Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते

यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी 'सत्' -- ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म भी 'सत्' -- ऐसा ही कहा जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

ত্যাগ, তপস্যা এবং দানে অটল থাকাকেও 'সত' বলা হয় এবং এগুলোর সাথে বা পরমেশ্বরের উদ্দেশ্যে করাকেও 'শনি' বলা হয়।

TeluguIND

త్యాగం, తపస్సు మరియు దానములలో దృఢత్వాన్ని 'సత్' అని కూడా అంటారు, మరియు వీటికి సంబంధించి లేదా పరమాత్మ కోసం చేసే చర్యను 'సత్' అని కూడా అంటారు.

PunjabiIND

ਤਿਆਗ, ਤਪੱਸਿਆ ਅਤੇ ਦਾਤ ਵਿੱਚ ਅਡੋਲਤਾ ਨੂੰ ‘ਸਤਿ’ ਵੀ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਸਬੰਧ ਵਿੱਚ ਜਾਂ ਪਰਮ ਦੀ ਖ਼ਾਤਰ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਕਰਮ ਨੂੰ ਵੀ ‘ਸਤਿ’ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

ત્યાગ, તપ અને દાનમાં દ્રઢતા પણ 'સત' કહેવાય છે, અને આના સંબંધમાં અથવા પરમાત્માને અર્થે કરવામાં આવતી ક્રિયાને પણ 'સત' કહેવાય છે.

TamilIND

தியாகம், துறவு, தானம் ஆகியவற்றில் உள்ள உறுதியும் 'சத்' என்றும், இவற்றுடன் தொடர்புடைய அல்லது பரமாத்மாவின் பொருட்டுச் செயல்படுவது 'சத்' என்றும் அழைக்கப்படுகிறது.

MarathiIND

त्याग, तप आणि दान यांच्यातील स्थिरता यालाही 'सत्' म्हणतात आणि त्यांच्याशी किंवा परमात्म्यासाठी केलेल्या कृतीलाही 'सत्' म्हणतात.

NepaliIND

यज्ञ, तप र दानमा दृढतालाई पनि 'सत्' भनिन्छ र यिनीहरू वा परमात्माको निमित्त गरिने कर्मलाई पनि 'सत्' भनिन्छ।

SindhiIND

قربانيءَ، سادگيءَ ۽ تحفي ۾ ثابت قدميءَ کي به ’سَت‘ چئبو آهي، ۽ انهن سان واسطو رکندڙ عمل کي به ’ست‘ چئبو آهي.

KannadaIND

ತ್ಯಾಗ, ತಪಸ್ಸು ಮತ್ತು ದಾನಗಳಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರತೆಯನ್ನು 'ಸತ್' ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ ಮತ್ತು ಇವುಗಳಿಗೆ ಸಂಬಂಧಿಸಿದಂತೆ ಅಥವಾ ಪರಮಾರ್ಥಕ್ಕಾಗಿ ಕ್ರಿಯೆಯನ್ನು ಸಹ 'ಸತ್' ಎಂದು ಕರೆಯಲಾಗುತ್ತದೆ.

MalayalamIND

ത്യാഗം, തപസ്സ്, ദാനം എന്നിവയിലെ സ്ഥിരതയെ 'സത്' എന്നും വിളിക്കുന്നു, ഇവയുമായി ബന്ധപ്പെട്ട് അല്ലെങ്കിൽ പരമാത്മാവിന് വേണ്ടിയുള്ള പ്രവൃത്തിയെ 'സത്' എന്നും വിളിക്കുന്നു.

OdiaIND

ବଳିଦାନ, ତୀବ୍ରତା, ଏବଂ ଉପହାରରେ ସ୍ଥିରତାକୁ 'ଶନି' ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ, ଏବଂ ଏଗୁଡିକ ସହିତ କାର୍ଯ୍ୟ, କିମ୍ବା ସର୍ବୋଚ୍ଚଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ, ଏହାକୁ 'ଶନି' ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଏ |

DogriIND

बलिदान, तप, ते दान च दृढ़ता गी बी 'सत' आखदे न ते इन्हें दे सरबंध च, जां परमात्मा आस्तै कर्म गी बी 'सत' आखेआ जंदा ऐ।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते -- यज्ञ? तप और दानरूप प्रशंसनीय क्रियाओंमें जो स्थिति (निष्ठा) होती है? वह सत् कही जाती है। जैसे? किसीकी सात्त्विक यज्ञमें? किसीकी सात्त्विक तपमें और किसीकी सात्त्विक दानमें जो स्थिति -- निष्ठा है अर्थात् इनमेंसे एकएक चीजके प्रति हृदयमें जो श्रद्धा है और इन्हें करनेकी जो तत्परता है? वह सन्निष्ठा (सत्निष्ठा) कही जाती है।च पद देनेका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार लोगोंकी सात्त्विक? यज्ञ? तप और दानमें श्रद्धा -- निष्ठा होती है? ऐसे ही किसीकी वर्णधर्ममें? किसीकी आश्रमधर्ममें? किसीकी सत्यव्रतपालनमें? किसीकी अतिथिसत्कारमें? किसीकी सेवामें? किसीकी आज्ञापालनमें? किसीकी पातिव्रतधर्ममें और किसीकी गङ्गाजीमें? किसीकी यमुनाजीमें? किसीकी प्रयागराज आदि विशेष तीर्थोंमें जो हृदयसे श्रद्धा है? उनमें जो रुचि? विश्वास और तत्परता है? वह भी सन्निष्ठा कही जाती है।कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते -- उन प्रशंसनीय कर्मोंके अलावा कर्मोंके दो तरहके स्वरूप होते हैं -- लौकिक (स्वरूपसे ही संसारसम्बन्धी) और पारमार्थिक (स्वरूपसे ही भगवत्सम्बन्धी) --,(1) वर्ण और आश्रमके अनुसार जीविकाके लिये यज्ञ? अध्यापन? व्यापार? खेती आदि व्यावहारिक कर्तव्यकर्म और खानापीना? उठनाबैठना? चलनाफिरना? सोनाजगना आदि शारीरिक कर्म -- ये सभी लौकिक हैं।(2) जपध्यान? पाठपूजा? कथाकीर्तन? श्रवणमनन? चिन्तनध्यान आदि जो कुछ किया जाय? सब,पारमार्थिक है।इन दोनों प्रकारके कर्मोंको अपने सुखआराम आदिका उद्देश्य न रखकर निष्कामभाव एवं श्रद्धाविश्वाससे केवल भगवानके लिये अर्थात् भगवत्प्रीत्यर्थ किये जायँ तो वे सबकेसब तदर्थीय कर्म हो जाते हैं। भगवदर्थ होनेके कारण उनका फल सत् हो जाता है अर्थात् सत्स्वरूप परमात्माके साथ सम्बन्ध होनेसे वे सभी दैवीसम्पत्ति हो जाते हैं? जो कि मुक्ति देनेवाली है।जैसे अग्निमें ठीकरी रख दी जाय तो अग्नि उसको अग्निरूप बना देती है। यह सब अग्निकी ही विशेषता है कि ठीकरी भी अग्निरूप हो जाती है ऐसे ही उस परमात्माके लिये जो भी कर्म किया जाय? वह सब सत् अर्थात् परमात्मस्वरूप हो जाता है अर्थात् उस कर्मसे परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है। उस कर्ममें जो भी विशेषता आयी है? वह परमात्माके सम्बन्धसे ही आयी है। वास्तवमें तो कर्ममें कुछ भी विशेषता नहीं है।यहाँ तदर्थीयम् कहनेका तात्पर्य है कि जो ऊँचेसेऊँचे भोगोंको? स्वर्ग आदि भोगभूमियोंको न चाहकर केवल परमात्माको चाहता है? अपना कल्याण चाहता है? मुक्ति चाहता है? ऐसे साधकका जितना पारमार्थिक साधन बन गया है? वह सब सत् हो जाता है। इस विषयमें भगवान्ने कहा है कि कल्याणकारी काम करनेवाले किसीकी भी दुर्गति नहीं होती (गीता 6। 40)? इतनी ही बात नहीं? जो योग(समता अथवा परमात्मतत्त्व) का जिज्ञासु होता है? वह भी वेदोंमें स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये बताये हुए सकाम कर्मोंसे ऊँचा उठ जाता है (गीता 6। 44)। कारण कि वे कर्म तो फल देकर नष्ट हो जाते हैं? पर उस परमात्माके लिये किया हुआ साधन -- कर्म नष्ट नहीं होता? प्रत्युत सत् हो जाता है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें आया कि परमात्माके उद्देश्यसे किये गये कर्म सत् हो जाते हैं। परन्तु परमात्माके उद्देश्यसे रहित जो कर्म किये जाते हैं? उनकी कौनसी संज्ञा होगी इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो यज्ञकर्ममें स्थिति है? जो तपमें स्थिति है और जो दानमें स्थिति है? वह भी सत् है ऐसा विद्वानोंद्वारा कहा जाता है। तथा उन यज्ञादिके लिये जो कर्म है अथवा जिसके तीन नामोंका प्रकरण चल रहा है? उस ईश्वरके लिये जो कर्म है? वह भी सत् है यही कहा जाता है। इस प्रकार किये हुए यज्ञ और तप आदि कर्म? यदि असात्त्विक और विगुण हों तो भी श्रद्धापूर्वक परमात्माके तीनों नामोंके प्रयोगसे सगुण और सात्त्विक बना लिये जाते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकारान्तरेण सच्छब्दस्य विनियोगमाह -- यज्ञ इति। नामत्रयोच्चारणेन साद्गुण्यं सिध्यतीति प्रकरणार्थमुपसंहरति -- तदेतदिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

यज्ञे यज्ञकर्मणि या स्तिथिस्तथा तपसि या स्थितिः दाने च या स्थितिः सा च विद्वद्भिः सदित्युच्यते। तदर्थीयं यज्ञदानतपोर्थीयं अथवा यस्याभिधानत्रयं प्रकृतं तदर्थीयमीश्वरार्थीयमित्येतत्सदित्येवाभिधीयते। तदेतद्यज्ञतपआदिकर्म असात्त्विकं विगुणमभक्तिपूर्वकमपि ब्रह्मणोऽभिधानत्रयेण सात्त्विकं सगुणं सभिक्तकं संपादितं भवत्यतोऽवश्यमोंतत्सदिति ब्रह्मणोऽभिधानत्रयमुदाहृत्य यज्ञादि प्रवर्तननीयमिति प्रकरणार्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yajñein sacrifice
tapasiin penance
dānein charity
chaand
sthitiḥestablished in steadiness
satthe syllable Sat
itithus
chaand
uchyateis pronounced
karmaaction
chaand
evaindeed
tatarthīyam
satthe syllable Sat
itithus
evaindeed
abhidhīyateis described
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.26
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते।प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते

हे पार्थ ! परमात्माके 'सत्'--इस नामका सत्तामात्रमें और श्रेष्ठ भावमें प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्मके साथ 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.28
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह

हे पार्थ ! अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब 'असत्' -- ऐसा कहा जाता है। उसका फल न यहाँ होता है, न मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 27
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते

यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी 'सत्' -- ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म भी 'सत्' -- ऐसा ही कहा जाता है। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी 'सत्' -- ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म भी 'सत्' -- ऐसा ही कहा जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 27 translates to: "Steadfastness in sacrifice, austerity, and gift is also called 'Sat', and action in connection with these, or for the sake of the Supreme, is also called 'Sat'. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। यज्ञ, तप और दानरूप क्रियामें जो स्थिति (निष्ठा) है, वह भी 'सत्' -- ऐसे कही जाती है और उस परमात्माके निमित्त किया जानेवाला कर्म भी 'सत्' -- ऐसा ही कहा जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yajñe tapasi dāne cha sthitiḥ sad iti chochyate" mean in English?

"yajñe tapasi dāne cha sthitiḥ sad iti chochyate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 27. Steadfastness in sacrifice, austerity, and gift is also called 'Sat', and action in connection with these, or for the sake of the Supreme, is also called 'Sat'. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.