Bhagavad Gita 14.2 — Commentary
20 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च
idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ sarge ’pi nopajāyante pralaye na vyathanti cha
"Those who, having taken refuge in this knowledge, have attained unity with Me, are neither born at the time of creation nor disturbed at the time of dissolution."
Scholar Commentaries (20)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
,इदं ज्ञानं यथोक्तमुपाश्रित्य? ज्ञानसाधनम् अनुष्ठाय इत्येतत्? मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मत्स्वरूपताम् आगताः प्राप्ताः इत्यर्थः। न तु समानधर्मता साधर्म्यम्? क्षेत्रज्ञेश्वरयोः भेदानभ्युपगमात् गीताशास्त्रे। फलवादश्च अयं स्तुत्यर्थम् उच्यते। सर्गेऽपि सृष्टिकालेऽपि न उपजायन्ते। न उत्पद्यन्ते। प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति च व्यथां न आपद्यन्ते? न च्यवन्ति इत्यर्थः।।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगः ईदृशः भूतकारणम् इत्याह --,
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानम् उपाश्रित्य मम साधर्म्यम् आगताः मत्साम्यं प्राप्ताः? सर्गे अपि न उपजायन्ते न सृजिकर्मतां भजन्ते? प्रलये न व्यथन्ति च? न च संहृतिकर्मतां भजन्ते।अथ प्राकृतानां गुणानां बन्धहेतुताप्रकारं वक्तुं सर्वस्य भूतजातस्य प्रकृतिपुरुषसंसर्गजत्वम्यावत्सञ्जायते किञ्चित् (गीता 13।26) इत्यनेन उक्तं भगवता स्वेन एव कृतम् इत्याह --
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
इस अध्याय में उपदिष्ट ज्ञान की महत्ता सैद्धान्तिक दृष्टि से उतनी अधिक नहीं है? जितनी कि साधना में उसके द्वारा होने वाले लाभ से है। इस अध्याय के गम्भीर अभिप्रायों को सम्यक् रूप से जानने वाला साधक पूर्णत्व की स्थिति को प्राप्त होता है। भगवान् कहते हैं? वे मेरे स्वरूप को प्राप्त होते हैं।गीता में? भगवान् श्रीकृष्ण मैं शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पूर्णत्व की दृष्टि से ही करते हैं। इस अध्याय का विषय उन गुणों की क्रीड़ा का अध्ययन करना है? जो हमें उपाधियों ओर अहंभाव के साथ बांध देते हैं। यदि एक बार हम उनसे मुक्त होकर अपने मन पर होने वाले उनके प्रभाव को समाप्त कर दें? तो तत्क्षण ही जीव भाव से मुक्त होकर हम अपने पारमार्थिक स्वरूप का अनुभव कर सकते हैं।स्वप्नद्रष्टा को स्वप्नावस्था में सत्य प्रतीत होने वाले दुख जाग्रत् अवस्था में असत् हो जाते हैं। नियम यह है कि एक अवस्था के सुखदुखादि अनुभव अन्य अवस्था में प्रभावशील नहीं होते हैं। अत? आत्म अज्ञान की अवस्था का उपाधि तादात्म्य तथा तज्जनित संसार का बन्धन जीव को ही सत्य प्रतीत होता है आत्मज्ञानी पुरुष को नहीं। ज्ञानी पुरुष अपने उस सर्वत्र व्याप्त सत्यस्वरूप को पहचानता है? जिसकी न उत्पत्ति है और न प्रलय।इसे यहाँ एक वाक्य से इंगित किया गया है? वे सृष्टि के आदि में जन्म नहीं लेते हैं सृष्टि मन का एक खेल है। जब हम मन से तादात्म्य नहीं करेंगे? तब हम उससे अविच्छिन्न भी नहीं होंगे? और इस प्रकार हमें सृष्टि का कोई अनुभव भी नहीं होगा। उदाहरणार्थ? जब कोई व्यक्ति क्रोधावेश में आ जाता है? तब वह एक क्रोधी व्यक्ति के रूप में व्यवहार करता है परन्तु क्रोध से निवृत्त होने और मन के शान्त हो जाने पर वह वैसा व्यवहार नहीं कर सकता। मन की युक्ति यह है कि वह विचारों के द्वारा एक सृष्टि की कल्पना करता है? और फिर उसी के साथ तादात्म्य कर स्वयं को इस प्रकार बन्धन में अनुभव करता है मानो उससे मुक्ति पाना कदापि संभव ही न हो। जब तक हम मन में ही डूबे रहेंगे तब तक उसके क्षोभ से उद्वेलित भी होते रहेंगे। मन से अतीत अर्थात् मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा में कोई सृष्टि नहीं है? तब हमें जन्म का अनुभव कैसे हो सकता है और उस स्थिति में प्रलय से भय कैसा वह पूर्ण मुक्ति की स्थिति है।परन्तु अपने मन पर विजय पाने के लिये? साधक को मन की उन युक्तियों (योजनाओं) का पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है? जिनके द्वारा यह प्राय उसे छलता रहता है। शत्रु पर आक्रमण करने के पूर्व उसकी रणनीति का ज्ञान प्राप्त करना अपरिहार्य होता है। इस दृष्टि से? भगवान् का यह कथन भी समीचीन है कि इन तीन गुणों का सम्पूर्ण ज्ञान साधक को अपने मन पर विजय प्राप्त कराने में सहायक होगा और इस प्रकार वह अपनी समस्त प्रकार की अपूर्णताओं से मुक्ति प्राप्त कर सकेगा।अब? भगवान् कहते हैं कि किस प्रकार जड़ और चेतन के सम्बन्ध में इस दुखपूर्ण संसार की उत्पत्ति होती है
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
14.2 इदम् this? ज्ञानम् knowledge? उपाश्रित्य having taken refuge in? मम My? साधर्म्यम् unity? आगताः have attained to? सर्गे at the time of creation? अपि also? न not? उपजायन्ते are born? प्रलये at the time of dissolution? न not? व्यथन्ति are (they) disturbed? च and.Commentary Having resorted to this knowledge they (the sages) are assimilated into My own nature. They have attained to My Being. They have become identical with Me. They live in Me with no thought of thou or I. They go beyond birth and death. There is no birth for them when creation begins and there is no death for them at the time of dissolution. Having reached Me they attain eternity? immortality and perfection. Having become identical with Me through the attainment of the knowledge of the Self by practising the necessary means? they are neither born at the time of creation nor are they disited at the time of dissolution. Knowledge of the Self is eulogised by the Lord in this verse.
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या -- इदं ज्ञानमुपाश्रित्य -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर -- इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी? उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।मम साधर्म्यमागताः -- उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं है? ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निर्लिप्तनिर्विकार रहता हूँ? ऐसे ही उनको भी अपनी निर्लिप्ततानिर्विकारताका अनुभव हो जाता है।ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निर्लिप्तनिर्विकार तो हो जाते हैं? पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति? पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ? योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है? पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह युञ्जान योगी है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् युक्त योगी हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं -- कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः। योगीकी सामर्थ्य तो,सीमित होती है? पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।सर्गेऽपि नोपजायन्ते -- यहाँ अपिपदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है? पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।प्रलये न व्यथन्ति च -- महाप्रलयमें संवर्तक अग्निसे चरअचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल? हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं? नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता? उनमें कोई हलचल नहीं होती? विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं? उस तत्त्वमें हलचल? विकार है ही नहीं? तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं नहीं हो सकते।महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्ममरण होता है? दुःख होता है? हलचल होती है? प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्ममरण? दुःख आदि नहीं होते। सम्बन्ध -- जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं? वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं? उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
इस ( ज्ञानद्वारा प्राप्त हुई ) सिद्धिकी अव्यभिचारिता -- नित्यता दिखलाते हैं --, इस उपर्युक्त ज्ञानका भलीभाँति आश्रय लेकर? अर्थात् ज्ञानके साधनोंका अनुष्ठान करके? मुझ परमेश्वरकी समानताको -- मेरे साथ एकरूपताको प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके उत्पत्तिकालमें भी? फिर उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें -- ब्रह्माके विनाशकालमें भी व्यथाको प्राप्त नहीं होते? अर्थात् गिरते नहीं। यह फलका वर्णन ज्ञानकी स्तुतिके लिये किया गया है। यहाँ साधर्म्य का अर्थ समानधर्मता नहीं है क्योंकि गीताशास्त्रमें क्षेत्रज्ञ और ईश्वरका भेद स्वीकार नहीं किया गया।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
ज्ञानफलस्य कर्मफलवैलक्षण्यमाह -- अस्याश्चेति। कथं ज्ञानाश्रयणं तद्धेतुश्रवणादिसामग्रीसंपत्तिद्वारेत्याह -- ज्ञानेति। साधर्म्ये गोगवययोरिव विद्वदीश्वरयोरपि भेदः स्यादित्याशङ्क्याह -- मत्स्वरूपतामिति। साधर्म्यस्य मुख्यत्वे भेदध्रौव्याद्गीताशास्त्रविरोधः स्यादित्याह -- नत्विति। ज्ञानस्तुतये तत्फलस्य विवक्षितत्वाच्च नात्र सारूप्यमिष्टमित्याह -- फलेति। सारूप्ये धीफलं हित्वा ध्यानफलमप्रस्तुतं प्रसज्येतेत्यर्थः। ईश्वरात्मतां गतानामेवावान्तरसर्गादौ जन्माद्यभावेऽपि महासर्गादौ तद्भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- सर्गेऽपीति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
मोक्षाख्यसिद्धेः कर्मफलापेक्षया परमत्वे तत्साधनस्य ज्ञानस्य चोत्तमत्वे हेत्वाकाङ्क्षायां सिद्धेरैकान्तिकत्वं दर्शयति -- इदमिति। इदं यथोक्तं वक्ष्यमाणं च ज्ञानामुपाश्रित्य श्रवणादिज्ञानसाधनमुष्ठाय मम परमात्मनः साधर्म्यं स्वरुपतामागताः प्राप्ता इत्यर्थः। ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः नतु समानधर्मता साधर्म्यमिति भ्रमितव्यम्। गीताशास्त्रे क्षेत्रक्ज्ञेश्वरयोर्भेदानभ्युपगमात्? प्रस्तुतं ज्ञानफलं विहाय अप्रस्ततध्यानफलस्वीकारप्रसङ्गाच्च। सर्गेऽपि ब्रह्माद्युत्पत्तिकालेऽपि नोपजायन्ते? प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति व्यथां नापद्यन्ते न चलन्तीत्यर्थः। अवान्तरसर्गादौ जन्मादिकं न प्राप्तनुवन्तीति किमु वक्तव्यमित्यपिशब्दार्थः। परं सर्वोत्कृष्टं ब्रह्म तत्स्वरुपमाह। ज्ञानानाममानित्वादीनां यज्ञादीनां ज्ञानसाधनानां मध्ये यदुत्तमं ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गम्। अहं घटं जानामीत्यत्राहमर्थस्य घटाकारवृत्तेर्घटस्य च ज्ञानमस्तीति विषयभेदाज्ज्ञाननत्रयमस्ति तत्राद्यद्वयं नान्तरीयकम्। यच्चोत्तमं चरमं घटप्रकाशकफलरुपं ज्ञानं तदेव परं ब्रह्मेत्यर्थः। यथोक्तं वार्तिककारैःपरागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन संगता। संविभेत्सैवेह ज्ञेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः इति। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा वेदान्तवाक्यजन्यया धीवृत्त्या अपरोक्षीकृत्य इदं ज्ञानं विषयविषयीरुपविकल्पविनिर्मुक्तमुपाश्रित्येत्यन्ये। अस्मिन्व्याख्याने ज्ञानानामिति निर्धारणष्ष्ठ्याः सामञ्जस्यं चिनत्यम्। साधनापेक्षया साधनोत्तमतायाः प्रतिपादनस्यैव सम्यक्त्वात्। किंच तत्स्वरुपमाह। ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गं अहं घटं जानामीत्यादिपरस्परमसंगतमिति दिक्।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
इदं ज्ञानं विषयविषयिरूपविकल्पविनिर्मुक्तं उपाश्रित्य मम ईश्वरस्य साधर्म्यं सर्वात्मत्वं सर्वनियन्तृत्वं सर्वभावाधिष्ठातृत्वमित्यादिधर्मसाम्यं साधर्म्यमागताः। तथा च श्रुतयःय एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति।सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिःस न साधुना कर्मणा भूयान्नो एवासाधुना कनीयान् इति ज्ञानफलं ईश्वरसाधर्म्यप्राप्तिमाहुः। किंच भुशुण्डीप्रभृतयो ज्ञानबलादेव सर्गेऽपि न जायन्ते? प्रलयकाले च तत्तद्भूतभावं गच्छन्तो न प्रलयाग्न्यादिभिर्व्यथन्ते व्यथां प्राप्नुवन्ति। इदं श्लोकद्वयं भाष्ये वक्ष्यमाणज्ञानस्तुत्यर्थत्वेनैव व्याख्यातम्। तज्ज्ञानमुपाश्रित्य ज्ञानसाधनमनुष्ठायेति पदार्थः। शेषं स्पष्टम्।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
किंच -- इदमिति। इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमुपाश्रित्य इदं ज्ञानसाधनमनुष्ठाय मम साधर्म्यं मद्रूपत्वं प्राप्ताः सन्तः सर्गेऽपि ब्रह्मादिषूत्पद्यमानेष्वपि नोत्पद्यन्ते तथा प्रलयेऽपि न व्यथन्ति प्रलये दुःखानि नानुभवन्ति। पुनर्नावर्तन्त इत्यर्थः।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
अपौनरुक्त्यं सूचयन् उत्तरश्लोकमवतारयति -- पुनरपि तज्ज्ञानमिति। इष्टप्राप्तिः पूर्वत्रोक्ता? अनिष्टनिवृत्तिरत्रोच्यत इति न पौनरुक्त्यमिति भावः। इदंशब्दस्योक्तपरत्वे प्रकृतासङ्गत्या अन्यथा व्याचष्टेवक्ष्यमाणमिति।आगताः इत्यस्यागमनकर्तृपरत्वे प्रकृतानन्वयात् प्राप्त्यर्थत्वमाहप्राप्ता इति।व्यथन्ति इत्यस्य दुःखार्थकत्वेऽपि जनिसमभिव्याहारात् संहारलक्षकत्वमुचितमित्यभिप्रायेणाह -- न च संहृतिकर्मतां भजन्त इति।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
तस्याः सिद्धेरैकान्तिकत्वं दर्शयति -- इदं यथोक्तं ज्ञानं ज्ञानसाधनमुपाश्रित्यानुष्ठाय मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मद्रूपतामत्यन्ताभेदेनागताः प्राप्ताः सन्तः सर्गेऽपि हिरण्यगर्भादिषूत्पद्यमानेष्वपि नोपजायन्ते। प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति च न व्यथन्ते। नच लीयन्त इत्यर्थः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
ज्ञानेन कथं सिद्धिं प्राप्ताः इत्यत आह -- इदमिति। इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमुपाश्रित्य साधनानुष्ठानं कृत्वा मम साधर्म्यं समानधर्मत्वं लीलायोग्यत्वमागताः सन्तः सर्गेऽपि आदिसर्गे ब्रह्मादिसृष्टावपि नोपजायन्ते। च पुनः प्रलये सृष्टिसंहारे न व्यथन्ति? न पुनरावर्तन्त इत्यर्थः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
इदं वक्ष्यमाणं मम साधर्म्यं षड्गुणवत्तया साम्यं प्राप्ता एके ते सर्गेऽपि नोपजायन्ते? प्रलये च न व्यथन्ति किन्तु नित्यं समीपे तिष्ठन्तीत्यर्थः। अनेन मुक्तानां तत्र बाहुल्यं सूचितंअनुव्रता यत्र हरेः इत्यादिवाक्यात्।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
14.2 Agatah, those who attain; mama sadharmyam, identity with Me the supreme God, unity with My real nature-sadharmyam, however, does not mean similarity of attributes, for, in the scripture Gita, distinction between the Knower of the field and God is not admitted; and this statement of the result is by way of eulogy-; upasritya, by resorting to i.e. by following; idam, this; jnanam, Knowledge as described, i.e., by following the means to Knowledge; na, are not; upajayante, born, produced; api, even; sarge, during creation; nor do they vyathanti, suffer pain, i.e. they do not perish; pralaye, during dissolution, when even Brahma perishes. The Lord says that association of this kind between the field and the Knower of the field is the origin of all beings:
Dr. S. Sankaranarayan
20th century CE · Academic / Shaiva
Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.
14.2 Idam etc. Vyathanti : The suffix tip (Personal Termination, Third person, Singular) is due to Vedism. The same may be stated in other [similar] instances of the suffixes of Case Terminations and Personal Terminations. Now to begin with, [the Bhagavat] speaks of the seence in the cycle of birth and death. For, if what is to be abandoned is understood along with its cause then it is easy to abandon that -
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
14.2 They, 'resorting to this knowledge' which will be expounded later, come to partake of My nature, and they attain My status. 'They are not born at the time of creation,' they are not subjected to the process of creation, and they 'suffer not at the time of dissolution,' i.e. they are not subjected to the distress involved in dissolution of the universe. In order to show how the Gunas of Prakrti constitute the cause of bondage, Sri Krsna now declares that, the aggregation of beings, born from the conjunction of Purusa and Prakrti as stated already in the passages, 'Whatever being is born' (13.26), is brought about by the Lord Himself:
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 14.2?
,इदं ज्ञानं यथोक्तमुपाश्रित्य? ज्ञानसाधनम् अनुष्ठाय इत्येतत्? मम परमेश्वरस्य साधर्म्यं मत्स्वरूपताम् आगताः प्राप्ताः इत्यर्थः। न तु समानधर्मता साधर्म्यम्? क्षेत्रज्ञेश्वरयोः भेदानभ्युपगमात् गीताशास्त्रे। फलवादश्च अयं स्तुत्यर्थम् उच्यते। सर्गेऽपि सृष्टिकालेऽपि न उपजायन्ते। न उत्पद्यन्ते। प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति च व्यथां न आपद्यन्ते? न च्यवन्ति इत्यर्थः।।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगः ईदृश
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 20 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 14.2, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.