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Adhyay 17, Shlok 2
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु

श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

, "ಮೂರ್ತರೂಪದ ಸ್ವಭಾವದಲ್ಲಿ ಅಂತರ್ಗತವಾಗಿರುವ ಮೂರು ವಿಧದ ನಂಬಿಕೆಗಳಿವೆ: ಸಾತ್ವಿಕ (ಶುದ್ಧ), ರಾಜಸಿಕ (ಉತ್ಸಾಹ) ಮತ್ತು ತಾಮಸಿಕ (ಕತ್ತಲೆ) ಅವುಗಳನ್ನು ಕೇಳಿ.

BengaliIND

, "মূর্ত প্রকৃতির মধ্যে অন্তর্নিহিত ত্রিবিধ বিশ্বাস রয়েছে: সাত্ত্বিক (শুদ্ধ), রাজসিক (আবেগপূর্ণ), এবং তামসিক (অন্ধকার)। সেগুলি শুনুন।

TamilIND

, "உடலுறவின் இயல்பில் உள்ளார்ந்த மூன்றுவிதமான நம்பிக்கைகள் உள்ளன: சாத்விக (தூய்மையானது), ராஜாசிக் (உணர்ச்சிமிக்கது), மற்றும் தாமசிக் (இருண்டது) அவற்றைக் கேளுங்கள்.

TeluguIND

, "మూర్తీభవించిన స్వభావంలో మూడు రెట్లు విశ్వాసాలు ఉన్నాయి: సాత్విక (స్వచ్ఛమైన), రాజసిక్ (ఉద్వేగభరితమైన), మరియు తామసిక్ (చీకటి) వాటిని వినండి.

MalayalamIND

, "മൂർത്തികളുടെ സ്വഭാവത്തിൽ അന്തർലീനമായ മൂന്ന് വിശ്വാസങ്ങളുണ്ട്: സാത്വികം (ശുദ്ധം), രാജസിക് (അഭിനിവേശം), താമസം (ഇരുണ്ടത്) അവയെക്കുറിച്ച് കേൾക്കുക.

SindhiIND

”مجسم جي فطرت ۾ ٽيئي عقيدا آهن: ساٿڪ (خالص)، راجاسڪ (پرجوش) ۽ تامسڪ (اونداهو) انهن جي باري ۾ ٻڌو.

PunjabiIND

, "ਸਰੂਪ ਦੀ ਪ੍ਰਕਿਰਤੀ ਵਿੱਚ ਤਿੰਨ ਗੁਣਾਂ ਦੇ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਮੌਜੂਦ ਹਨ: ਸਾਤਵਿਕ (ਸ਼ੁੱਧ), ਰਾਜਸਿਕ (ਭਾਵੁਕ), ਅਤੇ ਤਾਮਸਿਕ (ਹਨੇਰਾ)। ਉਨ੍ਹਾਂ ਬਾਰੇ ਸੁਣੋ।

GujaratiIND

, "મૂર્ત સ્વરૂપના સ્વભાવમાં ત્રણ ગણી શ્રદ્ધા રહેલી છે: સાત્વિક (શુદ્ધ), રાજસિક (ઉત્સાહી), અને તામસિક (શ્યામ). તે સાંભળો.

NepaliIND

, "मूर्तिको प्रकृतिमा निहित तीनवटा विश्वासहरू छन्: सात्विक (शुद्ध), राजसिक (उत्साही) र तामसिक (अन्धकार)। तिनीहरूको बारेमा सुन्नुहोस्।

MarathiIND

, "मूर्तिकृतांच्या स्वभावामध्ये त्रिगुणात्मक श्रद्धा आहेत: सात्विक (शुद्ध), राजसिक (उत्साही) आणि तामसिक (अंधकार) त्यांच्याबद्दल ऐका.

MizoIND

, "Tisa mi nihnaah hian rinna chi thum a awm a, chungte chu sattvic (thianghlim), rajasic (passionate), leh tamasic (thim) te an ni. Chu chu ngaithla rawh."

BhojpuriIND

, "शरीर के स्वभाव में तीन तरह के आस्था निहित बा: सात्विक (शुद्ध), राजसी (भावुक), आ तामसी (अंधेरा)। एकर बात सुनीं।"

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [अर्जुनने निष्ठाको जाननेके लिये प्रश्न किया था? पर भगवान् उसका उत्तर श्रद्धाको लेकर देते हैं क्योंकि श्रद्धाके अनुसार ही निष्ठा होती है।]त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा -- श्रद्धा तीन तरहकी होती है। वह श्रद्धा कौनसी है सङ्गजा है? शास्त्रजा है या स्वभावजा है तो कहते हैं कि वह स्वभावजा है -- सा स्वभावजा अर्थात् स्वभावसे पैदा हुई स्वतःसिद्ध श्रद्धा है। वह न तो सङ्गसे पैदा हुई है और न शास्त्रोंसे पैदा हुई है। वे स्वाभाविक इस प्रवाहमें बह रहे हैं और देवता आदिका पूजन करते जा रहे हैं।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु -- वह स्वभावजा श्रद्धा तीन प्रकारकी होती है -- सात्त्विकी? राजसी और तामसी। उन तीनोंको अलगअलग सुनो।पीछेके श्लोकमें सत्त्वमाहो रजस्तमः पदोंमें आहो अव्यय देनेका तात्पर्य यह था कि अर्जुनकी दृष्टिमें सत्त्वम् से दैवीसम्पत्ति और रजस्तमः से आसुरीसम्पत्ति -- ये दो ही विभाग हैं और भगवान् भी बन्धनकी दृष्टिसे राजसीतामसी दोनोंको आसुरीसम्पत्ति ही मानते हैं -- निबन्धायासुरीमता (16। 5)। परंतु बन्धनकी दृष्टिसे राजसी और तामसी एक होते हुए भी दोनोंके बन्धनमें भेद है। राजस मनुष्य सकामभावसे शास्त्रविहित कर्म भी करते हैं अतः वे स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें जाकर और वहाँके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर फिर मृत्युलोकमें लौट आते हैं -- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति (गीता 9। 21)। परन्तु तामस मनुष्य शास्त्रविहित कर्म नहीं करते अतः वे कामना और मूढ़ताके कारण अधम गतिमें जाते हैं -- अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)। इस प्रकार राजस और तामस -- दोनों ही मनुष्योंका बन्धन बना रहता है। दोनोंके बन्धनमें भेदकी दृष्टिसे ही भगवान् आसुरीसम्पदावालोंकी श्रद्धाके राजसी और तामसी -- दो भेद करते हैं और सात्त्विकी? राजसी और तामसी -- तीनों श्रद्धाओंको अलगअलग सुननेके लिये कहते हैं। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें वर्णित स्वभावजा श्रद्धाके तीन भेद क्यों होते हैं -- इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

यह प्रश्न साधारण मनुष्योंके विषयमें है अतः इसका उत्तर बिना विभाग किये देना उचित नहीं? इस अभिप्रायसे श्रीभगवान् बोले --, जिस निष्ठाके विषयमें तू पूछता है? मनुष्योंकी वह स्वभावजन्य श्रद्धा अर्थात् जन्मान्तरमें किये हुए धर्मअधर्म आदिके जो संस्कार मृत्युके समय प्रकट हुआ करते हैं उनके समुदायका नाम स्वभाव है? उससे उत्पन्न हुई श्रद्धातीन प्रकारकी होती है। सत्त्वगुणसे उत्पन्न हुई देवपूजादिविषयक श्रद्धा सात्त्विकी है? रजोगुणसे उत्पन्न हुई यक्षराक्षसादिकी पूजाविषयक श्रद्धा राजसी है और तमोगुणसे उत्पन्न हुई प्रेतपिशाच आदिकी पूजाविषयक श्रद्धा तामसी है। ऐसे तीन प्रकारकी श्रद्धा होती है। उस आगे कही जानेवाली ( तीन प्रकारकी ) श्रद्धाको तू सुन।

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Sri Anandgiri

विशेषनिष्ठमुत्तरं सामान्येन वक्तुं न शक्यमित्याशयेन परिहरति -- सामान्येति। किमिति श्रद्धात्रैविध्यं प्रश्नानुपयुक्तमुच्यते तत्राह -- यस्यामिति। श्रद्धापूर्विकायां क्रियायामिति यावत्। श्रद्धात्रैविध्ये हेतुमाह -- सा स्वभावजेति। स्वभावशब्दार्थं प्रकृतोपयोगितया कथयति -- जन्मान्तरेति। कथं त्रिविधेत्यपेक्षायामाह -- सात्त्विकीत्यादिना। कथमुक्ता श्रद्धा स्वभावजेति तत्राह -- तामिति।

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Sri Dhanpati

प्रश्नानुरुपमुत्तरं श्रीभगवानुवाच। त्रिविधा त्रिप्रकारा श्रद्धा भवति? ययान्वितानां निष्ठां त्वं पृच्छसि सा देहिनं देहवतां जीवानां स्वभावजा। जन्मान्तरकृतधर्माधर्मादिसंस्कारो मरणकालेऽभिव्यक्तः स्वभाव उच्यते। तस्माज्जाता जीवानां त्रिविधात्स्वभावाज्जातत्वात् श्रद्धा त्रिविधा भवतीत्यर्थः। या तु अस्वभावजा असूनामभावोऽस्वभावः मरणमित्यर्थस्तस्मिन्समीपे सति जाता। मरणसमये व्यस्तानां समस्तानां वा गुणानामुद्भवे जन्मान्तरे तत्संस्कारवशात्तत्तद्गुणाधिक एव भवतीति व्यवस्था कारणमितीतरेषां व्याख्या। सा तुमुखमस्तीत वक्त्व्यं इतिन्यायविजृम्बितत्वादुपेक्ष्या। श्रद्धायास्त्रैविध्यमाह। एवं त्रिविधां तां श्रद्धां भयोच्यमानां श्रुणु।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
trividhā
bhavatiis
śhraddhāfaith
dehināmembodied beings
which
svabhāva
sāttvikīof the mode of goodness
rājasīof the mode of passion
chaand
evacertainly
tāmasīof the mode of ignorance
chaand
itithus
tāmabout this
śhṛiṇuhear
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अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः

हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.3
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः

हे भारत ! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। इसलिये जो जैसी श्रद्धावाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा -- स्थिति है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 2
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु

श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 2 translates to: ", "There are threefold faiths inherent in the nature of the embodied: the sattvic (pure), the rajasic (passionate), and the tamasic (dark). Hear of them. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।सात्त्विकी राजसी चैव ताम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī-bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī-bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 2. , "There are threefold faiths inherent in the nature of the embodied: the sattvic (pure), the rajasic (passionate), and the tamasic (dark). Hear of them. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.