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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 1
अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः

हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी? — VaniSagar

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MarathiIND

जे शास्त्राच्या आज्ञेची अवहेलना करून श्रद्धेने यज्ञ करतात त्यांची अवस्था काय आहे - हे कृष्णा, सत्त्व, रज की तम?

PunjabiIND

ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਕੀ ਹਾਲਤ ਹੈ, ਜੋ ਧਰਮ-ਗ੍ਰੰਥਾਂ ਦੇ ਹੁਕਮਾਂ ਦੀ ਅਣਦੇਖੀ ਕਰਕੇ, ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਬਲੀਦਾਨ ਕਰਦੇ ਹਨ- ਕੀ ਇਹ ਸਤ, ਰਜਸ ਜਾਂ ਤਮਸ ਹੈ, ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ?

TamilIND

கிருஷ்ணா, சாஸ்திரங்களின் கட்டளைகளைப் புறக்கணித்து, நம்பிக்கையுடன் யாகம் செய்பவர்களின் நிலை என்ன?

TeluguIND

శాస్త్రోక్తమైన ఆజ్ఞలను విస్మరించి, విశ్వాసంతో త్యాగం చేసేవారి పరిస్థితి ఏమిటి- ఓ కృష్ణా, ఇది సత్వమా, రజమా, లేదా తామసమా?

MalayalamIND

ഗ്രന്ഥങ്ങളുടെ കൽപ്പനകൾ അവഗണിച്ച് വിശ്വാസത്തോടെ ത്യാഗം അനുഷ്ഠിക്കുന്നവരുടെ അവസ്ഥ എന്താണ് - കൃഷ്ണാ, ഇത് സത്വമോ രജസ്സോ തമസ്സോ?

KannadaIND

ಶಾಸ್ತ್ರಗಳ ಕಟ್ಟಳೆಗಳನ್ನು ನಿರ್ಲಕ್ಷಿಸಿ, ನಂಬಿಕೆಯಿಂದ ತ್ಯಾಗವನ್ನು ಮಾಡುವವರ ಸ್ಥಿತಿ ಏನಾಗುತ್ತದೆ-ಇದು ಸತ್ವವೋ, ರಾಜಸವೋ, ಅಥವಾ ತಾಮಸವೋ, ಓ ಕೃಷ್ಣಾ?

BengaliIND

যাঁরা শাস্ত্রের নির্দেশকে উপেক্ষা করে বিশ্বাসের সঙ্গে যজ্ঞ করেন, তাঁদের অবস্থা কী—এটা কি সত্ত্ব, রজস, না তমস, হে কৃষ্ণ?

SindhiIND

انهن جو ڪهڙو حال آهي، جيڪي صحيفن جي حڪمن کي نظرانداز ڪري، عقيدت سان قرباني ڪن ٿا- اي ڪرشن، ستو، راجس يا تمس؟

GujaratiIND

જેઓ શાસ્ત્રોના આદેશની અવગણના કરીને શ્રદ્ધા સાથે યજ્ઞ કરે છે તેમની શું હાલત છે - શું તે સત્વ, રજસ કે તમસ છે, હે કૃષ્ણ?

NepaliIND

शास्त्रको आज्ञाको अवहेलना गरेर श्रद्धापूर्वक यज्ञ गर्नेहरुको अवस्था के हुन्छ– हे कृष्ण, सत्त्व, रजस वा तमस ?

KonkaniIND

शास्त्रांतल्या आज्ञांक आडनदर करून श्रद्धेन यज्ञ करपी लोकांची स्थिती कितें-सत्त्व, रज वा तामस, हे कृष्ण?

MizoIND

Pathian Lehkha Thu thupekte ngaihthah a, rinna nena inthawina titute dinhmun chu eng nge ni—Aw Krishna, Sattva emaw, Rajas emaw, Tamas emaw a ni em?

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य ৷৷. सत्त्वमाहो रजस्तमः -- श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका संवाद सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये है। उन दोनोंके सामने कलियुगकी जनता थी क्योंकि द्वापरयुग समाप्त हो रहा था। आगे आनेवाले कलियुगी जीवोंकी तरफ दृष्टि रहनेसे अर्जुन पूछते हैं कि महाराज जिन मनुष्योंका भाव बड़ा अच्छा है? श्रद्धाभक्ति भी है? पर शास्त्रविधिको जानते नहीं । यदि वे जान जायँ? तो पालन करने लग जायँ? पर उनको पता नहीं। अतः उनकी क्या स्थिति होती हैआगे आनेवाली जनतामें शास्त्रका ज्ञान बहुत कम रहेगा। उन्हें अच्छा सत्सङ्ग मिलना भी कठिन होगा क्योंकि अच्छे सन्तमहात्मा पहले युगोंमें भी कम हुए हैं? फिर कलियुगमें तो और भी कम होंगे। कम होनेपर भी यदि भीतर चाहना हो तो उन्हें सत्संग मिल सकता है। परन्तु मुश्किल यह है कि कलियुगमें दम्भ? पाखण्ड ज्यादा होनेसे कई दम्भी और पाखण्डी पुरुष सन्त बन जाते हैं। अतः सच्चे सन्त पहचानमें आने मुश्किल हैं। इस प्रकार पहले तो सन्तमहात्मा मिलने कठिन हैं और मिल भी जायँ तो उनमेंसे कौनसे संत कैसे हैं -- इस बातकी पहचान प्रायः नहीं होती और पहचान हुए बिना उनका संग करके विशेष लाभ ले लें -- ऐसी बात भी नहीं है। अतः जो शास्त्रविधिको भी नहीं जानते और असली सन्तोंका सङ्ग भी नहीं मिलता? परन्तु जो कुछ यजनपूजन करते हैं? श्रद्धासे करते हैं -- ऐसे मनुष्योंकी निष्ठा कौनसी होती है सात्त्विकी अथवा राजसीतामसीसत्त्वमाहो रजस्तमः पदोंमें सत्त्वगुणको दैवीसम्पत्तिमें और रजोगुण तथा तमोगुणको आसुरीसम्पत्तिमें ले लिया गया है। रजोगुणको आसुरीसम्पत्तिमें लेनेका कारण यह है कि रजोगुण तमोगुणके बहुत निकट है । गीतामें कई जगह ऐसी बात आयी है जैसे -- दूसरे अध्यायके बासठवेंतिरसठवें श्लोकोंमें काम अर्थात् रजोगुणसे क्रोध और क्रोधसे मोहरूप तमोगुणका उत्पन्न होना बताया गया है । ऐसे ही अठारहवें अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें हिंसात्मक और शोकान्वितको रजोगुणी कर्ताका लक्षण बताया गया है और अठारहवें अध्यायके ही पचीसवें श्लोकमें हिंसा को तामस कर्मका लक्षण और पैंतीसवें श्लोकमें शोक को तामस धृतिका लक्षण बताया गया है। इस प्रकार रजोगुण और तमोगुणके बहुतसे लक्षण आपसमें मिलते हैं।सात्त्विक भाव? आचरण और विचार दैवीसम्पत्तिके होते हैं और राजसीतामसी भाव? आचरण और विचार आसुरीसम्पत्तिके होते हैं। सम्पत्तिके अनुसार ही निष्ठा होती है अर्थात् मनुष्यके जैसे भाव? आचरण और विचार होते हैं? उन्हींके अनुसार उसकी स्थिति (निष्ठा) होती है। स्थितिके अनुसार ही आगे गति होती है। आप कहते हैं कि शास्त्रविधिका त्याग करके मनमाने ढंगसे आचरण करनेपर सिद्धि? सुख और परमगति नहीं मिलती? तो जब उनकी निष्ठाका ही पता नहीं? फिर उनकी गतिका क्या पता लगे इसलिये आप उनकी निष्ठा बताइये? जिससे पता लग जाय कि वे सात्त्विकी गतिमें जाननेवाले हैं या राजसीतामसी गतिमें।कृष्ण का अर्थ है -- खींचनेवाला। यहाँ कृष्ण सम्बोधनका तात्पर्य यह मालूम देता है कि आप ऐसे मनुष्योंको अन्तिम समयमें किस ओर खींचेगे उनको किस गतिकी तरफ ले जायँगे छठे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भी अर्जुनने गतिविषयक प्रश्नमें कृष्ण सम्बोधन दिया है -- कां गतिं कृष्ण गच्छति। यहाँ भी अर्जुनका निष्ठा पूछनेका तात्पर्य गतिमें ही है।मनुष्यको भगवान् खींचते हैं या वह कर्मोंके अनुसार स्वयं खींचा जाता है वस्तुतः कर्मोंके अनुसार ही फल मिलता है? पर कर्मफलके विधायक होनेसे भगवान्का खींचना सम्पूर्ण फलोंमें होता है। तामसी कर्मोंका फल,नरक होगा? तो भगवान् नरकोंकी तरफ खींचेंगे। वास्तवमें नरकोंके द्वारा पापोंका नाश करके प्रकारान्तरसे भगवान् अपनी तरफ ही खींचते हैं। उनका किसीसे भी वैर या द्वेष नहीं है। तभी तो आसुरी योनियोंमें जानेवालोंके लिये भगवान् कहते हैं कि वे मेरेको प्राप्त न होकर अधोगतिमें चले गये (16। 20)। कारण कि उनका अधोगतिमें जाना भगवान्को सुहाता नहीं है। इसलिये सात्त्विक मनुष्य हो? राजस मनुष्य हो या तामस मनुष्य हो? भगवान् सबको अपनी तरफ ही खींचते हैं। इसी भावसे यहाँ कृष्ण सम्बोधन आया है। सम्बन्ध -- शास्त्रविधिको न जाननेपर भी मनुष्यमात्रमें किसीनकिसी प्रकारकी स्वभावजा श्रद्धा तो रहती ही है। उस श्रद्धाके भेद आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते इस भगवद्वाक्यसे जिसको प्रश्नका बीज मिला है वह अर्जुन बोला --, जो कोई साधारण मनुष्य? शास्त्रविधिको -- शास्त्रकी आज्ञाको अर्थात् श्रुतिस्मृति आदि शास्त्रोंके विधानको छोड़कर श्रद्धासे अर्थात् आस्तिकबुद्धिसे युक्त यानी सम्पन्न होकर देवादिका पूजन करते हैं। यहाँ ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः इस कथनसे श्रुतिरूप या स्मृतिरूप किसी भी शास्त्रके विधानको न जानकर? केवल वृद्ध व्यवहारको आदर्श मानकर? जो श्रद्धापूर्वक देवादिका पूजन करते हैं? वे ही मनुष्य ग्रहण किये गये हैं। किंतु जो मनुष्य कुछ शास्त्रविधिको जानते हुए भी? उसको छोड़कर अविधिपूर्वक देवादिका पूजन करते हैं? वे ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते इस कथनसे ग्रहण नहीं किये जा सकते। पू0 -- किसलिये ( ग्रहण नहीं किये जा सकते ) उ0 -- श्रद्धासे युक्त हुए ( पूजन करते हैं ) ऐसा विशेषण दिया गया है इसलिये। क्योंकि देवादिके पूजाविषयक किसी भी शास्त्रको जानते हुए ही उसे अश्रद्धापूर्वक छोड़कर? उस शास्त्रद्वारा विधान की हुई देवादिकी पूजामें श्रद्धासे युक्त हुए बर्तते हैं? ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। अतः पहले बतलाये हुए मनुष्य ही ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः इस कथनसे ग्रहण किये जाते हैं। हे कृष्ण इस प्रकारके उन मनुष्योंकी निष्ठा कौनसी है सात्त्विक है राजस है अथवा तामस है यानी उनकी स्थिति सात्त्विकी है या राजसी या तामसी है कहनेका अभिप्राय यह है कि उनकी जो देवादिविषयक पूजा है? वह सात्त्विकी है राजसी है अथवा तामसी है।

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Sri Anandgiri

आस्तिकानां नास्तिकानां च शास्त्रैकचक्षुषां गतिरुक्ता संप्रत्यास्तिकानामेव शास्त्रानभिज्ञानां गतिजिज्ञासया पृच्छतीत्याह -- तस्मादिति। यजन्त इति यागग्रहणं दानादेरुपलक्षणम्। यदि वेदोक्तं विधिमपश्यन्तस्तमुत्सृजन्ति कथं तर्हि श्रद्दधाना यागादि कुर्वन्ति? नहि मानं विना श्रद्धया यागादि कर्तुं शक्यमित्याशङ्क्याह -- श्रुतीति। ननु शास्त्रीयं विधिं पश्यन्तोऽपि केचित्तमुपेक्ष्य स्वोत्प्रेक्षया यागादि कुर्वन्तो दृश्यन्ते तेषामिह ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य इति ग्रहो भविष्यति नेत्याह -- ये पुनरिति। तेषामत्रापरिग्रहे प्रश्नपूर्वकं हेतुमाह -- कस्मादिति। शास्त्रज्ञानं तदुपेक्षावतां ग्रहेऽपि विशेषणमविरुद्धमित्याशङ्क्य व्याघातान्मैवमित्याह -- देवादीति। अश्रद्दधानतया तदुत्सृज्येति संबन्धः। शास्त्रोक्तं विधिमधिगच्छतामपि तमवधीर्य स्वेच्छया देवपूजादौ प्रवृत्तानामासुरेष्वेवान्तर्भावो यस्मादनन्तराध्याये सिद्धस्तस्मादास्तिकाधिकारे तेषां प्रसङ्गो नास्तीत्युपसंहरति -- यस्मादिति। पूर्वोक्ताः शास्त्रानभिज्ञाः। वृद्धव्यवहारानुसारिण इति यावत्। तैः श्रद्धया क्रियमाणं कर्म कुत्र पर्यवस्यतीति पृच्छति -- तेषामिति। का निष्ठेत्येतद्विवृणोति -- सत्त्वमिति। कार्याणां कारणैर्व्यपदेशमाश्रित्य तात्पर्यमाह -- एतदिति।

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Sri Dhanpati

गीताभाष्यप्राकाशेन जगदुद्धारकौ परौ। वन्दे परस्परात्मानौ देवौ श्रीकृष्णशंकरौ।।यः शास्त्रविधिमुत्सृत्य?तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते इति भगवद्वाक्यात् ये शास्त्रविधिं परित्यज्य कामकारतः प्रवृत्तास्ते नास्तिका असुराः? ये तु शास्त्रविधिमनुरुध्य विहितानुष्ठानाय प्रतिषिद्धप्रहाणाय च श्रद्दधानतया प्रवृत्तास्ते आस्तिकाः सुरा इति ज्ञात्वा श्रद्धावतां शास्त्रानबिज्ञानां निष्ठां जिज्ञासुरर्जुन उवाच। ये केचिदसुराणां देवानां च विशेषणैरविशेषिताः शास्त्रविधिं श्रुतिस्भृत्यादिशास्त्रविधानमुत्सृज्यालस्यादिनाऽपश्यन्तो वृद्धव्यवहारादेव श्रद्धया आस्तिक्यबुद्य्धान्विताः संयुक्ताः सन्तो देवादीन्यजन्ति पूजयन्ति। ये तु किंचिच्छास्त्रविधिमुपलभमाना एवाश्रद्धधानतया तमुत्सृज्यायथाविधि देवादीन्पूजयन्ति तेत्र न गृह्यन्ते। श्रद्धयान्विता इति विशेणात्। तेषामेवंभूतानां निष्ठा तु का किं सत्त्वमवस्थानं श्रद्धायाः सात्त्विकत्वात्। आहो रजः किंवा तमः। क्लेशबुद्य्धा आलस्येन च शास्त्रादर्शनस्य राजसतामसत्वात्। एतदुक्तं भवति। या तेषां देवादिविषया पूजा सा किं सात्त्विकी आहोस्विद्राजस्युत तामसीति?कृषिर्भूवाचकः शब्दोण्श्च निर्वृतिवाचकः। तयोकैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते इति निरुक्तमभिप्रेत्य सर्वत्र सत्तास्फूरर्त्यादिना स्थितस्य परमात्मनस्तव किंचिदप्यविदितं न भवतीति सूचयन्संबोधयति -- कृष्णेति। मम संशयापकर्षणेति वा संबोधनार्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
arjunaḥ uvāchaArjun said
yewho
śhāstravidhim
utsṛijyadisregard
yajanteworship
śhraddhayāanvitāḥ
teṣhāmtheir
niṣhṭhāfaith
tuindeed
what
kṛiṣhṇaKrishna
sattvammode of goodness
āhoor
rajaḥmode of passion
tamaḥmode of ignorance
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.2
श्री भगवानुवाचत्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु

श्रीभगवान् बोले -- मनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो। — VaniSagar

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Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 1
अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः

हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी? — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी? — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 1 translates to: "What is the condition of those who, disregarding the injunctions of the scriptures, perform sacrifice with faith—is it Sattva, Rajas, or Tamas, O Krishna? — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अर्जुन उवाचये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।तेषां निष्ठा तु का कृ" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी? — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "arjuna uvācha" mean in English?

"arjuna uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 1. What is the condition of those who, disregarding the injunctions of the scriptures, perform sacrifice with faith—is it Sattva, Rajas, or Tamas, O Krishna? — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.