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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च

इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। — VaniSagar

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SindhiIND

جن هن علم ۾ پناهه وٺي مون سان اتحاد حاصل ڪيو آهي، اهي نه تخليق جي وقت پيدا ٿيا آهن ۽ نه ئي ڦٽڻ وقت پريشان آهن.

GujaratiIND

જેમણે આ જ્ઞાનનો આશ્રય લઈને મારી સાથે એકતા પ્રાપ્ત કરી છે, તેઓ ન તો સૃષ્ટિના સમયે જન્મે છે અને ન તો વિસર્જન સમયે વિચલિત થાય છે.

TamilIND

இந்த அறிவில் அடைக்கலமாகி என்னுடன் ஐக்கியம் அடைந்தவர்கள், சிருஷ்டியின் போது பிறக்கவில்லை, கலைக்கும் நேரத்தில் கலங்கவில்லை.

MalayalamIND

ഈ ജ്ഞാനത്തിൽ അഭയം പ്രാപിച്ച്, എന്നിൽ ഐക്യം നേടിയവർ, സൃഷ്ടിസമയത്ത് ജനിച്ചവരോ, ലയിക്കുന്ന സമയത്ത് അസ്വസ്ഥരാകുകയോ ചെയ്യുന്നില്ല.

MarathiIND

ज्यांनी या ज्ञानाचा आश्रय घेऊन माझ्याशी एकरूपता प्राप्त केली आहे, ते सृष्टीच्या वेळी जन्म घेत नाहीत आणि विघटनाच्या वेळी विचलित होत नाहीत.

PunjabiIND

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਇਸ ਗਿਆਨ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਲੈ ਕੇ ਮੇਰੇ ਨਾਲ ਏਕਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲਈ ਹੈ, ਉਹ ਨਾ ਤਾਂ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦੇ ਸਮੇਂ ਪੈਦਾ ਹੁੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਵਿਘਨ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿਗੜਦੇ ਹਨ।

TeluguIND

ఈ జ్ఞానాన్ని ఆశ్రయించి, నాతో ఐక్యతను పొందిన వారు, సృష్టి సమయంలో జన్మించరు లేదా విచ్ఛిన్న సమయంలో కలవరపడరు.

KannadaIND

ಈ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ಆಶ್ರಯಿಸಿ, ನನ್ನೊಂದಿಗೆ ಐಕ್ಯತೆಯನ್ನು ಪಡೆದವರು, ಸೃಷ್ಟಿಯ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ಹುಟ್ಟುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ವಿಸರ್ಜನೆಯ ಸಮಯದಲ್ಲಿ ವಿಚಲಿತರಾಗುವುದಿಲ್ಲ.

NepaliIND

जसले यस ज्ञानको शरण लिएर मसँग एकता प्राप्त गरेका छन्, तिनीहरू न सृष्टिको समयमा जन्मिएका छन् न विघटनका बेला विचलित छन्।

BengaliIND

যারা এই জ্ঞানের আশ্রয় নিয়ে আমার সাথে একাত্মতা লাভ করেছে, তারা সৃষ্টির সময় জন্মায় না এবং বিলুপ্তির সময়ও বিচলিত হয় না।

MizoIND

He hriatnaah hian inhumhim a, Keimah nena inpumkhatna nei tawhte chu thil siam laiah an piang lo va, an inthen lai pawhin an buai lo.

DogriIND

जेह्ड़े इस ज्ञान दी शरण लैंदे होई मेरे कन्नै इकता हासल करी चुके दे न, ओह् न सृष्टि दे समें पैदा होंदे न ते ना गै विघटन दे समें च परेशान होंदे न।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- इदं ज्ञानमुपाश्रित्य -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने उत्तम और पर -- इन दो विशेषणोंसे जिस ज्ञानकी महिमा कही थी? उस ज्ञानका अनुभव करना ही उसका आश्रय लेना है। उस ज्ञानका अनुभव होनेसे मनुष्यके सम्पूर्ण संशय मिट जाते हैं और वह ज्ञानस्वरूप हो जाता है।मम साधर्म्यमागताः -- उस ज्ञानका आश्रय लेकर मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् जैसे मेरेमें कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं है? ऐसे ही उनमें भी कर्तृत्वभोक्तृत्व नहीं रहता। जैसे मैं सदा ही निर्लिप्तनिर्विकार रहता हूँ? ऐसे ही उनको भी अपनी निर्लिप्ततानिर्विकारताका अनुभव हो जाता है।ज्ञानी महापुरुष भगवान्के समान निर्लिप्तनिर्विकार तो हो जाते हैं? पर वे भगवान्के समान संसारकी उत्पत्ति? पालन और संहारका कार्य नहीं कर सकते। हाँ? योगाभ्यासके बलसे किसी योगीमें कुछ सामर्थ्य आ जाती है? पर वह सामर्थ्य भी भगवान्की सामर्थ्यके समान नहीं होती। कारण कि वह युञ्जान योगी है अर्थात् उसने अभ्यास करके कुछ सामर्थ्य प्राप्त की है। परन्तु भगवान् युक्त योगी हैं अर्थात् भगवान्में सामर्थ्य सदासे स्वतःसिद्ध है। भगवान् सब कुछ करनेमें समर्थ हैं -- कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं समर्थः। योगीकी सामर्थ्य तो,सीमित होती है? पर भगवान्की सामर्थ्य असीम होती है।सर्गेऽपि नोपजायन्ते -- यहाँ अपिपदसे यह मालूम होता है कि वे ज्ञानी महापुरुष महासर्गके आरम्भमें भी उत्पन्न नहीं होते। महासर्गके आदिमें चौदह लोकोंकी तथा उन लोकोंके अधिकारियोंकी उत्पत्ति होती है? पर वे महापुरुष उत्पन्न नहीं होते अर्थात् उनको फिर कर्मपरवश होकर शरीर धारण नहीं करना पड़ता।प्रलये न व्यथन्ति च -- महाप्रलयमें संवर्तक अग्निसे चरअचर सभी प्राणी भस्म हो जाते हैं। समुद्रके बढ़ जानेसे पृथ्वी डूब जाती है। चौदह लोकोंमें हलचल? हाहाकार मच जाता है। सभी प्राणी दुःखी होते हैं? नष्ट होते हैं। परन्तु महाप्रलयमें उन ज्ञानी महापुरुषोंको कोई दुःख नहीं होता? उनमें कोई हलचल नहीं होती? विकार नहीं होता। वे महापुरुष जिस तत्त्वको प्राप्त हो गये हैं? उस तत्त्वमें हलचल? विकार है ही नहीं? तो फिर वे महापुरुष व्यथित कैसे हो सकते हैं नहीं हो सकते।महासर्गमें भी उत्पन्न न होने और महाप्रलयमें भी व्यथित न होनेका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषका प्रकृति और प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। इसलिये प्रकृतिका सम्बन्ध रहनेसे जो जन्ममरण होता है? दुःख होता है? हलचल होती है? प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित महापुरुषमें वह जन्ममरण? दुःख आदि नहीं होते। सम्बन्ध -- जो भगवान्की सधर्मताको प्राप्त हो जाते हैं? वे तो महासर्गमें भी पैदा नहीं होते परन्तु जो प्राणी महासर्गमें पैदा होते हैं? उनके उत्पन्न होनेकी क्या प्रक्रिया है -- इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

इस ( ज्ञानद्वारा प्राप्त हुई ) सिद्धिकी अव्यभिचारिता -- नित्यता दिखलाते हैं --, इस उपर्युक्त ज्ञानका भलीभाँति आश्रय लेकर? अर्थात् ज्ञानके साधनोंका अनुष्ठान करके? मुझ परमेश्वरकी समानताको -- मेरे साथ एकरूपताको प्राप्त हुए पुरुष सृष्टिके उत्पत्तिकालमें भी? फिर उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकालमें -- ब्रह्माके विनाशकालमें भी व्यथाको प्राप्त नहीं होते? अर्थात् गिरते नहीं। यह फलका वर्णन ज्ञानकी स्तुतिके लिये किया गया है। यहाँ साधर्म्य का अर्थ समानधर्मता नहीं है क्योंकि गीताशास्त्रमें क्षेत्रज्ञ और ईश्वरका भेद स्वीकार नहीं किया गया।

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Sri Anandgiri

ज्ञानफलस्य कर्मफलवैलक्षण्यमाह -- अस्याश्चेति। कथं ज्ञानाश्रयणं तद्धेतुश्रवणादिसामग्रीसंपत्तिद्वारेत्याह -- ज्ञानेति। साधर्म्ये गोगवययोरिव विद्वदीश्वरयोरपि भेदः स्यादित्याशङ्क्याह -- मत्स्वरूपतामिति। साधर्म्यस्य मुख्यत्वे भेदध्रौव्याद्गीताशास्त्रविरोधः स्यादित्याह -- नत्विति। ज्ञानस्तुतये तत्फलस्य विवक्षितत्वाच्च नात्र सारूप्यमिष्टमित्याह -- फलेति। सारूप्ये धीफलं हित्वा ध्यानफलमप्रस्तुतं प्रसज्येतेत्यर्थः। ईश्वरात्मतां गतानामेवावान्तरसर्गादौ जन्माद्यभावेऽपि महासर्गादौ तद्भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- सर्गेऽपीति।

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Sri Dhanpati

मोक्षाख्यसिद्धेः कर्मफलापेक्षया परमत्वे तत्साधनस्य ज्ञानस्य चोत्तमत्वे हेत्वाकाङ्क्षायां सिद्धेरैकान्तिकत्वं दर्शयति -- इदमिति। इदं यथोक्तं वक्ष्यमाणं च ज्ञानामुपाश्रित्य श्रवणादिज्ञानसाधनमुष्ठाय मम परमात्मनः साधर्म्यं स्वरुपतामागताः प्राप्ता इत्यर्थः। ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः नतु समानधर्मता साधर्म्यमिति भ्रमितव्यम्। गीताशास्त्रे क्षेत्रक्ज्ञेश्वरयोर्भेदानभ्युपगमात्? प्रस्तुतं ज्ञानफलं विहाय अप्रस्ततध्यानफलस्वीकारप्रसङ्गाच्च। सर्गेऽपि ब्रह्माद्युत्पत्तिकालेऽपि नोपजायन्ते? प्रलये ब्रह्मणोऽपि विनाशकाले न व्यथन्ति व्यथां नापद्यन्ते न चलन्तीत्यर्थः। अवान्तरसर्गादौ जन्मादिकं न प्राप्तनुवन्तीति किमु वक्तव्यमित्यपिशब्दार्थः। परं सर्वोत्कृष्टं ब्रह्म तत्स्वरुपमाह। ज्ञानानाममानित्वादीनां यज्ञादीनां ज्ञानसाधनानां मध्ये यदुत्तमं ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गम्। अहं घटं जानामीत्यत्राहमर्थस्य घटाकारवृत्तेर्घटस्य च ज्ञानमस्तीति विषयभेदाज्ज्ञाननत्रयमस्ति तत्राद्यद्वयं नान्तरीयकम्। यच्चोत्तमं चरमं घटप्रकाशकफलरुपं ज्ञानं तदेव परं ब्रह्मेत्यर्थः। यथोक्तं वार्तिककारैःपरागर्थप्रमेयेषु या फलत्वेन संगता। संविभेत्सैवेह ज्ञेयोऽर्थो वेदान्तोक्तिप्रमाणतः इति। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा वेदान्तवाक्यजन्यया धीवृत्त्या अपरोक्षीकृत्य इदं ज्ञानं विषयविषयीरुपविकल्पविनिर्मुक्तमुपाश्रित्येत्यन्ये। अस्मिन्व्याख्याने ज्ञानानामिति निर्धारणष्ष्ठ्याः सामञ्जस्यं चिनत्यम्। साधनापेक्षया साधनोत्तमतायाः प्रतिपादनस्यैव सम्यक्त्वात्। किंच तत्स्वरुपमाह। ज्ञानं मोक्षफलत्वादन्तरङ्गं अहं घटं जानामीत्यादिपरस्परमसंगतमिति दिक्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
idamthis
jñānamwisdom
upāśhrityatake refuge in
mamamine
sādharmyamof similar nature
āgatāḥhaving attained
sargeat the time of creation
apieven
nanot
upajāyanteare born
pralayeat the time of dissolution
navyathanti
chaand
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.1
श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः

श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.3
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम्।संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्ति-स्थान है और मैं उसमें जीवरूप गर्भका स्थापन करता हूँ। उससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 2
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च

इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 2 का हिंदी अर्थ: "इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 2?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 2 translates to: "Those who, having taken refuge in this knowledge, have attained unity with Me, are neither born at the time of creation nor disturbed at the time of dissolution. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 2 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ" mean in English?

"idaṁ jñānam upāśhritya mama sādharmyam āgatāḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 2. Those who, having taken refuge in this knowledge, have attained unity with Me, are neither born at the time of creation nor disturbed at the time of dissolution. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.