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Sudarshana Chakra
Adhyay 14, Shlok 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

సత్వగుణం ప్రబలంగా ఉన్నప్పుడు దేహాత్ముడు మృత్యువును ఎదుర్కొంటే, వారు అత్యున్నతమైన జ్ఞానుల నిష్కళంక లోకాలను పొందుతారు.

MarathiIND

जर सत्त्वगुण प्रबळ असताना अवतरलेल्याला मृत्यूशी गाठ पडली, तर ते परात्पर जाणणाऱ्यांच्या निष्कलंक जगाला प्राप्त होतात.

NepaliIND

यदि सत्त्व प्रबल हुँदा मूर्त रूपले मृत्युलाई भेट्छ भने, तिनीहरूले परम ज्ञाताहरूको निष्कलंक जगतलाई प्राप्त गर्छन्।

BengaliIND

মূর্ত ব্যক্তি যদি সত্ত্বের প্রাধান্য থাকাকালীন মৃত্যুর সাথে সাক্ষাত করে, তবে তারা সর্বোচ্চ জ্ঞানীদের নিষ্কলঙ্ক জগত লাভ করে।

TamilIND

சத்வமே பிரதானமாக இருக்கும் போது உடலமைப்பாளர் மரணத்தை சந்தித்தால், அவர்கள் உன்னதத்தை அறிந்தவர்களின் களங்கமற்ற உலகங்களை அடைகிறார்கள்.

KannadaIND

ಸತ್ವವು ಪ್ರಧಾನವಾಗಿರುವಾಗ ಸಾಕಾರಗೊಂಡವರು ಮರಣವನ್ನು ಎದುರಿಸಿದರೆ, ಅವರು ಅತ್ಯುನ್ನತವಾದ ಬಲ್ಲವರ ನಿರ್ಮಲವಾದ ಪ್ರಪಂಚವನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತಾರೆ.

SindhiIND

جيڪڏهن مجسم ماڻهو موت سان ملن ٿا جڏهن ستوا غالب آهي، پوء اهي اعلي ترين ڄاڻندڙن جي بي مثال دنيا کي حاصل ڪن ٿا.

GujaratiIND

જો મૂર્ત વ્યક્તિ મૃત્યુને મળે છે જ્યારે સત્વ પ્રબળ હોય છે, તો તેઓ સર્વોચ્ચ જાણકારોના નિષ્કલંક વિશ્વને પ્રાપ્ત કરે છે.

MalayalamIND

സത്വഗുണം പ്രബലമായിരിക്കുമ്പോൾ മൂർത്തീഭാവമുള്ളവൻ മരണത്തെ അഭിമുഖീകരിക്കുകയാണെങ്കിൽ, അവർ അത്യുന്നതത്തെ അറിയുന്നവരുടെ കളങ്കരഹിതമായ ലോകങ്ങളെ പ്രാപിക്കുന്നു.

PunjabiIND

ਜੇਕਰ ਸਤਿਤਵ ਪ੍ਰਬਲ ਹੋਣ 'ਤੇ ਸਰੂਪ ਵਾਲੇ ਵਿਅਕਤੀ ਮੌਤ ਨੂੰ ਮਿਲਦੇ ਹਨ, ਤਾਂ ਉਹ ਉੱਚਤਮ ਦੇ ਜਾਣਨ ਵਾਲਿਆਂ ਦੇ ਬੇਦਾਗ ਸੰਸਾਰ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦੇ ਹਨ।

DogriIND

जेकर सत्त्व प्रधान होने पर देहदार गी मौत कन्नै मिलदा ऐ तां ओह् परमात्मा दे ज्ञातियें दे बेदाग लोकें गी हासल करदे न।

ManipuriIND

ꯀꯔꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯁꯠꯠꯕꯅꯥ ꯃꯔꯨ ꯑꯣꯏꯕꯥ ꯃꯇꯃꯗꯥ ꯍꯀꯆꯥꯡ ꯐꯅꯥ ꯂꯩꯕꯥ ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯗꯨꯅꯥ ꯁꯤꯕꯒꯥ ꯎꯅꯔꯕꯗꯤ ꯃꯈꯣꯌꯅꯥ ꯈ꯭ꯕꯥꯏꯗꯒꯤ ꯋꯥꯡꯕꯥ ꯈꯉꯕꯁꯤꯡꯒꯤ ꯃꯁꯛ ꯅꯥꯏꯕꯥ ꯃꯥꯂꯦꯃꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯐꯪꯏ |

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- यदा सत्त्वे प्रवृद्धे ৷৷. प्रतिपद्यते -- जिस कालमें जिसकिसी भी देहधारी मनुष्यमें? चाहे वह सत्त्वगुणी? रजोगुणी अथवा तमोगुणी ही क्यों न हो? जिसकिसी कारणसे सत्त्वगुण तात्कालिक बढ़ जाता है अर्थात् सत्त्वगुणके कार्य स्वच्छता? निर्मलता आदि वृत्तियाँ तात्कालिक बढ़ जाती हैं? उस समय अगर उस मनुष्यके प्राण छूट जाते हैं? तो वह उत्तम (शुभ) कर्म करनेवालोंके निर्मल लोकोंमें चला जाता है।उत्तमविदाम् कहनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य उत्तम (शुभ) कर्म ही करते हैं? अशुभकर्म कभी करते ही नहीं अर्थात् उत्तम ही उनके भाव हैं? उत्तम ही उनके कर्म हैं और उत्तम ही उनका ज्ञान है? ऐसे पुण्यकर्मा लोगोंका जिन लोकोंपर अधिकार हो जाता है? उन्हीं निर्मल लोकोंमें वह मनुष्य चला जाता है? जिसका शरीर सत्त्वगुणके बढ़नेपर छूटा है। तात्पर्य है कि उम्रभर शुभकर्म करनेवालोंको जिन ऊँचेऊँचे लोकोंकी प्राप्ति होती है? उन्हीं लोकोंमें तात्कालिक बढ़े हुए सत्त्वगुणकी वृत्तिमें प्राण छूटनेवाला जाता है।सत्त्वगुणकी वृद्धिमें शरीर छोड़नेवाले मनुष्य पुण्यात्माओंके प्राप्तव्य ऊँचे लोकोंमें जाते हैं -- इससे सिद्ध होता है कि गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली वृत्तियाँ कर्मोंकी अपेक्षा कमजोर नहीं हैं। अतः सात्त्विक वृत्ति भी पुण्यकर्मोंके,समान ही श्रेष्ठ है। इस दृष्टिसे शास्त्रविहित पुण्यकर्मोंमें भी भावका ही महत्त्व है? पुण्यकर्मविशेषका नहीं। इसलिये सात्त्विक भावका स्थान बहुत ऊँचा है। पदार्थ? क्रिया? भाव और उद्देश्य -- ये चारों क्रमशः एकदूसरेसे ऊँचे होते हैं।रजोगुण और तमोगुणकी अपेक्षा सत्त्वगुणकी वृत्ति सूक्ष्म और व्यापक होती है। लोकमें भी स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्मका आहार कम होता है जैसे -- देवतालोग सूक्ष्म होनेसे केवल सुगन्धिसे ही तृप्त हो जाते हैं। हाँ? स्थूलकी अपेक्षा सूक्ष्ममें शक्ति अवश्य अधिक होती है। यही कारण है कि सूक्ष्मभावकी प्रधानतासे अन्तसमयमें सत्त्वगुणकी वृद्धि? मनुष्यको ऊँचे लोकोंमें ले जाती है।अमलान् कहनेका तात्पर्य है कि सत्त्वगुणका स्वरूप निर्मल है अतः सत्त्वगुणके बढ़नेपर जो मरता है? उसको निर्मल लोकोंकी ही प्राप्ति होती है।यहाँ यह शङ्का होती है कि उम्रभर शुभकर्म करनेवालोंको जिन लोकोंकी प्राप्ति होती है? उन लोकोंमें सत्त्वगुणकी वृत्ति बढ़नेपर मरनेवाला कैसे चला जायगा भगवान्की यह एक विशेष छूट है कि अन्तकालमें मनुष्यकी जैसी मति होती है? वैसी ही उसकी गति होती है (गीता 8। 6)। अतः सत्त्वगुणकी वृत्तिके बढ़नेपर शरीर छोड़नेवाला मनुष्य उत्तम लोकोंमें चला जाय -- इसमें शङ्काकी कोई बात ही नहीं है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

मरणसमयकी अवस्थाके द्वारा जो फल मिलता है? वह सब भी आसक्ति और रागसे ही होनेवाला तथा गुणजन्य ही होता है? यह दिखानेके लिये कहते हैं --, जब यह शरीरधारी जीव? सत्त्वगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होता है? तब उत्तम तत्त्वको जाननेवालोंके अर्थात् महत्तत्त्वादिको जाननेवालोंके निर्मल -- मलरहित लोकोंको प्राप्त होता है।

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Sri Anandgiri

सात्त्विकादीनां भावानां पारलौकिकं फलविभागमुदाहरति -- मरणेति। सङ्गः सक्ती रागस्तृष्णा तद्बलादनुष्ठानद्वारा लभ्यमानमित्यर्थः। गौणं सत्त्वादिगुणप्रयुक्तमिति यावत्। तत्र सत्त्वगुणवृद्धिकृतफलविशेषमाह -- यदेति। मलरहिताव्रजस्तमसोरन्यतरस्योद्भवो मलं तेन रहितानागमसिद्धान्ब्रह्मलोकादीनित्यर्थः।

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Sri Dhanpati

मरणद्वारेणापि यत्पारलौकिकं फलं प्राप्यते तदपि सहेतुकं सर्वं सत्तवादिगुणप्रयुक्तमेवेति दर्शयन्नाह -- यदेति द्वाभ्याम्। तत्र सत्त्ववृद्धिकृतं फलविशेषमाह। यदा सत्त्वे विवृद्धे उद्भूते देहभृज्जीवः प्रलयः मरणं याति प्राप्नोति तदा उत्तमविदां महत्तत्त्वहिरण्यगर्भादितत्त्वविदां तदुपासकानां लोकानागमसिद्धान् ब्रह्मलोकादीनमलान् रजस्तमसोरन्यतरदुद्भूतं मलं तेन रहितान्प्रतिपद्यते प्राप्नोतीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadāwhen
sattvein the mode of goodness
pravṛiddhewhen premodinates
tuindeed
pralayamdeath
yātireach
dehabhṛit
tadāthen
uttamavidām
lokānabodes
amalānpure
pratipadyateattains
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 14.13
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च।तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन

हे कुरुनन्दन ! तमोगुणके बढ़नेपर अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह -- ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 14.15
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते।तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते

रजोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला प्राणी मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरनेवाला मूढ़योनियोंमें जन्म लेता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 14Shlok 14
Bhagavad Gita · Adhyay 14, Shlok 14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 14 श्लोक 14 का हिंदी अर्थ: "जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 14?

Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 14 translates to: "If the embodied one meets death when Sattva is predominant, then they attain the spotless worlds of the knowers of the Highest. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 14, श्लोक 14 है जो Bhagavad Gita के Gunatraya-Vibhaga Yoga में संकलित है। जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है, तो वह,उत्तमवेत्ताओंके निर्मल लोकोंमें जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit" mean in English?

"yadā sattve pravṛiddhe tu pralayaṁ yāti deha-bhṛit" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 14 Verse 14. If the embodied one meets death when Sattva is predominant, then they attain the spotless worlds of the knowers of the Highest. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.