Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TamilIND

துறவு மனிதன், தூய்மை, புத்திசாலி, மற்றும் அவரது சந்தேகங்களைத் துண்டித்து, விரும்பத்தகாத பணியை வெறுக்க மாட்டான் அல்லது இனிமையான ஒன்றில் இணைக்கப்படுவதில்லை.

GujaratiIND

ત્યાગનો માણસ, શુદ્ધતાથી વ્યાપ્ત, બુદ્ધિશાળી, અને તેની શંકાઓને કાપી નાખે છે, તે અપ્રિય કાર્યને ધિક્કારતો નથી અને તે સુખદ કાર્ય સાથે જોડાયેલ નથી.

BengaliIND

ত্যাগী ব্যক্তি, পবিত্রতা দ্বারা পরিব্যাপ্ত, বুদ্ধিমান, এবং তার সন্দেহগুলিকে ছিন্ন করে, একটি অপ্রীতিকর কাজকে ঘৃণা করে না এবং সে একটি সুখকর কাজের সাথে সংযুক্ত থাকে না।

KannadaIND

ಪರಿತ್ಯಾಗದ ಮನುಷ್ಯ, ಪರಿಶುದ್ಧತೆಯಿಂದ ವ್ಯಾಪಿಸಿರುವ, ಬುದ್ಧಿವಂತ, ಮತ್ತು ಅವನ ಅನುಮಾನಗಳನ್ನು ಕಡಿದುಹಾಕಿ, ಅಹಿತಕರ ಕೆಲಸವನ್ನು ದ್ವೇಷಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಆಹ್ಲಾದಕರವಾದದಕ್ಕೆ ಲಗತ್ತಿಸುವುದಿಲ್ಲ.

TeluguIND

పరిత్యాగముగల వ్యక్తి, స్వచ్ఛతతో వ్యాపించి, తెలివిగలవాడు, మరియు అతని సందేహాలను విడదీయడంతో, అతను అసహ్యకరమైన పనిని ద్వేషించడు లేదా అతను ఆహ్లాదకరమైన పనితో జతచేయడు.

PunjabiIND

ਤਿਆਗ ਦਾ ਮਨੁੱਖ, ਪਵਿੱਤਰਤਾ ਦੁਆਰਾ ਵਿਆਪਕ, ਬੁੱਧੀਮਾਨ, ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਸੰਦੇਹ ਨੂੰ ਕੱਟ ਕੇ, ਕਿਸੇ ਅਣਸੁਖਾਵੇਂ ਕੰਮ ਨਾਲ ਨਫ਼ਰਤ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਉਹ ਕਿਸੇ ਚੰਗੇ ਕੰਮ ਨਾਲ ਜੁੜਿਆ ਹੁੰਦਾ ਹੈ।

MarathiIND

संन्यासाचा मनुष्य, शुद्धतेने व्यापलेला, बुद्धिमान आणि त्याच्या शंकांना तोडून टाकणारा, एखाद्या अप्रिय कार्याचा तिरस्कार करत नाही किंवा तो एखाद्या आनंददायी कार्याशी संलग्न होत नाही.

MalayalamIND

പരിശുദ്ധിയും, ബുദ്ധിമാനും, സംശയങ്ങൾ ഛേദിക്കപ്പെട്ടവനും, ത്യജിക്കുന്ന മനുഷ്യൻ, അസുഖകരമായ ഒരു ജോലിയെ വെറുക്കുകയോ സുഖകരമായ ഒരു കാര്യത്തോട് അടുപ്പിക്കുകയോ ചെയ്യുന്നില്ല.

SindhiIND

نيڪيءَ جو انسان، پاڪدامن، عقلمند ۽ شڪ کان جدا ٿي، ڪنهن اڻ وڻندڙ ​​ڪم کان نفرت نه ڪندو آهي ۽ نه ئي ڪنهن خوشگوار ڪم سان جڙيل هوندو آهي.

NepaliIND

पवित्रताले व्याप्त, बुद्धिमान र आफ्नो शंकालाई छुट्याएर संन्यास गर्ने पुरुषले अप्रिय कामलाई घृणा गर्दैन र कुनै सुखद कार्यमा संलग्न हुँदैन।

AssameseIND

বিশুদ্ধতাৰে ব্যাপক, বুদ্ধিমান আৰু নিজৰ সন্দেহবোৰ বিভাজিত কৰা ত্যাগী মানুহজনে কোনো অপ্ৰীতিকৰ কামক ঘৃণা নকৰে আৰু সুখকৰ কামৰ লগতো তেওঁ আকৃষ্ট নহয়।

ManipuriIND

ꯁꯨꯃꯍꯠꯄꯥ, ꯂꯧꯁꯤꯡ ꯂꯩꯕꯥ, ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯍꯥꯛꯀꯤ ꯑꯀꯤꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯆꯦꯟꯊꯔꯀꯄꯥ ꯊꯥꯖꯕꯥ ꯌꯥꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯇꯕꯥ ꯊꯕꯛ ꯑꯃꯕꯨ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯂꯥꯡꯇꯛꯅꯗꯦ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯅꯨꯡꯉꯥꯏꯕꯥ ꯊꯕꯛ ꯑꯃꯗꯥ ꯌꯥꯑꯣꯗꯦ꯫

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म -- जो शास्त्रविहित शुभकर्म फलकी कामनासे किये जाते हैं और परिणाममें जिनसे पुनर्जन्म होता है (गीता 2। 42 -- 44 9। 20 -- 21) तथा जो शास्त्रनिषिद्ध पापकर्म हैं और परिणाममें जिनसे नीच योनियों तथा नरकोंमें जाना पड़ता है (गीता 16। 7 -- 20)? वे सबकेसब कर्म अकुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे अकुशल कर्मोंका त्याग तो करता है? पर द्वेषपूर्वक नहीं। कारण कि द्वेषपूर्वक त्याग करनेसे कर्मोंसे तो सम्बन्ध छूट जाता है? पर द्वेषके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है? जो शास्त्रविहित काम्यकर्मोंसे तथा शास्त्रनिषिद्ध पापकर्मोंसे भी भयंकर है।कुशले नानुषज्जते -- शास्त्रविहित कर्मोंमें भी जो वर्ण? आश्रम? परिस्थिति आदिके अनुसार नियत हैं और जो आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके किये जाते हैं तथा परिणाममें जिनसे मुक्ति होती है? ऐसे सभी कर्म कुशल कहलाते हैं। साधक ऐसे कुशल कर्मोंको करते हुए भी उनमें आसक्त नहीं होता।त्यागी -- कुशल कर्मोंके करनेमें जिसका राग नहीं होता और अकुशल कर्मोंके त्यागमें जिसका द्वेष नहीं होता? वही असली त्यागी है । परन्तु वह त्याग पूर्णतया तब सिद्ध होता है? जब कर्मोंको करने अथवा न करनेसे अपनेमें कोई फरक न पड़े अर्थात् निरन्तर निर्लिप्तता बनी रहे (गीता 3। 18 4। 18)। ऐसा होनेपर साधक योगारूढ़ हो जाता है (गीता 6। 4)।मेधावी -- जिसके सम्पूर्ण कार्य साङ्गोपाङ्ग होते हैं और संकल्प तथा कामनासे रहित होते हैं तथा ज्ञानरूप अग्निसे जिसने सम्पूर्ण कर्मोंको भस्म कर दिया है? उसे पण्डित भी पण्डित (मेधावी अथवा बुद्धिमान्) कहते हैं (गीता 4। 19)। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे लिपायमान न होना बड़ी बुद्धिमत्ता है।इसी मेधावीको चौथे अध्यायके अठारहवें श्लोकमें स बुद्धिमान्मनुष्येषु पदोंसे सम्पूर्ण मनुष्योंमें बुद्धिमान् बताया गया है।छिन्नसंशयः -- उस त्यागी पुरुषमें कोई सन्देह नहीं रहता। तत्त्वमें अभिन्नभावसे स्थित रहनेके कारण उसमें किसी तरहका संदेह रहनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। सन्देह तो वहीं रहता है? जहाँ अधूरा ज्ञान होता है अर्थात् कुछ जानते हैं और कुछ नहीं जानते।सत्त्वसमाविष्टः -- आसक्ति आदिका त्याग होनेसे उसकी अपने स्वरूपमें? चिन्मयतामें स्वतः स्थिति हो जाती है। इसलिये उसे सत्त्वसमाविष्टः कहा गया है। इसीको पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें तस्माद्ब्रह्मणि ते,स्थिताः पदोंसे परमात्मामें स्थित बताया गया है। सम्बन्ध -- कर्मोंको करनेमें राग न हो और छोड़नेमें द्वेष न हो -- इतनी झंझट क्यों की जाय कर्मोंका सर्वथा ही त्याग क्यों न कर दिया जाय -- इस शङ्काको दूर करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

विशुद्ध और प्रसन्न अन्तःकरण ही आध्यात्मिक विषयकी आलोचनामें समर्थ होता है। अतः इस प्रकार नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हो गया है एवं जो आत्मज्ञानके अभिमुख है? उसकी उस आत्मज्ञानमें जिस प्रकार क्रमसे स्थिति होती है? वह कहनी है? इसलिये कहते हैं --, अकुशल -- काम्यकर्मोंसे ( वह ) द्वेष नहीं करता अर्थात् काम्यकर्म पुनर्जन्म देनेवाले होनेके कारण संसारके कारण हैं? इनसे मुझे क्या प्रयोजन है? इस प्रकार उससे द्वेष नहीं करता। कुशलशुभनित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता। अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि? ज्ञानकी उत्पत्ति और उसमें स्थितिके हेतु होनेसे नित्यकर्म मोक्षके कारण हैं? इस प्रकार उनमें आसक्त नहीं होता। यानी उनमें भी अपना कोई प्रयोजन न देखकर प्रीति नहीं करता। वह कौन है त्यागी? जो कि पूर्वोक्त आसक्ति और फलके त्यागसे सम्पन्न है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति और उनका फल छोड़कर नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला है? ऐसा त्यागी। ऐसा पुरुष किस अवस्थामें? काम्यकर्मोंसे द्वेष नहीं करता और नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता सो कहते हैं -- जब कि वह सात्त्विक भावसे युक्त होता है। अर्थात् आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानके हेतुस्वरूप सत्त्वगुणसे भरपूर -- भली प्रकार व्याप्त होता है। इसीलिये वह मेधावी है अर्थात् आत्मज्ञानरूप बुद्धिसे युक्त है। मेधावी होनेके कारण ही छिन्नसंशय है -- अविद्याजनित संशयसे रहित है। अर्थात् आत्मस्वरूपमें स्थित हो जाना ही परम कल्याणका साधन है? और कुछ नहीं? इस निश्चयके कारण संशयरहित हो चुका है। जो अधिकारी पुरुष? पूर्वोंक्त प्रकारसे कर्मयोगके अनुष्ठानद्वारा क्रमसे विशुद्धान्तःकरण होकर? जन्मादि विकारोंसे रहित और क्रियारहित आत्माको भली प्रकार अपना स्वरूप समझ गया है? वह समस्त कर्मोंको मनसे त्यागकर न कुछ करता और न कराता हुआ रहनेवाला ( आत्मज्ञानी ) निष्कर्मतारूप ज्ञाननिष्ठाको भोगता है। इस प्रकार इस श्लोकद्वारा यह पूर्वोक्त कर्मयोगका फल बतलाया गया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

एवं पूर्वापरविरोधं पराकृत्यानन्तरश्लोकतात्पर्यमाह -- यस्त्विति। फलरागादिनेत्यादिशब्देन कर्मस्वरूपासङ्गो गृह्यते अन्तःकरणमकलुषीक्रियमाणमिति च्छेदः। विशुद्धेऽन्तःकरणे किं स्यादित्याशङ्क्याह -- विशुद्धमिति। मलविकलत्वं विशुद्धत्वं? संस्क्रियमाणत्वं प्रसन्नत्वमिति भेदः। क्रमेण श्रवणाद्यावृत्तिद्वारेणेत्यर्थः। तन्निष्ठेत्यात्मज्ञाननिष्ठोक्ता। काम्यकर्मणि त्याज्यत्वेन द्वेषमभिनयति -- किमिति। उभयत्र द्वेषं प्रीतिं च न करोतीति सामान्येनोक्तं कर्तारं प्रश्नपूर्वकं विशेषतो निर्दिशति -- कः पुनरिति। त्यागीत्युक्तं त्यागिनमभिव्यनक्ति -- पूर्वोक्तेनेति। कर्मणि सङ्गस्य तत्फलस्य च त्यागेनेति यावत्। उक्तमेव त्यागिनं विवृणोति -- यः कर्मणीति। तत्फलं त्यक्त्वेति संबन्धः। काम्ये निषिद्धे च कर्मणि बन्धहेतुरिति न द्वेष्टि नित्ये नैमित्तिके च मोक्षहेतुरिति न प्रीयते। तत्र कालविशेषं पृच्छति -- कदेति। नित्यादिकर्मणा फलाभिसन्धिवर्जितेन क्षपितकल्मषस्य सत्त्वं यथार्थग्रहणसामर्थ्यमुद्बुध्यते तेन समावेशदशायामुक्तप्रीतिद्वेषयोरभावो भवतीत्याह -- उच्यत इति। अतएवेति समुद्बुद्धयथार्थग्रहणसमर्थसमाविष्टत्वादित्यर्थः। छिन्नसंशयत्वमेव विशदयति -- आत्मेति। परं निःश्रेयसं तस्य च साधनं सम्यग्ज्ञानमेवेति योजना। न द्वेष्टीत्यादिना श्लोकेनोक्तमर्थं संक्षिप्यानुवदति -- योऽधिकृत इति। पूर्वोक्तप्रकारेणेति कर्मणि तत्फले च सङ्गत्यागेनेत्यर्थः। कर्मात्मयोगस्यानुष्ठानेन संस्कृतात्मा सन् क्रमेण श्रवणाद्यनुष्ठानद्वारेण कूटस्थं ब्रह्म प्रत्यक्त्वेन संबुद्ध इति संबन्धः। परस्य निष्क्रियत्वे हेतुमाह -- जन्मादीति। उक्तज्ञानवतः सर्वकर्मत्यागद्वारा मुक्तिभाक्त्वं दर्शयति -- स सर्वेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

एवं सात्त्विकं त्यागमुक्त्वा योऽधिकृतः सङ्गं फलाभिसन्धिं च त्यक्त्वा कर्म करोति तादृशकर्मानुष्ठानेन संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियमात्मानमात्मत्वेन संबुद्धः सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नासीनो नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञाननिष्ठां प्राप्नोतीत्येतत्पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनमाह -- न द्वेष्टीति। यस्त्यागी पूर्वोक्तसङ्गफलत्यागवान् नित्यकर्मानुष्ठायी यदा सत्त्वसमाविष्टः सङगं फलाभिसंधिं च त्यक्त्वा कर्मानुष्ठानतः सङ्गफलाभ्यामकलुषीक्रियमाणं नित्यैश्च कर्मभिः संस्िक्रयमाणं विशुद्धं समुद्धुद्धसत्त्वमात्मानात्मविवेकविज्ञानत्वन्तःकरणं सत्त्वमत्र ग्राह्यं तेन समाविष्टः संव्याप्तः संयुक्त इति यावत्। अतएव मेधावी ब्रह्मात्मज्ञानलक्षणा प्रज्ञा मेधा तद्वान् मेधावी। मेदावित्यावेद ब्रह्मात्मस्वरुपावस्थानमेव परं निःश्रेयससाधनं नान्यत्किंचिदित्येव निश्चयेन छिन्नोऽविद्याकृतः संशयो यस्य स छिन्नसंशयःतमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति श्रुतेः। स तदा अकुशलमशोभनं काम्यं निषिद्धं च कर्म न द्वेष्टि। काम्यादिकर्मशरीरारम्भादिद्वारेण संसारकारणमतः किमनेनेत्येवं द्वेषं न करोति। कुशले चित्तशुद्य्धादिद्वारा मोक्षहेतुत्वाच्छोभने नित्ये कर्मणि नावुषज्जते। सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तितन्निष्ठाहेतुत्वेन मोक्षकारणमतोऽनेन मदीयं प्रयोजनं सेत्स्यतीत्यनुषङ्गमासक्तिं प्रीतिं न करोतीत्यर्थः। एवंभूतसात्त्विकपरित्यागनिष्ठस्य लक्षणमाह -- सत्त्वसमाविष्टः सात्त्विकत्यागी अकुशलं दुःखावहं शिशिरे प्रातःस्नादिकर्म न द्वेष्टि? कुशले च सुखकरे कर्मणि निदाघे मध्याह्नस्त्रानादौ नानुषज्जते प्रीतिं न करोति। तत्र हेतुः -- मेधावी स्थिरबुद्धिः। यत्र परपरिभवादिमहद्दुःखमपि सह्यते स्वर्गादिसुखं च त्यज्यते तत्र कियदेतत्तात्कालिकं सुखं दुःखं चैवमनुसंधानवानित्यर्थः। अतएव छिन्नः संशयो मिथ्या ज्ञानं दैहिकसुखदुःखयोरुपादित्सापरिजिहीर्षालक्षणं यस्य स इत्यपरे। इतरे तु सतु त्यागी सात्त्विकत्यागकर्ता। तुशब्दस्तामसराजसत्यागकर्ततो विशेषद्योतकः। अकुशलमविवेकिनं मोक्षकथानभिज्ञं देहाभिमानिनम्। अतएवान्तःकरणशुद्धिप्रयोजनककर्माचरणासहिष्णुं किमर्थं वा एतत्कर्माचरसि किंवा पुत्रदारादिनिर्वाहकृत्कर्म त्यजसीत्येवमीदिजल्पन्तं न द्वेष्टि धिक् त्वां परतो गच्छेत्येवमादिचेष्टाभावद्वेषं न करोतीत्यर्थः। तथा कर्मकुशले नित्यनैमित्तिककर्माचरणकुशले तन्मात्रसङ्गत्फलत्यागवति स्वसमाने नानुषज्जतेददाति प्रतिगृणाति गुह्यमाख्याति पृच्छति। भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् इत्युक्तमनुषह्गं न करोति। ननु तस्योभयविधलिङ्गदर्शनात्संशय एव किं न स्यादित्य उक्तं छिन्नसंशयः संशयरहितः। तत्रैव हेतुमाह -- मेधावीति। स्वीकरणानिश्चयधारणावान्। कुतोयं निश्चयस्तस्येत्यत उक्तं असमाविष्ट इति। असमे क्षयिफलान्तरासदृशो निरतिशयानन्दरुपे फले आविष्टो लिप्सावान् अत ईदृग्लक्षणो व्याप्तत्यागी मुख्यः सात्त्विकत्यागी संन्यासीत्यर्थः। एवममुख्यं सात्त्विकं त्यागमुक्त्वा मुख्यं तमाह -- न द्वेष्टि सत्त्वेन सभ्यगाविष्टो व्याप्तस्त्यागी मुख्यः सात्त्विकत्यागी संन्यासीत्यर्थः। अकुशलमसुखप्रदं कर्म त्रिषवणस्त्राननचतुर्गुणशौचभिक्षाटनादिप्रासरुपं न द्वेष्टि। कुशले मिष्टान्नभक्षणादौ नानुज्जते प्रीति न करोति। यद्वा कर्मकुशले सेवादिकर्मकुशले शिष्यादौ नानुषज्जते तत्राकुशलं वा तं न द्वेष्टि। एतेन रागद्वेषशून्यत्वमस्य दर्शितम्? तदपि कुत इत्यपेक्षायामाह -- मेधावीति। ऊहापोहकुशलतया नित्यानित्यवस्तुविवेचनादौ प्रज्ञावान्। अनेन मोहात्तस्य परित्याग इत्युक्तात्तासात्त्यागद्य्वावृत्तिः। मेधावित्वादेव छिन्नसंशयः किं कर्माण्येव मुक्तिसाधनानि उत संन्यास एवेति संशयरहितः। अनेन कार्यमित्येवेत्युक्तादमुख्यसात्त्विकत्यागाद्य्वावृत्तिरेव। त्यागीत्यनेन यज्ञो दानमित्युक्तात्यागात्पूर्वार्धेन कायेत्युक्ताद्राजसात्तयागाद्य्ववृत्तिरित्यन्ये। आचार्योक्तव्याख्यानापेक्षयोदाहृतव्याख्यानत्रयेऽप्यधिकं स्वारस्यं चिन्त्यम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
naneither
dveṣhṭihate
akuśhalamdisagreeable
karmawork
kuśhaleto an agreeable
nanor
anuṣhajjateseek
tyāgīone who renounces desires for enjoying the fruits of actions
sattvain the mode of goodness
samāviṣhṭaḥendowed with
medhāvīintelligent
chhinnasanśhayaḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.9
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः

हे अर्जुन ! 'केवल कर्तव्यमात्र करना है' -- ऐसा समझकर जो नियत कर्म आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है, वही सात्त्विक त्याग माना गया है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 18.11
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते

कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 10
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः

जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 10 translates to: "The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate an unpleasant task nor is he attached to a pleasant one. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। जो अकुशल कर्मसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता, वह त्यागी, बुद्धिमान्, सन्देहरहित और अपने स्वरूपमें स्थित है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "na dveṣhṭy akuśhalaṁ karma kuśhale nānuṣhajjate" mean in English?

"na dveṣhṭy akuśhalaṁ karma kuśhale nānuṣhajjate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 10. The man of renunciation, pervaded by purity, intelligent, and with his doubts cut asunder, does not hate an unpleasant task nor is he attached to a pleasant one. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.