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Bhagavad Gita · BG 13.5

Bhagavad Gita 13.5 — Commentary

19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्िचतैः

ṛiṣhibhir bahudhā gītaṁ chhandobhir vividhaiḥ pṛithak brahma-sūtra-padaiśh chaiva hetumadbhir viniśhchitaiḥ

"Sages have sung in many ways, with various distinctive chants and also with suggestive words indicative of the Absolute, full of reasoning and decisive."

Scholar Commentaries (19)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

,ऋषिभिः वसिष्ठादिभिः बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। छन्दोभिः छन्दांसि ऋगादीनि तैः छन्दोभिः विविधैः नानाभावैः नानाप्रकारैः पृथक् विवेकतः गीतम्। किञ्च? ब्रह्मसूत्रपदैश्च एव ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणि तैः पद्यते गम्यते ज्ञायते इति तानि पदानि उच्यन्ते तैरेव च क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यम् गीतम् इति अनुवर्तते। आत्मेत्येवोपासीत (बृह0 उ0 1।4।7) इत्येवमादिभिः ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते? हेतुमद्भिः युक्तियुक्तैः विनिश्चितैः निःसंशयरूपैः निश्चितप्रत्ययोत्पादकैः इत्यर्थः।।स्तुत्या अभिमुखीभूताय अर्जुनाय आह भगवान् --,

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

महाभूतानि अहंकारो बुद्धिः अव्यक्तम् एव च इति क्षेत्रारम्भकद्रव्याणि? पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशमहाभूतानि? अहंकारो भूतादिः? बुद्धिः महान्? अव्यक्तं प्रकृतिः। इन्द्रियाणि दश एकं च पञ्च च इन्द्रियगोचराः? इति क्षेत्राश्रितानि तत्त्वानि? श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि वाक्पाणिपादपायूपस्थानि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि? तानि दश? एकम् इति मनः। इन्द्रियगोचराः च पञ्च शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः।

Swami Chinmayananda

20th century CE · Neo-Vedanta

Neo-Vedanta

Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.

प्रस्तुत अध्याय में जो विवेचन किया जा रहा है वह कोई व्यर्थ का भाषण अथवा श्रीकृष्ण की बुद्धि की कल्पना मात्र नहीं है। यहाँ भगवान् स्वयं ही स्पष्ट कहते हैं कि ऋषियों द्वारा अनुभूत और प्रतिपादित सत्य की ही वे पुनर्घोषणा कर रहे हैं। संक्षेप में? उपनिषदों के प्रतिपाद्य ब्रह्मतत्त्व का ही निरूपण इस अध्याय का विषय है।कोई व्यक्ति प्रश्न कर सकता है कि क्यों हम उपनिषद् के ऋषियों के कथनों को तत्परता से स्वीकार करें ऐसा प्रश्न केवल वे ही लोग कर सकते हैं? जिन्हें ऋषियों के प्रति अश्रद्धा है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि हमे ऋषियों के प्रति महान् आदर और सम्मान नहीं भी हो? तब भी हमें उनके द्वारा प्रतिपादित सत्य को स्वीकारना ही होगा? क्योंकि वे उपनिषद् के? निश्चित किये हुये युक्तियुक्त कथन हैं। उनके कथन कोई बौद्धिक आलेख अथवा दैवी आज्ञायें नहीं हैं? जो साधारण असहाय जनता पर विशेष दैवी अधिकार प्राप्त किसी देवदूत ने थोप दी हों।जब प्रमाण तर्क एवं अनुभव के द्वारा किसी सत्य को सिद्ध किया जाता है? तब किसी भी बुद्धिमान पुरुष को उसके युक्तियुक्त संगत होने के कारण स्वीकारना ही पड़ता है।अर्जुन के मन में रुचि उत्पन्न करने के पश्चात् भगवान् कहते हैं,

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

13.5 ऋषिभिः by Rishis? बहुधा in many ways? गीतम् sung? छन्दोभिः in chants? विविधैः various? पृथक् distinctive? ब्रह्मसूत्रपदैः in the suggestive words indicative of Brahman? च and? एव even? हेतुमद्भिः full of reasoning? विनिश्चितैः decisive.Commentary Many sages (such as Vasishtha) have talked about it (the true nature of the field and its knower) since ancient times. The ancient hymns? such as the Rig Veda? have explained this in various ways.The word Brahma Sutras refers to the Vedanta Sutras written by Vyasa or Badarayanacharya in order to reconcile the mutually contradictory passages in the Upanishads. A study of the Brahma Sutras is very necessary in order to comprehend the esoteric significance of the Upanishads. The Braham Sutras are also known by the name Sariraka Sutras because fifteen Sutras in the third Pada of the second chapter deal with the Sarira or Kshetra (body).The true nature of the field and its knower has also been taught in the Brahma Sutras which deal with Brahman such as Atmanyevopasita (only as the Self? let a man meditate on It.) (Brihadaranyaka Upanishad? I.4.7).They are full of reasoning? convincing and decisive. There is no doubt in the words or passages that treat of Brahman.

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या -- ऋषिभिर्बहुधा गीतम् -- वैदिक मन्त्रोंके द्रष्टा तथा शास्त्रों? स्मृतियों और पुराणोंके रचयिता ऋषियोंने अपनेअपने (शास्त्र? स्मृति आदि) ग्रन्थोंमें जडचेतन? सत्असत्? शरीरशरीरी? देहदेही? नित्यअनित्य आदि शब्दोंसे क्षेत्रक्षेत्रज्ञका बहुत विस्तारसे वर्णन किया है।छन्दोभिर्विविधैः पृथक् -- यहाँ विविधैः विशेषणसहित छन्दोभिः पद ऋक? यजुः? साम और अथर्व -- इन चारों वेदोंके संहिता और ब्राह्मण भागोंके मन्त्रोंका वाचक है। इन्हींके अन्तर्गत सम्पूर्ण उपनिषद् और भिन्नभिन्न शाखाओंको भी समझ लेना चाहिये। इनमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञका अलगअलग वर्णन किया गया है।ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः -- अनेक युक्तियोंसे युक्त तथा अच्छी तरहसे निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्रके पदोंद्वारा भी क्षेत्रक्षेत्रज्ञके तत्त्वका वर्णन किया गया है।इस श्लोकमें भगवान्का आशय यह मालूम देता है कि क्षेत्रक्षेत्रज्ञका जो संक्षेपसे वर्णन मैं कर रहा हूँ? उसे अगर कोई विस्तारसे देखना चाहे तो वह उपर्युक्त ग्रन्थोंमें देख सकता है। सम्बन्ध -- तीसरे श्लोकमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञके विषयमें जिन छः बातोंको संक्षेपसे सुननेकी आज्ञा दी थी? उनमेंसे क्षेत्रकी दो बातोंका अर्थात् उसके स्वरूप और विकारोंका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

श्रोताकी बुद्धिमें रुचि उत्पन्न करनेके लिये? उस कहे जानेवाले क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके यथार्थ स्वरूपकी स्तुति करते हैं --, ( यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व ) वसिष्ठादि ऋषियोंद्वारा बहुत प्रकारसे कहा गया है और ऋग्वेदादि नाना प्रकारके श्रुतिवाक्योंद्वारा भी पृथक्पृथक् -- विवेचनपूर्वक कहा गया है। तथा संशयरहित निश्चित ज्ञान उत्पन्न करनेवाले विनिश्चित और युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्रके पदोंसे भी कहा गया है। जो वाक्य ब्रह्मके सूचक हैं उसका नाम ब्रह्मसूत्र है? उनके द्वारा ब्रह्म पाया जाता है -- जाना जाता है? इसलिये उनको पद कहते हैं? उनसे भी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका तत्त्व कहा गया है क्योंकि केवल आत्मा ही सब कुछ है ऐसी उपासना करनी चाहिये इत्यादि ब्रह्मसूचक पदोंसे ही आत्मा जाना जाता है।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

क्षेत्रादियाथात्म्यस्तुत्या प्रलोभिताय किं तदिति जिज्ञासवे यथोद्देशं क्षेत्रं निर्दिशति -- स्तुत्येति। महत्त्वे हेतुमाह -- सर्वेति। भूतशब्देन स्थूलानामपि विशेषाभावाद्ग्रहे का हानिरित्याशङ्क्याह -- स्थूलानीति। अहंकारोऽहंप्रत्ययलक्षण इति संबन्धः। भूतानां प्रातीतिकत्वेनाभिमानमात्रात्मत्वं मत्वाहंकारं विशिनष्टि -- महाभूतेति। महतः परमित्यादौ प्रसिद्धं महच्छब्दार्थमहंकारहेतुमाह -- अहंकारेति। ईश्वरशक्तिरित्युक्ते चैतन्यमपि शङ्क्येत तदर्थमाह -- ममेति। अवधारणरूपमर्थमेव स्फुटयति -- एतावत्येवेति। पञ्चतन्मात्राण्यहंकारो महदव्याकृतमित्यष्टधा भिन्नत्वम्। मूलप्रकृत्या सह तन्मात्रादिभेदानां समुच्चयश्चकारार्थः। दशेन्द्रियाण्येव विभज्य व्युत्पादयति -- श्रोत्रेत्यादिना। तदेव प्रश्नद्वारा स्फुटयति -- किं तदिति। शब्दादिविषयशब्देन स्थूलानि भूतानि गृह्यन्ते। उक्तेषु तन्मात्रादिषु तन्त्रान्तरीयसंमतिमाह -- तानीति।मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त। षो़डशकश्च विकारः इति पठन्ति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

श्रोतृप्ररोचनाय क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं स्तौति -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्वासिष्ठातौ बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। न केवलमाप्तोक्तमेव क्षेत्रादियाथात्म्ये प्रमाणमपितु छन्दांसीत्याह। छन्दोभिऋःगादिभिर्विविधैः शाखामेदेन नानाप्रकारैः पृथग्विवेकतो गीतम्। उक्तार्थे श्रुतिस्मृती प्रमाणमभिधाय युक्तमाह -- ब्रह्मेति। ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणिः तैः पद्यते ज्ञायते ब्रह्मेति तानि पदान्युचयन्ते तैरेवं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं गीतं इत्यनुवर्तते। आत्मेत्येवोपासीतेत्येवमादिभिर्हि ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते हेतुमद्भिर्युक्तियुक्तैः विनिश्चितेः न संशयरुपैः निश्चितप्रत्ययोत्पादकैः इति भाष्ये। आदिपदात्यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म? तत्त्वमसि? ब्रह्मविदाप्नोति परं? न स वेद यथा पशुः इत्यादीनि सूत्रपदानि गृह्यन्ते। तथैच ब्रह्मसूत्राणि च तानि पदानीति भाष्योक्तलघुभूतकर्मधारयं विहाय ब्रह्मसूत्राणि च पदानि चेति समासो न प्रदर्शनीयः फलाभावात्। हेतुमद्भिर्युक्तियुक्तैःसदेव सोभ्येदमग्र आसीत्?कथमसतः सज्जायेत इति। तथाको ह्येवानयात्कः प्राण्यात् यदेश आकाश आनन्दो न स्यात्? एष ह्येवानन्दयति?अन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिः सोभ्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः इत्यादिभिः। यद्वाअथातो ब्रह्मजिज्ञासा इत्यादीन्यपि सूत्राण्यत्र गृहीतानि। अन्यथा छन्दोभिरित्यादिना पौनरुक्त्यादिति मत्वा विशिनष्टि। हेतुमद्भिरिति। यत् ऋष्यादिभिर्गीतं तत्सामासेन श्रृण्वित्यन्वयः।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

वक्ष्यमाणेऽर्थे प्रमाणमाह -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिर्वसिष्ठाद्यैर्बहुधा गीतं योगवासिष्ठादौ प्रतिपादितम्। छन्दोभिर्वेदैर्मन्त्रैर्वा पृथक् प्रतिशाखमनेकप्रकारं गीतम्। ब्रह्मसूत्रपदैः ब्रह्मणः सूचकानि पदानि समुच्चित्य वाक्यभावमापन्नानि तैर्ब्रह्मसूचकैर्ब्राह्मणवाक्यैः। तत्त्वमसीत्याद्यैरित्यर्थः। हेतुमद्धिःअन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छ अद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः,सोम्येमाः प्रजाः इत्यादिना कार्यलिङ्गान्यनुमानानि ब्रह्माधिगमाय प्रदर्शयन्तो हेतवस्तद्वद्भिः। विनिश्चितैरसकृदभ्यासेन सकलशङ्कापङ्कक्षालनेन निश्चितार्थैः क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोः स्वरूपमेतैः सर्वैर्यद्गीतं तच्छृण्विति पूर्वेण संबन्धः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

कैर्विस्तरेणोक्तस्यायं संक्षेप इत्यपेक्षायामाह -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्योगशास्त्रेषु ध्यानधारणादिविषयत्वेन वैराजादिरूपेण बहुधा गीतं निरूपितम्? विविधैर्विचित्रैश्च नित्यनैमित्तिककाम्यविषयैश्छन्दोभिर्वेदैर्नानायजनीयदेवतादिरूपेण गीतं? ब्रह्मणः सूत्रैः पदैश्च। ब्रह्म सूत्र्यते सूच्यत एभिरिति ब्रह्मसूत्राणियतो वा इमानि भूतानि जायन्ते इत्यादीनि तटस्थलक्षणपराण्युपनिषद्वाक्यानि? तथाच ब्रह्म पद्यते गम्यते साक्षाज्ज्ञायत एभिरिति पदानि स्वरूपलक्षणपराणिसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यादीनि तैश्च बहुधा गीतम्। किंच हेतुमद्भिःसदेव सोम्येदमग्र आसीत्कथमसतः सज्जायेत इति तथाको ह्येवान्यात्कः प्राण्यात्? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्? एष ह्येवानन्दयति इत्यादियुक्तिमद्भिः। अन्यादपानचेष्टां कः कुर्यात्? प्राण्यात्प्राणानां व्यापारं को वा कुर्यात् इति पदयोरर्थः। विनिश्चितैरुपक्रमोपसंहारैकवाक्यतया असंदिग्धार्थप्रतिपादकैरित्यर्थः। तदेवमेतैर्विस्तरेणोक्तं दुःसंग्रहं संक्षेपतस्तुभ्यं कथयिष्यामि तच्छृण्विवत्यर्थः। यद्वाअथातो ब्रह्मजिज्ञासा इत्यादीनि ब्रह्मसूत्राणि गृह्यन्ते? तान्येव ब्रह्म पद्यते निश्चीयत एभिरिति पदानि? तैर्हेतुमद्भिःईक्षतेर्नाशब्दम्आनन्दमयोऽभ्यासात् इत्यादिभिर्युक्तिमद्भिर्विनिश्चितार्थैः। शेषं समानम्।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

स्वेनोपदिश्यमानस्यार्थस्येतिहासपुराणमीमांसानुगृहीतानेकश्रुतिसिद्धत्वमाह -- ऋषिभिः इति श्लोकेन। विशदोपबृंहणवाक्यानुसारेण अविशदवेदवाक्यार्थनिश्चयाय प्रथममृषिभिर्गीतत्वोक्तिः। राजसतामसोपबृंहणव्यवच्छेदाय ऋषिशब्दोक्तान्विशिनष्टि -- पराशरादिभिरिति।बहुप्रकारमिति अर्थस्यैकत्वेऽपि वचनव्यक्तौ रथचक्रनद्यादिकल्पनाप्रकारभेदः। यद्वा सङ्क्षेपविस्तारादिरूपेणेत्यर्थः। अविविक्तदेहात्मस्वरूपस्य राज्ञो वाह्यवाहकत्वोक्तिप्रतिक्षेपार्थं वाक्यम् -- अहं त्वं चेति। अध्यात्मगन्धिवाक्यश्रवणमूलस्य कस्त्वमिति प्रश्नस्योत्तरं -- पिण्ड इति।शिरःपाण्यादिलक्षणः इत्यनेन कृत्स्नैकदेशचेतनत्वविकल्पो द्योतितः। प्रतिपादितार्थस्य श्रोतर्यपि स्वप्रत्ययेन दृढीकरणार्थं वाक्यंकिं त्वमिति। एवम्इदं शरीरम् [13।2] इति श्लोकेनोक्तस्य संवादकमुपात्तम्। ननु द्वासुपर्णा इति मन्त्रे तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति कर्मफलभोक्ता जीव उच्यते अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति [मुं.उ.3।1।1] इति परमात्मेति शारीरकेगुहां प्रविष्टावात्मानौ हितद्दर्शनात् [ब्र.सू.1।2।11]स्थित्यदनाभ्यां च [ब्र.सू.1।3।7] इत्यादिषु प्रपञ्चितम्। ब्राह्मणे तुतयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम् इति जन्तुवाचिना सत्त्वशब्देन जीवमभिधायअनश्नन्नन्यो अभिचाकशीतिअनश्नन्नन्यो अभिपश्यतीति क्षेत्रज्ञः तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ तदेतत्सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञः इति क्षेत्रज्ञशब्देन परमात्मानमेवाभिधत्ते। तावेवात्र क्षेत्रज्ञोपद्रष्ट्टशब्दौ प्रत्यभिज्ञायेतेतं प्राहुः क्षेत्रज्ञः [13।2] इतिउपद्रष्टानुमन्ता [13।23] इति च। मनुश्चयोऽस्यात्मनः कारयिता तं क्षेत्रज्ञं प्रचक्षते। यः करोति तु कर्माणि परमा(स भूता)त्मोच्यते बुधैः [मनुः12।12] इति क्षेत्रज्ञशब्देन परमात्मानमाह।अतः कथमत्र क्षेत्रज्ञो जीव इत्युच्यते इति शङ्कामर्थात्परिहरन्क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि [13।3] इत्यस्य संवादकं तस्य स्वोक्तार्थानुगुण्यं सूचयन्नवतारयति -- एवं विविक्तयोरिति। तथाच क्षेत्रज्ञशब्दस्य जीवेऽपि प्रयोगदर्शनात्क्षेत्रज्ञो जीव इत्युपपद्यते। प्रत्येकं समुदायेन वाममेदं शिरःममेमौ पाणीममेदं शरीरम् इति क्षेत्रवेदित्वाज्जीवस्य क्षेत्रज्ञत्वम्। परमात्मनस्तुइदं शरीरमेतत्कर्मारम्भायैतत्कर्मफलभोगाय इत्यादिक्षेत्रयाथात्म्यवेदितृत्वेन। एतच्चएतदवयवशः सङ्घातरूपेण च इदमहं वेद्मि इति यो वेत्ति इति [रा.भा.2] भाष्येणयोऽस्यात्मनः कारयिता [12।12] इति मनुवचनेन च ज्ञापितम्। एवमुपद्रष्ट्टत्वमपि जीवस्य स्वशरीरमात्रं प्रति परमात्मनस्तु सर्वचेतनाचेतनान् प्रतीत्युभयोरप्युपद्रष्ट्टत्वमविरुद्धम्। अतो न कस्यापि प्रमाणस्य विरोध इति भावः। स्वरूपवैविध्यस्यछन्दोभिः इति बहुवचनेनैव लाभात् विविधशब्दः प्रकृतप्रतिपाद्यप्रकारवैविध्यपर इत्यभिप्रायेणाह -- पृथग्विधैरिति। पृथग्भूताः विधाः प्रतिपाद्यप्रकारा येषामिति विग्रहः।आम्नायश्छन्दसां दण्डः इत्यादिप्रयोगानुसारेण च्छन्दश्शब्दो वेदपरः? न तु गायत्र्यादिपर इत्यभिप्रयन्नाहऋग्यजुरिति। पृथक्छब्दस्य ऋषिभिरुक्तात्पृथक्त्वपरत्वभ्रमव्युदासायाध्याहारानुषङ्गाभ्यां योजयतिदेहात्मनोः स्वरूपं पृथग्गीतमिति। परस्परविलक्षणं गीतमित्यर्थः। तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता? नाभावरा अर्पिताः? एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः? प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः [कौ.उ.3।9] एष म आत्माऽन्तर्हृदये एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भवितास्मि [छां.उ.3।14।4] दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः [मुं.उ.2।1।2] स कारणं करणाधिपाधिपः [श्वे.उ.6।9] भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा [श्वे.उ.1।12] जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति [मुं.उ.3।1।1] इत्यादिकमभिप्रेत्याह -- एवमृक्सामाथर्वस्विति।ब्रह्मसूत्र -- इत्यत्र लुप्तषष्ठ्यर्थः सम्बन्धः प्रतिपादकत्वमित्यभिप्रेत्यसूत्रपदैः इत्यत्र षष्ठीसमासभ्रमं वारयतिब्रह्मप्रतिपादनसूत्राख्यैः पदैरिति। फलितमाहशारीरकसूत्रैरिति।हेतुयुक्तैरिति हेतुप्रतिपादकैरित्यर्थः। कर्मणि क्ताश्रयणे प्रयोजनाभावाद्विशेषतो निश्चितं येषामिति भावे क्तं बहुव्रीहिं चाभिप्रेत्याहनिर्णयान्तैरिति? निर्णयफलकैरित्यर्थः।न वियदश्रुतेरित्यारभ्येत्यनेन -- अस्ति तु [ब्र.सू.2।3।2] इत्यादिकं सूत्रषट्कंएतेन मातरिश्वा व्याख्यातः [ब्र.सू.2।3।8]तेजोऽतस्तथा ह्याह [ब्र.सू.2।3।10]आपः [ब्र.सू.2।3।11]पृथिवी [ब्र.सू.2।3।12] इति सूत्रचतुष्टयं च विवक्षितम्।उक्त इति -- अनेनाकाशादीनामुत्पत्तिकथनेन तत्सङ्घातात्मकक्षेत्रयाथात्म्यमुक्तप्रायमिति भावः।नात्मा श्रुतेरित्यारभ्येत्यनेनज्ञोऽत एव? उत्क्रान्तिगत्यागतीनां? स्वात्मना चोत्तरयोः? नाणुरतच्छ्रुतेरिति चेन्नेतराधिकारात्? स्वशब्दोन्मानाभ्यां च? अविरोधश्चन्दनवत्? अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि? गुणाद्वा लोकवत्? व्यतिरेको गन्धवत् तथाच दर्शयति? पृथगुपदेशात्? तद्गुणसारत्वात्तु तद्व्यपदेशः प्राज्ञवत्? यावदात्मभावित्वाच्च न दोषस्तद्दर्शनात्? पुंस्त्वादिवत्त्वस्य सतोऽभिव्यक्तियोगात्? नित्योपलब्ध्यनुपलब्धिप्रसङ्गोऽन्यतरनियमो वाऽन्यथा? कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्? उपादानाद्विहारोपदेशाच्च? व्यपदेशाच्च क्रियायां न चेन्निदेशविपर्ययः? उपलब्धिवदनियमः? शक्तिविपर्ययात्? समाध्यभावाच्च? यथाच तक्षोभयधा? परात्तु तच्छ्रुतेः [ब्र.सू.2।3।1740] इत्यन्तं सूत्रजातमभिप्रेतम्।इत्यारभ्य ज्ञोऽत एवेत्यादिभिरिति पाठे इत्यादिशब्देनैतद्विवक्षितम्।भगवत्प्रवर्त्यत्वेनेति? चेतनं प्रति नियमेन नियाम्यद्रव्यत्वस्य शरीरलक्षणत्वादिति भावः। श्रुत्यादिभिः प्रतिपादितस्यैव क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यस्य ज्ञातुं शक्यत्वात्त्वत्तः किमर्थं श्रोतव्यमित्याशङ्कापरिहाराय पूर्वोक्तंतत्समासेन मे शृणु [13।4] इत्येतदत्र सङ्गमय्य तत्तात्पर्यमाह -- एवं बहुधा गीतमित्यादि। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यस्य श्रुत्यादिभिरतिविस्तरेण बहुधा गीतत्वात् किञ्चिज्ज्ञेन स्पष्टमवगन्तुमशक्यत्वात्सर्वज्ञेन मया सङ्क्षेपेण सुस्पष्टमुच्यमानं तच्छ्रोतव्यमिति भावः। ,

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

तत्क्षेत्रमिति। ऋषिभिरिति। येन विकारं गच्छति यद्विकारि। समासेनेति अविभागेनैव सर्वान्प्रश्नान् (S??K एतान् (S तान्) प्रश्नान्) साधारणोत्तरेण परिच्छिनत्ति। यद्यपि च ऋषिभिर्बहुधा वेदैश्चोक्तमेतत्। तथापि समासेनाहं व्याचक्षे इति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणि (शं.) इति कश्चित्। ततश्च छन्दसामृषिवाक्यानां च तथात्वात् ऋषिभिरित्यादिकं वृथा स्यादित्यतो रूढिमाश्रित्याह -- ब्रह्मेति।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

कैर्विस्तरेणोक्तस्यायं संक्षेप इत्यपेक्षायां श्रोतृबुद्धिप्ररोचनार्थं स्तुवन्नाह -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिर्वसिष्ठादिभिर्योगशास्त्रेषु धारणाध्यानविषयत्वेन बहुधा गीतं निरूपितम्। एतेन धर्मशास्त्रप्रतिपाद्यत्वमुक्तम्। विविधैर्नित्यनैमित्तिककाम्यकर्मादिविषयैः छन्दोभिः ऋगादिमन्त्रैर्ब्राह्मणैश्चः पृथग्विवेकतो गीतम्। एतेन कर्मकाण्डप्रतिपाद्यत्वमुक्तम्। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव ब्रह्म सूत्र्यते सूच्यते किंचिद्व्यवधानेन प्रतिपाद्यत एभिरिति ब्रह्मसूत्राणि।यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति इत्यादीनि तटस्थलक्षणपराण्युपनिषद्वाक्यानि। तथा पद्यते ब्रह्म साक्षात्प्रतिपाद्यत,एभिरिति पदानि स्वरूपलक्षणपराणिसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यादीनि तैर्ब्रह्मसूत्रैः पदैश्च हेतुमद्भिःसदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्युपक्रम्यतद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायेत इति नास्तिकमतमुपन्यस्यकुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेत इत्यादियुक्तीः प्रतिपादयद्भिः। विनिश्चितैः उपक्रमोपसंहारैकवाक्यतया संदेहशून्यार्थप्रतिपादकैः बहुधा गीतं च। एतेन ज्ञानकाण्डप्रतिपाद्यत्वमुक्तम्। एवमेतैरतिविस्तरेणोक्तं क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यं संक्षेपेण तुभ्यं कथयिष्यामि तच्छृण्वित्यर्थः। अथवा ब्रह्मसूत्राणि च तानि पदानि चेति कर्मधारयः। तत्र विद्यासूत्राणिआत्मेत्येवोपासीत इत्यादीनि? अविद्यासूत्राणिन स वेद यथा पशुः इत्यादीनि तैर्गीतमिति।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

बहुधान्योक्तभ्रमाभावाय प्रपञ्चयति -- ऋषिभिरिति। ऋषिभिः स्वानुभवोत्पन्नफलनिरूपणेन बहुधा बहुप्रकारेण गीतम्। किञ्च? छन्दोभिर्वेदैर्विविधैः कर्मज्ञानोपासनकाम्यादिभिः पृथक् भिन्नतया अधिकारपरत्वेन गीतम्। तथैव ब्रह्मसूत्रपदैश्च ब्रह्म सूत्र्यते एभिरिति ब्रह्मसूत्राणिजन्माद्यस्य यतः [ब्र.सू.1।1।2] इत्यादीनि। तथाच ब्रह्म प्रपद्यते गम्यते एभिरिति पदानि एको देवो बहुधा निविष्टः [तै.आ.3।14] इत्यादीनि तैर्बहुधा श्रुत्यनुसारेणैव गीतम्। कीदृशैस्तैः हेतुमद्भिः सहेतुकैः को ह्येवान्यात् कः प्राण्यात्? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् [तै.उ.2।7] एष ह्येव तं साधु कर्म कारयति [कौ.उ.3।9] इत्यादिभिः। विनिश्चितैः निस्सन्दिग्धैः स्वानुभवप्रतिपादकैरित्यर्थः। एवं विस्तरेणैतैरुक्तं दुर्बोधं याथातथ्येन तत् समासेन मे मत्तः उक्तं शृणु। कथयामीत्यर्थः।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

ऋषिभिर्बहुधा गीतमिति। क्षेत्त्रज्ञस्वरूपं बहुधा गीतं बहुप्रकारेण निरूपितस्य विप्रकीर्णस्यार्थस्यैकेन क्रोडीकारासम्भवादिति छन्दोभिर्ध्यानधारणाविषयत्वेन वैराजादिरूपेण नानायजनीयदेवतादिरूपेण क्षेत्रज्ञस्वरूपमुक्तं? तत्र विविधैरनेकैः पृथक् ब्रह्मसूत्रपदैश्च व्यासकृतैः वेदार्थसारग्रथनरूपैरतएव विनिश्चितैः हेतुमद्भिः हेतुः साधकवाक्यंतत्तु समन्वयात् [ब्र.सू.1।14] इतिवदनेकयुक्तिमद्भिरपि च बहुप्रकारेण गीतं मया तत्सर्वतः सारभूतं फलितं संगृह्योच्यते इति भावः।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

13.5 Gitam, It has been sung of, spoken of; bahudha, in various ways; rsibhih, by the Rsis, by Vasistha and others; sung prthak, separately; vividhaih, by the different kinds of; chandobhih, Vedic texts-chandas mean the Rg-veda etc; by them; ca, and; besides, hetumadbhih, by the rational; and viniscitaih, by the convincing, i.e. by those which are productive of certain knowledge-not by those which are in an ambiguous form; brahma-sutra-padaih eva, sentences themselves which are indicative of and lead to Brahman. Brahma-sutras are the sentences indicative of Brahman. They are called padani since Brahman is reached, known, through them. By them indeed has been sung the true nature of the field and the Knower of the field (-this is understood). The Self is verily known through such sentences as, 'The Self alone is to be meditated upon' (Br. 1.4.7), which are indicative of and lead to Brahman. To Arjuna who had become interested as a result of the eulogy, the Lord says:

Dr. S. Sankaranarayan

20th century CE · Academic / Shaiva

Shaiva

Scholar-practitioner who authored commentaries uniting rigorous Indology with spiritual practice.

13.4-5 Tat Ksetram etc. Rsibhih etc. Why it modifies : due to what this [Field] suffers modification. Collectively : not at all separately (one by one). [The Bhagavat] decides all the estions in a general way. Of course, many a time in many a way this has been declared by the seers and by the scritpures. But, let Me (the Bhagavat) explain this collectively (briefly).

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

13.5 It is this truth regarding the Kestra and Ksetrajna that has been sung in various ways by Parasara and others seers. For example, 'I and you and others are composed of the elements; and the elements, following the stream of alities, assume a shape; these alities, Sattva and the rest, are dependent on Karma; and Karma, accumulated by nescience, influences the condition of all beings. The self is pure, imperishable, tranil, void of alities and is pre-eminent over Prakrti' (V. P., 2.13.69-71). Similarly: 'The body, characterised by head, hands, feet and the like is different from Purusa.' Which of these can I designate by the name I?' (Ibid., 2.13.89). And also: 'Are you the head or the belly? Are you indeed the feet and other limbs, or do they belong to you, O King? You are distinct in your nature from all your members, O King. Know, O King, and understand "Who am I" '. (Ibid., 1.13.102-3). Moreover they state that Vasudeva constitutes the Self of the distinct entities (Ksetra and Ksetrajna): 'The senses, Manas, Buddhi, vigour, splendour, strength, courage, both Ksetra and Ksetrajna have Vasudeva for their self. (Ma. Bha. Sa., 149.136). In various distinctive hymns, namely, in the Vedas, Rg, Yajus, Saman and Atharvan, the distinction of body and the self has been sung. The nature of the body is described in the following text: 'From this Self, verily, ether arose; from the ether, air; from air, fire; from fire, water; from water, the earth; from the earth, herbs; from the herbs, food; from food, the person. The same person, verily, consists of the essence of food' (Tai. U., 2.1.2). Afterwards that which is inner than this (body) and which consists of Prana (or the vital breath), and that which is inner than this and which consists of mind are described. The nature of Ksetrjna is stated in the passage: 'Verily, other than, and within, that one that consists of mind, that (the individual Self) consists of understanding' (Ibid., 2.4.2). Later, the Supreme Brahman is stated in the text; 'Verily, other than, and within, that one consisting of understanding, is the Supreme Self that consists of bliss' (Ibid., 1.5.2). This is stated to be the Surpeme Self, consisting of bliss, as forming the inner Self of the individual self. Similarly in the three Vedas, Rg, Saman and Atharvan, here and there, the distinctive existence of the Ksetra and the Ksetrajna is affirmed with Brahman for their Self. Likewise, the same purpose is taught in the words of the Brahma-sutras, namely, the aphorisms about Brahman, known also as the Sariraka-sutras, which are characterised by reasoning, decision and conclusion. In the Sutras commencing with, 'Not ether, on account of the absence of the Sruti' (B. S., 2.3.1), the nature and the mode of the Ksetra is determined. In the Sutras commencing with 'Not the self, on account of the Sruti and on account of the eternity, (which is made out) from them' (Ibid., 2.3.18), the true nature of the Ksetrajna is determined. In the Sutras 'But from the Supreme, this being declared by Sruti' (Ibid., 2.3.40), that Ksetrajna has the Lord for Its Self on account of Its being under the control of the Lord, is declared. It has been sung in various ways; the meaning of this Sloka is this: Listen about the truths of the Ksetra and the Ksetrajna which have been expounded in numerous ways and declared by Me in a lucid and brief manner.

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 13.5?

,ऋषिभिः वसिष्ठादिभिः बहुधा बहुप्रकारं गीतं कथितम्। छन्दोभिः छन्दांसि ऋगादीनि तैः छन्दोभिः विविधैः नानाभावैः नानाप्रकारैः पृथक् विवेकतः गीतम्। किञ्च? ब्रह्मसूत्रपदैश्च एव ब्रह्मणः सूचकानि वाक्यानि ब्रह्मसूत्राणि तैः पद्यते गम्यते ज्ञायते इति तानि पदानि उच्यन्ते तैरेव च क्षेत्रक्षेत्रज्ञयाथात्म्यम् गीतम् इति अनुवर्तते। आत्मेत्येवोपासीत (बृह0 उ0 1।4।7) इत्येवमादिभिः ब्रह्मसूत्रपदैः आत्मा ज्ञायते? हेत

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 13.5, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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