना; पूण कर्मांचे इनाम सोडून दिवपी मनशाक खऱ्या अर्थान त्याग करपी मनीस अशें म्हण्टात.

MaithiliIND

सचमुच, कोनो मूर्त जीवक लेल कर्म केँ पूर्णतः त्याग करब संभव नहि; तथापि जे कर्मक फल त्याग करैत अछि ओकरा सत्यतः त्यागक पुरुष कहल जाइत छैक |

PunjabiIND

ਅਸਲ ਵਿੱਚ, ਇੱਕ ਮੂਰਤ ਜੀਵ ਲਈ ਕਿਰਿਆਵਾਂ ਨੂੰ ਪੂਰੀ ਤਰ੍ਹਾਂ ਤਿਆਗਣਾ ਸੰਭਵ ਨਹੀਂ ਹੈ; ਹਾਲਾਂਕਿ, ਜੋ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਫਲ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਦਿੰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਸੱਚਮੁੱਚ ਤਿਆਗ ਵਾਲਾ ਪੁਰਸ਼ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

TeluguIND

నిజానికి, మూర్తీభవించిన జీవి చర్యలను పూర్తిగా విడిచిపెట్టడం సాధ్యం కాదు; ఏది ఏమైనప్పటికీ, క్రియల యొక్క ప్రతిఫలాన్ని వదులుకునే వ్యక్తిని నిజంగా త్యజించిన వ్యక్తి అని పిలుస్తారు.

GujaratiIND

ખરેખર, મૂર્ત અસ્તિત્વ માટે ક્રિયાઓનો સંપૂર્ણ ત્યાગ કરવો શક્ય નથી; જો કે, જે કર્મોના ફળનો ત્યાગ કરે છે તે સાચા અર્થમાં ત્યાગનો માણસ કહેવાય છે.

NepaliIND

वास्तवमा, मूर्त प्राणीले कर्मलाई पूर्ण रूपमा त्याग्नु सम्भव छैन; तर, जसले कर्मको फल त्याग्छ, उसलाई साँच्चै त्यागी भनिन्छ।

SindhiIND

حقيقت ۾، اهو ممڪن ناهي ته هڪ مجسم وجود لاء مڪمل طور تي عمل کي ڇڏي ڏيو؛ تنهن هوندي به، جيڪو عملن جي جزا کي ڇڏي ڏئي ٿو، ان کي حقيقت ۾ هڪ انسان سڏيو ويندو آهي.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः -- देहधारी अर्थात् देहके साथ तादात्म्य रखनेवाले मनुष्योंके द्वारा कर्मोंका सर्वथा त्याग होना सम्भव नहीं है क्योंकि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति स्वतः क्रियाशील है। अतः शरीरके साथ तादात्म्य (एकता) रखनेवाला क्रियासे रहित कैसे हो सकता है हाँ? यह हो सकता है कि मनुष्य यज्ञ? दान? तप? तीर्थ आदि कर्मोंको छोड़ दे परन्तु वह खानापीना? चलनाफिरना? आनाजाना? उठनाबैठना? सोनाजागना आदि आवश्यक शारीरिक क्रियाओंको कैसे छोड़ सकता हैदूसरी बात? भीतरसे कर्मोंका सम्बन्ध छोड़ना ही वास्तवमें छोड़ना है। बाहरसे सम्बन्ध नहीं छोड़ा जा सकता। यदि बाहरसे सम्बन्ध छोड़ भी दिया जाय तो वह कबतक छूटा रहेगा जैसे कोई समाधि लगा ले तो उस समय बाहरकी क्रियाओंका सम्बन्ध छूट जाता है। परन्तु समाधि भी एक क्रिया है? एक कर्म है क्योंकि इसमें प्रकृतिजन्य कारणशरीरका सम्बन्ध रहता है। इसलिये समाधिसे भी व्युत्थान होता है।कोई भी देहधारी मनुष्य कर्मोंका स्वरूपसे सम्बन्धविच्छेद नहीं कर सकता (गीता 3। 5)। कर्मोंका आरम्भ किये बिना? निष्कर्मता (योगनिष्ठा) प्राप्त नहीं होती और कर्मोंका त्याग करनेमात्रसे सिद्धि (सांख्यनिष्ठा) भी प्राप्त नहीं होती (गीता 3। 4)।मार्मिक बातपुरुष (चेतन) सदा निर्विकार और एकरस रहनेवाला है परन्तु प्रकृति विकारी और सदा परिवर्तनशील है। जिसमें अच्छी रीतिसे क्रियाशीलता हो? उसको प्रकृति कहते हैं -- प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः।उस प्रकृतिके कार्य शरीरके साथ जबतक पुरुष अपना सम्बन्ध (तादात्म्य) मानता रहेगा? तबतक वह कर्मोंका सर्वथा त्याग कर ही नहीं सकता। कारण कि शरीरमें अहंताममता होनेके कारण मनुष्य शरीरसे होनेवाली प्रत्येक क्रियाको अपनी क्रिया मानता है? इसलिये वह कभी किसी अवस्थामें भी क्रियारहित नहीं हो सकता।दूसरी बात? केवल पुरुषने ही प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ा है। प्रकृतिने पुरुषके साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा है। जहाँ विवेक रहता है? वहाँ पुरुषने विवेककी उपेक्षा करके प्रकृतिसे सम्बन्धकी सद्भावना कर ली अर्थात् सम्बन्धको सत्य मान लिया। सम्बन्धको सत्य माननेसे ही बन्धन हुआ है। वह सम्बन्ध दो तरहका होता है -- अपनेको शरीर मानना और शरीरको अपना मानना। अपनेको शरीर माननेसे अहंता और शरीरको अपना माननेसे ममता होती है। इस अहंताममतारूप सम्बन्धका घनिष्ठ होना ही देहधारीका स्वरूप है। ऐसा देहधारी मनुष्य कर्मोंको सर्वथा नहीं छोड़ सकता।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते -- जो किसी भी कर्म और फलके साथ अपना सम्बन्ध नहीं रखता? वही त्यागी है। जबतक मनुष्य कुशलअकुशलके साथ? अच्छेमन्देके साथ अपना सम्बन्ध रखता है? तबतक वह त्यागी नहीं है।यह पुरुष जिस प्राकृत क्रिया और पदार्थको अपना मानता है? उसमें उसकी प्रियता हो जाती है। उसी,प्रियताका नाम है -- आसक्ति। यह आसक्ति ही वर्तमानके कर्मोंको लेकर कर्मासक्ति और भविष्यमें मिलनेवाले फलकी इच्छाको लेकर फलासक्ति कहलाती है। जब मनुष्य फलत्यागका उद्देश्य बना लेता है? तब उसके सब कर्म संसारके हितके लिये होने लगते हैं? अपने लिये नहीं। कारण कि उसको यह बात अच्छी तरहसे समझमें आ जाती है कि कर्म करनेकी सबकीसब सामग्री संसारसे मिली है और संसारकी ही है? अपनी नहीं। इन कर्मोंका भी आदि और अन्त होता है तथा उनका फल भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है परन्तु स्वयं सदा निर्विकार रहता है न उत्पन्न होता है? न नष्ट होता है और न कभी विकृत ही होता है। ऐसा विवेक होनेपर फलेच्छाका त्याग सुगमतासे हो जाता है। फलका त्याग करनेमें उस विवेककी मनुष्यमें कभी अभिमान भी नहीं आता क्योंकि कर्म और उसका फल -- दोनों ही अपनेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रहे हैं अतः उनके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तवमें है ही कहाँ इसीलिये भगवान् कहते हैं कि जो कर्मफलका त्यागी है? वही त्यागी कहा जाता है।निर्विकारका विकारी कर्मफलके साथ सम्बन्ध कभी था नहीं? है नहीं? हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं है। केवल अविवेकके कारण सम्बन्ध माना हुआ था। उस अविवेकके मिटनेसे मनुष्यकी अभिधा अर्थात् उसका नाम त्यागी हो जाता है -- स त्यागीत्यभिधीयते। माने हुए सम्बन्धके विषयमें दृष्टान्तरूपसे एक बात कही जाती है। एक व्यक्ति घरपरिवारको छोड़कर सच्चे हृदयसे साधुसंन्यासी हो जाता है तो उसके बाद घरवालोंकी कितनी ही उन्नति अथवा अवनति हो जाय अथवा सबकेसब मर जायँ? उनका नामोनिशान भी न रहे? तो भी उसपर कोई असर नहीं पड़ता। इसमें विचार करें कि उस व्यक्तिका परिवारके साथ जो सम्बन्ध था? वह दोनों तरफसे माना हुआ था अर्थात् वह परिवारको अपना मानता था और परिवार उसको अपना मानता था। परन्तु पुरुष और प्रकृतिका सम्बन्ध केवल पुरुषकी तरफसे माना हुआ है? प्रकृतिकी तरफसे माना हुआ नहीं जब दोनों तरफसे माना हुआ (व्यक्ति और परिवारका) सम्बन्ध भी एक तरफसे छोड़नेपर छूट जाता है? तब केवल एक तरफसे माना हुआ (पुरुष और प्रकृतिका) सम्बन्ध छोड़नेपर छूट जाय? इसमें कहना ही क्या है सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि कर्मफलका त्याग करनेवाला ही वास्तवमें त्यागी है। अगर मनुष्य कर्मफलका त्याग न करे तो क्या होता है -- इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

परंतु जो पुरुष कर्माधिकारी है और शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला होनेके कारण देहधारी अज्ञानी है? आत्मविषयक कर्तृत्वज्ञान नष्ट न होनेके कारण जो मैं करता हूँ ऐसी निश्चित बुद्धिवाला है उससे कर्मका अशेष त्याग होना असम्भव होनेके कारण? उसका कर्मफलत्यागके सहित विहित कर्मोंके अनुष्ठानमें ही अधिकार है? उनके त्यागमें नहीं। यह अभिप्राय दिखलानेके लिये कहते हैं --, देहधारीदेहको धारण करे सो देहधारी? इस व्युत्पत्तिके अनुसार शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला देहभृत् कहा जाता है? विवेकी नहीं। क्योंकि वेदाविनाशिनम् इत्यादि श्लोकोंसे वह ( विवेकी ) कर्तापनके अधिकारसे अलग कर दिया गया है। अतः ( यह अभिप्राय समझना चाहिये कि ) जिस कारण उस देहधारीअज्ञानीसे समस्त कर्मोंका पूर्णतया त्याग किया जाना सम्भव नहीं है? इसलिये जो तत्त्वज्ञानरहित अधिकारी? नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ उन कर्मोंके फलका त्यागी है? अर्थात् कर्मफलकी वासनामात्रको छोड़नेवाला है? वह कर्म करनेवाला होनेपर भी स्तुतिके अभिप्रायसे त्यागी कहा जाता है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि देहात्माभिमानसे रहित परमार्थज्ञानीके द्वारा ही निःशेषभावसे कर्मसंन्यास किया जा सकता है।

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Sri Anandgiri

आत्मज्ञानवतः सर्वकर्मत्यागसंभावनामुक्त्वा तद्धीनस्य तदसंभवे हेतुवचनत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति -- यः पुनरिति। न बाधितमात्मनि कर्तृत्वविज्ञानमस्येत्यज्ञस्तथा तस्य भावस्तत्ता तयेति यावत्? एतमर्थं दर्शयितुमज्ञस्य सर्वकर्मसंन्यासासंभवे हेतुमाहेति योजना। यस्मादित्यस्य तस्मादित्युत्तरेण संबन्धः। विवेकिनोऽपि देहधारितया देहभृत्त्वाविशेषे कर्माधिकारः स्यादित्याशङ्क्याह -- नहीति। कर्तृत्वाधिकारस्तत्पूर्वकं कर्मानुष्ठानं तस्मादिति यावत्। ज्ञानवतो देहधारणेऽपि तदभिमानित्वाभावोऽतःशब्दार्थः। अज्ञस्य सर्वकर्मत्यागायोगमुक्तं हेतूकृत्य फलितमाह -- तस्मादिति। कर्मानुष्ठायिनस्त्यागित्वोक्तिरयुक्तेत्याशङ्क्याह -- कर्म्यपीति। कर्मिणापि फलत्यागेन त्यागित्ववचनं फलत्यागस्तुत्यर्थमित्यर्थः। कस्य तर्हि सर्वकर्मत्यागः संभवतीत्याशङ्क्य विवेकवैराग्यादिमतो देहाभिमानहीनस्येत्युक्तं निगमयति -- तस्मादिति।

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Sri Dhanpati

तदेवं सात्त्विकत्यागवतः शुद्धिचित्तस्य सर्वकर्मत्यागे मुख्यसंन्यासेऽधिकारं प्रदर्श्याधिकृतस्य देहाभिमानित्वेन देहभृतोऽज्ञस्याबाधितात्मकर्तृत्वविज्ञानतयाहंकर्तेति निश्चितबुद्धेरशेषकर्मपरित्यागस्याशक्यत्वात्? कर्मफलत्यागेन विहितकर्मानुष्ठान देहभृतोऽज्ञस्याबाधितात्मकर्तृत्वविज्ञानतयाहंकर्तेति निश्चितबुद्धेरशेषकर्मपरित्यागस्याशक्यत्वात्? कर्मफलत्यागेन विहितकर्मानुष्ठान एवाधिकारो न त्याग इत्येमर्थं दर्शयितुमाह -- नहीति। हि यस्माद्देहभृता देहं स्वात्मत्वेन विभर्ति धारयतीति देहभृत् देहाभिमानवान् देनाज्ञेनाशेषतः निःशेषेण सर्वाणि कर्माणि त्यक्तुं संन्यसितुं न शक्यते। तस्माद्यस्तवज्ञो देहभृदधिकृतो विहितानि कर्माणि कुर्वन् तत्फलत्यागी कर्मफलाभिसंधिमात्रसंन्यासी स त्यागीत्यभिधीयते। कर्म्यपि सन् त्यागीति स्तुत्यभिप्रायेणोक्तम्। तथाच परमार्थदर्शिना देहाभिमानशून्येनाशेषकर्मसंन्यासः शक्यते कर्तुमिति भावः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
nanot
hiindeed
dehabhṛitā
śhakyampossible
tyaktumto give up
karmāṇiactivities
aśheṣhataḥentirely
yaḥwho
tubut
karmaphala
tyāgīone who renounces all desires for enjoying the fruits of actions
saḥthey
tyāgīone who renounces all desires for enjoying the fruits of actions
itias
abhidhīyateare said
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.12
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्

कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंको कर्मोंका इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित -- ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके बाद भी होता है; परन्तु कर्मफलका त्याग करनेवालोंको कहीं भी नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 11
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 11 का हिंदी अर्थ: "कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 11?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 11 translates to: "Indeed, it is not possible for an embodied being to completely abandon actions; however, he who relinquishes the rewards of actions is truly called a man of renunciation. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 11 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥ" mean in English?

"na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 11. Indeed, it is not possible for an embodied being to completely abandon actions; however, he who relinquishes the rewards of actions is truly called a man of renunciation. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.