Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 13
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

KonkaniIND

धर्तरेक व्यापून, सगळ्या प्राण्यांक म्हज्या उर्जेन आदार दितां; आनी उदकाचो चंद्र जावन सगळ्या वनस्पतींचें पोशण करतां.

BhojpuriIND

धरती में व्याप्त होके हम अपना ऊर्जा से सभ जीव के सहारा देनी; आ पानी के चाँद बन के हम सब जड़ी-बूटी के पोषण करेनी।

ManipuriIND

ꯄ꯭ꯔ꯭ꯏꯊꯤꯕꯤꯗꯥ ꯆꯦꯟꯊꯔꯀꯄꯥ, ꯑꯩꯅꯥ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯀꯄꯨ ꯑꯩꯒꯤ ꯏꯅꯔꯖꯤꯅꯥ ꯁꯄꯣꯔꯠ ꯇꯧꯏ; ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯏꯁꯤꯡꯒꯤ ꯊꯥ ꯑꯃꯥ ꯑꯣꯏꯔꯀꯄꯗꯒꯤ ꯑꯩꯅꯥ ꯃꯍꯩ-ꯃꯔꯣꯡ ꯄꯨꯝꯅꯃꯀꯄꯨ ꯌꯣꯀꯄꯤ꯫

MaithiliIND

पृथ्वी मे व्याप्त, हम अपन ऊर्जा सँ सब प्राणी के सहारा दैत छी; आ जलीय चन्द्रमा बनि हम सभ जड़ी-बूटीक पोषण करैत छी।

MarathiIND

पृथ्वीवर पसरून, मी माझ्या शक्तीने सर्व प्राण्यांना आधार देतो; आणि पाणीदार चंद्र बनून, मी सर्व औषधी वनस्पतींचे पोषण करतो.

AssameseIND

পৃথিৱীত গ্ৰাস কৰি মই মোৰ শক্তিৰে সকলো সত্তাক সমৰ্থন কৰো; আৰু জলচন্দ্ৰ হৈ মই সকলো বনৌষধিক পুষ্টি দিওঁ।

MizoIND

Leilung luah khatin, Ka chakna hmangin thilsiam zawng zawng ka thlawp a; tin, thla tui tak ka lo nih tawh avangin thlai chi zawng zawng ka chawm a ni.

TeluguIND

భూమిని విస్తరించి, నేను నా శక్తితో అన్ని జీవులకు మద్దతు ఇస్తున్నాను; మరియు నీటి చంద్రునిగా మారినందున, నేను అన్ని మూలికలను పోషించాను.

NepaliIND

पृथ्वीमा व्याप्त, म आफ्नो शक्तिले सबै प्राणीहरूलाई समर्थन गर्छु; र पानीको चन्द्रमा बनेर, म सबै जडीबुटीहरू पोषण गर्छु।

SindhiIND

زمين کي گھيرو ڪندي، مان پنھنجي توانائي سان سڀني مخلوقن جي مدد ڪريان ٿو. ۽ پاڻي وارو چنڊ بڻجي، مون سڀني جڙي ٻوٽين کي پاليو.

TamilIND

பூமியில் ஊடுருவி, நான் என் ஆற்றலால் அனைத்து உயிரினங்களையும் ஆதரிக்கிறேன்; நீர் நிலவாகி, அனைத்து மூலிகைகளையும் நான் போஷிக்கிறேன்.

BengaliIND

পৃথিবীতে ছড়িয়ে থাকা, আমি আমার শক্তি দিয়ে সমস্ত প্রাণীকে সমর্থন করি; এবং জলপূর্ণ চাঁদ হয়ে, আমি সব ভেষজ পুষ্টি.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा -- भगवान् ही पृथ्वीमें प्रवेश करके उसपर स्थित सम्पूर्ण स्थावरजङ्गम प्राणियोंको धारण करते हैं। तात्पर्य यह है कि पृथ्वीमें जो धारणशक्ति देखनेमें आती है? वह पृथ्वीकी अपनी न होकर भगवान्की ही है ।वैज्ञानिक भी इस बातको स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीकी अपेक्षा जलका स्तर ऊँचा है और पृथ्वीपर जलका भाग स्थलकी अपेक्षा बहुत अधिक है । ऐसा होनेपर भी पृथ्वी जलमग्न नहीं होती -- यह भगवान्की धारणशक्तिका ही प्रभाव है।पृथ्वीके उपलक्षणसे यह समझना चाहिये कि पृथ्वीके सिवाय जहाँ भी धारणशक्ति देखनेमें आती है? वह सब भगवान्की ही है। पृथ्वीमें अन्नादि ओषधियोंको उत्पन्न करनेकी (उत्पादिका) शक्ति एवं गुरुत्वाकर्षणशक्ति भी भगवान्की ही समझनी चाहिये।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः -- चन्द्रमामें दो शक्तियाँ हैं -- प्रकाशिकाशक्ति और पोषणशक्ति। प्रकाशिकाशक्तिमें अपने प्रभावका वर्णन पूर्वश्लोकमें करनेके बाद अब भगवान् इस श्लोकमें,चन्द्रमाकी पोषणशक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं कि चन्द्रमाके माध्यमसे सम्पूर्ण वनस्पतियोंको मैं ही पुष्ट करता हूँ।चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पोषक और कृष्णपक्षमें शोषक होता है। शुक्लपक्षमें रसमय चन्द्रमाकी मधुर किरणोंसे अमृतवर्षा होनेके कारण ही लतावृक्षादि पुष्ट होते हैं और फलतेफूलते हैं। माताके उदरमें स्थित शिशु भी शुक्लपक्षमें वृद्धिको प्राप्त होता है।यहाँ सोमः पद चन्द्रलोकका वाचक है? चन्द्रमण्डलका नहीं। नेत्रोंसे हमें जो दीखता है? वह चन्द्रमण्डल है। चन्द्रमण्डलसे भी ऊपर (आँखोंसे न दीखनेवाला) चन्द्रलोक है। उपर्युक्त पदोंमें विशेषरूपसे सोमः पद देनेका अभिप्राय यह है कि चन्द्रमामें प्रकाशके साथसाथ अमृतवर्षाकी शक्ति भी है। वह अमृत पहले चन्द्रलोकसे चन्द्रमण्डलमें आता है और फिर चन्द्रमण्डलसे भूमण्डलपर आता है।यहाँ ओषधीः पदके अन्तर्गत गेहूँ? चना आदि सब प्रकारके अन्न समझने चाहिये। चन्द्रमाके द्वारा पुष्ट हुए अन्नका भोजन करनेसे ही मनुष्य? पशु? पक्षी आदि समस्त प्राणी पुष्टि प्राप्त करते हैं। ओषधियों? वनस्पतियोंमें शरीरको पुष्ट करनेकी जो शक्ति है? वह चन्द्रमासे आती है। चन्द्रमाकी वह पोषणशक्ति भी उसकी अपनी न होकर भगवान्की ही है। भगवान् ही चन्द्रमाको निमित्त बनाकर सबका पोषण करते हैं। सम्बन्ध -- समष्टिशक्तिमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् जिस शक्तिसे व्यष्टिजगत्में क्रियाएँ हो रही हैं? उस व्यष्टिशक्तिमें अपना प्रभाव बताते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर अपने उस बलसे? जो कि कामना और आसक्तिसे रहित मेरा ऐश्वर्यबल जगत्को धारण करनेके लिये पृथिवीमें प्रविष्ट है? जिस बलके कारण भारवती पृथिवी नीचे नहीं गिरती और फटती भी नहीं? सारे जगत्को धारण करता हूँ। यही बात वेदमन्त्र भी कहते हैं कि जिससे द्युलोक और भारवती पृथिवी दृढ़ है तथा वह पृथिवीको धारण करता है इत्यादि। अतः यह कहना ठीक ही है कि मैं पृथिवीमें प्रविष्ट होकर चराचर समस्त भूतप्राणियोंको धारण करता हूँ। तथा मैं ही रसस्वरूप चन्द्रमा होकर पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाली धान? जौ आदि समस्त ओषधियोंका पोषण करता हूँ अर्थात् उनको पुष्ट और स्वादयुक्त किया करता हूँ। जो सब रसोंका आत्मा है? रस ही जिसका स्वभाव है? जो समस्त रसोंकी खानि है वह सोम है? वही अपने रसका सञ्चार करके? समस्त वनस्पतियोंका पोषण किया करता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

इतश्च सर्वात्मत्वं प्रकृतपदस्य युक्तमित्याह -- किञ्चेति। ईश्वरो हि पृथिवीदेवतारूपेण पृथिवीं प्रविश्य भूतशब्दितं जगदैश्वरेणैव बलेन बिभर्ति। ततो गुर्व्यपि पृथिवी विदीर्य नाधो निपततीत्यत्र प्रमाणमाह -- तथाचेति। परस्यैव हिरण्यगर्भात्मनावस्थानान्न मन्त्रयोरन्यपरतेति भावः। देवतात्मना द्यावापृथिव्योरुग्रत्वमुद्धरणत्वसामर्थ्यं तथापीश्वरायत्तमेव स्वरूपधारणं तदपेक्षया दुर्बलत्वादिति द्रष्टव्यम्। ईश्वरस्य सर्वात्मत्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। रसात्मकसोमरूपतापत्तावपि कथमोषधीरीश्वरः सर्वाः पुष्णातीत्याशङ्क्याह -- सर्वेति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

किंच यद्धलं कामरागविवर्जितमैश्वरं जगद्विधाराणाय पृथिव्यामाविष्टं येन गुर्वी पृथ्वी नाधः पतति नापि सिकतामुष्टिवज्जलोपरिस्थितापि विशीर्यते। तथाच मन्त्रवर्णःयेन द्योरुग्रा पृथिवी च दृढा इति?स दाधार पृथिवीं इति च? तेनौजसा बलेन गां पृथिवीमाविश्य प्रविश्य भूतानि चराचराणि धारयामि। किंच रसात्मकः सर्वरसस्वभावः सोमो भूत्वा स्वात्मरसावेशेन पृथिव्या जाता ओषधीः सर्वा व्रीहियवाद्याः पुष्णामि पुष्टिमती रसस्वादवतीश्च करोमि।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
gāmearth
āviśhyapermeating
chaand
bhūtāniliving beings
dhārayāmisustain
ahamI
ojasāenergy
puṣhṇāminourish
chaand
auṣhadhīḥplants
sarvāḥall
somaḥthe moon
bhūtvābecoming
rasaātmakaḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.12
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्

सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.14
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्

प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला मैं प्राण-अपानसे युक्त वैश्वानर होकर चार प्रकारके अन्नको पचाता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 13
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 13
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 13 का हिंदी अर्थ: "मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 13?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 13 translates to: "Permeating the earth, I support all beings with My energy; and having become the watery moon, I nourish all herbs. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 13 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā" mean in English?

"gām āviśhya cha bhūtāni dhārayāmy aham ojasā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 13. Permeating the earth, I support all beings with My energy; and having become the watery moon, I nourish all herbs. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.