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Sudarshana Chakra
Adhyay 18, Shlok 1
अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन

हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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MalayalamIND

ഹേ ശക്തനായ ഹൃഷീകേശേ, കേശിയുടെ ഘാതകനേ, പരിത്യാഗത്തിൻ്റെയും പരിത്യാഗത്തിൻ്റെയും സത്തയോ സത്യമോ ഒന്നായി അറിയാൻ ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു.

NepaliIND

हे पराक्रमी ऋषिकेश, हे केशीका वधकर्ता, म त्याग र त्यागको सार वा सत्य जान्न चाहन्छु।

PunjabiIND

ਹੇ ਬਲਵਾਨ ਹ੍ਰਿਸ਼ੀਕੇਸ, ਹੇ ਕੇਸੀ ਦੇ ਕਾਤਲ, ਮੈਂ ਤਿਆਗ ਅਤੇ ਤਿਆਗ ਦੇ ਸਾਰ ਜਾਂ ਸੱਚ ਨੂੰ ਜਾਣਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਹਾਂ।

MarathiIND

हे पराक्रमी हृषीकेसा, हे केशीच्या वध करणाऱ्या, मला त्याग आणि त्यागाचे सार किंवा सत्य जाणून घेण्याची इच्छा आहे.

TeluguIND

ఓ బలమైన ఆయుధ హృషీకేశా, కేశిని సంహరించిన ఓ త్యజించడం మరియు పరిత్యాగం యొక్క సారాంశం లేదా సత్యాన్ని నేను తెలుసుకోవాలనుకుంటున్నాను.

KannadaIND

ಓ ಬಲಿಷ್ಠ ಶಸ್ತ್ರಸಜ್ಜಿತ ಹೃಷೀಕೇಶನೇ, ಕೇಶಿಯ ಸಂಹಾರಕನೇ, ತ್ಯಾಗ ಮತ್ತು ಪರಿತ್ಯಾಗದ ಸಾರ ಅಥವಾ ಸತ್ಯವನ್ನು ನಾನು ಹಲವಾರು ಬಾರಿ ತಿಳಿದುಕೊಳ್ಳಲು ಬಯಸುತ್ತೇನೆ.

AssameseIND

হে মহাবাহু হৃষিকেশ, হে কেছিৰ হত্যাকাৰী, ত্যাগ আৰু পৰিত্যাগৰ সাৰ বা সত্যক কেইবাবাৰো জানিবলৈ ইচ্ছা কৰিছো।

BhojpuriIND

हे महाबाहु हृषिकेश, हम कई बेर संन्यास आ परित्याग के सार भा सत्य जाने के चाहत बानी, हे केसी के वध करे वाला।

MaithiliIND

हे महाबाहु हृषिकेश, हम वैराग्य आ परित्यागक सार वा सत्य केँ अनेक रूप सँ जानबाक इच्छा रखैत छी हे केसीक वधक।

KonkaniIND

हे पराक्रमी हृषीकेश, त्याग आनी त्यागाचें सार वा सत्य जायते फावटीं जाणून घेवपाची इत्सा आसा, हे केसी वधक.

ManipuriIND

ꯍꯦ ꯁꯛꯇꯤ ꯂꯩꯔꯕꯥ ꯍ꯭ꯔ꯭ꯏꯁꯤꯀꯦꯁ, ꯑꯩꯅꯥ ꯊꯥꯗꯣꯀꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯊꯥꯗꯣꯀꯄꯒꯤ ꯃꯔꯨꯑꯣꯏꯕꯥ ꯅꯠꯔꯒꯥ ꯑꯆꯨꯝꯕꯥ ꯑꯗꯨ ꯀꯌꯥ ꯌꯥꯝꯅꯥ ꯈꯉꯕꯥ ꯄꯥꯝꯃꯤ, ꯍꯦ ꯀꯦꯁꯤꯕꯨ ꯍꯥꯠꯄꯥ |

MizoIND

Aw kut chak tak nei Hrishikesa, Kesi thattu, bânsan leh kalsanna thupui emaw, thudik emaw chu vawi tam tak hriat ka duh a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- संन्यासस्य महाबाहो ৷৷. पृथक्केशिनिषूदन -- यहाँ महाबाहो सम्बोधन सामर्थ्यका सूचक है। अर्जुनद्वारा इस सम्बोधनका प्रयोग करनेका भाव यह है कि आप सम्पूर्ण विषयोंको कहनेमें समर्थ हैं अतः मेरी जिज्ञासाका समाधान आप इस प्रकार करें? जिससे मैं विषयको सरलतासे समझ सकूँ। हृषीकेश सम्बोधन अन्तर्यामीका वाचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहता हूँ अतः इस विषयमें जोजो आवश्यक बातें हों? उनको आप (मेरे पूछे बिना भी) कह दें।केशिनिषूदन सम्बोधन विघ्नोंको दूर करनेवालेका सूचक है। इसके प्रयोगमें अर्जुनका भाव यह है कि जिस प्रकार आप अपने भक्तोंके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर कर देते हैं? उसी प्रकार मेरे भी सम्पूर्ण विघ्नोंको अर्थात् शङ्काओँ और संशयोंको दूर कर दें।जिज्ञासा प्रायः दो प्रकारसे प्रकट की जाती है --,(1) अपने आचरणमें लानेके लिये और (2) सिद्धान्तको समझनेके लिये। जो केवल पढ़ाई करनेके लिये (सीखनेके लिये) सिद्धान्तको समझते हैं? वे केवल पुस्तकोंके विद्वान् बन सकते हैं और नयी पुस्तक भी बना सकते हैं? पर अपना कल्याण नहीं कर सकते । अपना कल्याण तो वे ही कर सकते हैं? जो सिद्धान्तको समझकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये तत्पर हो जाते हैं।यहाँ अर्जुनकी जिज्ञासा भी केवल सिद्धान्तको जाननेके लिये ही नहीं है? प्रत्युत सिद्धान्तको जानकर उसके अनुसार अपना जीवन बनानेके लिये है। एषा तेऽभिहिता सांख्ये (गीता 2। 39) में आये सांख्य पदको ही यहाँ संन्यास पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी सांख्य और संन्यासको पर्यायवाची माना है जैसे -- पाँचवें अध्यायके दूसरे श्लोकमें संन्यासः? चौथे श्लोकमें सांख्ययोगौ? पाँचवें श्लोकमें यत्सांख्यैः और छठे श्लोकमें संन्यासस्तु पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने सांख्यको ही संन्यास कहा है। इसी प्रकार बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु (गीता 2। 39) में आये योग पदको ही यहाँ त्याग पदसे कहा गया है। भगवान्ने भी योग (कर्मयोग) और त्यागको पर्यायवाची माना है जैसे -- दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा इक्यावनवें श्लोकमें फलं त्यक्त्वा? तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कर्मयोगेन योगिनाम्? चौथे अध्यायके बीसवें श्लोकमें त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम्? पाँचवें श्लोकमें तद्योगैरपि गम्यते? ग्यारहवें श्लोकमें सङ्गं त्यक्त्वा तथा बारहवें श्लोकमें त्यागात् पदोंका एक ही अर्थमें प्रयोग हुआ है। इसलिये यहाँ अर्जुनने कर्मयोगको ही त्याग कहा है।अच्छी तरहसे रखनेका नाम संन्यास है -- सम्यक् न्यासः संन्यासः। तात्पर्य है कि प्रकृतिकी चीज सर्वथा प्रकृतिमें देने (छोड़ देने) और विवेकद्वारा प्रकृतिसे अपना सर्वथा सम्बन्धविच्छेद कर लेनेका नाम संन्यास है।कर्म और फलकी आसक्तिको छोड़नेका नाम त्याग है। छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें आया है कि जो कर्म और फलमें आसक्त नहीं होता? वह योगारूढ़ हो जाता है। सम्बन्ध -- अर्जुनकी जिज्ञासाके उत्तरमें पहले भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अन्य दार्शनिक विद्वानोंके चार मत बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस अध्यायमें पहलेके सभी अध्यायोंमें कहा हुआ अभिप्राय मिलता है। तथापि अर्जुन केवल संन्यास और त्याग -- इन दो शब्दोंके अर्थोंका भेद जाननेकी इच्छासे ही प्रश्न करता है --,अर्जुन बोला -- हे महाबाहो हे हृषीकेश हे केशिनिषूदन मैं संन्यासका अर्थात् संन्यासशब्दके अर्थका और त्यागका अर्थात् त्यागशब्दके अर्थका तत्त्व -- यथार्थ स्वरूप अलगअलग विभागपूर्वक जानना चाहता हूँ। भगवान् वासुदेवने छलसे घोड़ेका रूप धारण करनेवाले केशि नामक असुरको मारा था? इसलिये वे उस,( केशिनिषूदन ) नामसे अर्जुनद्वारा सम्बोधित किये गये हैं।,

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Sri Anandgiri

पूर्वैरध्यायैर्विस्तरेण यतस्ततो विक्षिप्ततयोक्तमर्थं सुखप्रतिपत्त्यर्थं संक्षेपेणोपसंहृत्याभिधातुमध्यायान्तरमवतारयति -- सर्वस्यैवेति। उपसंहृत्य वक्तव्य इति संबन्धः। किं चोपनिषत्सु इतस्ततो विस्तृतस्यार्थस्य बुद्धिसौकर्यार्थमस्मिन्नध्याये संक्षिप्ताभिधानं कर्तव्यमुपनिषदां गीतानां चैकार्थत्वादित्याह -- सर्वश्चेति। कथं सर्वोऽपि शास्त्रार्थोऽस्मिन्नध्याये संक्षिप्योपसंह्रियते तत्राह -- सर्वेषु हीति। ननु वेदार्थश्चेदशेषतोऽत्रोपसंजिहीर्षितस्तर्हि किमिति त्यागेनैके संन्यासयोगादिति च वेदार्थैकदेशविषयं प्रश्नप्रतिवचनं तत्राह -- अर्जुनस्त्विति। पृथगनयोस्तत्त्वं वेदितुमिच्छामीति विशेषणादपृथगर्थस्तयोरस्तीति गम्यते। बुभुत्सितस्य प्रष्टव्यत्वादेकदेशे तदभावादुक्तप्रश्नोपपत्तिरिति भावः।

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Sri Dhanpati

।18.1।।नमः समाय सोमाय मखार्च्याय मखारये। कृष्णायाकृष्णरुपाय विष्णवे शंभवे नमःपूर्वाध्यायैर्विस्तरेणेतस्ततो विक्षिप्ततयोक्तमर्थमुपनिषत्सु चेतस्ततो विस्तृतमर्थं सुखप्रतिपत्तये उपसंहृत्य वक्तुमयमध्याय आरभ्यते। अतोताध्यायेपूक्तस्य सर्ववेदार्थस्यास्मिन्नध्यायेऽवगम्यमानत्वात्। अर्जुनस्तु संन्यासत्यागशब्दार्थयोरेव विशेणं बुभुत्सुरुवाच। संन्यासस्य संन्यासभ्दार्थस्य त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्य च पृथगन्योन्यविभागतस्तत्त्वं याथात्म्यं वेदितुं ज्ञातुमिच्छामि। हे महाबारो इति संबोधयन् तब बाहुतो जातैः क्षत्रियैः महाबाहुभिरितरैर्बाह्वादिसाध्ये कर्मण्यधिकृतैरज्ञैश्च कृतस्य संन्यासस्य त्यागस्य च तत्त्वं पृथग्वेदितुमिच्छामीति ध्वनयति। सर्वेन्द्रियनियन्तुरन्तर्यामिणः सर्वज्ञस्य मदभिप्रायनुसारेणैतत्कथनं सुकरमितिद्योतयन्नाह -- हृषीकेशेति। स्वजनसुखार्थं केश्यादिदुष्टनिषूदनस्य तव स्वभक्तस्य ममाप्यज्ञाननिषूदनं युक्तमेवेति सूचयन्संबोधयति केशिनिषूदनेति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
sanyāsasyaof renunciation of actions
mahābāho
tattvamthe truth
ichchhāmiI wish
veditumto understand
tyāgasyaof renunciation of desires for enjoying the fruits of actions
chaand
hṛiṣhīkeśhaKrishna, the Lord of the senses
pṛithakdistinctively
keśhīniṣhūdana
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 18.2
श्री भगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः। सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 18Shlok 1
Bhagavad Gita · Adhyay 18, Shlok 1
अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन

हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 18 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 1 translates to: "O mighty-armed Hrishikesa, I desire to know the essence or truth of renunciation and abandonment severally, O slayer of Kesi. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 18, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Moksha-Opadesa Yoga में संकलित है। हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशिनिषूदन ! मैं संन्यास और त्यागका तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 18 Verse 1. O mighty-armed Hrishikesa, I desire to know the essence or truth of renunciation and abandonment severally, O slayer of Kesi. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.