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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च

क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ। — VaniSagar

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TamilIND

ஏனென்றால், நான் பிரம்மனின் இருப்பிடம், அழியாத, மாறாத, நிரந்தரமான தர்மம் மற்றும் முழுமையான ஆனந்தம்.

KannadaIND

ಏಕೆಂದರೆ ನಾನು ಬ್ರಹ್ಮನ ವಾಸಸ್ಥಾನವಾಗಿದ್ದೇನೆ, ಅಮರ, ಅಚಲ ಮತ್ತು ಶಾಶ್ವತವಾದ ಧರ್ಮ ಮತ್ತು ಸಂಪೂರ್ಣ ಆನಂದ.

MalayalamIND

എന്തെന്നാൽ, ഞാൻ ബ്രഹ്മത്തിൻ്റെ വാസസ്ഥലമാണ്, അനശ്വരവും അചഞ്ചലവും ശാശ്വതവുമായ ധർമ്മവും പരമമായ ആനന്ദവുമാണ്.

GujaratiIND

કારણ કે હું બ્રહ્મનું નિવાસસ્થાન છું, અમર, અપરિવર્તનશીલ અને શાશ્વત ધર્મ, અને સંપૂર્ણ આનંદ.

MarathiIND

कारण मी ब्रह्माचे निवासस्थान आहे, अविनाशी, अपरिवर्तनीय, आणि शाश्वत धर्म, आणि पूर्ण आनंद आहे.

TeluguIND

ఎందుకంటే నేను బ్రహ్మానికి నిలయం, అమృతం, మార్పులేనిది మరియు శాశ్వతమైన ధర్మం మరియు సంపూర్ణ ఆనందాన్ని కలిగి ఉన్నాను.

BengaliIND

কেননা আমি ব্রহ্মের নিবাস, অমর, অপরিবর্তনীয় এবং চিরন্তন ধর্ম এবং পরম আনন্দ।

NepaliIND

किनकि म ब्रह्मको निवास, अविनाशी, अपरिवर्तनीय, नित्य धर्म र परम आनन्द हुँ।

PunjabiIND

ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦਾ ਨਿਵਾਸ ਹਾਂ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ, ਅਟੱਲ, ਅਤੇ ਸਦੀਵੀ ਧਰਮ, ਅਤੇ ਪੂਰਨ ਅਨੰਦ ਹਾਂ।

SindhiIND

ڇو ته مان برهمڻ جو رهاڪو آهيان، لافاني، بي بدل ۽ لازوال ڌرم، ۽ مڪمل نعمت.

MaithiliIND

कारण हम ब्रह्म के निवास छी, अमर, अपरिवर्तनीय आ सनातन धर्म आ निरपेक्ष आनंद।

KonkaniIND

कारण हांव ब्रह्माचें निवासस्थान, अमर, अविकारी आनी शाश्वत धर्म आनी निरपेक्ष आनंद.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् -- मैं ब्रह्मकी प्रतिष्ठा? आश्रय हूँ -- ऐसा कहनेका तात्पर्य ब्रह्मसे अपनी अभिन्नता बतानेमें है। जैसे जलती हुई अग्नि साकार है और काष्ठ आदिमें रहनेवाली अग्नि निराकार है -- ये अग्निके दो रूप हैं? पर तत्त्वतः अग्नि एक ही है। ऐसे ही भगवान् साकाररूपसे हैं और ब्रह्म निराकररूपसे है -- ये दो रूप साधकोंकी उपासनाकी दृष्टिसे हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं? दो नहीं। जैसे भोजनमें एक सुगन्ध होती है और एक स्वाद होता है नासिकाकी दृष्टिसे सुगन्ध होती है और रसनाकी दृष्टिसे स्वाद होता है? पर भोजन तो एक ही है। ऐसे ही ज्ञानकी दृष्टिसे ब्रह्म है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान् हैं? पर तत्त्वतः भगवान् और ब्रह्म एक ही हैं।भगवान् कृष्ण अलग हैं और ब्रह्म अलग है -- यह भेद नहीं है किन्तु भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म हैं और ब्रह्म ही भगवान् कृष्ण है। गीतामें भगवान्ने अपने लिये ब्रह्म शब्दका भी प्रयोग किया है -- ब्रह्मण्याधाय कर्माणि (5। 10) और अपनेको अव्यक्तमूर्ति भी कहा है -- मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना (9। 4)। तात्पर्य है कि साकार और निराकार एक ही हैं? दो नहीं।अमृतस्याव्ययस्य च -- अविनाशी अमृतका अधिष्ठान मैं ही हूँ और मेरा ही अधिष्ठान अविनाशी अमृत है। तात्पर्य है कि अविनाशी अमृत और मैं -- ये दो तत्त्व नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। इसी अविनाशी अमृतकी प्राप्तिको भगवान्ने अमृतमश्नुते (13। 12 14। 20) पदसे कहा है।शाश्वतस्य च धर्मस्य -- सनातन धर्मका आधार मैं हूँ और मेरा आधार सनातन धर्म है। तात्पर्य है कि सनातन धर्म और मैं -- ये दो नहीं हैं? प्रत्युत एक ही हैं। सनातन धर्म मेरा ही स्वरूप है । गीतामें अर्जुनने भगवान्को शाश्वतधर्मका गोप्ता (रक्षक) बताया है (11। 18)। भगवान् भी अवतार लेकर सनातन धर्मकी रक्षा किया करते हैं (4। 8)।सुखस्यैकान्तिकस्य च -- ऐकान्तिक सुखका आधार मैं हूँ और मेरा आधार ऐकान्तिक सुख है अर्थात् मेरा ही स्वरूप ऐकान्तिक सुख है। भगवान्ने इसी ऐकान्तिक सुखको अक्षय सुख (5। 21)? आत्यन्तिक सुख (6। 21) और अत्यन्त सुख (6। 28) नामसे कहा है।इस श्लोकमें ब्रह्मणः? अमृतस्य आदि पदोंमें राहोः शिरः की तरह अभिन्नतामें षष्ठी विभक्तिका प्रयोग किया गया है। तात्पर्य है कि राहुका सिर -- ऐसा जो प्रयोग होता है? उसमें राहु अलग है और सिर अलग है -- ऐसी बात नहीं है? प्रत्युत राहुका नाम ही सिर है और सिरका नाम ही राहु है। ऐसे ही यहाँ ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि ही भगवान् कृष्ण हैं और भगवान् कृष्ण ही ब्रह्म? अविनाशी अमृत आदि हैं।ब्रह्म कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो? चाहे ब्रह्म कहो अविनाशी अमृत कहो? चाहे कृष्ण कहो? और कृष्ण कहो चाहे अविनाशी अमृत कहो शाश्वत धर्म कहो? चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे शाश्वत धर्म कहो ऐकान्तिक सुख कहो चाहे कृष्ण कहो और कृष्ण कहो चाहे ऐकान्तिक सुख कहो एक ही बात है। इसमें कोई आधारआधेय भाव नहीं है? एक ही तत्त्व है। इसलिये भगवान्की उपासना करनेसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है -- यह बात ठीक ही है।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें गुणत्रयविभागयोग नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ,

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Sri Harikrishnadas Goenka

ऐसा क्यों होता है सो बतलाते हैं --, क्योंकि ब्रह्म -- परमात्माकी प्रतिष्ठा मैं हूँ। जिसमें प्रतिष्ठित हो वह प्रतिष्ठा है? इस व्युत्पत्तिके अनुसार मैं अन्तरात्मा ( ब्रह्मकी ) प्रतिष्ठा हूँ। कैसे ब्रह्मकी ( सो कहते हैं -- ) जो अमृत -- अविनाशी? अव्यय -- निर्विकार? शाश्वत -- नित्य? धर्मस्वरूप -- ज्ञानयोगरूप धर्मद्वारा प्राप्तव्य और ऐकान्तिक सुखस्वरूप अर्थात् व्यभिचाररहित आनन्दमय है उस ब्रह्मकी मैं प्रतिष्ठा हूँ। अमृत आदि स्वभाववाले परमात्माकी प्रतिष्ठा अन्तरात्मा ही है क्योंकि यथार्थ ज्ञानसे वही परमात्मारूपसे निश्चित होता है। यही बात ब्रह्मभूयाय कल्पते इस पदसे कही गयी है। अभिप्राय यह है कि जिस ईश्वरीय शक्तिसे भक्तोंपर अनुग्रह आदि करनेके लिये ब्रह्म प्रवर्तित होता है? वह शक्ति? मैं ब्रह्म ही हूँ क्योंकि शक्ति और शक्तिमान्में भेद नहीं होता। अथवा ( ऐसा समझना चाहिये कि ) ब्रह्मशब्दका वाच्य होनेके कारण यहाँ सगुण ब्रह्मका ग्रहण है? उस सगुण ब्रह्मका मैं निर्विकल्प -- निर्गुण ब्रह्म ही प्रतिष्ठा -- आश्रय हूँ? दूसरा कोई नहीं। किन विशेषणोंसे युक्त सगुण ब्रह्मका जो अमृत अर्थात् मरणधर्मसे रहित है और अविनाशी अर्थात् क्षय होनेसे रहित है? उसका। तथा ज्ञाननिष्ठारूप शाश्वतनित्य धर्मका और उससे होनेवाले ऐकान्तिक एकमात्र निश्चित परम आनन्दका भी? मैं ही आश्रय हूँ। अहं प्रतिष्ठा यह पद यहाँ अनुवृत्तिसे लिया गया है।

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Sri Anandgiri

विद्वान् ब्रह्मैवेत्यत्र हेतुं पृच्छति -- कुत इति। तत्रोत्तरमाह -- उच्यत इति। ब्रह्मशब्दस्यासति बाधके मुख्यार्थग्रहणमभिप्रेत्याह -- परमात्मन इति। तं प्रति प्रत्यगात्मनो यत्प्रतिष्ठात्वं तदुपपादयति -- प्रतितिष्ठतीति। यद्ब्रह्म प्रत्यगात्मनि प्रतितिष्ठति तत्किंविशेषणमित्यपेक्षायामुक्तम् -- अमृतस्येत्यादि। तत्रामृतशब्देनाव्ययशब्दस्य पुनरुक्तिं परिहरति -- अविकारिण इति। नित्यत्वमपक्षयराहित्यं तेन पूर्वाभ्यामपौनरुक्त्यम्। प्रसिद्धार्थस्य धर्मशब्दस्य ब्रह्मण्यनुपपत्तिमाशङ्क्याह -- ज्ञानेति। अर्थेन्द्रियसंबन्धोत्थं सुखं व्यावर्तयितुमैकान्तिकस्येत्युक्तम्। अक्षरार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह -- अमृतादीति। प्रतिष्ठा यस्मादिति पूर्वेण संबन्धः। तस्मात्प्रत्यगात्मा परमात्मतया निश्चीयते सम्यग्ज्ञानेनेति योजना। अस्य श्लोकस्य पूर्वश्लोकेनैकवाक्यतामाह -- तदेतदिति। विवक्षितं वाक्यार्थं प्रपञ्चयति -- ययेति। सा शक्तिर्ब्रह्मैवेति कथं सामानाधिकरण्यं तत्राह -- शक्तीति। व्याख्यानान्तरमाह -- अथवेति। विशेषणानि पूर्ववदपौनरुक्त्यानि नेतव्यानि। तदनेनाध्यायेन क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्य संसारकारणत्वं पञ्चप्रश्ननिरूपणद्वारेण च सम्यग्ज्ञानस्य सकलसंसारनिवर्तकत्वमित्येतदुपपादयता मुमुक्षोर्यत्नसाध्यं गुणैरचाल्यत्वादि मुक्तस्यायत्नसिद्धं लक्षणमिति निर्धारितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौचतुर्दशोऽध्यायः

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Sri Dhanpati

योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन मां सेवते स गुणान्समतीत्य ब्रह्मभूयाय कल्पत इत्यत्र हेतुमाह -- ब्रह्मणो हीति। हि यस्माद्ब्रह्मणः परमात्मनोऽहं प्रत्यगात्मा प्रतिष्ठा प्रतितिष्ठत्यस्मिन्नति प्रतिष्ठा यत् ब्रह्म प्रत्यगात्मनि प्रतितिष्ठति। तद्विशिनष्टि। अमृतस्याविनाशिनः अव्ययस्याविकारिणः। शाश्वतस्य नित्यस्यापक्षयरहितस्य। तेन न पौनरुक्त्यम्। धर्मस्य,धर्मज्ञानस्येत्यर्थः। सुखस्य ज्ञानयोगधर्मप्राप्यस्यानन्दरुपस्येन्द्रियसंबन्धोत्थं सुखं व्यावर्थयितुमाह। एकान्तिस्याव्यभिचारिणः। अमृतादिस्वभावस्य परमात्मनः प्रत्यगात्मा प्रतिष्ठा यस्मात्तस्मात्सभ्यग्ज्ञानेन स परमात्मेति निश्चीयते तदेतब्रह्म भूयाय कल्पते इत्युक्तं। यया चेश्वरशक्त्या भक्तानुग्रहादिप्रयोजनाय ब्रह्म प्रवर्तते सा शक्तिः ब्रह्मैवाहं शक्तिशक्तिमतोरभेदादित्यभिप्रायः। यद्वा ब्रह्मशब्दवाच्यत्वात्सविकल्पकं ब्रह्म ब्रह्मशब्देनाभिधीयते तस्य ब्रह्मणे निर्विकल्पोऽहमवाच्यः प्रतिष्ठाश्रयः। सविकल्पकं ब्रह्म विशिनष्टि। अमृतस्य मरणधर्मरहितस्याव्ययस्य व्ययरहितस्य किंच शाश्वतस्यच नित्यस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य सुखस्य च जनितस्यैकान्तिस्यैकान्तनियतस्य च प्रतिष्ठाहं इति वर्तते। अतो मत्सेवया युक्तैव ब्रह्मभावप्राप्तिरित्यर्थः। हि यस्माद्ब्रह्मणोऽहं प्रतिष्ठा प्रतिमास्थानिभूतं यथा घनीभूतप्रकाश एव सूर्यमण्डलं तद्वदित्यर्थः। तथाव्यस्यामृतस्य नित्यस्य मोक्षस्य नित्यमुक्त्वात्। तथा तत्साधनस्य शाश्वतस्य च धर्मस्य शुद्धसत्त्वात्मकत्वात्। तथैकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठाहं परमानन्दरुपत्वात् इत्यपरे। तथा तत्साधनस्य शाश्वतस्य च धर्मस्य शुद्धसत्त्वात्मकत्वात्। तथैकान्तिकस्य सुखस्य च प्रतिष्ठाहं परमानन्दरुपत्वात् इत्यपरे। त्वद्भक्तस्त्वद्भावमाप्नोतुनाम कथंतु ब्रह्मभावाय कल्पते ब्रह्मणः सकाशात्तवान्यत्वादिति तत्राह। ब्राह्मणः परमात्मनः प्रतिष्ठा पर्याप्तिरहमेव नतु मद्भिन्नं ब्रह्मेत्यर्थः। तथामृतस्याव्ययस्य प्रतिष्ठाहमेव मय्येव मोक्षः पर्यवसितः। मत्प्राप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। तथा शाश्वतस्य नित्यस्य मोक्षफलस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं किंचित्प्राप्यमित्यर्थः। तथामृतस्याव्ययस्य प्रतिष्ठाहमेव मय्येव मोक्षः पर्यवसितः। मत्प्राप्तिरेव मोक्ष इत्यर्थः। तथा शाश्वतस्य नित्यस्य मोक्षफलस्य धर्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं नित्यस्य मोक्षफलस्य ध्मस्य ज्ञाननिष्ठालक्षणस्य च पर्याप्तिरहमेव। ज्ञाननिष्ठालक्षणो धर्मो मय्येव पर्यवसितस्ततो न तेन मद्भिन्नं किंचित्प्राप्यमित्यर्थः। तथा ऐसान्तिकस्य सुखस्य च पर्याप्तिरहमेव परमानन्दत्वात्। न मद्भिन्नं किंचित्सुखं प्राप्यमस्तीत्यर्थः। इति केचित्। अन्ये तु वासिष्ठोक्तं ज्ञानभूमिसप्तकं प्रखाशमित्यादिश्लोकैर्दर्शयन्ति। तथाहिज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता। विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसा। सत्त्वपात्तिश्चतुर्थी स्यात्ततो संसक्तिनामिका। पदार्थाभाविनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता इति। तत्र यथोक्तसाधनसंपन्मुमुक्षुता प्रथमा? श्रवणगननविचारात्मिका द्वितीया? निदिध्यासनरुपा तृतीया? एताः साधनभूमयः। ब्रह्मसाक्षात्काररुपा चतुर्थी फलभूता। अस्यां योगी कृतार्थोऽपि जीवन्मुक्तिसुखं पुष्कलं नानुभवति। परास्तिन्नो जीवन्मुक्तेरवान्तरभेदाः। तत्रापि पञ्चम्यामसंसक्तिनामिकायां स्थितो योगी ब्रह्मविद्वरः स्वयमेवोत्तिष्ठते। षष्ठ्यां पदार्थाभाविन्यां स्थितो ब्रह्मविद्वरीयान् परप्रयत्नेन व्युत्तिष्ठते। सप्तम्यां तुर्यगायां ब्रह्मविद्वरिष्ठः न स्वतः परतो वा व्युत्तिष्ठति। तत्र नित्यसमाधिर्स्थोत्यभूमिगः प्रकाशमिति श्लोकेनोक्तः। उदासीन इत्यनेनोपान्त्यभूमिगः समदुःखसुखः इति पञ्चम्यां स्थितो मानापमानयोरिति चतुर्थ्यां मां चेति तृतीयायां स्थितो योगी उक्तः। विषयप्रदर्शनद्वाराऽमृतसाधनस्याव्ययस्यानादित्वादनन्तत्वाच्चपौरुषेत्वेनाप्रामाण्यशङ्काकलङ्कशून्यस्य स्वतःप्रमाणभूतस्येत्यर्थः। एतेनोपक्रमोपसंहारदितात्पर्यालोचनया वेदाविरुद्धतर्कोपकरणया कृत्स्त्रस्य वेदस्य तात्पर्यप्रदर्शनकामेन निर्णेतव्यमिति विचारणाख्या द्वितीया भूमिरुक्ता। हेतुफलोपदर्शनमुखेन शुभेच्छाख्यां प्रथमां भूमिमाह -- शाश्वतस्येति। काम्यधर्मवत्फलदानेन नाशाभावात्। भगवत्यर्पितो नित्यो धर्मः शाश्वतः। विवितषादिपारंपर्येण मोक्षाख्यशास्वतफलत्वात्। तस्य च प्रतिष्ठा परमं प्राप्यमहमेव। तथा सुखस्यैकान्तिकस्य मोक्षसुखस्य च प्रतिष्ठा अहमेव। सेयं प्रथमा भूमिरुक्ता। अत्र परां परां भूमिमारोढुमशक्तस्य पूर्वो पूर्वा भूमिरुपदिश्यते इति तदेतद्यत्किंचित्कल्पनं सर्वज्ञानां मार्गप्रदर्शकानामाचार्याणां न शोभतेऽत एतदनुक्त्या तेषां न्यूनता नापादनीया। तदनेन चतुर्दशाध्यायेन सर्वमुत्पद्यमानं क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगाद्यथोत्पद्यते यस्मिन्गुणे च यथा सङ्ग ये वा गुणाः यथा वा बध्नन्ति गणेभ्यश्च मोक्षणं यथा स्यात् मुक्तस्य च यल्लक्षणं तत्सर्वं प्रतिपादयता तत्त्ववित्प्राप्तयं प्रत्यगभिन्नं ब्रह्म प्रदर्शितम्।इति श्रीमत्परमहंस0 श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां चतुर्दशोऽध्यायः

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
brahmaṇaḥof Brahman
hionly
pratiṣhṭhāthe basis
ahamI
amṛitasyaof the immortal
avyayasyaof the imperishable
chaand
śhāśhvatasyaof the eternal
chaand
dharmasyaof the dharma
sukhasyaof bliss
aikāntikasyaunending
chaand
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 27
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च

क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 27 का हिंदी अर्थ: "क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 27?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 27 translates to: "For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 27 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha" mean in English?

"brahmaṇo hi pratiṣhṭhāham amṛitasyāvyayasya cha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 27. For I am the abode of Brahman, the immortal, immutable, and everlasting Dharma, and absolute bliss. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.