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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 29
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्

क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

GujaratiIND

કારણ કે જે સાચે જ સર્વત્ર એક જ પ્રભુને વાસ કરતો જુએ છે, તે આત્મ દ્વારા આત્માનો નાશ કરતો નથી; તેના બદલે, તે ઉચ્ચતમ ધ્યેય પ્રાપ્ત કરે છે.

BengaliIND

কারণ যিনি সত্যই একই ভগবানকে সর্বত্র বিরাজমান দেখেন, তিনি আত্মাকে ধ্বংস করেন না; বরং, সে সর্বোচ্চ লক্ষ্য অর্জন করে।

KannadaIND

ಯಾಕಂದರೆ ಎಲ್ಲೆಂದರಲ್ಲಿ ನೆಲೆಸಿರುವ ಒಂದೇ ಭಗವಂತನನ್ನು ನಿಜವಾಗಿ ನೋಡುವವನು ತನ್ನಿಂದ ಆತ್ಮವನ್ನು ನಾಶಮಾಡುವುದಿಲ್ಲ; ಬದಲಿಗೆ, ಅವನು ಅತ್ಯುನ್ನತ ಗುರಿಯನ್ನು ಸಾಧಿಸುತ್ತಾನೆ.

TamilIND

ஏனெனில், எங்கும் ஒரே இறைவன் வீற்றிருப்பதை உண்மையாகக் காண்பவன் தன்னிலையால் தன்னை அழிப்பதில்லை; மாறாக, அவர் உயர்ந்த இலக்கை அடைகிறார்.

MarathiIND

कारण ज्याला सर्वत्र एकच परमेश्वर वास्तव्य केलेला दिसतो तो आत्मस्वरूपाचा नाश करत नाही; उलट, तो सर्वोच्च ध्येय गाठतो.

SindhiIND

ڇاڪاڻ ته جيڪو سچ پچ هڪ ئي رب کي هر جڳهه تي رهجي ٿو ڏسي، سو پنهنجي نفس جي ذريعي نفس کي تباهه نٿو ڪري. بلڪه، هو اعليٰ مقصد حاصل ڪري ٿو.

TeluguIND

ప్రతిచోటా ఒకే భగవంతుడు నివసించడాన్ని నిజంగా చూసేవాడు తనంతట తానుగా నాశనం చేసుకోడు; బదులుగా, అతను అత్యున్నత లక్ష్యాన్ని సాధిస్తాడు.

MalayalamIND

കാരണം, എല്ലായിടത്തും ഒരേ ഭഗവാൻ വസിക്കുന്നത് യഥാർത്ഥമായി കാണുന്നവൻ സ്വയം സ്വയം നശിപ്പിക്കുന്നില്ല; മറിച്ച്, അവൻ ഏറ്റവും ഉയർന്ന ലക്ഷ്യം കൈവരിക്കുന്നു.

NepaliIND

किनकि जसले साँच्चिकै एउटै प्रभुलाई सर्वत्र बास गरेको देख्छ, उसले स्वयंद्वारा आत्म विनाश गर्दैन। बरु, उसले उच्चतम लक्ष्य प्राप्त गर्दछ।

PunjabiIND

ਕਿਉਂਕਿ ਜੋ ਸੱਚਮੁੱਚ ਇੱਕੋ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਹਰ ਥਾਂ ਵੱਸਦਾ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਨਾਸ ਨਹੀਂ ਕਰਦਾ; ਸਗੋਂ, ਉਹ ਉੱਚਤਮ ਟੀਚਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

OdiaIND

କାରଣ ଯିଏ ପ୍ରକୃତରେ ସମାନ ପ୍ରଭୁଙ୍କୁ ସର୍ବତ୍ର ବାସ କରୁଥିବା ଦେଖେ, ସେ ଆତ୍ମ ଦ୍ୱାରା ଆତ୍ମକୁ ନଷ୍ଟ କରେ ନାହିଁ; ବରଂ ସେ ସର୍ବୋଚ୍ଚ ଲକ୍ଷ୍ୟ ହାସଲ କରନ୍ତି |

AssameseIND

কাৰণ যিজনে সঁচাকৈয়ে একেটা প্ৰভুক সকলোতে বাস কৰা দেখে, তেওঁ আত্মাৰ দ্বাৰা আত্মাক ধ্বংস নকৰে; বৰঞ্চ তেওঁ সৰ্বোচ্চ লক্ষ্যত উপনীত হয়।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- समं पश्यन्हि ৷৷. हिनस्त्यात्मनात्मानम् -- जो मनुष्य स्थावरजङ्गम? जडचेतन प्राणियोंमें? ऊँचनीच योनियोंमें? तीनों लोकोंमें समान रीतिसे परिपूर्ण परमात्माको देखता है अर्थात् उस परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव करता है? वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता।जो शरीरके साथ तादात्म्य करके शरीरके बढ़नेसे अपना बढ़ना और शरीरके घटनेसे अपना घटना? शरीरके बीमार होनेसे अपना बीमार होना और शरीरके नीरोग होनेसे अपना नीरोग होना? शरीरके जन्मनेसे अपना जन्मना और शरीरके मरनेसे अपना मरना मानता है तथा शरीरके विकारोंको अपने विकार मानता है? वह अपनेआपसे अपनी हत्या करता है अर्थात् अपनेको जन्ममरणके चक्करमें ले जाता है। परन्तु जिसकी दृष्टि शरीरकी तरफसे हटकर केवल सर्वव्यापक? सबके शासक परमत्माकी तरफ हो जाती है? वह फिर अपनी हत्या नहीं करता अर्थात् जन्ममरणके चक्करमें नहीं जाता? अपनेमें संसार और शरीरके विकारोंका अनुभव नहीं करता।वास्तवमें अपनेआपकी (स्वरूपकी) हत्या अर्थात् अभाव कभी कोई कर ही नहीं सकता और अपना अभाव कभी हो भी नहीं सकता तथा अपना अभाव करना कोई चाहता भी नहीं। वास्तवमें नाशवान् शरीरके साथ तादात्म्य करना ही अपनी हत्या करना है? अपना पतन करना है? अपनेआपको जन्ममरणमें ले जाना है।ततो याति परां गतिम् -- शरीरके साथ तादात्म्य करके जो ऊँचनीच योनियोंमें भटकता था? बारबार जन्मतामरता था? वह जब परमात्माके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है? तब वह परमगतिको अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्माको प्राप्त हो जाता है।मर्मिक बातपरमात्मतत्त्व सब देशमें है? सब कालमें है? सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें है? सम्पूर्ण वस्तुओंमें है? सम्पूर्ण घटनाओंमें है? सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें है? सम्पूर्ण क्रियाओंमें है। वह सबमें एक रूपसे? समान रीतिसे ज्योंकात्यों परिपूर्ण है। अब उसको प्राप्त करना कठिन है तो सुगम क्या होगा जहाँ चाहो? वहीं प्राप्त कर लो। वास्तवमें इस संसारका जो हैपना दीखता है? वह संसारका नहीं है। संसार तो एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता। इसमें,केवल परिवर्तनहीपरिवर्तन है। यह केवल परिवर्तनका ही पुञ्ज है। जैसे पंखा तेजीसे घूमता है तो एक चक्र दीखता है? पर वास्तवमें वहाँ चक्र नहीं है? प्रत्युत पंखेकी ताड़ी ही चक्ररूपसे दीखती है। ऐसे ही यह संसार नहीं होते हुए भी हैरूपसे दीखता है। वास्तवमें एक परमात्मतत्त्व ही हैरूपसे विद्यमान है।विचार करें? अभी जितने शरीर आदि दीखते हैं? ये सौ वर्ष पहले थे क्या और सौ वर्ष बाद रहेंगे क्या ये पहले भी नहीं थे और अन्तमें भी नहीं रहेंगे अतः ये बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु परमात्मा सृष्टिके पैदा होनेसे पहले भी था? सृष्टिके लीन होनेके बाद भी रहेगा? अतः परमात्मा सृष्टिके समय भी ज्योंकात्यों परिपूर्ण है। जो पहले भी नहीं था? बादमें भी नहीं रहेगा? वह अभी भी नहीं है और जो पहले भी था? बादमें भी रहेगा? वह अभी भी है। अतः संसारका जो हैपन दीखता है? यह गलती है। परमात्मतत्त्व ही हैरूपसे दीखता है उस परमात्मतत्त्वकी सत्यतासे ही यह असत् संसार मोह(मूर्खता) के कारण सत्यकी तरह दीखता है -- जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।(मानस 1। 117। 4)यदि मोह नहीं होगा? तो यह संसार नहीं दीखेगा? प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही दीखेगा -- वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19)। कारण कि परमात्मा ही था? परमात्मा ही रहेगा? बीचमें दूसरा कहाँसे आयेगा सोनेके जितने गहने हैं? उनमें पहले सोना ही था फिर सोना ही रहेगा अतः बीचमें सोनेके सिवाय दूसरा कहाँसे आयेगा गहना तो केवल (रूप? आकृति? उपयोग आदिको लेकर) कहनेके लिये है? तत्त्वतः तो सोना ही है। ऐसे ही संसार केवल कहनेके लिये है? तत्त्वतः तो परमात्मा ही है। उस परमात्माका अनुभव करनेमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।है(परमात्मा) का अनुभव न करके नहीं(संसार) में उलझ जाना मनुष्यता नहीं है? प्रत्युत पशुता है। इस पशुताका त्याग करना है -- पशुबुद्धिमिमां जहि (श्रीमद्भा0 12। 5। 2)। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें नष्ट न होनेवाले परमात्माको देखता है? उसका देखना सही है। परन्तु जो नष्ट होनेवालेको देखता है और नष्ट न होनेवालेको नहीं देखता? वह आत्मघाती है -- योऽन्यथा सन्तमात्मानमन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चौरेणात्मापहारिणा।।(महाभारत? उद्योग0 42। 37) जो अन्य प्रकारका (अविनाशी) होते हुए भी आत्माको अन्य प्रकारका (विनाशी) मानता है? उस आत्मघाती चोरने कौनसा पाप नहीं किया ,जो नाशवान् संसारको न देखकर सब जगह समानरूपसे परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको देखता है? वह आत्मघाती नहीं होता अर्थात् वह अपने द्वारा अपनी हत्या नहीं करता? इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। परन्तु जो सब जगह परिपूर्ण परमात्मतत्त्वको न देखकर संसारशरीरको देखता है? वह आत्मघाती परमगतिको न प्राप्त होकर बारबार जन्मतामरता रहता है? दुःख पाता रहता है। इसलिये मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे? अपना पतन न करे (गीता 6। 5)।जैसे दर्पणमें मुख नहीं होनेपर भी मुख दीखता है और स्वप्नमें हाथी नहीं होनेपर भी हाथी दीखता है? ऐसे ही संसार नहीं होनेपर भी संसार दीखता है। अगर संसारकी तरफ दृष्टि न रहे तो संसार हैरूपसे नहीं दीखेगा। परमात्मा ही हैरूपसे दीख रहा है -- इस बातको साधक दृढ़तासे मान ले? फिर चाहे वह,अभी न दीखे? पर बादमें दीखने लग जायगा। जैसे अभी साधक वृन्दावनमें बैठा है? तो उसे वृन्दावनको याद नहीं करना पड़ता। सोते समय? भोजन करते समय? हरेक कार्य करते समय वह वृन्दावनको याद नहीं करता परन्तु मैं वृन्दावनमें हूँ -- इस बातमें उसको सन्देह नहीं होता। वह बिना याद किये याद रहता है। ऐसे ही अभी भले ही परमात्मा न दीखे? पर साधक ऐसा दृढ़तासे मान ले कि हैरूपसे तो केवल परमात्मा ही है? संसार नहीं है? तो बादमें उसको ऐसा अनुभव होने लग जायगा। कारण कि मिथ्या वस्तु कबतक टिकी रहेगी और सत्य वस्तु कबतक छिपी रहेगी सम्बन्ध -- इसी अध्यायके छब्बीसवें श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रक्षेत्रज्ञके संयोगकी बात बतायी। इस संयोगसे छूटनेके दो उपाय हैं -- परमात्माके साथ अपने स्वतःसिद्ध सम्बन्धको पहचानना और प्रकृति(शरीर) से अपने माने हुए सम्बन्धको तोड़ना। सत्ताईसवेंअट्ठाईसवें श्लोकोंमें परमात्माके साथ सम्बन्धको पहचाननेकी बात बता दी। अब आगेके दो श्लोकोंमें प्रकृतिसे सम्बन्ध तोड़नेकी बात बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उपर्युक्त यथार्थ ज्ञानका फल बतलाकर उसकी स्तुति करनी चाहिये। इसलिये यह श्लोक आरम्भ किया जाता है --, क्योंकि सर्वत्र -- सब भूतोंमें समभावसे स्थित हुए ईश्वरको अर्थात् ऊपरके श्लोकमें जिसके लक्षण बतलाये गये हैं? उस ( परमेश्वर ) को सर्वत्र समान भावसे देखनेवाला पुरुष स्वयं -- अपने आप अपनी हिंसा नहीं करता? इसलिये अर्थात् अपनी हिंसा न करनेके कारण वह मोक्षरूप परम उत्तम गतिको प्राप्त होता है। पू0 -- कोई भी प्राणी स्वयं अपनी हिंसा नहीं करता फिर यह अप्राप्तका निषेध क्यों किया जाता है कि वह अपनी हिंसा नहीं करता जैसे कोई कहे कि पृथ्वीपर और अन्तरिक्षमें अग्नि नहीं जलानी चाहिये। उ0 -- यह दोष नहीं है क्योंकि अज्ञानियोंसे स्वयं अपना तिरस्कार करना बन सकता है। सभी अज्ञानी अत्यन्त प्रसिद्ध साक्षात् -- प्रत्यक्ष आत्माका तिरस्कार करके अनात्मा शरीरादिको आत्मा मानकर? फिर धर्म और अधर्मका आचरण कर? उस प्राप्त किये हुए ( शरीररूप ) आत्माका नाश करके दूसरे नये ( शरीररूप ) आत्माको प्राप्त करते हैं। फिर उसका भी इसी प्रकार नाश करके अन्यको और उसका भी वैसे ही नाश करके ( पुनः ) अन्यको पाते रहते हैं। इस प्रकार बारंबार शरीररूप आत्माको प्राप्त करके उसकी हिंसा करते जाते हैं? अतः सभी अज्ञानी आत्महत्यारे हैं। जो वास्तवमें आत्मा है वह भी अविद्याद्वारा ( अज्ञात होनेके कारण ) सदा मारा हुआसा ही रहता है क्योंकि उनके लिये उसका विद्यमान फल भी नहीं होता। सुतरां अभी अविद्वान् आत्माकी हिंसा करनेवाले ही हैं। परंतु जो इनसे अन्य उपर्युक्त आत्मस्वरूपको जाननेवाला है? वह दोनों प्रकारसे ही अपनेद्वारा अपना नाश नहीं करता है। इसलिये वह परमगति प्राप्त कर लेता है अर्थात् उसे पहले बताया हुआ ( परम गतिरूप ) फल प्राप्त होता है।

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Sri Anandgiri

श्लोकान्तरं शङ्कोत्तरत्वेनावतारयितुमनुवदति -- सर्वेति। प्रतिदेहं धर्माधर्मादिमत्त्वेनात्मनो भेदभानान्न सम्यग्दर्शनमिति शङ्कते -- तदिति। स्वगुणैः सुखदुःखादिभिः स्वकर्मभिश्च धर्माधर्माख्यैर्वैलक्षण्यात्प्रतिदेहं भेदे तद्विशिष्टेष्वात्मसु कथं साम्येन दर्शनमित्येतदाशङ्क्य परिहरतीत्याह -- एतदिति। प्रकृतिशब्दस्य स्वभाववाचित्वं व्यावर्तयति -- प्रकृतिरिति। मायाशब्दस्य संवित्पर्यायत्वं प्रत्याह -- त्रिगुणेति। उक्ता परस्य शक्तिर्मायेत्यत्र श्रुतिसंमतिमाह -- मायां त्विति। अन्येन केनचित्क्रियमाणानि न भवन्ति कर्माणीत्येवकारार्थमाह -- नान्येनेति। किं तदन्यन्निषेध्यमित्युक्ते सांख्याभिप्रेता प्रधानाख्या प्रकृतिरित्याह -- महदादीति। सर्वप्रकारत्वं काम्यत्वनिषिद्धत्वादिना प्रकारबाहुल्यमात्मानमुक्तविशेषणं यः पश्यतीति पूर्वेण संबन्धः। स पश्यतीत्ययुक्तं पुनरुक्तेरित्याशङ्क्याह -- स परमार्थेति। आत्मनां प्रतिदेहं भिन्नत्वे तेषु समदर्शनमयुक्तमित्युक्तस्य कः समाधिरित्याशङ्क्याह -- निर्गुणस्येति।

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Sri Dhanpati

श्रोतृप्ररोचनाय यथोक्तं सभ्यग्दर्शनं फलवचनेन स्तौति -- सममिति। सर्वत्र समं तुल्यतयावस्तितं ईश्वरमुक्तलक्षणं समं पश्यन् उपलभमानः। हि यस्मादात्मना स्वेनैव स्वात्मानं न हिनस्तिहिंसां न करोति ततस्तस्मात्परां प्रकृष्टां मोक्षाख्यां गतिं याति प्राप्नोति। मुच्यत इत्यर्थः। अयमर्थः -- सर्वो ह्यज्ञोऽत्यन्तप्रसिद्धं साक्षादपरोक्षमप्यात्मानं तिरस्कृत्यानात्मानमात्मत्वेन परिगृह्य तमपि धर्माधर्मौ कृत्वोपात्तमात्मानं हत्वाऽन्यमात्मानमुपादत्ते तमपि हत्वाऽन्यमित्येवमुपात्तमुपात्तमात्मानं हन्तीत्यात्महा उत्यते।असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृताः। तांस्ते प्रत्याभिगच्छन्ति ये केचात्महनो जनाः।अन्यथा सन्तमात्मानं योऽन्यथा प्रतिपद्यते। किं तेन न कृतं पापं चोरेणात्मापहारिणा इत्यादि श्रुतिस्मृतिभ्यां परमार्थात्माप्यविद्वद्भिरविद्यया हत इव। अतः सर्वेऽप्यविद्वांस आत्महन एवोच्यन्ते। यस्त्वितरो यथोक्तात्मदर्शी स उभयथाप्यात्मना आत्मानं न हिनस्ति ततो याति परां गतिम्। एतेन कश्चिदपि प्राणी स्वयं स्वमात्मानं नैव हिनस्तीत्यतो प्राप्तं हननं किमिति प्रतिषिध्यत इति शङ्का प्रत्युक्ता। आत्मशब्दस्य स्वस्मिन्मुख्यत्वादुक्तार्थे स्वरसाधिक्याच्चात्मना देहादिनात्मानं। यद्वा ऐक्यात्मदर्शित्वात्स्वात्मानमिवान्यमप्यात्मानं न हिनस्ति सर्वत्र दयालुर्भवतीति व्याख्यानमाचार्यैर्न प्रदर्शितम्।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
samamequally
paśhyansee
hiindeed
sarvatraeverywhere
samavasthitamequally present
īśhvaramGod as the Supreme soul
nado not
hinastidegrade
ātmanāby one’s mind
ātmānamthe self
tataḥthereby
yātireach
parāmthe supreme
gatimdestination
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.28
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति

जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.30
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।यः पश्यति तथाऽऽत्मानमकर्तारं स पश्यति

जो सम्पूर्ण क्रियाओंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही की जाती हुई देखता है और अपने-आपको अकर्ता देखता (अनुभव करता) है, वही यथार्थ देखता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 29
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 29
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्

क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 29 translates to: "For he who truly sees the same Lord dwelling everywhere does not destroy the Self by the self; rather, he attains the highest goal. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram" mean in English?

"samaṁ paśhyan hi sarvatra samavasthitam īśhvaram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 29. For he who truly sees the same Lord dwelling everywhere does not destroy the Self by the self; rather, he attains the highest goal. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.