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Adhyay 14, Shlok 1
श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः

श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। — VaniSagar

Global Translations

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GujaratiIND

, "હું તમને ફરીથી તે પરમ જ્ઞાન, સર્વ જ્ઞાનમાં શ્રેષ્ઠ, જાહેર કરીશ, જે જાણીને બધા ઋષિઓ આ જીવન પછી પરમ પૂર્ણતામાં ગયા છે.

MalayalamIND

, "എല്ലാ ജ്ഞാനികളും ഈ ജീവിതത്തിന് ശേഷം അത്യുന്നതമായ പൂർണ്ണതയിലേക്ക് പോയത് എന്താണെന്ന് അറിഞ്ഞുകൊണ്ട്, എല്ലാ ജ്ഞാനത്തിലും ഏറ്റവും ഉത്തമമായ ആ പരമമായ അറിവ് ഞാൻ വീണ്ടും നിങ്ങളോട് പ്രഖ്യാപിക്കുന്നു.

TamilIND

, "முனிவர்கள் அனைவரும் இந்த வாழ்விற்குப் பிறகு உச்சநிலைக்குச் சென்றுவிட்டார்கள் என்பதை அறிந்த நான், உன்னதமான அறிவை, எல்லா அறிவிலும் சிறந்த அறிவை மீண்டும் உனக்கு அறிவிக்கிறேன்.

KannadaIND

, "ಈ ಜೀವನದ ನಂತರ ಎಲ್ಲ ಋಷಿಗಳು ಸರ್ವೋನ್ನತ ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಗೆ ಹೋಗಿದ್ದಾರೆಂದು ತಿಳಿದುಕೊಂಡು, ಎಲ್ಲಾ ಜ್ಞಾನಕ್ಕಿಂತ ಶ್ರೇಷ್ಠವಾದ ಜ್ಞಾನವನ್ನು ನಾನು ಮತ್ತೊಮ್ಮೆ ನಿಮಗೆ ಘೋಷಿಸುತ್ತೇನೆ.

PunjabiIND

, "ਮੈਂ ਤੁਹਾਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਉਸ ਪਰਮ ਗਿਆਨ ਦਾ ਐਲਾਨ ਕਰਾਂਗਾ, ਸਭ ਤੋਂ ਉੱਤਮ ਗਿਆਨ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਜਾਣ ਕੇ ਸਾਰੇ ਰਿਸ਼ੀ ਇਸ ਜੀਵਨ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਪਰਮ ਸੰਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਚਲੇ ਗਏ ਹਨ।

TeluguIND

, "ఈ జీవితానంతరం ఋషులందరూ సర్వోత్కృష్టమైన పరిపూర్ణతకు చేరుకున్నారని తెలిసి, అన్నింటికంటే ఉత్తమమైన జ్ఞానాన్ని నేను మళ్ళీ నీకు ప్రకటిస్తాను.

BengaliIND

, "আমি আবার তোমাকে সেই পরম জ্ঞান, সর্বশ্রেষ্ঠ জ্ঞানের কথা ঘোষণা করব, যা জেনে সমস্ত ঋষিগণ এই জীবনের পর পরম সিদ্ধিতে গিয়েছেন।

NepaliIND

, " म तिमीलाई त्यो परम ज्ञान, सबै ज्ञान भन्दा श्रेष्ठ ज्ञानको घोषणा गर्नेछु, जुन सबै ऋषिहरू यस जीवन पछि परम पूर्णतामा गएका छन्।

MarathiIND

, "मी तुला पुन्हा ते परम ज्ञान, सर्व ज्ञानाहून श्रेष्ठ ज्ञान सांगेन, जे जाणून घेऊन सर्व ऋषी या जन्मानंतर परम सिद्धीला गेले आहेत.

SindhiIND

”آءٌ وري توکي ٻڌايان ٿو ته اعليٰ علم، سڀني علمن کان بھترين، جنھن کي ڄاڻڻ کان پوءِ سڀ سياڻا ھن زندگيءَ کان پوءِ اعليٰ ڪمال ڏانھن ويا آھن.

BhojpuriIND

, "हम तोहरा के फेरु से घोषणा करब कि परम ज्ञान, सब ज्ञान से श्रेष्ठ, जवना के जान के सब ऋषि एह जीवन के बाद परम सिद्धि में चल गईल बाड़े।"

MaithiliIND

, "हम अहाँ केँ पुनः घोषणा करब जे परम ज्ञान, सब सँ श्रेष्ठ ज्ञान, ई जानि जे सब ऋषि एहि जीवनक बाद परम सिद्धि मे चलि गेल छथि |"

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्'--तेरहवें अध्यायके अठारहवें, तेईसवें और चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका, प्रकृतिपुरुषका जो ज्ञान (विवेक) बताया था, उसी ज्ञानको फिर बतानेके लिये भगवान् 'भूयः प्रवक्ष्यामि' पदोंसे प्रतिज्ञा करते हैं। लौकिक और पारलौकिक जितने भी ज्ञान हैं अर्थात् जितनी भी विद्याओं, कलाओँ, भाषाओं, लिपियों आदिका ज्ञान है, उन सबसे प्रकृति-पुरुषका भेद बतानेवाला, प्रकृतिसे अतीत करनेवाला, परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला यह ज्ञान श्रेष्ठ है, सर्वोत्कृष्ट है। इसके समान दूसरा कोई ज्ञान है ही नहीं, हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। कारण कि दूसरे सभी ज्ञान संसारमें फँसानेवाले हैं, बन्धनमें डालनेवाले हैं। यद्यपि 'उत्तम' और 'पर'-- इन दोनों शब्दोंका एक ही अर्थ होता है, तथापि जहाँ एक अर्थके दो शब्द एक साथ आ जाते हैं, वहाँ उनके दो अर्थ होते हैं। अतः यहाँ 'उत्तम' शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान प्रकृति और उसके कार्य संसार-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करानेवाला होनेसे श्रेष्ठ है; और 'पर' शब्दका अर्थ है कि यह ज्ञान परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे सर्वोत्कृष्ट है। 'यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः'-- जिस ज्ञानको जानकर अर्थात् जिसका अनुभव करके बड़े-बड़े मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमात्माको प्राप्त हो गये हैं, उसको मैं कहूँगा। उस ज्ञानको प्राप्त करनेपर कोई मुक्त हो और कोई मुक्त न हो -- ऐसा होता ही नहीं, प्रत्युत इस ज्ञानको प्राप्त करनेवाले सब-के-सब मुनिलोग मुक्त हो जाते हैं, संसारके बन्धनसे, संसारकी परवशतासे छूट जाते हैं और परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं। तत्त्वका मनन करनेवाले जिस मनुष्यका शरीरके साथ अपनापन नहीं रहा, वह 'मुनि' कहलाता है। 'परां सिद्धिम्' कहनेका तात्पर्य है कि सांसारिक कार्योंकी जितनी सिद्धियाँ हैं अथवा योगसाधनसे होनेवाली अणिमा, महिमा, गरिमा आदि जितनी सिद्धियाँ हैं, वे सभी वास्तवमें असिद्धियाँ ही हैं। कारण कि वे सभी जन्म-मरण देनेवाली, बन्धनमें डालनेवाली, परमात्मप्राप्तिमें बाधा डालनेवाली हैं। परन्तु परमात्मप्राप्तिरूप जो सिद्धि है, वह सर्वोत्कृष्ट है क्योंकि उसको प्राप्त होनेपर मनुष्य जन्ममरणसे छूट जाता है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा जो यह कहा कि प्रकृतिमें स्थित होना और गुणविषयक आसक्ति -- यही संसारका कारण है? सो किस गुणमें किस प्रकारसे आसक्ति होती है गुण कौनसे हैं वे कैसे बाँधते हैं गुणोंसे छुटकारा कैसे होता है तथा मुक्तका लक्षण क्या है यह सब बातें बतलानेके लिये भी इस अध्यायका आरम्भ किया जाता है --,श्रीभगवान् बोले -- परम् इस पदका दूरस्थ ज्ञानम् पदके साथ सम्बन्ध है। समस्त ज्ञानोंमें उत्तम परम ज्ञानको अर्थात् जो पर वस्तुविषयक होनेसे परम है और उत्तम फलयुक्त होनेके कारण समस्त ज्ञानोंमें उत्तम है? उस परम उत्तम ज्ञानको? यद्यपि पहलेके सब अध्यायोंमें बारबार कह आया हूँ? तो भी फिर भली प्रकार कहूँगा। यहाँ ज्ञानोंमेंसे इस शब्दसे अमानित्वादि ज्ञानसाधनोंका ग्रहण नहीं है। किंतु यज्ञादि ज्ञेयवस्तुविषयक ज्ञानोंका ग्रहण है। वे यज्ञादिविषयक ज्ञान मोक्षके लिये उपयुक्त नहीं हैं और यह ( जो इस अध्यायमें बतलाया जाता है वह ) मोक्षके लिये उपयुक्त है? इसलिये परम और उत्तम इन दोनों शब्दोंसे श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये इसकी स्तुति करते हैं। जिस ज्ञानको जानकर -- पाकर सब मननशील संन्यासीजन इस देहबन्धनसे मुक्त होनेके बाद मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं? ( ऐसा परम ज्ञान कहूँगा )।

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Sri Anandgiri

क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगस्य सर्वोत्पत्तिनिमित्तत्वमज्ञातं ज्ञापयितुमध्यायान्तरमवतारयन्नध्याययोरुत्थाप्योत्थापकत्वरूपां संगतिमाह -- सर्वमिति। विधान्तरेणाध्यायारम्भं सूचयति -- अथवेति। तदेव वक्तुमुक्तमनुवदति -- ईश्वरेति। प्रकृतिस्थत्वं पुरुषस्य प्रकृत्या सहैक्याध्यासस्तस्यैव गुणेषु शब्दादिविषयेषु सङ्गोऽभिनिवेशः। षड्विधामाकाङ्क्षां निक्षिप्य तदुत्तरत्वेनाध्यायारम्भे पूर्ववदेव पूर्वाध्यायसंबन्धसिद्धिरित्याह -- कस्मिन्निति। पूर्वोक्तेनार्थेनास्याध्यायस्य समुच्चयार्थश्चकारः। परमित्यस्य भाविकालार्थत्वं व्यावर्तयितुं सङ्गतिमाह -- परमिति। भूयःशब्दस्याधिकार्थत्वमिह नास्तीत्याह -- पुनरिति। पुनःशब्दार्थमेव विवृणोति -- पूर्वेष्विति। पुनरुक्तिस्तर्हीत्याशङ्क्य सूक्ष्मत्वेन दुर्बोधत्वात्पुनर्वचनमर्थवदित्याह -- तच्चेति। विशेष्यं प्रश्नद्वारा निर्दिशति -- किं तदिति। निर्धारणार्थां षष्ठीमादाय तस्य प्रकर्षं दर्शयति -- सर्वेषामिति। परमुत्तममिति पुनरुक्तिमाशङ्क्य विषयफलभेदान्मैवमित्याह -- उत्तमेति। ज्ञानं ज्ञेयमित्यादौ ज्ञानशब्देनामानित्वादीनामुक्तत्वात्तन्मध्ये च ज्ञानस्य साध्यत्वेनोत्तमत्वान्न तस्य वक्तव्यतेत्याशङ्क्याह -- ज्ञानानामिति। नामानित्वादीनां ग्रहणमिति शेषः। इतिशब्दादूर्ध्वं पूर्ववदेव शेषो द्रष्टव्यः। यथोक्तज्ञानापेक्षया कुतस्तज्ज्ञानस्य प्रकर्षस्तत्राह -- तानीति। स्तुतिफलमाह -- श्रोतृबुद्धीति। ज्ञानं ज्ञात्वा ज्ञानस्य ज्ञेयत्वोपगमादनवस्थेत्याशङ्क्याह -- प्राप्येति। मुनिशब्दस्य चतुर्थाश्रमविषयत्वे तन्मात्रादेव ज्ञानायोगात्कुतस्तेषां मुक्तिरित्याशङ्क्याह -- मननेति। सिद्धेर्ज्ञानत्वं परामिति विशेषणाद्व्यावर्त्य मुक्तित्वमाह -- मोक्षाख्यामिति। देहाख्यस्य बन्धनस्याध्यक्षत्वमाह -- अस्मादिति।

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Sri Dhanpati

यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्तावरजंगमम्। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ इत्युक्तं तत्कथमिति प्रकाशनार्थं ईश्वरतन्त्रयोः क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः जगत्कारणत्वं नतु सांख्यानामिव स्वतन्त्रयोरित्येवमर्थं च। तथाकारणं गुणसङ्गेऽस्य सदसद्योनिजन्मसु इत्युक्तं। कस्मिन् गुणे कथं रागः के वा गुणाः कथं ते बध्नान्ति गुणेभ्यश्च मोक्षणं कथं स्यात् मुक्तस्य च लक्षणं वक्त्वयं इत्येवमर्थं चाध्यायमारभमाण आदौ श्रोतृरुच्युत्पत्तये श्रीभगवानुवाच -- परमिति। ज्ञानानां यज्ञादिज्ञेयवस्तुविषयाणां सर्वेषामुत्तमफलत्वादुत्तमं नत्वमानित्वादीनां तत्त्वज्ञानान्तरङ्गसाधनानां एतादृशं परमात्मसाक्षात्कारसाधनं ज्ञानं पूर्वेष्वध्यायेष्वसकृदुक्तमपि ब्रह्मणः सूक्ष्मत्वेन दुर्बोधत्वात् भूयः पुनरहं प्रकर्षेण वक्ष्यामि। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा सर्वे मुनयो मननशीलाः परां सिद्धिं मोक्षाख्यां इतोऽस्माद्देहबन्धनादूर्ध्वं गताः प्राप्ताः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
śhrībhagavān uvācha
paramsupreme
bhūyaḥagain
pravakṣhyāmiI shall explain
jñānānāmof all knowledge
jñānam uttamamthe supreme wisdom
yatwhich
jñātvāknowing
munayaḥsaints
sarveall
parāmhighest
siddhimperfection
itaḥthrough this
gatāḥattained
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Bhagavad Gita · 14.2
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च

इस ज्ञानका आश्रय लेकर जो मनुष्य मेरी सधर्मताको प्राप्त हो गये हैं, वे महासर्गमें भी पैदा नहीं होते और महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 1
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 1
श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः

श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 1 का हिंदी अर्थ: "श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 1?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 1 translates to: ", "I will again declare to thee that supreme knowledge, the best of all knowledge, having known which all the sages have gone to supreme perfection after this life. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"श्री भगवानुवाचपरं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्।यज्ज्ञात्वा मुनयः सर" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 1 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। श्रीभगवान् बोले -- सम्पूर्ण ज्ञानोंमें उत्तम और पर ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब-के-सब मुनिलोग इस संसारसे मुक्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "śhrī-bhagavān uvācha" mean in English?

"śhrī-bhagavān uvācha" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 1. , "I will again declare to thee that supreme knowledge, the best of all knowledge, having known which all the sages have gone to supreme perfection after this life. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.