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Bhagavad Gita · BG 12.3

Bhagavad Gita 12.3 — Commentary

18 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti

Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more

Sanskrit Original — मूल श्लोक

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्

ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate sarvatra-gam achintyañcha kūṭa-stham achalandhruvam sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

"Those who worship the imperishable, the indefinable, the unmanifest, the omnipresent, the unthinkable, the immovable, and the eternal."

Scholar Commentaries (18)

Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.

Sri Shankaracharya

8th century CE · Advaita Vedanta

Advaita

The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.

ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम्? अव्यक्तत्वात् अशब्दगोचर इति न निर्देष्टुं शक्यते? अतः अनिर्देश्यम्? अव्यक्तं न केनापि प्रमाणेन व्यज्यत इत्यव्यक्तं पर्युपासते परि समन्तात् उपासते। उपासनं नाम यथाशास्त्रम् उपास्यस्य अर्थस्य विषयीकरणेन सामीप्यम् उपगम्य तैलधारावत् समानप्रत्ययप्रवाहेण दीर्घकालं यत् आसनम्? तत् उपासनमाचक्षते। अक्षरस्य विशेषणमाह उपास्यस्य -- सर्वत्रगं व्योमवत् व्यापि अचिन्त्यं च अव्यक्तत्वादचिन्त्यम्। यद्धि करणगोचरम्? तत् मनसापि चिन्त्यम्? तद्विपरीतत्वात् अचिन्त्यम् अक्षरम्? कूटस्थं दृश्यमानगुणम् अन्तर्दोषं वस्तु कूटम्। कूटरूपम् कूटसाक्ष्यम् इत्यादौ कूटशब्दः प्रसिद्धः लोके। तथा च अविद्याद्यनेकसंसारबीजम् अन्तर्दोषवत् मायाव्याकृतादिशब्दवाच्यतया मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् (श्वे0 उ0 4।10) मम माया दुरत्यया (गीता 7।14) इत्यादौ प्रसिद्धं यत् तत् कूटम्? तस्मिन् कूटे स्थितं कूटस्थं तदध्यक्षतया। अथवा? राशिरिव स्थितं कूटस्थम्। अत एव अचलम्। यस्मात् अचलम्? तस्मात् ध्रुवम्? नित्यमित्यर्थः।।

Sri Ramanuja

11th–12th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.

ये तु अक्षरं प्रत्यगात्मस्वरूपं अनिर्देश्यं देहाद् अन्यतया देवादिशब्दानिर्देश्यम् अतएव चक्षुरादिकरणानभिव्यक्तं सर्वत्रगम् अचिन्त्यं च सर्वत्र देवादिदेहेषु वर्तमानम् अपि तद्विसजातीयतया तेन तेन रूपेण चिन्तयितुम् अनर्हम्? तत एव कूटस्थं सर्वसाधारणं तत्तद्देवाद्यसाद्यारणाकारासंबन्धम् इत्यर्थः। अपरिणामित्वेन स्वासाधारणाकारात् न चलति? न च्यवते इति अचलं तत एव ध्रुवं नित्यम् सन्नियम्य इन्द्रियग्रामं चक्षुरादिकम् इन्द्रियग्रामं सर्वस्वव्यापारेभ्यः सम्यक् नियम्य सर्वत्र समबुद्धयः सर्वत्र देवादिविषमाकारेषु देहेषु अवस्थितेषु आत्मसु ज्ञानैकाकारतया समबुद्धयः तत एव सर्वभूतहिते रताः सर्वभूताहितरतित्वात् निवृत्ताः? सर्वभूताहितरतित्वं हि आत्मनो देवादिविषमाकाराभिमाननिमित्तम्? ये एवम् अक्षरम् उपासते ते अपि मां प्राप्नुवन्ति एव। मत्समानाकारम् असंसारिणम् आत्मानं प्राप्नुवन्ति एव इत्यर्थः।मम साधर्म्यमागताः (गीता 14।2) इति वक्ष्यते श्रूयते च -- निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति (मु0 उ0 3।1।3) इति।तथा अक्षरशब्दनिर्दिष्टात् कूटस्थाद् अन्यत्वं परस्य ब्रह्मणो वक्ष्यते।कूटस्थोऽक्षर उच्यते। (गीता 15।16)उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः (गीता 15।17) इति। अथपरा यथा तदक्षरमधिगम्यते (मु0 उ0 1।1।5) इति अक्षरविद्यायां तु अक्षरशब्दनिर्दिष्टं परम् एव ब्रह्म? भूतयोनित्वाद् एव।

Sri Madhavacharya

13th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.

भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः? इतरेषां तु किं फलं इत्यत आह -- ये त्वित्यादिना। अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः -- अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चयः [ ] इति। ईश्वरस्तु देवशब्देनोक्तःदैवमन्ये परे [4।25] इत्यत्र। उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ -- नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् [ऋक्सं.8।7।18।1] इति। न महाभूतं नोपभूतं तदासीत् इत्याद्यारभ्य तम आसीत्तमसा गूढमग्रे [ऋक्सं.8।7।17।3] इति। तमो ह्यव्यक्तमजरमनिर्द्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः इति।सर्वगाऽचिन्त्यादिलक्षणा हि सा। तथाहि मोक्षधर्मे -- नारायणगुणाश्रयादजरामरादतीन्द्रियादग्राह्यादसम्भवतः। असत्यादहिंस्राल्ललामाद्वितीयप्रवृत्तिविशेषादवैरादक्षयादमरादक्षरादमूर्तितः। सर्वस्याः सर्वस्य सर्वकर्त्तुः,शाश्वततमसः [म.भा.12।342।6] इतिआसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः इति मानवे [1।5]।कूटस्थोऽक्षर उच्यते [15।16] वक्ष्यति इति। कूटे आकाशे स्थिता कूटस्था। आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता इति ह्यग्वेदखिलेषु। सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा विरजस्का इति सामवेदे गौपवनशाखायाम्।

Swami Sivananda

20th century CE · Integral Yoga

Integral Yoga

Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.

12.3 ये who? तु verily? अक्षरम् the imperishable? अनिर्देश्यम् the indefinable? अव्यक्तम् the unmanifested? पर्युपासते worship? सर्वत्रगम् the omnipresent? अचिन्त्यम् the unthinkable? च and? कूटस्थम् the unchangeable? अचलम् the immovable? ध्रुवम् the eternal.Commentary Anirdesyam That which cannot be actually shown or which cannot be defined -- the Akshaa or Satchidananda Para Brahman is beyond the reach of the mind and speech. Why can It not be defined Because It is unmanifested. It does not have the four alities of manifested beings? vi.z? Jati (caste such as Brahmana? Kshatriya? etc.)? Guna (attributes such as blueness? whiteness? tallness? shortness? etc.)? Kriya (reading? walking? etc.)? and Sambandha (like the relation between father and son).The unmanifest Incomprehensible by any of the organs of knowledge not manifest to any of the organs of knowledge.Upasana (worship) means sitting near. It is approaching the chosen ideal or object of worship by meditating on it? in accordance with the teachings of the scriptures and the spiritual preceptor? and dwelling steadily in the current of that one thought like a threat of oil poured from one vessel to another. It means continous and uninterrupted contemplation of God.The imperishable Brahman is omnipresent? pervading everything like the ether. It is unthinkable? because It is unmanifest. Whatever is visible to the senses can be thought of by the mind also. That which can be grasped by the organs of knowledge can be thought of by the mind also. But the Supreme Being is invisible to the senses and so cannot be grasped by the organs of knowledge and is? therefore? unthinkable. All thoughts of God ultimately lead the aspirant to iescent meditation.It is Kutastha (unchangeable). Kutastha means remaining like a mass or a heap. Therefore It is immutable and eternal. Just as the anvil remains unchanged though the ironpieces which are beaten on the anvil change their shape? so also Brahman is unchanging though the forms are changing. Hence Brahman is called Kutastha. Kuta also means a thing which appears to be good externally but which is full of evil within. Hence it refers to that seed of Samsara? viz.? ignorance? which is full of evil within and which is known as the Avyakrita (undifferentiated) in the Svetasvataropanishad (Mayam tu prakritim vidyat? Mayinam tu mahesvaram) and in the Gita (Mama maya duratyaya -- The illusion of Mine is hard to pierce -- VII.14). Another interpretation for Kutastha is that which is at the root of everything. He Who is seated in Maya as its witness? as its Lord? is Kutastha.Achalam Immovable? that which is free from change. Therefore the imperishable Brahman is Dhruvam? eternal. (Cf.VIII.21)

Swami Ramsukhdas

20th century CE · Gita Press Gorakhpur

Bhakti

Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.

व्याख्या--'तु'--यहाँ 'तु' पद साकार-उपासकोंसे निराकार-उपासकोंकी भिन्नता दिखानेके लिये आया है। 'संनियम्येन्द्रियग्रामम्'--'सम्' और 'नि'-- दो उपसर्गोंसे युक्त 'संनियम्य' पद देकर भगवान्ने यह बताया है कि सभी इन्द्रियोंको सम्यक् प्रकारसे एवं पूर्णतः वशमें करे, जिससे वे किसी अन्य विषयमें न जायँ। इन्द्रियाँ अच्छी प्रकारसे पूर्णतः वशमें न होनेपर निर्गुण-तत्त्वकी उपासनामें कठिनता होती है। सगुण-उपासनामें तो ध्यानका विषय सगुण भगवान् होनेसे इन्द्रियाँ भगवान्में लग सकती हैं; क्योंकि भगवान्के सगुण स्वरूपमें इन्द्रियोंको अपने विषय प्राप्त हो जाते हैं। अतः सगुण-उपासनामें इन्द्रिय-संयमकी आवश्यकता होते हुए भी इसकी उतनी अधिक आवश्यकता नहीं है, जितनी निर्गुण-उपासनामें है। निर्गुण-उपासनामें चिन्तनका कोई आधार न रहनेसे इन्द्रियोंका सम्यक् संयम हुए बिना (आसक्ति रहनेपर) विषयोंमें मन जा सकता है और विषयोंका चिन्तन होनेसे पतन होनेकी अधिक सम्भावना रहती है (गीता 2। 62 -- 63)। अतः निर्गुणोपासकके लिये सभी इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाते हुए सम्यक् प्रकारसे पूर्णतः वशमें करना आवश्यक है। इन्द्रियोंको केवल बाहरसे ही वशमें नहीं करना है? प्रत्युत विषयोंके प्रति साधकके अन्तःकरणमें भी राग नहीं रहना चाहिये; क्योंकि जबतक विषयोंमें राग है, तबतक ब्रह्मकी प्राप्ति कठिन है (गीता 15। 11)।

Sri Harikrishnadas Goenka

19th–20th century CE · Gita Press

Vaishnava

Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.

तो क्या दूसरे युक्ततम नहीं हैं यह बात नहीं? किंतु उनके विषयमें जो कुछ कहना है सो सुन --, परंतु जो पुरुष उस अक्षरकीजो कि अव्यक्त होनेके कारण शब्दका विषय न होनेसे किसी प्रकार भी बतलाया नहीं जा सकता इसलिये अनिर्देश्य है और किसी भी प्रमाणसे प्रत्यक्ष नहीं किया जा सकता इसलिये अव्यक्त है -- सब प्रकारसे उपासना करते हैं। उपास्य वस्तुको शास्त्रोक्त विधिसे बुद्धिका विषय बनाकर उसके समीप पहुँचकर तैलधाराके तुल्य समान वृत्तियोंके प्रवाहसे जो दीर्घकालतक उसमें स्थित रहना है? उसको उपासना कहते हैं -- उस अक्षरके विशेषण बतलाते हैं -- वह आकाशके समान सर्वव्यापक है और अव्यक्त होनेसे अचिन्त्य है क्योंकि जो वस्तु इन्द्रियादि करणोंसे जाननेमें आती है उसीका मनसे भी चिन्तन किया जा सकता है। परंतु अक्षर उससे विपरीत होनेके कारण अचिन्त्य और कूटस्थ है। जो वस्तु ऊपरसे गुणयुक्त प्रतीत होती हो और भीतर दोषोंसे भरी हो उसका नाम कूट है। संसारमें भी कूटरूप कूटसाक्ष्य इत्यादि प्रयोगोंमें कूट शब्द ( इसी अर्थमें ) प्रसिद्ध है। वैसे ही जो अविद्यादि अनेक संसारोंकी बीजभूत अन्तर्दोषोंसे युक्त प्रकृति मायाअव्याकृत आदि शब्दोंद्वारा कही जाती है एवं प्रकृतिको तो माया और महेश्वरको मायापति समझना चाहिये मेरी माया दुस्तर है इत्यादि श्रुतिस्मृतिके वचनोंमें जो माया नामसे प्रसिद्ध है? उसका नाम कूट है। उस कूट ( नामक माया ) में जो उसका अधिष्ठातारूपसे स्थित हो रहा हो उसका नाम कूटस्थ है। अथवा राशि -- ढेरकी भाँति जो ( कुछ भी क्रिया न करता हुआ ) स्थित हो उसका नाम कूटस्थ है। इस प्रकार कूटस्थ होनेके कारण जो अचल है और अचल होनेके कारण ही जो ध्रुव अर्थात् नित्य है ( उस ब्रह्मकी जो लोग उपासना करते हैं )।

Sri Anandgiri

13th century CE · Advaita

Advaita

Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).

वक्ष्यामस्तदुपरिष्टादित्युक्तं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति -- किमित्यादिना। पूर्वेभ्यः फलतो विशेषार्थस्तुशब्दः। अव्यक्तत्वमनिर्देश्यत्वे हेतुरित्याह -- अव्यक्तत्वादिति। यतोऽव्यक्तमतोऽनिर्देश्यमिति योजना। निरुपाधिकेऽक्षरे कथमुपासनेति पृच्छति -- उपासनमिति। शास्त्रतोऽक्षरं ज्ञात्वा तदुपेत्यात्मत्वेनोपगम्योपासते तथैव तिष्ठन्ति पूर्णचिदेकतानमक्षरमात्मानमेव सदा भावयन्तीत्येतदिह विवक्षितमित्याह -- यथेति। अव्यक्तत्वमेवाचिन्त्यत्वेऽपि हेतुरित्याह -- यद्धीति। कूटस्थशब्दस्योक्तार्थत्वं वृद्धप्रयोगतः साधयति -- कूटरूपमिति। आदिपदमनृतार्थम्। प्रकृते किं तदनृतं कूटशब्दितमित्याशङ्क्याह -- तथाचेति। उक्तरीत्या कूटशब्दस्यानृतार्थत्वे सिद्धे यदनेकस्य संसारस्य बीजं निरूप्यमाणं नानाविधदोषोपेतंतद्धेदं तर्ह्यव्याकृतं?मायां तुं प्रकृतिंमम माया इत्यादौ मायाशब्दिततया प्रसिद्धमविद्यादि तदिह कूटशब्दितमित्यर्थः। तत्रावस्थानं केन रूपेणेत्याशङ्कायामाह -- तदध्यक्षतयेति। कूटस्थशब्दस्य निष्क्रियत्वमर्थान्तरमाह -- अथवेति। पूर्वमुपजीव्यानन्तरविशेषणद्वयप्रवृत्तिमाह -- अतएवेति।

Sri Dhanpati

14th century CE · Vedanta

Advaita

Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.

निर्गुणोपासनस्य साक्षान्मोक्षहेतुत्वेनातिश्रैष्ठ्यं बोधयन् सुशकत्वेन सगुणोपासनस्य श्रेष्ठतां बोधयति -- येत्विति। तुशब्दो निर्विशेषोपासनस्य सविशेषोपासनफलत्वात्पूर्वेभ्यः श्रैष्ठ्यद्योतनार्थः। ये तु अक्षरं न क्षरत्यश्रुते वेत्यक्षरंएतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्नस्वमदीर्घमपूर्वमनपरम इत्यादिश्रुत्या सर्वधर्मशून्येत्वेन बोधितं ब्रह्मणो निर्विशेषं स्वरुपं लक्षयति। निर्देष्टुं न शक्यते। शब्दाप्रतिपाद्यमित्यर्थः। यतोऽव्यक्तं प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्न व्यज्यत इत्यवक्तं रुपादिभिः शब्दप्रवृत्तिनिमित्तैः संज्ञाजातिगुणक्रियासंबन्धैश्च रहितत्वादित्यर्थः। यतोऽनिर्देश्यमतोऽव्यक्तं रुपादिहीनमिति वा। अस्मिन्पक्षे हेतुहेतुमद्भावासामञ्जस्यमभिप्रेत्यायं पक्ष आचार्यैरुपेक्षिः। अव्यक्तत्वं कुत इत्य आह। सर्वत्रगं सर्वाधिष्ठानत्वात्सर्वस्मिन्नाकाशवद्य्वापकमतः केनापि प्रमाणेन परिच्छेत्तुमशक्यमव्यक्तमित्यर्थः। यद्वा ननु एं तर्हि शून्यत्वमेव ब्रह्मण आगतमिति तत्राह। सर्वत्रगं सर्वेषु व्यभिचरत्सु घटपटादिष्वव्यभिचरितसद्रूपेण व्यापकं सर्वस्य सत्तास्फूर्तिप्रदातुः शून्यत्वासंभवादिति भावः। अव्यक्तत्वादचिन्त्यं करणागोचरस्य मनसा चिन्तयितुमशक्यत्वात्। तथाच श्रुतिःयतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा मह इति। एतेन सर्वत्रगं चेत्यसर्वैः कुतो नावगम्यत इति शङ्का निरस्ता। सर्वप्रमाणापरिच्छेद्यस्यातिकुशलेनापि चिन्तयुतुमप्यशक्यस्य सर्वावगतिविषयताया दुरनिरस्तत्वात्। नन्वेवं चेत्तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि?दृश्यते त्वग्र्यया बुद्य्धा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः?मनसैवानुद्रष्टव्यं?आत्मा वारे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यःअनन्याश्चिन्तयन्तो मां?शास्त्रयोनित्वात् इत्यादिश्रुतिस्मृतिसूत्राणां का गतिरितिचेत्तत्राह। कूटस्थं दृश्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्योःअनन्याश्चिन्तयन्तो मां?शास्त्रयोनित्वात् इत्यादिश्रुतिस्मृतिसूत्राणां का गतिरितिचेत्तत्राह। कूटस्थं दृश्यमानगुणकमन्तर्दोषं वस्तु कूटशब्दप्रतिपाद्यम्। कूटरुपकं कोटसाक्ष्यं कूटकार्षापण इत्यादौ तथाभूते कूटशब्दस्य प्रयोगदर्शनात्।तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्?मायाचावित्या च स्वयमेव भवति?मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरं?तैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया इत्यादौ मायादिशब्दिततया प्रसिद्धमविद्यादि तदिहानेकसंसारबीजमन्तर्दोषं कूटशब्देन ग्राह्यम्। तस्मिन्कूटेऽध्यक्षतयाधिष्ठानतया तिष्ठतीति कूटस्थम्। भाष्येऽविद्यादीति आदिपदात् अहंकारदिकं ग्राह्यम्। तथाच ब्रह्मण्यारोपितस्याविद्यादेर्निवृत्तये उपचारेण निर्विशेषस्य शास्त्रविषयत्वमिति भावः। यद्वा अतएव राशिरिव स्थितं कुटस्थं निर्विकारण्। एतएवाचलं अध्यस्तस्याविद्यादेर्गुणदोषाभ्यां गुणदोषवत्त्वेन स्वस्वरुपान्न चलतीत्यचलमित्यर्थः। अतएव ध्रुवं नित्यम्। सदैकरसमिति यावत्। एतादृशं अक्षरं ये पर्युपासते परि समन्तादुपासते श्रवणमननाभ्यां उपास्यस्यार्थस्य विषयीकरणेन सामीप्यमुपगम्यानवच्छिन्नतैलधारावत्समानप्रत्ययप्रवाहेण दीर्घकालमासनं निदिध्यासनं कुर्वन्तीत्यर्थः।

Sri Neelkanth

17th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.

एवमुपासकांस्तुत्वा अव्यक्तविदां ज्ञानिनां दौर्लभ्यं श्लोकत्रयेणाह -- येत्विति। तुशब्दः सगुणाद्वैलक्षण्यार्थः। अक्षरंएतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम् इत्यादिश्रुत्या सर्वधर्मशून्यं निरूपितम्। अतएवानिर्देश्यं निर्देष्टुमशक्यं वाचा। अव्यक्तं च वाचामगोचरत्वाद्बुद्धेरप्यविषय इत्यर्थः। तथा च श्रुतिःयतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इति। ब्रह्मणो वाङ्मनसातीतत्वं दर्शयति। पर्युपासते सर्वप्रकारेणोपासते। उपासनमिहानात्मनामदर्शनमेव। यथोक्तंअनात्मादर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे इति। ननु तर्ह्येवंविधस्य शून्यकल्पस्य सत्त्वे किं मानमत आह -- सर्वत्रगमिति। सत्तारूपेण स्फुरणरूपेण च सर्वत्र गतम्। यत्सत्तया सर्वं सत्तावद्भवति कथं तस्यासत्त्वं वाच्यमिति भावः। नन्वेवं तार्किकाभिमतं सत्तासामान्यमुक्तं स्यात्। तद्धि घटः सन्पटः सन्निति सर्वत्रानुगतं दृश्यत इत्याशङ्क्याह -- अचिन्त्यमिति। सत्तासामान्यं हि प्रत्यक्षं तदपि ब्रह्मसत्तानुवेधेनैवात्मानं लभते न स्वतःसिद्धं सामान्यं सत् जातिः सती घटत्वं सदिति प्रत्ययात् सामान्यस्य। सदिति प्रत्ययागोचरत्वे तु तस्यासत्त्वापत्त्या पदार्थत्वमेव न स्यात्। तस्मात्सर्वाधिष्ठानभूतं ब्रह्मरूपादिहीनत्वाच्चिन्तयितुमशक्यं? दूरे तस्य सर्वगतत्वेन प्रत्यक्षगोचरत्वमित्यर्थः। ननु सत्सदिति प्रत्ययस्यान्यथाप्युपपत्तौ सत्तासामान्यवादिनं प्रति तेनाधिष्ठानभूतं ब्रह्म न साधयितुं शक्यमत आह -- कूटस्थमिति। वस्तुतोऽसदपि सदिवावभासमानं कूटम्। यथा कूटकार्षापणं कूटतुलेति तद्वत्कूटः अहंकारः प्रतीच्यभेदेन भासमानत्वे सति कादाचित्कत्वाद्यो यदभेदेन कदाचिद्भाति स तत्र मिथ्याकल्पितो यथा रज्जूरगस्तथा चायमहंकारो मिथ्यात्वात् कूटसंज्ञस्तत्र तिष्ठति तद्भासकत्वेनेति कूटस्थं चैतन्यम्। अहमनुभवे हि अहंकारो दृश्यतया भाति तद्भासकं च चैतन्यं ततोऽन्यत्। यथा घटभासकोऽर्को घटादन्यस्तद्वत्। एतेन नित्यापरोक्षत्वं ब्रह्मणः साधितम्। नन्वहमनुभव एवात्मविषयोऽतोऽहमर्थ एवात्मा न ततोऽन्य आत्मास्तीत्याशङ्क्याह -- अचलमिति। अहमर्थो हि सुखी दुःखी परिणाम्याविर्भावतिरोभावशीलश्चातश्चञ्चलः। आत्मा तु न तथा। तस्य तथात्वेऽनिर्मोक्षापत्तेः वह्न्यौष्ण्यवद्दुःखादिधर्मिण आत्यन्तिकदुःखनाशस्य मोक्षस्य धर्मिनाशमन्तरेणासंभवात्। घटे यावद्रूपनाशादर्शनात्। आत्मनस्तिरोभावे च जगदान्ध्यं प्रसज्येत। सुषुप्तावपि तत्रत्यसुखाज्ञानसाक्षित्वेनाविर्भूतस्वरूप एवात्मास्ति। अन्यथा सुप्तोत्थितस्य सुखमहमस्वाप्समिति परामर्शायोगात्। ननु सुषुप्तौ सन्नप्यात्मा न प्रकाशते तत्प्रकाशकस्य मनःसंयोगस्याभावात्। कर्त्रा व्याप्रियमाणं हि करणं क्रियां साधयति। न च सुषुप्तौ करणव्यापारोऽस्ति। तस्मान्न्यस्तवास्यस्तक्षेवात्मा सुषुप्तौ ज्ञानादिगुणहीनोऽप्रकाशमानोऽस्त्येवेत्याशङ्क्याह -- ध्रुवमिति। ननु आत्मा किं सत्तामात्रेणायस्कान्तवत्करणानि प्रवर्तयति उत व्यापाराविष्टः सन्। नाद्यः। इष्टापत्तेः। त्वन्मते च आत्मनः कर्तृत्वासिद्धेः। नान्त्यः। अनित्यत्वापत्तेः। व्यापारो हि स्पन्दः। स च परिच्छिन्नस्यैव युज्यते न विभोः। विभुत्वहाने चाणुत्वानभ्युपगमात्। मध्यमपरिमाणत्वे घटादिवदनित्यतापत्तिः। तस्माद्ध्रुवमप्रच्युतस्वभावमक्षरमित्यर्थः।

Sri Sridhara Swami

14th century CE · Advaita

Advaita

Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.

तर्हि इतरे किं न श्रेष्ठा इत्यत आह -- ये त्विति द्वाभ्याम्। ये त्वक्षरं पर्युपासते ध्यायन्ति तेऽपि मामेव प्राप्नुवन्तीति द्वयोरन्वयः। अक्षरस्य लक्षणमनिर्देश्यमित्यादि। अनिर्देश्यं शब्देन निर्देष्टुमशक्यम्? यतोऽव्यक्तं रूपादिहीनं? सर्वत्रगं सर्वव्यापि? अव्यक्तत्वादेवाचिन्त्यं कूटस्थं कूटे मायाप्रपञ्चे स्थितमधिष्ठानत्वेन स्थितम्? अचलं स्पन्दनरहितं? अतएव ध्रुवं नित्यम् वृद्ध्यादिरहितम्।

Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha

13th–14th century CE · Vishishtadvaita

Vishishtadvaita

Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.

अक्षरनिष्ठस्यापकर्षमाह -- ये त्वक्षरम् इत्यादिश्लोकत्रयेण। सर्वप्रकारनिर्देशनिषेधस्य स्ववचनविरोधादिदुष्टत्वाद्यथावस्थितस्वरूपे निषेध्यतया विवक्षितं निर्देशविशेषं सहेतुकमाहदेहादन्यतयेति। यद्यपि देहादन्यस्मिन्नपि देहिनि देहद्वारा देवादिशब्दाः प्रवर्तन्ते तथापि विविच्य निर्देष्टव्ये प्रकृतिसम्बन्धरहिते चापवृक्तात्मस्वरूपे तावत्तादृशवृत्तिरपि न सम्भवतीत्यभिप्रायः।तत एव देहादन्यतयैवेत्यर्थः। अत्यन्तानभिव्यक्तत्वविवक्षायांउपासते इति स्ववाक्येनापि विरोध इत्यभिप्रायेणाह -- चक्षुरादिकरणानभिव्यक्तमिति।सर्वत्रगम् इत्यत्राणुत्व श्रुतिविरोधपरिहारायाहदेवादिदेहेष्विति। यद्वा निषेध्यस्य चिन्त्यत्वस्य प्रसङ्गार्थंसर्वत्रगम् इत्युक्तमित्याह -- देवादिदेहेषु वर्तमानमपीति।तेन तेन रूपेणेति आत्मचिन्ताविधिविरोधाच्चिन्त्यमात्रनिषेधो न शक्यत इति भावः।तत एव कूटस्थमिति तत्तद्विलक्षणत्वादित्यर्थः। अनेकेषां सन्तन्यमानानां पुरुषाणां साधारणो हि पूर्वः पुरुषः कूटस्थः अत्र तु साधारण्यमात्रं लक्ष्यत इत्याहसर्वसाधारणमिति। एतेन कूटशब्दनिर्दिष्टमायाध्यक्षत्वं वा राशिवत्स्थितत्वं वा वदन्तः प्रसिद्धार्थपरित्यागादिभिर्निरस्ताः। अतः कूट इव निश्चलं वृद्धिक्षयादिरहितमित्यप्यत्र मन्दम्। नन्वेकदा सर्वसाधारणत्वमसिद्धं? कालभेदेन सर्वजातीयशरीरपरिग्रहेऽपि सर्वव्यक्तिपरिग्रहो नास्ति? अतः कथं सर्वसाधारणत्वमित्यत आहदेवादीति। नह्यसाधारणा देवत्वादय आत्मन्यव्यवधानेन सम्बध्यन्त इति भावः।उत्क्रान्त्यादिमतो जीवस्य स्पन्दनिषेधादेरनुपपन्नत्वादत्राचलशब्दविवक्षितमाह -- अपरिणामित्वेनेति। अनित्यत्वं हि परिणामेन व्याप्तम्। ततश्च व्यापकाभावाद्व्याप्याभावो विवक्षित इत्यपुनरुक्तिरित्याह -- तत एव ध्रुवमिति।उपासते [12।2] इत्यनेनैव मनोनियमनस्य सिद्धत्वात्तदुपयुक्तबाह्येन्द्रियव्यापारनियमनपरतया व्याचष्टेसम्यङ्नियम्येति।अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यपरिग्रहः [वि.ध.104।3बृ.ना.31।76] इत्यादिकमभिप्रेत्योक्तंसर्वत्रेति।शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः [5।18] इत्यादिकमभिप्रेत्यआत्मसु ज्ञानैकाकारतया समबुद्धय इत्युक्तम्।तत एव -- समबुद्धित्वादेव।य एवमक्षरमुपासते अक्षरशब्दवाच्यं प्रत्यगात्मानं प्राप्यतया निश्चित्य परमात्मानं तत्प्रापकतयोपासते।तेऽपीति मद्व्यतिरिक्तप्राप्यान्तरनिश्चयवन्तोऽपीत्यर्थः।मां प्राप्नुवन्त्येव -- विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता [वि.पु.6।7।61] इत्युक्तप्रकारेणअविभागेन दृष्टत्वात् [ब्र.सू.4।4।3] इत्यपृथक्सिद्धविशेषणभूतं मुक्तस्वरूपं मत्समानाकारं प्राप्नुवन्तीत्यर्थ इत्यर्थः।प्रमेयशरीरं साधीयः? यदि प्रमाणमुपलभामह इत्याशङ्क्य सोपबृंहणश्रुतिमुदाहरतिपरमं साम्यमुपैतीति। ननु अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते [मुं.उ.1।1।5]अक्षरमम्बरान्तधृतेः [ब्र.सू.1।3।10] इत्यादिषु परब्रह्मसाधारणतया प्रयुज्यमानमक्षरपदं कथं जीवात्मवाचकम् उच्यते अमृताक्षरं हरः [श्वे.उ.1।10]कूटस्थोऽक्षर उच्यते [15।16] इत्यादिषूक्तत्वादित्याहतथाक्षरशब्दनिर्दिष्टादित्यादिना।पञ्चविंशकमव्यक्तं षड्विंशः पुरुषोत्तमः। एतज्ज्ञात्वा विमुच्यन्ते यतयः शान्तबुद्धयः [य.स्मृ.] इत्युक्तप्रकारेणाव्यक्तजीवात्मासक्तचेतसां क्लेशस्त्वधिकतरः? मय्यावेशितचेतस्त्वाभावात्। अव्यक्तविषया मनोवृत्तिः सर्वेन्द्रियोपरतिरूपा। ननु देहवत्त्वं सनकादीनामपि सम्भवतीत्याशङ्क्यदेहात्माभिमानयुक्तैरित्युक्तम्।

Sri Abhinavgupta

10th–11th century CE · Kashmir Shaivism

Kashmir Shaivism

Supreme scholar of Kashmir Shaivism who interpreted the Gita through the non-dual Tantric lens.

येत्वित्यादि अवाप्यते इत्यन्तम्। ये पुनरक्षरं (S ये त्वक्षरम्) ब्रह्म उपास्ते आत्मानं [ तैरपि ] सर्वत्रगम् इत्यादिभिर्विशेषणैः आत्मनः सर्वे ईश्वरधर्मा आरोप्यन्ते। अतो ब्रह्मोपासका अपि मामेव यद्यपि यान्ति तथापि अधिकतरस्तेषां क्लेशः। आत्मनि किल अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकारोपं विधाय पश्चात्तमेव उपासते इति स्वतः सिद्धगुणग्रामगरिमणि ईश्वरे ( ईश्वरेऽपि) अयत्नसाध्ये स्थितेऽपि द्विगुणमायासं विन्दन्ति।

Sri Jayatritha

14th century CE · Dvaita Vedanta

Dvaita

A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.

एवं तर्हिमय्यावेश्य [12।2] इत्यनेनैव मदुपासका एवोत्तमा इति प्रश्नस्योत्तरं जातं? किमुत्तरेण वाक्येन इत्यत आह -- भवन्त्विति। आक्षेपगर्भोऽयमभ्युपगमः। न युक्तं त्वदुपासकानामेवोत्तमत्वमिति भावः। तदुपपादनाय पृच्छति -- इतरेषामिति। अव्यक्तोपासकानां किं फलं मोक्षोऽस्ति? न वा नोचेदुदाहृतवाक्यविरोधः। आद्ये कथं त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् फलसाम्यादिति भावः। नन्वेषां विशेषणानां ब्रह्मणोऽन्यत्रासम्भवात् कथमितरेषां किं फलं इत्यस्योत्तरत्वेन एतदवतार इत्यतोऽक्षराव्यक्तत्वयोर्मायायामुपपादितत्वात् तदन्यानि तत्रोपपादयन्ननिर्देश्यत्वं तावदुपपादयति -- अनिर्देश्यत्वं चेति शब्दागोचरम् धर्मस्य मम पादभङ्ग इत्यन्वयः। नन्वत्रापीश्वरोऽस्त्वनिर्देश्य इत्यत आह -- ईश्वरस्त्विति। दैवं पादभङ्गकारणमाहुः। तथा च पुनरुक्तिः स्यादिति भावः। न च दैवशब्दोऽदृष्टवाची। तस्यअपरे कर्म इति पृथगुक्तत्वात्। मायाया अनिर्देश्यत्वे स्पष्टं च प्रमाणमाह -- उक्तं चेति। महाभूतमाकाशवायुरूपम्। उपभूतं तेजोब्भूलक्षणम्। तदा प्रलये। अजरमित्यादिकं प्रलयेऽवस्थानस्योपपादकम्। नचैतत् ब्रह्मेति प्रदर्शनायएषा ह्येव प्रकृतिः इत्युदाहृतम्।इदानींसर्वत्रगं इत्यादिकं मायायामुपपादयितुमाह -- सर्वगेति। भावप्रधानो निर्देशः। स्वरूपवाची वा लक्षणशब्दः नारायणगुणस्तदिच्छादिलक्षण आश्रयो यस्य तत्तथोक्तम्। अनेन ब्रह्मणो व्यावृत्तिः। अजरादमरादिति जडप्रधानादेः? तस्य तत्प्राप्त्यभावात्। अग्राह्यान्मनसोऽप्यगोचरादित्यनेनाचिन्त्यमिति,सिद्ध्यति। असम्भवतोऽक्षयादक्षरादिति ध्रुवत्वसिद्धिः। असति प्रलये भवमसत्त्यम्। ललामं प्रधानम्। द्वितीया भगवदेकाधीना प्रवृत्तिर्विशेषो यस्य तत्तथा। अमूर्तितः प्राकृतदेहरहितात्। सर्वस्याः सर्वगाया इति छान्दसो लिङ्गव्यत्ययः? अनाद्यविद्याभिमानित्वात्। शाश्वततमसः पुरुषोऽभूदित्यन्वयः। इदं प्रसिद्धं तमो मायाख्यं प्रलये सर्वतः प्रसुप्तमिव निर्व्यापारमासीत्। अभूतमजातम्।अप्रज्ञातं इत्यादिना प्रत्यक्षानुमानागमवेद्यत्वाभाव उच्यते। अवेद्यलक्षणत्वादप्रतर्क्यम्। अनेन सर्वत्रगमचिन्त्यं ध्रुवमिति सिध्यति। गीतावाक्येन कूटस्थत्वं नित्यत्वं चेत् ध्रुवमिति पुनरुक्तिः। कूटमनृतं तिष्ठत्यस्मिन्नित्यसम्भवीत्यत आह -- कूट इति। कूटशब्दस्याकाशवाचित्वेऽभिधानं प्राक् पठितम्। तथापि दार्ढ्याय श्रुत्युदाहरणम्। श्रुत्यनुसारेण स्त्रीलिङ्गम्। सा सर्वगैत्युक्तार्थे स्पष्टं प्रमाणम्। निश्चला स्वपदादभ्रष्टा। विश्वं गतमाश्रितमस्यामिति विश्वगा। एतानि चोक्तविशेषणानि तदुपासनस्य मोक्षसाधनत्वाङ्गीकारसमर्थनार्थानीति ज्ञेयम्।

Sri Madhusudan Saraswati

16th century CE · Advaita

Advaita

Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.

निर्गुणब्रह्मविदपेक्षया सगुणब्रह्मविदां कोऽतिशयो येन त एव युक्ततमास्तएवाभिमता इत्यपेक्षायां तमतिशयं वक्तुं तन्निरूपकान्निर्गुणब्रह्मविदः प्रस्तौति द्वाभ्यां -- येत्वित्यादिना। येऽक्षरं मामुपासते तेऽपि मामेव प्राप्नुवन्तीति द्वितीयगतेनान्वयः। पूर्वेभ्यो वैलक्षण्यद्योतनाय तुशब्दः। अक्षरं निर्विशेषं ब्रह्म वाचक्नवीब्राह्मणे प्रसिद्धं तस्य समर्पणाय सप्त विशेषणानि। अनिर्देश्यं शब्देन व्यपदेष्टुमशक्यं। यतोऽव्यक्तं शब्दप्रवृत्तिनिमित्तैर्जातिगुणक्रियासंबन्धै रहितं जातिं गुणं क्रियां संबन्धं वा द्वारीकृत्य शब्दप्रवृत्तेर्निर्विशेषे प्रवृत्त्ययोगात् कुतो जात्यादिराहित्यमत आह -- सर्वत्रगमिति। सर्वत्रगं सर्वव्यापि सर्वकारणं अतो जात्यादिशून्यं परिच्छिन्नस्य कार्यस्यैव जात्यादियोगदर्शनात्? आकाशादीनामपि कार्यात्वाभ्युपगमाच्च। अतएवाचिन्त्यं शब्दप्रवृत्तेरिव मनोवृत्तेरपि न विषयः। तस्या अपि परिच्छिन्नविषयत्वात्यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इति श्रुतेः। तर्हि कथंतं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि इति?दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या इति च श्रुतिःशास्त्रयोनित्वात् इति सूत्रं च। उच्यते। अविद्याकल्पितसंबन्धेन शब्दजन्यायां बुद्धिवृत्तौ चरमायां परमानन्दबोधरूपे शुद्धे वस्तुनि प्रतिबिम्बितेऽविद्यातत्कार्ययोः कल्पितयोर्निवृत्त्युपपत्तेरुपचारेण विषयत्वाभिधानात्। अतस्तत्र कल्पितमविद्यासंबन्धं प्रतिपादयितुमाह -- कूटस्थमिति। कूटस्थं यन्मिथ्याभूतं सत्यतया प्रतीयते तत्कूटमिति लोकैरुच्यते। यथा कूटकार्षापणः कूटसाक्षित्वमित्यादौ। अज्ञानमपि मायाख्यं सहकार्यप्रपञ्चेन मिथ्याभूतमपि लौकिकैः सत्यतया प्रतीयमानं कूटं तस्मिन्नाध्यासिकेन संबन्धेनाधिष्ठानतया तिष्ठतीति कूटस्थमज्ञानतत्कार्याधिष्ठानमित्यर्थः। एतेन सर्वानुपपत्तिपरिहारः कृतः। अतएव सर्वविकाराणामविद्याकल्पितत्वात्तदधिष्ठानं साक्षिचैतन्यं निर्विकारमित्याह -- अचलमिति। अचलं चलनं विकारः अचलत्वादेव ध्रुवं अपरिणामि नित्यं एतादृशं शुद्धं ब्रह्म मां पर्युपासते श्रवणेन प्रमाणगतामसंभावनामपोद्य मननेन च प्रमेयगतामनन्तरं विपरीतभावनानिवृत्तये ध्यायन्ति। विजातीयप्रत्ययतिरस्कारेण तैलधारावदविच्छिन्नसमानप्रत्ययप्रवाहेण निदिध्यासनसंज्ञकेन ध्यानेन विषयीकुर्वन्तीत्यर्थः। कथं पुनर्विषयेन्द्रियसंयोगे सति विजातीयप्रत्ययतिरस्कारोऽत आह -- संनियम्येति। संनियम्य स्वविषयेभ्य उपसंहृत्येन्द्रियग्रामं करणसमुदायम्। एतेन शमदमादिसंपत्तिरुक्ता। विषयभोगवासनायां सत्यां कुत इन्द्रियाणां,ततो निवृत्तिस्तत्राह -- सर्वत्रेति। सर्वत्र विषये समा तुल्या हर्षविषादाभ्यां रागद्वेषाभ्यां च रहिता मतिर्येषाम्। सम्यग्ज्ञानेन तत्कारणस्याज्ञानस्यापनीतत्वाद्विषयेषु दोषदर्शनाभ्यासेन स्पृहाया निरसनाच्च ते सर्वत्र समबुद्धयः। एतेन वशीकारसंज्ञावैराग्यमुक्तं। अतएव सर्वत्रात्मदृष्ट्या हिंसाकारणद्वेषरहितत्वात्सर्वभूतहिते रताःअभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा इति मन्त्रेण दत्तसर्वभूताभयदक्षिणाः। कृतसंन्यासा इति यावत्।अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा संन्यासमाचरेत् इति स्मृते। एवंविधाः सर्वसाधनसंपन्नाः सन्तः स्वयं ब्रह्मभूता निर्विचिकित्सेन साक्षात्कारेण सर्वसाधनफलभूतेन मामक्षरं ब्रह्मैव ते प्राप्नुवन्ति। पूर्वमपि मद्रूपा एव सन्तोऽविद्यानिवृत्त्या मद्रूपा एव तिष्ठन्तीत्यर्थः।ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतिब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति इत्यादि श्रुतिभ्य इहापि चज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् इत्युक्तम्।

Sri Purushottamji

16th century CE · Vallabha Sampradaya

Shuddhadvaita

Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.

एवं स्वभक्तानामुत्तमत्वमुक्त्वा अक्षरोपासकानां स्वरूपमाह -- ये त्वक्षरमिति द्वयेन। ये तु? तुशब्देन स्वाभिमतत्वं निराकृतम् ये अनिर्देश्यं शब्दाविवेच्यं? अव्यक्तमप्रकटरूपं सर्वत्रगं ध्यानादिदशायामपि हृदयेऽस्थिरस्वभावम्। अतएव अचिन्त्यं चिन्तनायोग्यं रूपाद्यभावादस्थिरत्वाच्च? कूटस्थं प्रपञ्चाधिष्ठितम्? अचलं मच्चरणात्मकं अतएव ध्रुवं नित्यं एतादृशम् अक्षरम्।

Sri Vallabhacharya

15th–16th century CE · Shuddhadvaita

Shuddhadvaita

Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.

येत्विति। तुशब्दो भेदं द्योतयति। ये त्वक्षरमन्तर्यामिस्वरूपांशं पूर्वोक्तमनामरूपत्वादव्यक्तं गणितानन्दं बृहत्स्वरूपं पर्युपासते। स्वष्ट एव भेदः। अक्षरोऽव्यक्तः? अहं तु व्यक्तः। सोऽनिर्देश्यः? अहं तु स्वेच्छयाऽलौकिकनिर्देशार्हः। स सर्वत्रगः? अहं तु भक्तैकगम्यः। स चाचिन्त्यः अहं तु भक्तैश्चिन्त्यः। स तु कूटस्थः सर्वसाधारणः अहमसाधारणः। स त्वचलः स्थिरात्मा? अहं चलः तत्रतत्र विहरन् चलामि। स तु ध्रुवं पदरूपमैश्वर्यमध्यात्मं? अहं त्वीश्वरस्तन्निलयन इति। तदुपासका मां ब्रह्मानन्दात्मिकां श्रियमेव ध्रुवात्मानं वा मां प्राप्नुवन्ति।

Swami Gambirananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Advaita

Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.

12.3 Ye, those; tu, however; who, pari-upasate, meditate in every way; aksaram, on the Immutable; anirdesyam, the Indefinable-being unmanifest, It is beyond the range of words and hence cannot be defined; avyaktam, the Unmanifest-It is not comprehensible thrugh any means of knowledge-. Upasana, meditation, means approaching an object of meditation as presented by the scriptures, and making it an object of one's own thought and dwelling on it uniterruptedly for long by continuing the same current of thought with regard to it-like a line of pouring oil. This is what is called upasana. The Lord states the characteristics of the Immutable [Here Ast. adds 'upasyasya, which is the object of meditation'.-Tr.] : Sarvatragam, all-pervading, pervasive like space; and acintyam, incomprehensible-becuase of Its being unmanifest. For, whatever comes within the range of the organs can be thought of by the mind also. Being opposed to that, the Immutable is inconceivable. It is kutastham, changeless. Kuta means something apparently good, but evil inside. The word kuta (deceptive) is well known in the world in such phrases as, 'kuta-rupam, deceptive in appearance,' 'kuta-saksyam, false evidence', etc. Thus, kuta is that which, as ignorance etc., is the seed of many births, full of evil within, referred to by such words as maya, the undifferentiated, etc., and well known from such texts as, 'One should know Maya to be Nature, but the Lord of Maya to be the supreme God' (Sv. 4.10), 'The divine Maya of Mine is difficult to cross over' (7.14), etc. That which exists on that kuta as its controller (or witness) is the kuta-stha. Or, kutastha may mean that which exists like a heap [That is, motionless.]. Hence it is acalam, immovable. Since It is immovable, therefore It is dhruvam, constant, i.e. eternal.

Swami Adidevananda

20th century CE · Ramakrishna Mission

Vishishtadvaita

Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.

12.3 - 12.5 The individual self meditated upon by those who follow the path of the 'Aksara' (the Imperishable) is thus described: It cannot be 'defined' in terms indicated by expressions like gods and men etc., for It is different from the body; It is 'imperceptible' through the senses such as eyes; It is 'omnipresent and unthinkable,' for though It exists everywhere in bodies such as those of gods and others, It cannot be conceived in terms of those bodies, as It is an entity of an altogether different kind; It is 'common to all beings' i.e., alike in all beings but different from the bodily forms distinguishing them; It is 'immovable' as It does not move out of Its unie nature, being unmodifiable, and therefore eternal. Such aspirants are further described as those who, 'subduing their senses' like the eye from their natural operations, look upon all beings of different forms as 'eal' by virtue of their knowledge of the sameness of the nature of the selves as knowers in all. Therefore they are not given 'to take pleasure in the misfortune of others,' as such feelings proceed from one's identification with one's own special bodily form. Those who meditate on the Imperishable Principle (individual self) in this way, even they come to Me. It means that they also realise their essential self, which, in respect of freedom from Samsara, is like My own Self. So Sri Krsna will declare later on: 'Partaking of My nature' (14.2). Also the Sruti says: 'Untainted, he attains supreme eality' (Mun. U., 3.1.3). Likewise He will declare the Supreme Brahman as being distinct from the freed self which is without modification and is denoted by the term 'Imperishable' (Aksara), and is described as unchanging (Kutastha). 'The Highest Person is other than this Imperishable' (15.16 - 17). But in the teaching in Aksara-vidya 'Now that higher science by which that Aksara is known' (Mun. U., 1.5) the entity that is designated by the term Aksara is Supreme Brahman Himself; for He is the source of all beings, etc. Greater is the difficulty of those whose minds are attached to the unmanifest. The path of the unmanifest is a psychosis of the mind with the unmanifest as its object. It is accomplished with difficulty by embodied beings, who have misconceived the body as the self. For, embodied beings mistake the body for the self. The superiority of those who adore the Supreme Being is now stated clearly:

Frequently Asked Questions

What is Shankaracharya's commentary on BG 12.3?

ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम्? अव्यक्तत्वात् अशब्दगोचर इति न निर्देष्टुं शक्यते? अतः अनिर्देश्यम्? अव्यक्तं न केनापि प्रमाणेन व्यज्यत इत्यव्यक्तं पर्युपासते परि समन्तात् उपासते। उपासनं नाम यथाशास्त्रम् उपास्यस्य अर्थस्य विषयीकरणेन सामीप्यम् उपगम्य तैलधारावत् समानप्रत्ययप्रवाहेण दीर्घकालं यत् आसनम्? तत् उपासनमाचक्षते। अक्षरस्य विशेषणमाह उपास्यस्य -- सर्वत्रगं व्योमवत् व्यापि अचिन्त्यं च अव्यक्तत्वादचि

How many scholars have commented on this verse?

VaniSagar presents 18 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 12.3, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.

Which commentary is best for a beginner?

For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.

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