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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

మరియు అచంచలమైన భక్తితో నన్ను సేవించేవాడు, ద్వంద్వాలను దాటి, బ్రహ్మంగా మారడానికి తగినవాడు.

NepaliIND

र जसले अटल भक्तिले मेरो सेवा गर्छ, त्यो द्वैतबाट पार भएर ब्राह्मण बन्न योग्य हुन्छ।

BengaliIND

এবং যিনি অটল ভক্তি সহকারে আমার সেবা করেন, তিনি দ্বৈততা অতিক্রম করে ব্রহ্ম হওয়ার উপযুক্ত।

KannadaIND

ಮತ್ತು ಯಾರು ನನ್ನನ್ನು ಅಚಲವಾದ ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ಸೇವಿಸುತ್ತಾರೋ, ಅವನು ದ್ವಂದ್ವಗಳನ್ನು ಮೀರಿ ಬ್ರಹ್ಮನಾಗಲು ಯೋಗ್ಯನು.

SindhiIND

۽ جيڪو بيحد عقيدت سان منهنجي خدمت ڪري ٿو، اهو، ٻٽيتن کان پري ٿي، برهمڻ ٿيڻ جي لائق آهي.

MarathiIND

आणि जो अखंड भक्तीने माझी सेवा करतो, तो द्वैतांच्या पलीकडे जाऊन ब्रह्म होण्यास योग्य आहे.

GujaratiIND

અને જે અતૂટ ભક્તિભાવથી મારી સેવા કરે છે, તે દ્વંદ્વોને પાર કરીને બ્રહ્મ બનવા માટે યોગ્ય છે.

MalayalamIND

അചഞ്ചലമായ ഭക്തിയോടെ എന്നെ സേവിക്കുന്നവൻ, ദ്വന്ദ്വങ്ങളെ മറികടന്ന്, ബ്രഹ്മമാകാൻ യോഗ്യനാണ്.

TamilIND

யார் என்னை அசையாத பக்தியுடன் சேவிக்கிறானோ, அவன் இருமைகளைக் கடந்து பிரம்மனாக மாறுவதற்குத் தகுதியானவன்.

PunjabiIND

ਅਤੇ ਜੋ ਅਟੁੱਟ ਸ਼ਰਧਾ ਨਾਲ ਮੇਰੀ ਸੇਵਾ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਦਵੈਤ-ਭਾਵ ਤੋਂ ਪਾਰ ਹੋ ਕੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਬਣਨ ਦੇ ਯੋਗ ਹੈ।

BhojpuriIND

आ जे अटल भक्ति से हमार सेवा करेला, ऊ द्वैत से परे पार करत ब्रह्म बने के योग्य बा।

KonkaniIND

आनी जो अविचल भक्तीन म्हजी सेवा करता, तो द्वैतांच्या पलतडीं वचून ब्रह्म जावपाक योग्य आसा.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [यद्यपि भगवान्ने इसी अध्यायके उन्नीसवेंबीसवें श्लोकोंमें गुणोंका अतिक्रमण करनेका उपाय बता दिया था? तथापि अर्जुनने इक्कीसवें श्लोकमें गुणातीत होनेका उपाय पूछ लिया। इससे यह मालूम होता है कि अर्जुन उस उपायके सिवाय गुणातीत होनेके लिये दूसरा कोई उपाय जानना चाहते हैं। अतः अर्जुनको भक्तिका अधिकारी समझकर भगवान् उनको गुणातीत होनेका उपाय भक्ति बताते हैं।]मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते -- इन पदोंमें उपासक? उपास्य और उपासना -- ये तीनों आ गये हैं अर्थात् यः पदसे उपासक? माम् पदसे उपास्य और अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते पदोंसे उपासना आ गयी है।अव्यभिचारेण पदका तात्पर्य है कि दूसरे किसीका भी सहारा न हो। सांसारिक सहारा तो दूर रहा? ज्ञानयोग? कर्मयोग आदि योगों(साधनों) का भी सहारा न हो और भक्तियोगेन पदका तात्पर्य है कि केवल भगवान्का ही सहारा हो? आश्रय हो? आशा हो? बल हो? विश्वास हो। इस तरह अव्यभिचारेण पदसे दूसरोंका आश्रय लेनेका निषेध करके भक्तियोगेन पदसे केवल भगवान्का ही आश्रय लेनेकी बात कही गयी है।सेवते पदका तात्पर्य है कि अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा भगवान्का भजन करे? उनकी उपासना करे? उनके शरण हो जाय? उनके अनुकूल चले।स गुणान्समतीत्यैतान् -- जो अनन्यभावसे केवल भगवान्के ही शरण हो जाता है? उसको गुणोंका अतिक्रमण करना नहीं पड़ता? प्रत्युत भगवान्की कृपासे उसके द्वारा स्वतः गुणोंका अतिक्रमण हो जाता है (गीता 12। 67)।ब्रह्मभूयाय कल्पते -- वह गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र (अधिकारी) हो जाता है। भगवान्ने जब यहाँ भक्तिकी बात बतायी है? तो फिर भगवान्को यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात न कहकर अपनी प्राप्तिकी बात बतानी चाहिये थी। परन्तु यहाँ ब्रह्मप्राप्तिकी बात बतानेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनने गुणातीत होने(निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति) का उपाय पूछा था। इसलिये भगवान्ने अपनी भक्तिको? ब्रह्मप्राप्तिका उपाय बताया।दूसरी बात? शास्त्रोंमें कहा गया है कि भगवान्की उपासना करनेवालेको ज्ञानकी भूमिकाओंकी सिद्धिके लिये दूसरा कोई साधन? प्रयत्न नहीं करना पड़ता? प्रत्युत उसके लिये ज्ञानकी भूमिकाएँ अपनेआप सिद्ध हो जाती हैं। उसी बातको लक्ष्य करके भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि अव्यभिचारी भक्तियोगसे मेरा सेवन करनेवालेको ब्रह्मप्राप्तिका पात्र बननेके लिये दूसरा कोई साधन नहीं करना पड़ता? प्रत्युत वह अपनेआप ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। परन्तु वह भक्त ब्रह्मप्राप्तिमें सन्तोष नहीं करता। उसका तो यही भाव रहता है कि भगवान् कैसे प्रसन्न हों भगवान्की प्रसन्नतामें ही उसकी प्रसन्नता होती है। तात्पर्य यह निकला कि जो केवल भगवान्के ही परायण है? भगवान्में ही आकृष्ट है? उसके लिये ब्रह्मप्राप्ति स्वतःसिद्ध है। हाँ? वह ब्रह्मप्राप्तिको महत्त्व दे अथवा न दे -- यह बात दूसरी है? पर वह ब्रह्मप्राप्तिका अधिकारी स्वतः हो जाता है।तीसरी बात? जिस तत्त्वकी प्राप्ति ज्ञानयोग? कर्मयोग आदि साधनोंसे होती है? उसी तत्त्वकी प्राप्ति भक्तिसे भी होती है। साधनोंमें भेद होनेपर भी उस तत्त्वकी प्राप्तिमें कोई भेद नहीं होता। सम्बन्ध -- उपासना तो करे भगवान्की और पात्र बन जाय ब्रह्मप्राप्तिका -- यह कैसे इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

मनुष्य इन तीनों गुणोंसे किस प्रकार अतीत होता है इस प्रश्नका उत्तर अब देते हैं --, जो संन्यासी या कर्मयोगी सब भूतोंके हृदयमें स्थित मुझ परमेश्वर नारायणको? कभी व्यभिचरित ( विचलित ) न होनेवाले अव्यभिचारी भक्तियोगद्वारा सेवन करता है -- भजनका नाम भक्ति है? वही योग है? उस भक्तियोगके द्वारा जो मेरी सेवा करता है -- वह इन ऊपर कहे हुए गुणोंको अतिक्रमण करके ब्रह्मलोकको पानेके लिये? अर्थात् मोक्ष प्राप्त करनेके लिये योग्य समझा जाता है? अर्थात् ( मोक्ष प्राप्त करनेमें ) समर्थ होता है।

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Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रश्नद्वयमेवं परिहृत्य तृतीयं प्रश्नं परिहरति -- अधुनेति। मच्छब्दस्य संसारिविषयत्वं व्यावर्तयति -- ईश्वरमिति। तत्रैव नारायणशब्दान्मूर्तिभेदो व्यावर्त्यते। तस्य ताटस्थ्यं व्यवच्छिनत्ति -- सर्वेति। मुख्यामुख्याधिकारिभेदेन विकल्पः। भक्तियोगस्य यादृच्छिकत्वं व्यवच्छेत्तुमव्यभिचारेणेत्युक्तम्। तद्व्याचष्टे -- नेति। भजनं परमप्रेमा स एव युज्यतेऽनेनेति योगः। सेवते पराक्चित्ततां विना सदानुसंदधातीत्यर्थः। स भगवदनुकृतसम्यग्धीसंपन्नो विद्वाञ्जीवन्नेवेत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

प्रस्नद्वयं समाधायेदानीं कथमेतान् त्रीन् गुणानतिवर्तते इति तृतीयप्रश्नस्य प्रतिवचनमाह -- मामिति। चः पूर्वोक्तगुणातीतलक्षणस्य मुमुक्षुणा प्रयत्नसाध्यस्य समुच्चयार्थः। मामीश्वरं नारायणं सर्वभूतहृदयाश्रितं यो यतिः कर्मी वाऽव्यभिचारेण व्यभिचारशून्येन निष्कामेण परमप्रेमलक्षणेन भजनं भक्तिः सैव यज्यतेऽनेनेति योगः तेन भक्तियोगेन तत्त्वज्ञानोत्पादकेन सेवते विषयचिन्तां विहाय सदानुसंदधाति स भगवदनुग्रहकृतसभ्यज्ञानसंपन्नो जीवन्नेवैतान्गुणान्यथोक्तान्समतीत्य सभ्यगतिक्रम्य ब्रह्मभूयाय ब्रह्मभवनाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवतीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
māmme
chaonly
yaḥwho
avyabhichāreṇaunalloyed
bhaktiyogena
sevateserve
saḥthey
guṇānthe three modes of material nature
samatītyarise above
etānthese
brahmabhūyāya
kalpatecomes to
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.25
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते

जो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है; जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.27
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्ययस्य च।शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च

क्योंकि ब्रह्म, अविनाशी अमृत, शाश्वत धर्म और ऐकान्तिक सुखका आश्रय मैं ही हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 26
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 26
मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते

जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 26 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 26?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 26 translates to: "And he who serves Me with unwavering devotion, he, crossing beyond the dualities, is fit for becoming Brahman. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"मां च योऽव्यभिचारेण भक्ितयोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 26 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate" mean in English?

"māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 26. And he who serves Me with unwavering devotion, he, crossing beyond the dualities, is fit for becoming Brahman. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.