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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 6
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

তুমি ইহাদিগকে শয়তানী সংকল্প বলিয়া জান, দেহের সমস্ত উপাদান এবং দেহে বসবাসকারী আমাকে নির্বোধভাবে অত্যাচার করি।

GujaratiIND

તું આને આસુરી સંકલ્પોથી જાણ, શરીરના તમામ તત્ત્વોને અને શરીરમાં રહેનાર મને અણસમજુ ત્રાસ આપે છે.

TeluguIND

ఇవి రాక్షస సంకల్పాలు అని తెలుసుకో, దేహంలోని అన్ని ధాతువులను మరియు శరీరంలో నివసించే నన్నూ తెలివి లేకుండా హింసించండి.

MalayalamIND

ശരീരത്തിലെ എല്ലാ ഘടകങ്ങളെയും ദേഹത്തിൽ വസിക്കുന്ന എന്നെയും ബുദ്ധിശൂന്യമായി പീഡിപ്പിക്കുന്ന പൈശാചികമായ തീരുമാനങ്ങളാണിവയെന്ന് നീ അറിയുക.

PunjabiIND

ਤੂੰ ਇਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਭੂਤ ਦੇ ਸੰਕਲਪਾਂ ਵਾਲਾ ਜਾਣ ਲੈ, ਸਰੀਰ ਦੇ ਸਾਰੇ ਤੱਤਾਂ ਨੂੰ ਅਤੇ ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਵੱਸਣ ਵਾਲੇ ਮੈਨੂੰ ਬੇਸਮਝੀ ਨਾਲ ਤਸੀਹੇ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ।

KannadaIND

ದೇಹದಲ್ಲಿರುವ ಎಲ್ಲಾ ಧಾತುಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ದೇಹದಲ್ಲಿ ನೆಲೆಸಿರುವ ನನ್ನನ್ನೂ ಬುದ್ಧಿಹೀನವಾಗಿ ಹಿಂಸಿಸುತ್ತಾ, ಇವು ರಾಕ್ಷಸ ಸಂಕಲ್ಪಗಳೆಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.

NepaliIND

देहमा वास गर्ने म र शरीरमा रहेका सबै तत्वहरूलाई मूर्खतापूर्वक यातना दिने यी आसुरी संकल्पका हुन् भनी जान।

OdiaIND

ତୁମେ ଜାଣ ଯେ ଏମାନେ ଭୂତତ୍ୱର ସଂକଳ୍ପବଦ୍ଧ, ଶରୀରର ସମସ୍ତ ଉପାଦାନ ଏବଂ ଶରୀରରେ ବାସ କରୁଥିବା ମୁଁ ନିର୍ବୋଧ ଭାବରେ ନିର୍ଯାତନା ଦେଉ |

MarathiIND

देहातील सर्व तत्वांना आणि देहात वास करणाऱ्या मी यांना निर्विकारपणे छळणाऱ्या या आसुरी संकल्पांचे तू जाण.

BhojpuriIND

तू ई लोग के आसुरी संकल्प के जानऽ, शरीर के सभ तत्वन के बेमतलब आ शरीर में निवास करे वाला हमरा के यातना देत बाड़ऽ।

AssameseIND

এইবোৰক আসুৰিক সংকল্পৰ বুলি চিনি পাবা, শৰীৰৰ সকলো উপাদান আৰু শৰীৰত বাস কৰা মোক অজ্ঞানভাৱে অত্যাচাৰ কৰা।

TamilIND

இவை அசுரத் தீர்மானங்கள், உடலிலுள்ள அனைத்து உறுப்புகளையும், உடலில் வசிக்கும் என்னையும் உணர்வின்றி துன்புறுத்துவதாக அறிந்துகொள்.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः -- शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है? प्रत्युत निषेध है? ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता 18। 32) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।दम्भाहंकारसंयुक्ताः -- उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन? ध्यान? स्वाध्याय आदि करते हैं? वे सब दम्भ करते हैं? दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका? चतुराईका? जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं हम लोगोंको समझा सकते हैं? उनको रास्तेपर ला सकते हैं हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें हम कोई कम जानते हैं क्या हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले आदिआदि।कामरागबलान्विताः -- काम शब्द भोगपदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना? तल्लीन हो जाना? एकरस हो जाना राग है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ? दुराग्रह है? वह बल है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंमें यह भाव रहता है कि मनुष्यशरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्यशरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोगसामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया? तो फिर उसने क्या किया मनुष्यशरीर पाकर मनचाही भोगसामग्री नहीं मिली? तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है? आदिआदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धनसम्पत्ति आदि भोगसामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक? जिदसे तप किया करते हैं।कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम् -- वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों(पृथ्वी? जल? तेज? वायु और आकाश) को कृश करते हैं? शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता -- ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।आगे चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है? वहाँ शरीरको कष्ट देनकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है? वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अविधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।मां चैवान्तःशरीरस्थम् -- भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं? दुःख देते हैं। कैसे वे मेरी आज्ञा? मेरे मतके अनुसार नहीं चलते? प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।अर्जुनने पूछा था कि वे कौनसी निष्ठावाले हैं -- सात्त्विक हैं कि राजसतामस दैवीसम्पत्तिवाले हैं कि आसुरीसम्पत्तिवाले तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो -- तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। यहाँ आसुरनिश्चयान् पद सामान्य आसुरीसम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है? प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्तनीच -- विशेष नास्तिक हैं? उनका वाचक है।विशेष बातचौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जाननेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये यजन्ते पद आया है परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये तप्यन्ते पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्यबुद्धि होती है -- तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगढ़ंत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके,तपका लक्षण है -- शरीरको सुखाना? कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व देते हैं? उसे बहुत अच्छा मानते हैं परन्तु भगवान्को? शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं? जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना? काँटोंपर सोना? उलटे लटकना? एक पैरसे खड़े होना? शास्त्राज्ञासे विरुद्ध अग्नि तपना? अपने शरीर? मन? इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि -- ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपक्षा करके दानसेवा? उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है? जो इतनी बुरी नहीं है क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्रविधियुक्त तो नहीं हैं? पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं? उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि? सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी क्योंकि इनमें दम्भ? अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं? सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं। सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका उपेक्षापूर्वक त्याग है? इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका अज्ञतापूर्वक त्याग है और यहाँ शास्त्रका विरोधपूर्वक त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा? शास्त्रविधि? प्राणिसमुदाय और भगवान् -- इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसीतामसी वर्णनमें नहीं है। सम्बन्ध -- अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे? तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी -- इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रुचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

वे अविवेकी मनुष्य? शरीरमें स्थित इन्द्रियादि करणोंके रूपमें परिणत भूतसमुदायको और शरीरके भीतर अन्तरात्मारूपसे स्थित? उनके कर्म और बुद्धिके साक्षी? मुझ ईश्वरको भी? कृश ( तंग ) करते हुए -- मेरी आज्ञाको न मानना ही मुझे कृश करना है? इस प्रकार मुझे कृश करते हुए ( घोर तप करते हैं ) उनको तू आसुरी निश्चयवाले जान। जिनका असुरोंकासा निश्चय हो? वे आसुरी निश्चयवाले कहलाते हैं। उनका सङ्ग त्याग करनेके लिये तू उनको जान? यह उपदेश है।

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Sri Anandgiri

रजोनिष्ठान्प्राधान्येन प्रदर्श्य तमोनिष्ठान्प्राधान्येन दर्शयति -- कर्शयन्त इति। कथं शरीरादिसाक्षिणमीश्वरं प्रति कृशीकरणं प्राणिनां प्रकल्प्यते तत्राह -- मदनुशासनेति। तेषां विपर्यासनिश्चयवतां परिज्ञानं कुत्रोपयुज्यते तत्राह -- परिहरणार्थमिति।

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Sri Dhanpati

रजोनिष्टान्प्राधान्येन प्रदर्शय तमोनिष्टान्प्राधान्येन विशिनष्टि -- कर्शयन्त इति। शरीरस्थं भूतग्रामं करणसमुदायरुपेण परिणतं कर्शयन्तः कृशीकुर्वन्तः यतोऽचेतसोऽविवेकिनो मूढाः मां चैव तत्कर्मबुद्धिसाक्षिभूतमन्तःशरीरस्थं कर्शयन्तो मदनुशासनातिक्रमणं कुर्वन्तो भोक्तृरुपेणान्तःशरीरस्थम्। भोग्यस्य शरीरस्य कर्शनेन कृशीकुर्वन्त इति तु भोग्यस्य कृशीकरणेनापि निरवयवस्य भोक्तुः वास्तवं कार्श्यं न संभवतीत्यभिप्रेत्याचार्यैः नोक्तम्। य एवंविधास्तान् आसुरो निश्चयो येषां ते आसुरनिश्चयाः तान्परिहरणार्थं विद्धि विजानीहीति करुणानिधिर्भगवानुपदिशति।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
karṣhayantaḥtorment
śharīrastham
bhūtagrāmam
achetasaḥsenseless
māmme
chaand
evaeven
antaḥwithin
śharīrastham
tānthem
viddhiknow
āsuraniśhchayān
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.7
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु

आहार भी सबको तीन प्रकारका प्रिय होता है और वैसे ही यज्ञ, दान और तप भी तीन प्रकारके होते हैं अर्थात् शास्त्रीय कर्मोंमें भी तीन प्रकारकी रुचि होती है, तू उनके इस भेदको सुन। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 6
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 6
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 6 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 6?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 6 translates to: "Know thou these to be of demonical resolves, senselessly torturing all the elements in the body and Me who dwell in the body. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 6 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ" mean in English?

"karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 6. Know thou these to be of demonical resolves, senselessly torturing all the elements in the body and Me who dwell in the body. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.