Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 15, Shlok 12
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्

सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

त्यो ज्योति जो सूर्यमा रहन्छ, सारा संसारलाई उज्यालो पार्छ; जो चन्द्रमा र आगोमा छ - त्यो ज्योति मेरो हो भनेर जान।

PunjabiIND

ਉਹ ਰੋਸ਼ਨੀ ਜੋ ਸੂਰਜ ਵਿੱਚ ਵੱਸਦੀ ਹੈ, ਸਾਰੇ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਮਾਨ ਕਰਦੀ ਹੈ; ਜੋ ਚੰਦਰਮਾ ਅਤੇ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਹੈ - ਉਸ ਚਾਨਣ ਨੂੰ ਮੇਰਾ ਸਮਝੋ।

BengaliIND

যে আলো সূর্যের মধ্যে অবস্থান করে, সমগ্র বিশ্বকে আলোকিত করে; যা আছে চাঁদে এবং আগুনে-সে আলোকে আমার বলে জান।

KannadaIND

ಸೂರ್ಯನಲ್ಲಿ ನೆಲೆಸಿರುವ ಆ ಬೆಳಕು ಇಡೀ ಜಗತ್ತನ್ನು ಬೆಳಗಿಸುತ್ತದೆ; ಚಂದ್ರನಲ್ಲಿ ಮತ್ತು ಬೆಂಕಿಯಲ್ಲಿ - ಆ ಬೆಳಕು ನನ್ನದು ಎಂದು ತಿಳಿಯಿರಿ.

MaithiliIND

ओ इजोत जे सूर्य मे निवास करैत अछि, समस्त संसार केँ प्रकाशित करैत अछि; जे चन्द्रमा आ अग्नि मे अछि—ओहि इजोत केँ हमर बुझू।

AssameseIND

সেই পোহৰ যি সূৰ্য্যত বাস কৰে, সমগ্ৰ জগতখনক আলোকিত কৰে; যিটো চন্দ্ৰ আৰু জুইত আছে—সেই পোহৰক মোৰ বুলি জানি লওক।

BhojpuriIND

ऊ प्रकाश जवन सूरज में निवास करेला, पूरा दुनिया के रोशन करेला; जवन चाँद में आ आग में बा—ओह प्रकाश के हमार होखे के जान लीं।

ManipuriIND

ꯃꯥꯂꯦꯝ ꯄꯨꯝꯕꯕꯨ ꯃꯉꯥꯜ ꯄꯤꯔꯤꯕꯥ ꯅꯨꯃꯤꯠꯇꯥ ꯂꯩꯔꯤꯕꯥ ꯃꯉꯥꯜ ꯑꯗꯨ; ꯊꯥꯗꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯃꯩꯗꯥ ꯂꯩꯔꯤꯕꯥ ꯑꯗꯨ—ꯃꯉꯥꯜ ꯑꯗꯨ ꯑꯩꯒꯤꯅꯤ ꯍꯥꯌꯅꯥ ꯈꯉꯕꯤꯌꯨ꯫

TeluguIND

సూర్యునిలో నివసించే ఆ కాంతి, మొత్తం ప్రపంచాన్ని ప్రకాశిస్తుంది; చంద్రునిలో మరియు అగ్నిలో ఉన్నది - ఆ కాంతి నాదేనని తెలుసుకోండి.

GujaratiIND

તે પ્રકાશ જે સૂર્યમાં રહે છે, સમગ્ર વિશ્વને પ્રકાશિત કરે છે; જે ચંદ્ર અને અગ્નિમાં છે - તે પ્રકાશને મારો હોવાનું જાણો.

MarathiIND

तो प्रकाश जो सूर्यामध्ये राहतो, सर्व जग प्रकाशित करतो; जे चंद्र आणि अग्नीमध्ये आहे - तो प्रकाश माझा आहे हे जाणून घ्या.

KonkaniIND

तो उजवाड जो सूर्यांत रावता, सगळ्या जगांत उजवाड घालता; जें चंद्रांत आनी उज्यांत आसा तें-तें उजवाड म्हजें अशें जाणून घेयात.

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [प्रभाव और महत्त्वकी ओर आकर्षित होना जीवका स्वभाव है। प्राकृत पदार्थोंके सम्बन्धसे जीव प्राकृत पदार्थोंके प्रभावसे प्रभावित हो जाता है। कारण यह है कि प्रकृतिमें स्थित होनेके कारण जीवको प्राकृत पदार्थों(शरीर? स्त्री? पुत्र? धन आदि) का महत्त्व दीखने लगता है? भगवान्का नहीं। अतः जीवपर पड़े प्राकृत पदार्थोंका प्रभाव हटानेके लिये भगवान् अपने प्रभावका वर्णन करते हुए यह रहस्य प्रकट करते हैं कि उन प्राकृत पदार्थोंमें जो प्रभाव और महत्त्व देखनेमें आता है? वह वस्तुतः (मूलमें) मेरा ही है? उनका नहीं। सर्वोपरि प्रभावशाली मैं ही हूँ। मेरे ही प्रकाशसे सब प्रकाशित हो रहे हैं।]यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् -- जैसे भगवान्ने (गीता 2। 55में ) कामनाओंको मनोगतान् बताया है? ऐसे ही यहाँ तेजको आदित्यगतम् बताते हैं। तात्पर्य यह है कि जैसे मनमें स्थित कामनाएँ मनका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक हैं? ऐसे ही सूर्यमें स्थित तेज सूर्यका धर्म या स्वरूप न होकर आगन्तुक है अर्थात् वह तेज सूर्यका अपना न होकर (भगवान्से) आया हुआ है।सूर्यका तेज (प्रकाश) इतना महान् है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उससे प्रकाशित होता है। ऐसा वह तेज सूर्यका दीखनेपर भी वास्तवमें भगवान्का ही है। इसलिये सूर्य भगवान्को यहा उनके परमधामको प्रकाशित नहीं कर सकता। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं -- पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्।।(योगदर्शन 1। 26)ईश्वर सबके पूर्वजोंका भी गुरु है क्योंकि उसका कालसे अवच्छेद नहीं है। सम्पूर्ण भौतिक जगत्में सूर्यके समान प्रत्यक्ष प्रभावशाली पदार्थ कोई नहीं है। चन्द्र? अग्नि? तारे? विद्युत् आदि जितने भी प्रकाशमान पदार्थ हैं? वे सभी सूर्यसे ही प्रकाश पाते हैं। भगवान्से मिले हुए तेजके कारण जब सूर्य इतना विलक्षण और प्रभावशाली है? तब स्वयं भगवान् कितने विलक्षण और प्रभावशाली होंगे ऐसा विचार करनेपर स्वतः भगवान्की तरफ आकर्षण होता है।सूर्य नेत्रोंका अधिष्ठातृदेवता है। अतः नेत्रोंमें जो प्रकाश (देखनेकी शक्ति) है वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।यच्चन्द्रमसि -- जैसे सूर्यमें स्थित प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति -- दोनों ही भगवान्से प्राप्त (आगत) हैं? ऐसे ही चन्द्रमाकी प्रकाशिका शक्ति और पोषण शक्ति -- दोनों (सूर्यद्वारा प्राप्त होनेपर भी परम्परासे) भगवत्प्रदत्त ही हैं। जैसे भगवान्का तेज आदित्यगत है? ऐसे ही उनका तेज चन्द्रगत भी समझना चाहिये। चन्द्रमामें प्रकाशके साथ शीतलता? मधुरता? पोषणता आदि जो भी गुण हैं? वह सब भगवान्का ही प्रभाव है।यहाँ चन्द्रमाको तारे? नक्षत्र आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।चन्द्रमा मन का अधिष्ठातृदेवता है। अतः मनमें जो प्रकाश (मनन करनेकी शक्ति) है? वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।यच्चाग्नौ -- जैसे भगवान्का तेज आदित्यगत है? ऐसे ही उनका तेज अग्निगत भी समझना चाहिये। तात्पर्य यह है कि अग्निकी प्रकाशिका शक्ति और दाहिका शक्ति -- दोनों भगवान्की ही हैं? अग्निकी नहीं।यहाँ अग्निको विद्युत्? दीपक? जुगनू आदिका भी उपलक्षण समझना चाहिये।अग्नि वाणीका अधिष्ठातृदेवता है। अतः वाणीमें जो प्रकाश (अर्थप्रकाश करनेकी शक्ति) है? वह भी परम्परासे भगवान्से ही आयी हुई समझनी चाहिये।तत्तेजो विद्धि मामकम् -- जो तेज सूर्य? चन्द्रमा और अग्निमें है और जो तेज इन तीनोंके प्रकाशसे प्रकाशित अन्य पदार्थों (तारे? नक्षत्र? विद्युत्? जुगनू आदि) में देखने तथा सुननेमें आता है? उसे भगवान्का ही तेज समझना चाहिये।उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि मनुष्य जिसजिस तेजस्वी पदार्थकी तरफ आकर्षित होता है? उसउस पदार्थमें उसको मेरा ही प्रभाव देखना चाहिये (गीता 10। 41)। जैसे बूँदीके लड्डूमें जो मिठास है? वह उसकी अपनी न होकर चीनीकी ही है? ऐसे ही सूर्य? चन्द्रमा और अग्निमें जो तेज है? वह उनका अपना न होकर भगवान्का ही है। भगवान्के प्रकाशसे ही यह सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है -- तस्य भासा सर्वमिदं विभाति (कठोपनिषद् 2। 2। 15)। वह सम्पूर्ण ज्योतियोंकी भी ज्योति है -- ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः (गीता 13। 17)।सूर्य? चन्द्रमा और अग्नि क्रमशः नेत्र? मन और वाणीके अधिष्ठाता एवं उनको प्रकाशित करनेवाले हैं। मनुष्य अपने भावोंको प्रकट करने और समझनेके लिये नेत्र? मन (अन्तःकरण) और वाणी -- इन तीन इन्द्रियोंका ही उपयोग करता है। ये तीन इन्द्रियाँ जितना प्रकाश करतीं हैं? उतना प्रकाश अन्य इन्द्रियाँ नहीं करतीं। प्रकाशका तात्पर्य है -- अलगअलग ज्ञान कराना। नेत्र और वाणी बाहरी करण हैं तथा मन भीतरी करण है। करणोंके द्वारा वस्तुका ज्ञान होता है। ये तीनों ही करण (इन्द्रियाँ) भगवान्को प्रकाशित नहीं कर सकते क्योंकि इनमें जो तेज या प्रकाश है? वह इनका अपना न होकर भगवान्का ही है। सम्बन्ध -- दृश्य (दीखनेवाले) पदार्थोंमें अपना प्रभाव बतानेके बाद अब भगवान् आगेके श्लोकमें जिस शक्तिसे समष्टिजगत्में क्रियाएँ हो रही हैं? उस समष्टिशक्तिमें अपना प्रभाव प्रकट करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

सबको प्रकाशित करनेवाली अग्नि? सूर्य आदि ज्योतियाँ भी जिस परमपदको प्रकाशित नहीं कर सकतीं? जिस परमपदको प्राप्त हुए मुमुक्षुजन फिर संसारकी ओर नहीं लौटते? जैसे घट आदिके आकाश महाकाशके अंश हैं? वैसे ही उपाधिजनित भेदसे विभिन्न हुए जीव? जिस परमपदके ( कल्पितभावसे ) अंश हैं? उस परमपदका? सर्वात्मत्व और समस्त व्यवहारका आधारत्व? बतलानेकी इच्छासे भगवान् चार श्लोकोंद्वारा संक्षेपसे विभूतियोंका वर्णन करते हैं --, जो तेजदीप्ति प्रकाश? सूर्यमें स्थित हुआ अर्थात् सूर्यके आश्रित हुआ समस्त जगत्को प्रकाशित करता है? जो प्रकाश करनेवाला तेज शशाङ्क -- चन्द्रमामें स्थित है और जो अग्निमें वर्तमान है? उस तेजको तू मुझ विष्णुकी अपनी ज्योति समझ। अथवा जो तेज यानी चैतन्यमय ज्योति? सूर्यमें स्थित है? तथा जो चन्द्रमा और अग्निमें स्थित है? उस तेजको तू मुझ विष्णुकी स्वकीय ( चेतनमयी ) ज्योति समझ। पू0 -- वह चेतनमयी ज्योति तो चराचर? सभी पदार्थोंमें समानभावसे स्थित है? फिर यह विशेषता कैसे बतलायी कि जो तेज सूर्यमें स्थित है इत्यादि। उ0 -- सत्त्व -- स्वच्छताकी अधिकतासे उनमें अधिकता सम्भव होनेके कारण यह दोष नहीं है क्योंकि सूर्य आदिमें सत्त्वअत्यन्त प्रकाश अत्यन्त स्वच्छता है? अतः उनमें ही ब्रह्मज्योति अत्यन्त प्रत्यक्ष प्रतिभासित होती है? इसीसे उनकी विशेषता बतलायी गयी है। यह बात नहीं कि वहीं कुछ बह्मज्योति अधिक है। जैसे संसारमें देखा जाता है कि समान भावसे सम्मुखसामने स्थित होनेपर भी? काष्ठ या भित्ति आदिमें मुखका प्रतिबिम्ब नहीं दीखता? पर दर्पण आदि पदार्थमें? जो जितना स्वच्छ और स्वच्छतर होता है उसमें उसी तारतम्यसे? स्वच्छ और स्वच्छतर दीखता है? वैसे ही ( इस विषयमें समझो )।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

अनन्तरश्लोकचतुष्टयस्य वृत्तानुवादद्वारा तात्पर्यार्थमाह -- यत्पदमिति। जीवात्मत्वेन चिद्रूपत्वमुक्त्वा तदीयचैतन्येनादित्यादीनामवभासकत्वाच्च ब्रह्मणश्चिद्रूपत्वमित्याह -- यदादित्येति। चिद्रूपस्यैव ब्रह्मणः सर्वात्मकत्वप्रतिपादकत्वेन श्लोकं व्याचष्टे -- यदित्यादिना। आदित्यादौ तत्र तत्र स्थितं ब्रह्मचैतन्यज्योतिः सर्वावभासकमित्यर्थः। ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वेन चिद्रूपत्वमत्र विवक्षितमिति व्याख्यान्तरमाह -- अथवेति। चैतन्यज्योतिषः सर्वत्राविशेषादादित्यादिगतत्वविशेषणमयुक्तमिति शङ्कते -- नन्विति। सर्वत्र सत्त्वेऽपि क्वचिदेवाभिव्यक्तिविशेषाद्विशेषणमिति परिहरति -- नैष दोष इति। तदेव प्रपञ्चयति -- आदित्यादिष्विति। सर्वत्र चैतन्यज्योतिषस्तुल्यत्वेऽपि क्वचिदेवाभिव्यक्त्या विशेषणोपपत्तिं दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- यथाहीति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

यत्पदं सर्वावभासकमादित्यादिकं ज्योतिर्नावभाषयते? यत्प्राप्ताश्च मुमुक्षवः पुनः संसाराभिमुखा न निवर्तन्ते? यस्य च पदस्यानुविधीयमाना जीवा घटाकाशादयो यथाकाशस्यांशास्तथांश इवांसा बुद्य्धादितादात्म्याध्यासेनन मृषैवोत्क्रान्त्यादिकं प्राप्नुवन्तीति न तद्भासयते सूर्य इत्यादिनोक्तमिदानीं तस्य पदस्य सर्वात्मत्वं सर्वव्याहारास्पतत्वं विवक्षुश्चतुर्भिः श्लोकैर्विभूतिसंक्षेपाह -- यदिति। यदादित्यगतं सूर्याश्रयं तेजो दीप्तिः प्रकाशः अखिलं सर्वं जगद्भासयते प्रकाशयति यत्समस्तावभासकं चन्द्रमसि तेजो वर्तते यच्चाग्नौ तत्तेजो मामकं मदीयं विद्धि जानीहि। यद्वा ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वेन चिद्रूपत्वमत्र विवक्षितम्। तथाचायमर्थः। यदातित्यगतं तेजश्चैतन्यात्मकं ज्योतिः यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ वर्तते तेत्तेजो मामकं विद्धि। ननु चैतन्यज्योतिषः सर्वत्राविशेषात्कथमिदं विशेषणं यदादित्यगतमित्यादि। नैष दोषः। चैतन्यज्योतिषः सर्वत्र तुल्यत्वेऽपि क्वचिदेव सत्त्वधिक्यप्रयुक्ताभिव्यक्त्या विशेषणोपपत्तेः। यथाहि लोके तुल्येऽपि मुखसंस्थाने न काष्ठकुड्यादौ मुखमाविर्भवति आदर्शादौ तु स्वच्छे स्वच्छतरे स्वच्छतमे च तारतभ्येनाविर्भवतीति तद्वत्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yatwhich
ādityagatam
tejaḥbrilliance
jagatsolar system
bhāsayateilluminates
akhilamentire
yatwhich
chandramasiin the moon
yatwhich
chaalso
agnauin the fire
tatthat
tejaḥbrightness
viddhiknow
māmakammine
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 15.11
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः

यत्न करनेवाले योगीलोग अपने-आपमें स्थित इस परमात्मतत्त्वका अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अविवेकी मनुष्य यत्न करनेपर भी इस तत्त्वका अनुभव नहीं करते। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 15.13
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः

मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूपमें समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 15Shlok 12
Bhagavad Gita · Adhyay 15, Shlok 12
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्

सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 15 श्लोक 12 का हिंदी अर्थ: "सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Purushottama Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 12?

Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 12 translates to: "That light which resides in the sun, illuminating the whole world; that which is in the moon and in the fire—know that light to be Mine. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्।यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 15, श्लोक 12 है जो Bhagavad Gita के Purushottama Yoga में संकलित है। सूर्यमें आया हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है और जो तेज चन्द्रमामें है तथा जो तेज अग्निमें है, उस तेजको मेरा ही जान। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yad āditya-gataṁ tejo jagad bhāsayate ’khilam" mean in English?

"yad āditya-gataṁ tejo jagad bhāsayate ’khilam" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 15 Verse 12. That light which resides in the sun, illuminating the whole world; that which is in the moon and in the fire—know that light to be Mine. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.