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Sudarshana Chakra
Adhyay 13, Shlok 28
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति

जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

KannadaIND

ಎಲ್ಲ ಜೀವಿಗಳಲ್ಲಿ ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಇರುವ ಪರಮಾತ್ಮನನ್ನು ನೋಡುವವನು, ನಾಶವಾಗುವಂತಹವುಗಳಲ್ಲಿ ನಾಶವಾಗುವುದಿಲ್ಲ, ನಿಜವಾಗಿಯೂ ನೋಡುತ್ತಾನೆ.

PunjabiIND

ਜੋ ਪਰਮ ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਵਿੱਚ ਮੌਜੂਦ ਵੇਖਦਾ ਹੈ, ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਦੇ ਅੰਦਰ ਅਵਿਨਾਸ਼, ਸੱਚਮੁੱਚ ਹੀ ਵੇਖਦਾ ਹੈ।

MalayalamIND

എല്ലാ ജീവികളിലും യഥാർത്ഥമായി നിലനിൽക്കുന്ന പരമേശ്വരനെ കാണുന്നവൻ, നശ്വരമായതിൽ നാശമില്ലാത്തത്, യഥാർത്ഥമായി കാണുന്നു.

TamilIND

எல்லா உயிர்களிடத்தும் உள்ள பரமபிதாவை உண்மையாகக் காண்பவர், அழியக்கூடியவற்றுக்குள் அழியாதவர், உண்மையில் பார்க்கிறார்.

GujaratiIND

જે સર્વ જીવોમાં વિદ્યમાન પરમ ભગવાનને, નાશવંતની અંદર અવિનાશીને જુએ છે, તે ખરેખર જુએ છે.

NepaliIND

जसले परमात्मालाई साँच्चै सबै प्राणीहरूमा अवस्थित देख्छ, विनाशशील भित्र अविनाशी देख्छ।

SindhiIND

جيڪو سڀني مخلوقات ۾ موجود عظيم رب کي ڏسي ٿو، غير فاني ۾ غير فاني، حقيقت ۾ ڏسي ٿو.

TeluguIND

అన్ని జీవులలో ఉన్న పరమాత్మను నిజంగా చూసేవాడు, నశించే దానిలో ఉన్న అవినాశిని, వాస్తవానికి చూస్తాడు.

MarathiIND

जो परमात्म्याला सर्व प्राणिमात्रांमध्ये विराजमान असलेला, नाशिवानांमध्ये अविनाशी पाहतो, तो खरोखरच पाहतो.

BengaliIND

যিনি পরম ভগবানকে সর্বপ্রাণে বিরাজমান দেখেন, ধ্বংসশীলের মধ্যে অবিনশ্বর, তিনি সত্যই দেখেন।

MizoIND

Lalpa Chungnungber chu thil nung zawng zawnga awm tak tak, boral thei chhunga boral thei lo hmutu chuan a hmu tak zet a ni.

MaithiliIND

जे परमात्मा के सब जीव में, नाशवान के भीतर अविनाशी के सत्यतः विद्यमान देखैत अछि, ओ वास्तव में देखैत अछि |

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या -- समं सर्वेषु भूतेषु -- परमात्माको सम्पूर्ण प्राणियोंमें सम कहनेका तात्पर्य है कि सभी प्राणी विषम हैं अर्थात् स्थावरजङ्गम हैं? सात्त्विकराजसतामस हैं? आकृतिसे छोटेबड़े? लम्बेचौड़े हैं? नाना वर्णवाले हैं -- इस प्रकार तरहतरहके जितने भी प्राणी हैं? उन सब प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं। वे परमात्मा किसीमें छोटेबड़े? कमज्यादा नहीं हैं।पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने क्षेत्रज्ञके साथ अपनी एकता बताते हुए कहा था कि तू सम्पूर्ण प्राणियोंमें क्षेत्रज्ञ मेरेको समझ? उसी बातको यहाँ कहते हैं कि सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्मा समरूपसे स्थित हैं।तिष्ठन्तम् -- सम्पूर्ण प्राणी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय -- इन तीन अवस्थाओंमें जाते हैं सर्गप्रलय? महासर्गमहाप्रलयमें जाते हैं ऊँचनीच गतियोंमें? योनियोंमें जाते हैं अर्थात् सभी प्राणी किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहते। परन्तु परमात्मा उन सब अस्थिर प्राणियोंमें नित्यनिरन्तर एकरूपसे स्थित रहते हैं।परमेश्वरम् -- सभी प्राणी अपनेको किसीनकिसीका ईश्वर अर्थात् मालिक मानते ही रहते हैं परन्तु परमात्मा उन सभी प्राणियोंके तथा सम्पूर्ण जडचेतन संसारके परम ईश्वर हैं।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति -- प्रतिक्षण विनाशकी तरफ जानेवाले प्राणियोंमें विनाशरहित? सदा एकरूप रहनेवाले परमात्माको जो निर्विकार देखता है? वही वास्तवमें सही देखता है। तात्पर्य है कि जो,परिवर्तनशील शरीरके साथ अपनेआपको देखता है? उसका देखना सही नहीं है किन्तु जो सदा ज्योंकेत्यों रहनेवाले परमात्माके साथ अपनेआपको अभिन्नरूपसे देखता है? उसका देखना ही सही है।पहले इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञका ज्ञान ही मेरे मतमें ज्ञान है? उसी बातको यहाँ कहते हैं कि जो नष्ट होनेवाले प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और सम देखता है? उसका देखना (ज्ञान) ही सही है। तात्पर्य है कि जैसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगमें क्षेत्रमें तो हरदम परिवर्तन होता है? पर क्षेत्रज्ञ ज्योंकात्यों ही रहता है? ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न और नष्ट होते हैं? पर परमात्मा सब अवस्थाओंमें समानरूपसे स्थित रहते हैं।पीछेके (छब्बीसवें) श्लोकमें भगवान्ने यह बताया कि जितने भी प्राणी पैदा होते हैं? वे सभी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे ही पैदा होते हैं। परन्तु उन दोनोंमें क्षेत्र तो किसी भी क्षण स्थिर नहीं रहता और क्षेत्रज्ञ एक क्षण भी नहीं बदलता। अतः क्षेत्रज्ञसे क्षेत्रका जो निरन्तर वियोग हो रहा है? उसका अनुभव कर ले। इस (सत्ताईसवें) श्लोकमें भगवान् यह बताते हैं कि उत्पन्न और नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण विषम प्राणियोंमें जो परमात्मा नाशरहित और समानरूपसे स्थित रहते हैं? उनके साथ अपनी एकताका अनुभव कर ले। सम्बन्ध -- अब भगवान् नष्ट होनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंमें अविनाशी परमात्माको देखनेका फल बताते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

न स भूयोऽभिजायते इस कथनसे पूर्णज्ञानका फल? अविद्या आदि संसारके बीजोंकी निवृत्तिद्वारा पुनर्जन्मका अभाव बतलाया गया? तथा अविद्याजनित क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगको जन्मका कारण बतलाया गया। इसलिये उस अविद्याको निवृत्ति करनेवाला पूर्ण ज्ञान? यद्यपि पहले कहा जा चुका है तो भी दूसरे शब्दोंमें फिर कहा जाता है --, ( जो पुरुष ) ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त प्राणियोंमें समभावसे स्थित -- ( व्याप्त ) हुए परमेश्वरको अर्थात् शरीर? इन्द्रिय? मन? बुद्धि अव्यक्त और आत्माकी अपेक्षा जो परम ईश्वर है? उस परमेश्वरको सब भूतोंमें समभावसे स्थित देखता है। यहाँ भूतोंसे परमेश्वरकी अत्यन्त विलक्षणता दिखलानेके निमित्त भूतोंके लिये विनाशशील और परमेश्वरके लिये अविनाशी विशेषण देते हैं। पू0 -- इससे परमेश्वरकी विलक्षणता कैसे सिद्ध होती है उ0 -- सभी भावविकारोंका जन्मरूप? भावविकार मूल है। अन्य सब भावविकार जन्मके पीछे होनेवाले और विनाशमें समाप्त होनेवाले हैं। भावका अभाव हो जानेके कारण विनाशके पश्चात् कोई भी भावविकार नहीं रहता क्योंकि धर्मीके रहते ही धर्म रहते हैं। इसलिये अन्तिम भावविकारके अभावका ( अविनश्यन्तम् इस पदके द्वारा ) अनुवाद करनेसे पहले होनेवाले? सभी भावविकारोंका कार्यके सहित प्रतिषेध हो जाता है। सुतरां ( उपर्युक्त वर्णनसे ) परमेश्वरकी सब भूतोंसे अत्यन्त ही विलक्षणता तथा निर्विशेषता और एकता भी सिद्ध होती है। अतः जो इस प्रकार उपर्युक्त भावसे परमेश्वरको देखता है वही देखता है। पू0 -- सभी लोग देखते हैं फिर वही देखता है इस विशेषणसे क्या प्रयोजन है उ0 -- ठीक है? ( अन्य सब भी ) देखते हैं परंतु विपरीत देखते हैं? इसलिये वह विशेषण दिया गया है कि वही देखता है। जैसे कोई तिमिररोगसे दूषित हुई दृष्टिवाला अनेक चन्द्रमाओंको देखता है? उसकी अपेक्षा एक चन्द्र देखनेवालेकी यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीक देखता है। वैसे ही यहाँ भी जो आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे विभागरहित एक देखता है? उसकी अलगअलग अनेक आत्मा देखनेवाले विपरीतदर्शियोंकी अपेक्षा यह विशेषता बतलायी जाती है कि वही ठीकठीक देखता है। अभिप्राय यह है कि दूसरे सब अनेक चन्द्र देखनेवालेकी भाँति विपरीत भावसे देखनेवाले होनेके कारण? देखते हुए भी वास्तवमें नहीं देखते।

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Sri Anandgiri

प्रकृतसम्यग्ज्ञानेन किमित्यपेक्षायां तत्फलोक्त्या तस्यैव स्तुत्या तद्धेतौ पुरुषं प्रवर्तयितुं श्लोकान्तरमित्याह -- यथोक्तस्येति। यस्मादित्यस्य ततःशब्देन संबन्धः। सर्वभूतेषु तुल्यतयावस्थितं पूर्वोक्तलक्षणमीश्वरं निर्विशेषं पश्यन्नात्मानमात्मना यस्मान्न हिनस्ति ततस्तस्मान्मोक्षाख्यां परां गतिं यातीति योजना। तत्र पादत्रयेण ज्ञानादज्ञानध्वस्त्या ध्वस्तिरनर्थस्योक्ता। अज्ञानमिथ्याज्ञानयोरावरणयोर्नाशे सर्वोत्कृष्टां,गतिं परमपुरुषार्थं परमानन्दमनुभवति विद्वानिति चतुर्थपादार्थः। न हिनस्त्यात्मनात्मानमिति यथाश्रुतमादाय चोदयति -- नन्विति। न पृथिव्यामिति प्राप्तिद्वारा निषेधवन्नान्तरिक्षे न दिवीति प्राप्त्यभावाच्चायं निषेधो मुख्यो नेष्यते तथेहापि प्राप्तिं विना निषेधो न युक्तिमानित्याह -- यथेति। अज्ञानामात्मनैवात्महिंसासंभवाद्विदुषां तद्भावोक्तिर्युक्तेति समाधत्ते -- नैष दोष इति। संग्रहवाक्यं विवृणोति -- सर्वो हीति। अनात्मशब्दो देहादिविषयः। अविदुषामारोपितात्महन्तृत्वं निगमयति -- इत्यात्महेति। तथापि पारमार्थिकस्यात्मनो हननाभावान्न तेषां सर्वेषामात्महन्तृत्वमित्याशङ्क्याह -- यस्त्विति। उक्तरीत्या सर्वेषामविदुषामात्महन्तृत्वं सिद्धमित्युपसंहरति -- सर्व इति। आत्मनैवात्महननमविदुषां दृष्टं तदिह विद्वद्विषये शक्यं निषेद्धुमित्याह -- यस्त्वितर इति। उभयथापीति। आरोपानारोपाभ्यामित्यर्थः। ज्ञानादनर्थभ्रमभ्रंशे पूर्वोक्तपरमानन्दप्राप्त्या परितृप्तत्वं युक्तमित्याह -- तत इति।

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Sri Dhanpati

न स भूयोभिजायत इत्यनेन सभ्यग्दर्शनफलमविद्यादिसंसारबीजनिवृत्तिद्वारेण ज्माभाव उक्तो जन्मकारणं चाविद्यानिमित्तकक्षेत्रक्षेत्रसंयोग उक्तः। अतः सर्वथापि सर्वानर्थमूलभूतस्याज्ञानस्य निवर्तकं सभ्यग्दर्शनमुक्तमप्यतिसूक्ष्मार्थस्य पुनः पुनर्वचनेनाधिकारिभेदानुग्रहं मत्वा शब्दान्तरेण पुनराह -- सममिति। सर्वेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु भूतेषु भवनधर्मकेषु प्राणिषु परस्परमत्यन्तविषमेष्वनेकेषु समं तिष्ठन्तं निर्विशेषमेवं स्थितिं कुर्वन्तं परमेश्वरं देहेन्द्रियाद्यात्मानमपेक्ष्य परमश्चासावीशनशीलश्च तं विनश्यत्सु सर्वेषां भावविकारणां जन्मोत्तरभावित्वात् नाशेन षट्भावविकारा गृह्यन्ते। सर्वभाविकारवत्सु अविनश्यन्तं सर्वविकाररहितं। तथाचसर्वभूतेब्योऽत्यन्तविलक्षणं प्रत्यगभिन्नं परमेश्वरं यः पश्यति स एव पश्यति नतु विपरीतदर्शी। यताऽनेकचन्द्रदर्श्यपेक्षया एकचन्द्रदर्शी विशिष्यते तथा विभक्तानेकात्मविपरीतदर्शिभ्यो यथोक्तात्मदर्श्यपीत्यर्थः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
samamequally
sarveṣhuin all
bhūteṣhubeings
tiṣhṭhantam
paramaīśhvaram
vinaśhyatsuamongst the perishable
avinaśhyantamthe imperishable
yaḥwho
paśhyatisee
saḥthey
paśhyatiperceive
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 13.27
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! स्थावर और जंगम जितने भी प्राणी पैदा होते हैं, उनको तुम क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके संयोगसे उत्पन्न हुए समझो। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 13.29
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।न हिनस्त्यात्मनाऽऽत्मानं ततो याति परां गतिम्

क्योंकि सब जगह समरूपसे स्थित ईश्वरको समरूपसे देखनेवाला मनुष्य अपने-आपसे अपनी हिंसा नहीं करता, इसलिये वह परमगतिको प्राप्त हो जाता है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 13Shlok 28
Bhagavad Gita · Adhyay 13, Shlok 28
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति

जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 13 श्लोक 28 का हिंदी अर्थ: "जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 28?

Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 28 translates to: "He who sees the Supreme Lord existing truly in all beings, the imperishable within the perishable, sees indeed. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 13, श्लोक 28 है जो Bhagavad Gita के Ksetra-Ksetrajnya Vibhaga Yoga में संकलित है। जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है, वही वास्तवमें सही देखता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram" mean in English?

"samaṁ sarveṣhu bhūteṣhu tiṣhṭhantaṁ parameśhvaram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 13 Verse 28. He who sees the Supreme Lord existing truly in all beings, the imperishable within the perishable, sees indeed. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.