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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 31
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा

जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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MarathiIND

जेव्हा एखादी व्यक्ती सर्व प्राणीमात्रांना एकात विसावलेल्या आणि एकट्यापासून उत्सर्जित झाल्याचे पाहते, तेव्हा ते ब्रह्म बनतात.

GujaratiIND

જ્યારે કોઈ વ્યક્તિ બધા જીવોને એકમાં વિશ્રામ કરતા અને એકલામાંથી નીકળતા જુએ છે, ત્યારે તે બ્રહ્મ બની જાય છે.

MalayalamIND

ഒരു വ്യക്തി എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളെയും ഒന്നിൽ വിശ്രമിക്കുന്നതായും ഒന്നിൽ നിന്ന് മാത്രം ഉദ്ഭവിക്കുന്നതായും കാണുമ്പോൾ അവർ ബ്രഹ്മമായിത്തീരുന്നു.

TamilIND

ஒருவன் எல்லா உயிர்களையும் ஒருவனில் இளைப்பாறுவதையும், ஒன்றிலிருந்து மட்டுமே வெளிப்படுவதையும் பார்க்கும்போது, ​​அவை பிரம்மமாகின்றன.

KannadaIND

ಒಬ್ಬ ವ್ಯಕ್ತಿಯು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳನ್ನು ಒಬ್ಬನಲ್ಲಿಯೇ ವಿಶ್ರಮಿಸುವಂತೆ ಮತ್ತು ಏಕಾಂಗಿಯಾಗಿ ಹೊರಹೊಮ್ಮುವಂತೆ ನೋಡಿದಾಗ, ಅವರು ಬ್ರಹ್ಮವಾಗುತ್ತಾರೆ.

BengaliIND

যখন একজন ব্যক্তি সমস্ত প্রাণীকে একের মধ্যে বিশ্রাম এবং একক থেকে নির্গত হিসাবে দেখেন, তখন তারা ব্রহ্ম হন।

PunjabiIND

ਜਦੋਂ ਕੋਈ ਮਨੁੱਖ ਸਾਰੇ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਇੱਕ ਵਿੱਚ ਟਿਕਿਆ ਹੋਇਆ ਦੇਖਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਕੱਲੇ ਤੋਂ ਹੀ ਉਤਪੰਨ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਉਹ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

TeluguIND

ఒక వ్యక్తి అన్ని జీవులను ఒకదానిలో విశ్రాంతిగా మరియు ఒక్కడి నుండి మాత్రమే ఉద్భవించినట్లు చూసినప్పుడు, వారు బ్రహ్మంగా మారతారు.

SindhiIND

جڏهن ڪو ماڻهو ڏسندو آهي ته سڀني مخلوقن کي هڪ ۾ آرام ڪري رهيو آهي ۽ اڪيلو اڪيلو مان نڪرندو آهي، پوء اهي برهمڻ بڻجي ويندا آهن.

NepaliIND

जब एक व्यक्तिले सबै प्राणीहरूलाई एकमा आराम गरेको र एकबाट उत्पन्न भएको देख्छ, तब उहाँ ब्रह्म बन्छ।

ManipuriIND

ꯃꯤꯑꯣꯏ ꯑꯃꯅꯥ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯀꯄꯨ ꯑꯃꯠꯇꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯂꯦꯞꯄꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯃꯈꯛꯇꯗꯒꯤ ꯊꯣꯔꯀꯄꯥ ꯑꯣꯏꯅꯥ ꯎꯔꯀꯄꯥ ꯃꯇꯃꯗꯥ ꯃꯈꯣꯌ ꯑꯗꯨ ꯕ꯭ꯔꯍ꯭ꯝ ꯑꯣꯏꯔꯀꯏ |

MizoIND

Miin thil nung zawng zawng chu Pakhatah chawl a, pakhat chauh atanga lo chhuak anga a hmuh chuan Brahman an lo ni ta a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- [प्रकृतिके दो रूप हैं -- क्रिया और पदार्थ। क्रियासे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये उनतीसवाँ श्लोक कहा? अब पदार्थसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये यह तीसवाँ श्लोक कहते हैं।]यदा भूतपृथग्भावं ৷৷. ब्रह्म सम्पद्यते तदा -- जिस कालमें साधक सम्पूर्ण प्राणियोंके अलगअलग भावोंको अर्थात् त्रिलोकीमें जितने जरायुज? अण्डज? उद्भिज्ज और स्वेदज प्राणी पैदा होते हैं? उन प्राणियोंके स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है? उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।त्रिलोकीके स्थावरजङ्गम प्राणियोंके शरीर? नाम? रूप? आकृति? मनोवृत्ति? गुण? विकार? उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय आदि सब एक प्रकृतिसे ही उत्पन्न हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर प्रकृतिसे ही उत्पन्न होते हैं? प्रकृतिमें ही स्थित रहते हैं और प्रकृतिमें ही लीन होते हैं। इस प्रकार देखनेवाला ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है अर्थात् प्रकृतिसे अतीत स्वतःसिद्ध अपने स्वरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। वास्तवमें वह पहलेसे ही प्राप्त था? केवल प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही उसको अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता था। परन्तु जब वह सबको प्रकृतिमें ही स्थित और प्रकृतिसे ही उत्पन्न देखता है? तब उसको अपने स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।जैसे पृथ्वीसे उत्पन्न होनेवाले स्थावरजङ्गम जितने भी शरीर हैं तथा उन शरीरोंमें जो कुछ भी परिवर्तन होता है? रूपान्तर होता है क्रियाएँ होती हैं वे सब पृथ्वीपर ही होती हैं। ऐसे ही प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले जितने गुण? विकार हैं तथा उनमें जो कुछ परिवर्तन होता है? घटबढ़ होती है? वह सबकीसब प्रकृतिमें ही होती है। तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीसे पैदा होनेवाले पदार्थ पृथ्वीमें ही स्थित रहनेसे और पृथ्वीमें लीन होनेसे पृथ्वीरूप ही हैं? ऐसे ही प्रकृतिसे पैदा होनेवाला सब संसार प्रकृतिमें ही स्थित रहनेसे और प्रकृतिमें ही लीन होनेसे प्रकृतिरूप ही है। इसी प्रकार स्थावरजङ्गम प्राणियोंके रूपमें जो चेतनतत्त्व है? वह निरन्तर परमात्मामें ही स्थित रहता है। प्रकृतिके सङ्गसे उसमें कितने ही विकार क्यों न दीखें? पर वह सदा असङ्ग ही रहता है। ऐसा स्पष्ट अनुभव हो जानेपर साधक ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।यह नियम है कि प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध माननेके कारण स्वार्थबुद्धि? भोगबुद्धि? सुखबुद्धि आदिसे प्राणियोंको अलगअलग भावसे देखनेपर रागद्वेष पैदा हो जाते हैं। राग होनेपर उनमें गुण दिखायी देते हैं और द्वेष होनेपर दोष दिखायी देते हैं। इस प्रकार दृष्टिके आगे रागद्वेषरूप परदा आ जानेसे वास्तविकताका अनुभव नहीं होता। परन्तु जब साधक अपने कहलानेवाले स्थूल? सूक्ष्म और कारणशरीरसहित सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंकी उत्पत्ति? स्थिति और विनाशको प्रकृतिमें ही देखता है तथा अपनेमें उनका अभाव देखता है? तब उसकी दृष्टिके आगेसे रागद्वेषरूप परदा हट जाता है और उसको स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- बाईसवें श्लोकमें जिसको देहसे पर बताया है और पीछेके (तीसवें) श्लोकमें जिसका ब्रह्मको प्राप्त होना बताया है? उस पुरुष(चेतन) के वास्तविक स्वरूपका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

फिर भी? उसी यथार्थ ज्ञानकी दूसरे शब्दोंसे व्याख्या करते हैं --, जिस समय ( यह विद्वान् ) भूतोंके अलगअलग भावोंको -- भूतोंकी पृथक्ताको? एक आत्मामें ही स्थित देखता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे मनन करके आत्माको इस प्रकार प्रत्यक्षभावसे देखता है कि यह सब कुछ आत्मा ही है। तथा उस आत्मासे ही सारा विस्तार -- सबकी उत्पत्ति -- विकास देखता है अर्थात् जिस समय आत्मासे ही प्राण? आत्मासे ही आशा? आत्मासे ही संकल्प? आत्मासे ही आकाश? आत्मासे ही तेज? आत्मासे ही जल? आत्मासे ही अन्न? आत्मासे ही सबका प्रकट और लीन होना इत्यादि प्रकारसे सारा विस्तार आत्मासे ही हुआ देखने लगता है उस समय वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है -- ब्रह्मरूप ही हो जाता है।

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Sri Anandgiri

परिपूर्णत्वेन सर्वात्मत्वे प्राप्तमात्मनो देहादि तेन कर्तृत्वादिना तद्वत्त्वं दृष्टं हि पवित्रस्यापि पञ्चगव्यादेरपवित्रसंसर्गात्तद्दोषेण दुष्टत्वमित्याशङ्कामनूद्योत्तरत्वेन श्लोकमवतारयति -- एकस्येति। अनादित्वमेव साधयति -- आदिरिति। तथापि किं स्यादित्याशङ्क्य कार्यत्वकृतव्ययाभावः सिध्यतीत्याह -- यद्धीति। तथापि गुणापकर्षद्वारको व्ययो भविष्यति नेत्याह -- तथेति। निरवयवत्वादेव सावयवद्वारकस्य निर्गुणत्वाद्गुणद्वारकस्य च व्ययस्याभावेऽपि स्वभावतो व्ययः स्यादित्याशङ्क्याह -- परमात्मेति। परमात्मनः स्वतः परतो वा व्ययाभावे फलितमाह -- यत इति। स्वमहिमप्रतिष्ठस्य कथं शरीरस्थत्वं तत्राह -- शरीरेष्विति। सर्वगतत्वेन सर्वात्मत्वेन च देहादौ स्थितोऽपि स्वतो देहाद्यात्मना वा न करोति कूटस्थत्वाद्देहादेश्च कल्पितत्वादित्यर्थः। कर्तृत्वाभावेऽपि भोक्तृत्वं स्यादित्याशङ्क्याह -- तदकरणादिति। तंदेवोपपादयति -- यो हीति। परस्य कर्तृत्वादेरभावे कस्य तदिष्टमिति पृच्छति -- कः पुनरिति। परस्मादन्यस्य कस्यचिज्जीवस्य कर्तृत्वादीत्याशङ्कामनुवदति -- यदीति। तस्मिन्पक्षे प्रक्रमभङ्गः स्यादिति दूषयति -- तत इति। ईश्वरातिरिक्तजीवानङ्गीकारान्नोपक्रमविरोधोऽस्तीति शङ्कते -- अथेति। तर्हि प्रतीतकर्तृत्वादेरधिकरणं वक्तव्यमिति पूर्ववाद्याह -- क इति। परस्यैव कर्तृत्वाद्याधारत्वान्नास्ति वक्तव्यमित्याशङ्क्याह -- परो वेति। नास्तीति वाच्यमिति पूर्वेण संबन्धः। नहि कर्तृत्वादिभाक्त्वे परस्यास्मदादिवदीश्वरत्वमिति भावः। परस्यान्यस्य वा कर्तृत्वादावविशिष्टे शरीरस्थोऽपीत्यादिश्रुतिमूलमपि ज्ञातुं वक्तुं चाशक्यत्वात्त्याज्यमेवेति परीक्षकसंमत्योपसंहरति -- सर्वथेति। परस्य वस्तुनोऽकर्तुरभोक्तुश्चाविद्यया तदारोपादादेयमेव भगवन्मतमिति परिहरति -- तत्रेति। तमेव परिहारं प्रपञ्चयति -- अविद्येति। व्यावहारिके कर्तृत्वादाविष्टे पारमार्थिकमेव किं,नेष्यते तत्राह -- नत्विति। वास्तवकर्तृत्वाद्यभावे लिङ्गमुपन्यस्यति -- अत इति।

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Sri Dhanpati

प्रकृतेर्विकाराणां च सांख्यवत्पुरुषादन्यत्वप्रसक्तिं निराकुर्वन्पुनरपि तदेव सम्यग्दर्शनं शब्दान्तरेण प्रपञ्चयति -- यदेति। यदा यस्मिन्काले भूतानां पृथग्भावः पृथक्त्वमेकस्थमेकस्मिन्नात्मनि प्रकृत्यादिसमस्तप्रपञ्चाधिष्ठाने प्रत्यगभिन्ने ब्रह्माणि सद्रूपे स्तितं कल्पितस्याधिष्ठानानतिरेकादात्मानतिरिक्तमनु शास्त्राचार्योपदेशात्पश्चात्पश्यतिआत्मैवैदं सर्वं? सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेहनानास्ति किंचन? अहं ब्रह्मास्मि इति साक्षात्करोति ततएव परमात्मन एव विस्तारंयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते? आनन्दाद्य्धवे खल्विमानि भूतानि जायन्ते? तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः? तदैक्षत? तत्तेजोऽसृजत इति सर्वप्रपञ्चविस्तारमनुपश्यति तदा तस्मिन्काले ब्रह्म संपद्यते। ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः।ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। एकस्यामेवेश्वरशक्तिरुपायां प्रकृतौ स्थितं प्रलयेऽनुपश्यति। तत एव च तस्या एव प्रकृतेः सकाशाद्भूतानां विस्तारं सृष्टिसमयेऽनुपश्यतीति तूक्तप्रसक्त्यनिरासं ब्रह्म संपद्यते इति कथनानुपपत्तिं चाभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yadāwhen
bhūtaliving entities
pṛithakbhāvam
ekastham
anupaśhyatisee
tataḥthereafter
evaindeed
chaand
vistāramborn from
brahmaBrahman
sampadyate(they) attain
tadāthen
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.30
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति

जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने-आपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.32
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते

हे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 31
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 31
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा

जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 31 का हिंदी अर्थ: "जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 31?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 31 translates to: "When a person sees all beings as resting in the One and emanating from the One alone, they then become Brahman. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 31 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। जिस कालमें साधक प्राणियोंके अलग-अलग भावोंको एक प्रकृतिमें ही स्थित देखता है और उस प्रकृतिसे ही उन सबका विस्तार देखता है, उस कालमें वह ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati" mean in English?

"yadā bhūta-pṛithag-bhāvam eka-stham anupaśhyati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 31. When a person sees all beings as resting in the One and emanating from the One alone, they then become Brahman. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.