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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 32
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते

हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। — VaniSagar

Global Translations

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TamilIND

ஆரம்பம் இல்லாதவர், எந்த குணமும் இல்லாதவர், உயர்ந்த சுயம், அழியாதவர், உடலில் வசிப்பவர் என்றாலும், அர்ஜுனா, செயல்களும் இல்லை, கறைகளும் இல்லை.

MalayalamIND

തുടക്കമില്ലാത്തവനും, ഗുണങ്ങളില്ലാത്തവനും, പരമാത്മാവ്, നാശമില്ലാത്തവനും, ശരീരത്തിൽ വസിക്കുന്നവനെങ്കിലും, അർജ്ജുനാ, പ്രവൃത്തികളോ കളങ്കമോ അല്ല.

GujaratiIND

આરંભ વગરના હોવાને કારણે, કોઈપણ ગુણોથી રહિત, પરમાત્મા, અવિનાશી, દેહમાં રહેવા છતાં, હે અર્જુન, ન તો કૃત્ય કરે છે અને ન તો કલંકિત છે.

BengaliIND

আদি বিহীন, গুণ বর্জিত, পরমেশ্বর, অবিনশ্বর, দেহে বাস করেও, হে অর্জুন, কাজও করেন না, কলঙ্কও করেন না।

NepaliIND

आदिविहीन, गुणरहित, परमात्मा, अविनाशी, देहमा वास गरेर पनि, हे अर्जुन, न त कर्म गर्छ न कलंक।

SindhiIND

اي ارجن، بي ابتدا، ڪنهن به صفت کان خالي، اعليٰ ذات، لافاني، جسم ۾ رهڻ جي باوجود، نه ڪم ڪري ٿو ۽ نه داغدار آهي.

MarathiIND

हे अर्जुना, आरंभरहित, कोणत्याही गुणांपासून रहित, परमस्वरूप, अविनाशी, देहात वास करूनही, कर्म करीत नाही व कलंकही नाही.

PunjabiIND

ਅਰਜਨ ਤੋਂ ਰਹਿਤ, ਕਿਸੇ ਵੀ ਗੁਣਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ, ਪਰਮ ਸਰੂਪ, ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ, ਸਰੀਰ ਵਿੱਚ ਰਹਿਣ ਦੇ ਬਾਵਜੂਦ, ਹੇ ਅਰਜੁਨ, ਨਾ ਕੋਈ ਕੰਮ ਕਰਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਦਾਗੀ ਹੈ।

KannadaIND

ಆದಿಯಿಲ್ಲದವನು, ಯಾವುದೇ ಗುಣಗಳಿಲ್ಲದವನು, ಪರಮಾತ್ಮನು, ನಾಶವಾಗದವನು, ದೇಹದಲ್ಲಿ ನೆಲೆಸಿದ್ದರೂ, ಓ ಅರ್ಜುನಾ, ಕಾರ್ಯವೂ ಇಲ್ಲ ಅಥವಾ ಕಳಂಕವೂ ಇಲ್ಲ.

TeluguIND

ప్రారంభం లేనివాడు, ఏ గుణాలు లేనివాడు, పరమాత్మ, నాశనము లేనివాడు, శరీరంలో నివసిస్తున్నప్పటికీ, ఓ అర్జునా, క్రియలు చేయవు లేదా కలుషితం కాదు.

DogriIND

आदिहीन होने दे नाते, किसे गुणों से रहित, परमात्मा, अविनाशी, हालांकि शरीर में निवास करते हुए, हे अर्जुन, न कर्म करदा है न कलंकित है।

MizoIND

A bul tanna nei lo, mizia engmah nei lo, Mahni Chungnung ber, boral thei lo, taksaa awm mah se, Aw Arjuna, thiltih a nei lo va, a bawlhhlawh lo bawk.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः -- इसी अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें जिसको अनादि कहा है? उसीको यहाँ भी अनादित्वात् पदसे अनादि कहा है अर्थात् यह पुरुष आदि(आरम्भ) से रहित है। अब प्रश्न होता है कि वहाँ तो प्रकृतिको भी अनादि कहा है? इसलिये प्रकृति और पुरुष -- दोनोंमें,क्या फरक रहा इसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं -- निर्गुणत्वात् अर्थात् यह पुरुष गुणोंसे रहित है। प्रकृति अनादि तो है? पर वह गुणोंसे रहित नहीं है? प्रत्युत गुणों और विकारोंवाली है। उससे सात्त्विक? राजस और तामस -- ये तीनों गुण तथा विकार पैदा होते हैं। परन्तु पुरुष इन तीनों गुणोँ और विकारोंसे सर्वथा रहित (निर्गुण और निर्विकार) है। ऐसा यह पुरुष साक्षात् अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है अर्थात् यह पुरुष विनाशरहित परम शुद्ध आत्मा है।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते -- यह पुरुष शरीरमें रहता हुआ भी न कुछ करता है और न किसी कर्मसे लिप्त ही होता है। तात्पर्य है कि इस पुरुष(स्वयं) ने न तो पहले किसी भी अवस्थामें कुछ किया है? न वर्तमानमें कुछ करता है और न आगे ही कुछ कर सकता है अर्थात् यह पुरुष सदासे ही प्रकृतिसे निर्लिप्त? असङ्ग है तथा गुणोंसे रहित और अविनाशी है। इसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व है ही नहीं।यहाँ शरीरस्थोऽपि कहनेका तात्पर्य है कि यह पुरुष जिस समय अपनेको शरीरमें स्थित मानकर अपनेको कार्यका कर्ता और सुखदुःखका भोक्ता मानता है? उस समय भी वास्तवमें यह तटस्थ? प्रकाशमात्र ही रहता है। सुखदुःखका भान इसीसे होता है अतः इसको प्रकाशक कह सकते हैं? पर इसमें प्रकाशकधर्म नहीं है।यहाँ अपि पदसे ऐसा मालूम होता है कि अनादिकालसे अपनेको शरीरमें स्थित माननेवाला हरेक (चींटीसे ब्रह्मापर्यन्त) प्राणी स्वरूपसे सदा ही निर्लिप्त? असङ्ग है। उसकी शरीरके साथ एकता कभी हुई ही नहीं क्योंकि शरीर तो प्रकृतिका कार्य होनेसे सदा प्रकृतिमें ही स्थित रहता है और स्वयं परमात्माका अंश होनेसे सदा परमात्मामें ही स्थित रहता है। स्वयं परमात्मासे कभी अलग हो सकता ही नहीं। शरीरके साथ एकात्मता माननेपर भी? शरीरके साथ कितना ही घुलमिल जानेपर भी? शरीरको ही अपना स्वरूप माननेपर भी उसकी निर्लिप्तता कभी नष्ट नहीं होती? वह स्वरूपसे सदा ही निर्लिप्त रहता है। अपनी निर्लिप्तताका अनुभव न होनेपर भी उसके स्वरूपमें कुछ भी विकृति नहीं होती। अतः उसने अपने स्वरूपसे न कभी कुछ किया है और न करता ही है तथा वह स्वयं न कभी लिप्त हुआ है और न लिप्त होता ही है।यद्यपि पुरुष अपनेको शरीरमें स्थित माननेसे ही कर्ता और भोक्ता बनता है? तथापि इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है और यहाँ कहते हैं कि शरीर में स्थित होनेपर भी पुरुष कर्ताभोक्ता नहीं है। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि प्रकृति और उसका कार्य शरीर -- दोनों एक ही हैं। अतः पुरुषको चाहे प्रकृतिमें स्थित कहो? चाहे शरीरमें स्थित कहो? एक ही बात है। एक शरीरके साथ सम्बन्ध होनेसे मात्र प्रकृतिके साथ? मात्र शरीरोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है। वास्तवमें पुरुषका सम्बन्ध न तो व्यष्टि शरीरके साथ है और न समष्टि प्रकृतिके साथ ही है। अपना सम्बन्ध शरीरके साथ माननेसे ही वह अपनेको कर्ताभोक्ता मान लेता है। वास्तवमें वह न कर्ता है और न भोक्ता है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि वह पुरुष न करता है और न लिप्त होता है? तो अब प्रश्न होता है कि वह कैसे लिप्त नहीं होता और कैसे नहीं करता इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

एक ही आत्मा सब शरीरोंका आत्मा माना जानेसे? उसका उन सबके दोषोंसे सम्बन्ध होगा? ऐसी शंका होनेपर यह कहा जाता है --, आदि कारणको कहते हैं? जिसका कोई कारण न हो? उसका नाम अनादि है और अनादिके भावका नाम अनादित्व है यह परमात्मा अनादि होनेके कारण अव्यय है क्योंकि जो वस्तु आदिमान् होती है? वही अपने,स्वरूपसे क्षीण होती है। किंतु यह परमात्मा अनादि है? इसलिये अवयवरहित है। अतः इसका क्षय नहीं होता। तथा निर्गुण होनेके कारण भी यह अव्यय है क्योंकि जो वस्तु गुणयुक्त होती है? उसका गुणोंके क्षयसे क्षय होता है। परंतु यह ( आत्मा ) गुणरहित है? अतः इसका क्षय नहीं होता। सुतरां यह परमात्मा अव्यय है? अर्थात् इसका व्यय नहीं होता। ऐसा होनेके कारण यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भीशरीरमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता है? तथा कुछ न करनेके कारण ही उसके फलसे भी लिप्त नहीं होता है। आत्माकी शरीरमें प्रतीति होती है? इसलिये शरीरमें स्थित कहा जाता है। क्योंकि जो कर्ता होता है वही कर्मोंके फलसे लिप्त होता है। परंतु यह अकर्ता है? इसलिये फलसे लिप्त नहीं होता? यह अभिप्राय है। पू0 -- तो फिर शरीरोंमें ऐसा कौन है जो कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है यदि यह मान लिया जाय कि? परमात्मासे भिन्न कोई शरीरी कर्म करता है और उसके फलसे लिप्त होता है तब तो क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही जान इस प्रकार जो क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकता कही है? वह अयुक्त ठहरेगी। यदि यह माना जाय कि ईश्वरसे पृथक् अन्य कोई शरीरी नहीं है तो यह बतलाना चाहिये फिर कौन करता और लिप्त होता है अथवा यह कह देना चाहिये कि ( इन सबसे ) पर कोई ईश्वर ही नहीं है। ( बात तो यह है कि ) भगवान्द्वारा कहा हुआ यह उपनिषद्रूप दर्शन सर्वथा दुर्विज्ञेय और दुर्वाच्य है? इसीलिये वैशेषिक? सांख्य? जैन और बौद्धमतावलम्बियोंद्वारा यह छोड़ दिया गया है। उ0 -- इसका उत्तर स्वभाव ही बर्तता है ऐसा कहकर भगवान्ने स्वयं ही दे दिया है क्योंकि अविद्यामात्र स्वभाववाला ही करता है? और लिप्त होता है? इसीसे यह व्यवहार चल रहा है। वास्तवमें अद्वितीय परमात्मामें वे ( कर्तापन और लिप्त होना आदि ) नहीं हैं। सुतरां इस वास्तविक ज्ञानदर्शनमें स्थित हुए ज्ञाननिष्ठ? परमहंस परिव्राजक संन्यासियोंका जिन्होंने अविद्याकृत समस्त व्यवहारका तिरस्कार कर दिया है? कर्मोंमें अधिकार नहीं है -- यह बात जगहजगह भगवान्द्वारा दिखलायी गयी है।

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Sri Anandgiri

सूक्ष्मभावात् अप्रतिहतस्वभावत्वादित्यर्थः। न संबध्यते पङ्कादिभिरिति शेषः।

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Sri Dhanpati

नन्वेकस्यात्मनः सर्वत्र समवस्थितत्वेन देहादिगतकर्तृत्वादिमत्त्वं प्राप्तं पवित्रस्यापि गङ्गाजलादेः अपवित्रप्राण्युतरान्तरदोषेण दोषवक्त्ववदिति तत्राह -- अनादित्वादीति। अयं परमात्माव्ययोऽपक्षयरहितः कूटस्थ इत्यर्थः। तत्र,व्ययस्त्रिविधः स्वभावतो वा? अवयवद्वारको वा गुणाद्वारको वा। स्वतस्तु परब्रह्मणो न संभवतीति कथयितुं परमात्मेत्युक्तम्। द्वितीयासंभवे हेतुमाह -- अनादित्वादिति। आदिः कारणं नास्ति तदनादि। घटादेरादिमत्त्वेन सावयवत्वाद्य्वयो दृष्टः? आत्मनस्तवनादित्वेन निरवयवत्वादवयवद्वारको व्ययो न संभवतीत्यर्थः। तृतीयं निराकरोति -- निर्गुणत्वादिति। तथा सगुणो गुणव्ययाद्य्वेति अयंतु निर्गुणत्वान्न व्येति। गुणद्वारकोऽस्य व्ययो न संभवतीत्यर्थः। यत एवमतः शरीरस्थोपि शरीरेष्वात्मन उपलब्धिधर्मवतीति शरीरस्थ उच्यते। सर्वगतत्वेन सर्वात्मत्वेन च देहादौ स्थितोऽपि स्वतो देहात्मना वा न करोति कूटस्थात्वाद्देहादेश्च तस्मिन्कल्पितत्वादित्यर्थः। कर्तृत्वाभावादेव कर्मफलेन न लिप्यते। कुन्त्युत्पन्नशरीरस्थस्यापि तव कर्तृत्वं लेपश्च नास्तीति संबोधनाशयः। ननु एवं यः शरीरस्थः करोति लिप्यते च स कः किमुक्तलक्षणादकर्तुरलिप्तादात्मनोऽन्यः किंचाऽनन्यः। नाद्यः तत्त्वमसि? क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धीति क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वप्रतिपादनानुपप्तिप्रसङ्गात्। द्वितीये परमात्मनः कर्तत्वाद्यभावेन प्रतीयमानस्य कर्तृत्वादेरधिकरणं वाच्यम्। तथाच सर्वथेदं दुरुपपादमितिचेन्न। स्वभावस्तु प्रवर्तत इत्यविद्यामात्रस्वभावो हि करोति लिप्यत इति व्यवहारदशायामाविद्यकस्य कर्तृत्वादेर्भगवतैव निरुपितत्वात्। एवंच प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मण्याविधकं कर्तृत्वादि न पारमार्थिकमिति भगवता प्रोक्ते औपनिषदे परमार्थसांख्यदर्शने दुर्विज्ञयत्वात् सांख्यवैसेषिकादिभिभ्रान्तिजन्यय पूर्वोक्तशङ्क्या परित्यक्ते स्थितानां ज्ञाननिष्ठानामविद्यापरिकल्पितकर्तृत्वाद्यपगमेन मोक्षप्राप्तिः नत्वन्यस्मिन् शुक्तिरुप्यकल्पे सांख्यादिपरिकल्पितते निष्टावतामिति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
anāditvātbeing without beginning
nirguṇatvātbeing devoid of any material qualities
paramathe Supreme
ātmāsoul
ayamthis
avyayaḥimperishable
śharīrasthaḥ
apialthough
kaunteyaArjun, the the son of Kunti
naneither
karotiacts
nanor
lipyateis tainted
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.31
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा

जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.33
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 32
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 32
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते

हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 32 का हिंदी अर्थ: "हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 32?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 32 translates to: "Being without beginning, devoid of any qualities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 32 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ" mean in English?

"anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 32. Being without beginning, devoid of any qualities, the Supreme Self, imperishable, though dwelling in the body, O Arjuna, neither acts nor is tainted. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.