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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

সেই সমস্ত পুরুষ যারা শাস্ত্র দ্বারা নির্ধারিত নয় এমন ভয়ানক তপস্যা অনুশীলন করে, ভণ্ডামি ও অহংকারকে প্রদত্ত, লালসা ও আসক্তির বল দ্বারা চালিত হয়।

GujaratiIND

વાસના અને આસક્તિના બળથી પ્રેરિત, દંભ અને અહંકારને આપવામાં, શાસ્ત્રો દ્વારા સૂચવવામાં ન આવેલું ભયંકર તપ આચરનારા તે પુરુષો.

KannadaIND

ಕಾಮ ಮತ್ತು ಬಾಂಧವ್ಯದ ಬಲದಿಂದ ನಡೆಸಲ್ಪಡುವ ಬೂಟಾಟಿಕೆ ಮತ್ತು ಅಹಂಕಾರಕ್ಕೆ ನೀಡಿದ ಧರ್ಮಗ್ರಂಥಗಳಿಂದ ಸೂಚಿಸದ ಭಯಂಕರವಾದ ತಪಸ್ಸನ್ನು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡುವ ಪುರುಷರು.

PunjabiIND

ਉਹ ਪੁਰਸ਼ ਜੋ ਵਾਸਨਾ ਅਤੇ ਮੋਹ ਦੇ ਬਲ ਦੁਆਰਾ ਚਲਾਏ ਗਏ ਪਾਖੰਡ ਅਤੇ ਹਉਮੈ ਨੂੰ ਦਿੱਤੇ ਗਏ, ਧਰਮ ਗ੍ਰੰਥ ਦੁਆਰਾ ਦੱਸੇ ਗਏ ਭਿਆਨਕ ਤਪੱਸਿਆ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਦੇ ਹਨ।

TamilIND

காமம் மற்றும் பற்றுதலின் சக்தியால் உந்தப்பட்டு, பாசாங்குத்தனத்திற்கும் அகங்காரத்திற்கும் கொடுக்கப்பட்ட, வேதங்களால் பரிந்துரைக்கப்படாத பயங்கரமான துறவுகளை கடைப்பிடிக்கும் ஆண்கள்.

TeluguIND

గ్రంధాలచే నిర్దేశించబడని అద్భుతమైన తపస్సులను అభ్యసించే వారు, కపటత్వం మరియు అహంభావానికి ఇవ్వబడ్డారు, కామం మరియు అనుబంధం యొక్క శక్తితో నడపబడతారు.

MalayalamIND

വേദഗ്രന്ഥങ്ങളാൽ അനുശാസിക്കപ്പെടാത്ത ഭയാനകമായ തപസ്സുകൾ അനുഷ്ഠിക്കുന്ന പുരുഷന്മാർ, കാപട്യത്തിൻ്റെയും ആസക്തിയുടെയും ശക്തിയാൽ നയിക്കപ്പെടുന്ന കാപട്യത്തിനും അഹംഭാവത്തിനും വിധേയരാകുന്നു.

MarathiIND

जे पुरुष शास्त्राने सांगितलेले नसलेले भयंकर तपस्या करतात, दांभिकता आणि अहंकाराला बळी पडतात, वासना आणि आसक्तीच्या बळावर चालतात.

SindhiIND

اهي ماڻهو جيڪي صحيفن ۾ بيان ڪيل نه آهن، منافقت ۽ انا پرستي جي ڪري، لالچ ۽ وابستگي جي زور تي هلندڙ خوفناڪ سادگيءَ تي عمل ڪن ٿا.

NepaliIND

ती पुरुषहरू जो शास्त्रले नबनाई भयानक तपस्या गर्छन्, पाखण्ड र अहंकारलाई दिएर, वासना र आसक्तिको बलले प्रेरित हुन्छन्।

OdiaIND

ସେହି ପୁରୁଷମାନେ ଯେଉଁମାନେ ଭୟଙ୍କର ଆର୍ଥିକ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତି, ଶାସ୍ତ୍ର ଦ୍ prescribed ାରା ନିର୍ଦ୍ଦିଷ୍ଟ କରାଯାଇ ନାହିଁ, କପଟୀତା ଏବଂ ଅହଂକାରକୁ ଦିଆଯାଏ, ଲୋଭ ଏବଂ ସଂଲଗ୍ନର ଶକ୍ତି ଦ୍ୱାରା ଚାଳିତ |

MaithiliIND

जे पुरुष शास्त्र द्वारा निर्धारित नहि भयंकर तपस्या करैत छथि, पाखंड आ अहंकार के प्रति समर्पित, काम आ आसक्ति के बल स संचालित |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः -- शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है? प्रत्युत निषेध है? ऐसे घोर तपको करनेमें उनकी रुचि होती है अर्थात् उनकी रुचि सदा शास्त्रसे विपरीत ही होती है। कारण कि तामसी बुद्धि (गीता 18। 32) होनेसे वे स्वयं तो शास्त्रोंको जानते नहीं और दूसरा कोई बता भी दे तो वे न उसको मानना चाहते हैं तथा न वैसा करना ही चाहते हैं।दम्भाहंकारसंयुक्ताः -- उनके भीतर यह बात गहरी बैठी हुई रहती है कि आज संसारमें जितने भजन? ध्यान? स्वाध्याय आदि करते हैं? वे सब दम्भ करते हैं? दम्भके बिना दूसरा कुछ है ही नहीं। अतः वे खुद भी दम्भ करते हैं। उनके भीतर अपनी बुद्धिमानीका? चतुराईका? जानकारीका अभिमान रहता है कि हम बड़े जानकार आदमी हैं हम लोगोंको समझा सकते हैं? उनको रास्तेपर ला सकते हैं हम शास्त्रोंकी बातें क्यों सुनें हम कोई कम जानते हैं क्या हमारी बातें सुनो तो तुम्हारेको पता चले आदिआदि।कामरागबलान्विताः -- काम शब्द भोगपदार्थोंका वाचक है। उन पदार्थोंमें रँग जाना? तल्लीन हो जाना? एकरस हो जाना राग है और उनको प्राप्त करनेका अथवा उनको बनाये रखनेका जो हठ? दुराग्रह है? वह बल है। इनसे वे सदा युक्त रहते हैं। उन आसुर स्वभाववाले लोगोंमें यह भाव रहता है कि मनुष्यशरीर पाकर इन भोगोंको नहीं भोगा तो मनुष्यशरीर पशुकी तरह ही है। सांसारिक भोगसामग्रीको मनुष्यने प्राप्त नहीं किया? तो फिर उसने क्या किया मनुष्यशरीर पाकर मनचाही भोगसामग्री नहीं मिली? तो फिर उसका जीवन ही व्यर्थ है? आदिआदि। इस प्रकार वे प्राप्त सामग्रीको भोगनेमें सदा तल्लीन रहते हैं और धनसम्पत्ति आदि भोगसामग्रीको प्राप्त करनेके लिये हठपूर्वक? जिदसे तप किया करते हैं।कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामम् -- वे शरीरमें स्थित पाँच भूतों(पृथ्वी? जल? तेज? वायु और आकाश) को कृश करते हैं? शरीरको सुखाते हैं और इसीको तप समझते हैं। शरीरको कष्ट दिये बिना तप नहीं होता -- ऐसी उनकी स्वाभाविक धारणा रहती है।आगे चौदहवें? पन्द्रहवें और सोलहवें श्लोकमें जहाँ शरीर? वाणी और मनके तपका वर्णन हुआ है? वहाँ शरीरको कष्ट देनकी बात नहीं है। वह तप बड़ी शान्तिसे होता है। परन्तु यहाँ जिस तपकी बात है? वह शास्त्रविरुद्ध घोर तप है और अविधिपूर्वक शरीरको कष्ट देकर किया जाता है।मां चैवान्तःशरीरस्थम् -- भगवान् कहते हैं कि ऐसे लोग अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करते हैं? दुःख देते हैं। कैसे वे मेरी आज्ञा? मेरे मतके अनुसार नहीं चलते? प्रत्युत उसके विपरीत चलते हैं।अर्जुनने पूछा था कि वे कौनसी निष्ठावाले हैं -- सात्त्विक हैं कि राजसतामस दैवीसम्पत्तिवाले हैं कि आसुरीसम्पत्तिवाले तो भगवान् कहते हैं कि उनको आसुर निश्चयवाले समझो -- तान्विद्धि आसुरनिश्चयान्। यहाँ आसुरनिश्चयान् पद सामान्य आसुरीसम्पत्तिवालोंका वाचक नहीं है? प्रत्युत उनमें भी जो अत्यन्तनीच -- विशेष नास्तिक हैं? उनका वाचक है।विशेष बातचौथे श्लोकमें शास्त्रविधिको न जाननेवाले श्रद्धायुक्त मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये यजन्ते पद आया है परन्तु यहाँ शास्त्रविधिका त्याग करनेवाले श्रद्धारहित मनुष्योंके द्वारा किये जानेवाले पूजनके लिये तप्यन्ते पद आया है। इसका कारण यह है कि आसुर निश्चयवाले मनुष्योंकी तप करनेमें ही पूज्यबुद्धि होती है -- तप ही उनका यज्ञ होता है और वे मनगढ़ंत रीतिसे शरीरको कष्ट देनेको ही तप मानते हैं। उनके,तपका लक्षण है -- शरीरको सुखाना? कष्ट देना। वे तपको बहुत महत्त्व देते हैं? उसे बहुत अच्छा मानते हैं परन्तु भगवान्को? शास्त्रको नहीं मानते। तप भी वही करते हैं? जो शास्त्रके विरुद्ध है। बहुत ज्यादा भूखे रहना? काँटोंपर सोना? उलटे लटकना? एक पैरसे खड़े होना? शास्त्राज्ञासे विरुद्ध अग्नि तपना? अपने शरीर? मन? इन्द्रियोंको किसी तरह कष्ट पहुँचाना आदि -- ये सब आसुर निश्चयवालोंके तप होते हैं।सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रविधिको जानते हुए भी उसकी उपक्षा करके दानसेवा? उपकार आदि शुभकर्मोंको करनेकी बात आयी है? जो इतनी बुरी नहीं है क्योंकि उनके दान आदि कर्म शास्त्रविधियुक्त तो नहीं हैं? पर शास्त्रनिषिद्ध भी नहीं हैं। परन्तु यहाँ जो शास्त्रोंमें विहित नहीं हैं? उनको ही श्रेष्ठ मानकर मनमाने ढंगसे विपरीत कर्म करनेकी बात है। दोनोंमें फरक क्या हुआ तेईसवें श्लोकमें कहे लोगोंको सिद्धि? सुख और परमगति नहीं मिलेगी अर्थात् उनके नाममात्रके शुभकर्मोंका पूरा फल नहीं मिलेगा। परन्तु यहाँ कहे लोगोंको तो नीच योनियों तथा नरकोंकी प्राप्ति होगी क्योंकि इनमें दम्भ? अभिमान आदि हैं। ये शास्त्रोंको मानते भी नहीं? सुनते भी नहीं और कोई सुनाना चाहे तो सुनना चाहते भी नहीं। सोलहवें अध्यायके तेईसवें श्लोकमें शास्त्रका उपेक्षापूर्वक त्याग है? इसी अध्यायके पहले श्लोकमें शास्त्रका अज्ञतापूर्वक त्याग है और यहाँ शास्त्रका विरोधपूर्वक त्याग है। आगे तामस यज्ञादिमें भी शास्त्रकी उपेक्षा है। परन्तु यहाँ श्रद्धा? शास्त्रविधि? प्राणिसमुदाय और भगवान् -- इन चारोंके साथ विरोध है। ऐसा विरोध दूसरी जगह आये राजसीतामसी वर्णनमें नहीं है। सम्बन्ध -- अगर कोई मनुष्य किसी प्रकार भी यजन न करे? तो उसकी श्रद्धा कैसे पहचानी जायगी -- इसे बतानेके लिये भगवान् आहारकी रुचिसे आहारीकी निष्ठाकी पहचानका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

इस प्रकार कार्यसे जिनकी सात्त्विकादि निष्ठाओंका निर्णय किया गया है उन ( स्वाभाविक श्रद्धावाले ) हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही शास्त्रविधिका त्याग होनेपर देवपूजादिके परायण? सात्त्विक निष्ठायुक्त होता है। अधिकांश मनुष्य तो राजसी और तामसी निष्ठावाले ही होते हैं। कैसे ( सो कहा जाता है -- ) जो मनुष्य? शास्त्रमें जिसका विधान नहीं है ऐसा? अशास्त्रविहित और घोर अर्थात् अन्य प्राणियोंको और अपने शरीरको भी पीड़ा पहुँचानेवाला? तप? दम्भ और अहंकार -- इन दोनोंसे युक्त होकर तथा कामना और आसक्तिजनित बलसे युक्त होकर? अथवा कामना? आसक्ति और बलसे युक्त होकर तपते हैं।

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Sri Anandgiri

ननु सत्त्वादिनिष्ठाः शास्त्रेण ज्ञातुं शक्यन्ते कुतः कार्यलिङ्गकानुमानेनेति तत्राह -- एवमिति। सत्त्वादिनिष्ठानां जन्तूनामवान्तरविशेषं प्रचुरत्वाप्रचुरत्वरूपं दर्शयति -- तत्रेत्यादिना। राजसानां तामसानां च प्राचुर्यं प्रश्नद्वारा विवृणोति -- कथमित्यादिना। कामश्च काम्यमानविषयो रागश्च तद्विषयभोगाभिलाषस्तत्कृतं तत्प्रयुक्तम्। तन्निमित्तमिति यावत्।

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Sri Dhanpati

एवं कार्यतो निर्णीतानां सत्त्वादिनिष्ठानां मध्ये देवपूजादितत्परस्य सत्त्वनिष्ठस्य दौर्लभ्यं रजस्तमोनिष्ठानां बाहुल्यं च ज्ञापयितुं आह। अशास्त्रविहितं शास्त्रविहितं श्रुतिस्मृत्यादिरुपेण शास्त्रेण विहितं न भवति तत्? शास्त्रं न भवतीत्यशास्त्रं तेन बुद्धाद्यागमेन बोधितमिति वा। घोरं प्राणिनामात्मनश्च पीडाकरं तपो ये जनास्तप्यन्ते निर्वर्तयन्ति। जनान्विशिनष्टि। दम्भाहंकारसंयुक्ताः दम्भो धर्मध्वजित्वं? अहंकारोऽहमेव सर्वोत्तम इति दुरभिमानस्ताभ्यां सम्यग्युक्ताः। कामरागबलान्विताः कामो विषयाभिलाषः कामस्य कारणीभूतो विषयाभिरञ्जनात्मको रागः कामरागाभ्यां कृतं बलं विषयसंपादनोत्साहस्तेनान्विताः? कामरागबलैरन्विता इति वा।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
aśhāstravihitam
ghoramstern
tapyanteperform
yewho
tapaḥausterities
janāḥpeople
dambhahypocrisy
ahankāraegotism
sanyuktāḥpossessed of
kāmadesire
rāgaattachment
balaforce
anvitāḥimpelled by
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.4
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः

सात्त्विक मनुष्य देवताओंका पूजन करते हैं, राजस मनुष्य यक्षों और राक्षसोंका और दूसरे जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेतों और भूतगणोंका पूजन करते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.6
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 5
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 5
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः

जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 5 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 5?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 5 translates to: "Those men who practice terrific austerities not prescribed by the scriptures, given to hypocrisy and egoism, driven by the force of lust and attachment. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 5 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ। Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ" mean in English?

"aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 5. Those men who practice terrific austerities not prescribed by the scriptures, given to hypocrisy and egoism, driven by the force of lust and attachment. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.