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Sudarshana Chakra
Adhyay 17, Shlok 18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्

जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है। — VaniSagar

Global Translations

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BengaliIND

যে তপস্যা ভাল অভ্যর্থনা, সম্মান ও উপাসনা লাভের লক্ষ্যে এবং কপটতার সাথে করা হয় তাকে রাজসিক, অস্থির এবং ক্ষণস্থায়ী বলা হয়।

PunjabiIND

ਜਿਸ ਤਪੱਸਿਆ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਚੰਗੇ ਸੁਆਗਤ, ਸਨਮਾਨ ਅਤੇ ਪੂਜਾ ਦੇ ਉਦੇਸ਼ ਨਾਲ ਅਤੇ ਪਾਖੰਡ ਨਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਨੂੰ ਰਾਜਸੀ, ਅਸਥਿਰ ਅਤੇ ਅਸਥਾਈ ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

GujaratiIND

સારા સ્વાગત, સન્માન અને પૂજાના ઉદ્દેશ્ય સાથે અને દંભ સાથે જે તપસ્યા કરવામાં આવે છે તે રાજસિક, અસ્થિર અને ક્ષણિક કહેવાય છે.

MarathiIND

चांगले स्वागत, सन्मान आणि उपासना मिळवण्याच्या उद्देशाने आणि दांभिकतेने जी तपस्या केली जाते, ती राजसिक, अस्थिर आणि क्षणभंगुर असे म्हणतात.

TamilIND

நல்ல வரவேற்பையும், மரியாதையையும், வழிபாட்டையும் பெறுவதை நோக்கமாகக் கொண்டும், பாசாங்குத்தனத்தோடும் கடைப்பிடிக்கப்படும் துறவு ராஜஸம், நிலையற்றது, நிலையற்றது என்று கூறப்படுகிறது.

MalayalamIND

നല്ല സ്വീകരണം, ബഹുമാനം, ആരാധന എന്നിവ നേടുക എന്ന ലക്ഷ്യത്തോടെയും കാപട്യത്തോടെയും അനുഷ്ഠിക്കുന്ന തപസ്സ് രാജസികവും അസ്ഥിരവും ക്ഷണികവുമാണെന്ന് പറയപ്പെടുന്നു.

TeluguIND

మంచి ఆదరణ, గౌరవం మరియు పూజలను పొందాలనే లక్ష్యంతో మరియు కపటత్వంతో ఆచరించే తపస్సు రాజసికం, అస్థిరమైనది మరియు క్షణికమైనది.

KannadaIND

ಉತ್ತಮ ಸ್ವಾಗತ, ಗೌರವ ಮತ್ತು ಆರಾಧನೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುವ ಉದ್ದೇಶದಿಂದ ಮತ್ತು ಕಪಟದಿಂದ ಆಚರಿಸುವ ತಪಸ್ಸು ರಾಜಸಿಕ, ಅಸ್ಥಿರ ಮತ್ತು ಕ್ಷಣಿಕ ಎಂದು ಹೇಳಲಾಗುತ್ತದೆ.

NepaliIND

असल स्वागत, सम्मान, पुजा प्राप्त गर्ने उद्देश्यले र पाखण्डसहित गरिने तपस्यालाई राजसिक, अस्थिर र क्षणिक भनिन्छ।

SindhiIND

جنهن سادگيءَ کي نيڪي، عزت ۽ عبادت حاصل ڪرڻ جي مقصد سان ۽ منافقت سان ڪيو ويندو آهي، ان کي راجسڪي، غير مستحڪم ۽ عارضي چئبو آهي.

OdiaIND

ଉତ୍ତମ ଗ୍ରହଣ, ସମ୍ମାନ, ଏବଂ ଉପାସନା ହାସଲ କରିବା ଏବଂ କପଟୀତା ସହିତ ଅଭ୍ୟାସ କରାଯାଉଥିବା ଆର୍ଥିକତା ରାଜାସିକ୍, ଅସ୍ଥିର ଏବଂ କ୍ଷଣସ୍ଥାୟୀ ବୋଲି କୁହାଯାଏ |

KonkaniIND

बरो स्वागत, मान आनी उपासना मेळोवपाच्या हेतान आनी पाखंडीपणान जें तप करतात तें राजसी, अस्थिर आनी क्षणिक अशें म्हण्टात.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- सत्कारमानपूजार्थं तपः क्रियते -- राजस मनुष्य सत्कार? मान और पूजाके लिये ही तप किया करते हैं जैसे -- हम जहाँकहीं जायँगे? वहाँ हमें तपस्वी समझकर लोग हमारी अगवानीके लिये सामने आयेंगे। गाँवभरमें हमारी सवारी निकालेंगे। जगहजगह लोग हमें उत्थान देंगे? हमें बैठनेके लिये आसन देंगे? हमारे नामका जयघोष करेंगे? हमसे मीठा बोलेंगे? हमें अभिनन्दनपत्र देंगे इत्यादि बाह्य क्रियाओंद्वारा हमारा सत्कार करेंगे। लोग हृदयसे हमें श्रेष्ठ मानेंगे कि ये बड़े संयमी? सत्यवादी? अहिंसक सज्जन हैं? वे सामान्य मनुष्योंकी अपेक्षा हमारेमें विशेष भाव रखेंगे इत्यादि हृदयके भावोंसे लोग हमारा मान करेंगे। जीतेजी लोग हमारे चरण धोयेंगे? हमारे मस्तकपर फूल चढ़ायेंगे? हमारे गलेमें माला पहनायेंगे? हमारी आरती उतारेंगे? हमें प्रणाम करेंगे? हमारी चरणरजको सिरपर चढ़ायेंगे और मरनेके बाद हमारी वैकुण्ठी निकालेंगे? हमारा स्मारक बनायेंगे और लोग उसपर श्रद्धाभक्तिसे पत्र? पुष्प? चन्दन? वस्त्र? जल आदि चढ़ायेंगे? हमारे स्मारककी परिक्रमा करेंगे इत्यादि क्रियाओंसे हमारी पूजा करेंगे।दम्भेन चैव यत् -- भीतरसे तपपर श्रद्धा और भाव न होनेपर भी बाहरसे केवल लोगोंको दिखानेके लिये आसन लगाकर बैठ जाना? माला घुमाने लग जाना? देवता आदिका पूजन करने लग जाना? सीधेसरल चलना? हिंसा न करना आदि।तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् -- राजस तपका फल चल और अध्रुव कहा गया है। तात्पर्य है कि जो तप सत्कार? मान और पूजाके लिये किया जाता है? उस राजस तपका फल यहाँ चल अर्थात् नाशवान् कहा गया है और जो तप केवल दिखावटीपनके लिये किया जाता है? उसका फल यहाँ अध्रुव अर्थात् अनिश्चित (फल मिले या न मिले? दम्भ सिद्ध हो या न हो) कहा गया है।इह प्रोक्तम् पदोंका तात्पर्य यह है कि इस राजस तपका इष्ट फल प्रायः यहाँ ही होता है। कारण कि सात्त्विक पुरुषोंका तो ऊर्ध्वलोक है? तामस मनुष्योंका अधोलोक है और राजस मनुष्योंका मध्यलोक है (गीता 14। 18)। इसलिये राजस तपका फल न स्वर्ग होगा और न नरक होगा किन्तु यहाँ ही महिमा होकर? प्रशंसा होकर खत्म हो जायगा।राजस मनुष्यके द्वारा शारीरिक? वाचिक और मानसिक तप हो सकता है क्या फलेच्छा होनेसे वह देवता आदिका पूजन कर सकता है। उसमें कुछ सीधासरलपन भी रह सकता है। ब्रह्मचर्य रहना मुश्किल है।,अहिंसा भी मुश्किल है। पुस्तक आदि पढ़ सकता है। उसका मन हरदम प्रसन्न नहीं रह सकता और सौम्यभाव भी हरदम नहीं रह सकता। कामनाके कारण उसके मनमें संकल्पविकल्प होते रहेंगे। वह केवल सत्कार? मान? पूजा और दम्भके लिये ही तप करता है? तो उसके भावकी संशुद्धि कैसे होगी अर्थात् उसके भाव शुद्ध कैसे होंगे अतः राजस मनुष्य तीन प्रकारके तपको साङ्गोपाङ्ग नहीं कर सकता।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

जो तप सत्कार? मान और पूजाके लिये किया जाता है -- यह बड़ा श्रेष्ठ पुरुष है? तपस्वी है? ब्राह्मण है। इस प्रकार जो बड़ाई की जाती है उसका नाम सत्कार है। ( आते देखकर ) खड़े हो जाना तथा प्रणाम आदि करना -- ऐसे सम्मानका नाम मान है। पैर धोना? अर्चन करना? भोजन कराना इत्यादिका नाम पूजा है। इन सबके लिये जो तप किया जाता है और जो दम्भसे किया जाता है? वह तप यहाँ राजसी कहा गया है। तथा अनिश्चित फलवाला होनेसे नाशवान् और अनित्य भी कहा गया है।

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Sri Anandgiri

राजसं तपो निर्दिशति -- सत्कारेति। साधुकारमेवास्फोरयति -- साधुरिति। दम्भेन चैव नास्तिक्येन केवलधर्मध्वजित्वेनेत्यर्थः। तदिह प्रोक्तमस्मिन्नेव लोके फलप्रदमित्यर्थः। कादाचित्कफलवत्वमध्रुवमनियतमनैकान्तिकफलमिति यावत्।

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Sri Dhanpati

सात्त्विकं तप उदाहृत्य राजसं तदुदाहरति। सत्कारः साधुरयं तपस्वीत्येवं स्तुतिरुपः साधुकारः। मानो माननं प्रत्युत्थानाभिवादनादि। पूजा पादप्रक्षालनार्चनान्नधनाद्यनाद्यर्पणादि तदर्थं। दम्भेन चैव नास्तिक्येन केवलधर्मध्वजित्वेन यत्तपः क्रियते तदिहास्मिन्नेव लोके सत्कारादिफलप्रदं राजसं प्रोक्तं कथितम्। चलं क्षणिकफलमध्रुवमनियतफलं? यद्वा चलं कादाचित्कफलं दाम्भिकोऽयमित्यापरिज्ञानकाले कस्मिंश्चित्सत्कारादिफलप्रदं नतु सर्वदेतियवात्। अतएवाध्रुवं सत्कारादिप्राप्तिपर्यन्तं स्थायि नतु सदैवेत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
satkāra
mānahonor
pūjāadoration
arthamfor the sake of
tapaḥausterity
dambhenawith ostentation
chaalso
evacertainly
yatwhich
kriyateis performed
tatthat
ihain this world
proktamis said
rājasamin the mode of passion
chalamflickering
adhruvamtemporary
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 17.17
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्ित्रविधं नरैः।अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते

परम श्रद्धासे युक्त फलेच्छारहित मनुष्योंके द्वारा तीन प्रकार-(शरीर, वाणी और मन-) का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 17.19
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः।परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्

जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे अपनेको पीड़ा देकर अथवा दूसरोंको कष्ट देनेके लिये किया जाता है, वह तप तामस कहा गया है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 17Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 17, Shlok 18
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्

जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 17 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 18 translates to: "The austerity that is practiced with the aim of gaining good reception, honor, and worship, and with hypocrisy, is said to be Rajasic, unstable, and transient. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 17, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Sraddha-Traya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat" mean in English?

"satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 17 Verse 18. The austerity that is practiced with the aim of gaining good reception, honor, and worship, and with hypocrisy, is said to be Rajasic, unstable, and transient. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.