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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।शुभाशुभपरित्यागी भक्ितमान्यः स मे प्रियः

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar

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BengaliIND

যিনি আনন্দ করেন না, ঘৃণা করেন না, দুঃখও করেন না বা কামনা করেন না, ভাল-মন্দ উভয়ই ত্যাগ করেন এবং ভক্তিতে পূর্ণ তিনিই আমার প্রিয়।

KannadaIND

ಯಾರು ಸಂತೋಷಪಡುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ದ್ವೇಷಿಸುವುದಿಲ್ಲ, ದುಃಖಿಸುವುದಿಲ್ಲ ಅಥವಾ ಬಯಸುವುದಿಲ್ಲ, ಒಳ್ಳೆಯದು ಮತ್ತು ಕೆಟ್ಟದ್ದನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವವನು ಮತ್ತು ಭಕ್ತಿಯಿಂದ ತುಂಬಿರುವವನು ನನಗೆ ಪ್ರಿಯ.

TamilIND

எவன் மகிழ்ச்சியோ, வெறுக்கவோ, துக்கமோ, ஆசையோ இல்லாத, நன்மை தீமை இரண்டையும் துறந்து, பக்தி நிறைந்தவனே, எனக்குப் பிரியமானவன்.

PunjabiIND

ਜੋ ਨਾ ਅਨੰਦ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਨਫ਼ਰਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਨਾ ਹੀ ਉਦਾਸ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾ ਹੀ ਇੱਛਾਵਾਂ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਚੰਗੇ ਅਤੇ ਮਾੜੇ ਦੋਹਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਜੋ ਭਗਤੀ ਨਾਲ ਭਰਪੂਰ ਹੈ, ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਪਿਆਰਾ ਹੈ।

MarathiIND

जो आनंद करत नाही, द्वेष करत नाही, शोक करत नाही किंवा इच्छाही करत नाही, चांगल्या आणि वाईटाचा त्याग करतो आणि जो भक्तीने परिपूर्ण आहे, तो मला प्रिय आहे.

GujaratiIND

જે ન તો આનંદ કરે છે, ન દ્વેષ કરે છે, ન શોક કરે છે કે ન ઈચ્છે છે, સારા અને ખરાબ બંનેનો ત્યાગ કરે છે અને જે ભક્તિથી ભરપૂર છે તે મને પ્રિય છે.

TeluguIND

సంతోషించని, ద్వేషించని, దుఃఖించని, కోరుకోని, మంచి చెడులను త్యజించి, భక్తితో నిండినవాడు నాకు ప్రియమైనవాడు.

SindhiIND

جيڪو نه خوش ٿئي ٿو، نه نفرت ڪري ٿو، نه غمگين ٿو ۽ نه خواهش ڪري ٿو، جيڪو نيڪي ۽ بديءَ کي ڇڏي ڏئي ٿو ۽ جيڪو عقيدت سان ڀريل آهي، اهو مون کي پيارو آهي.

NepaliIND

जो न रमाउँछ, न घृणा गर्छ, न शोक गर्छ, न कामना गर्दछ, राम्रो र खराब दुवैलाई त्याग्छ, र जो भक्तिले पूर्ण छ, त्यो मलाई प्रिय छ।

MalayalamIND

സന്തോഷിക്കാത്തവനും വെറുക്കാത്തവനും ദുഃഖിക്കാത്തവനും ആഗ്രഹിക്കാത്തവനും നന്മതിന്മകളെ ത്യജിച്ച് ഭക്തി നിറഞ്ഞവനുമായവൻ എനിക്ക് പ്രിയപ്പെട്ടവനാണ്.

OdiaIND

ଯିଏ ଆନନ୍ଦ କରେ ନାହିଁ, ଘୃଣା କରେ ନାହିଁ, ଦୁ ieve ଖ କରେ ନାହିଁ କିମ୍ବା ଇଚ୍ଛା କରେ ନାହିଁ, ଉଭୟ ଭଲ ଏବଂ ମନ୍ଦ ତ୍ୟାଗ କରେ, ଏବଂ ଯିଏ ଭକ୍ତିରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ସେ ମୋ ପାଇଁ ପ୍ରିୟ ଅଟେ |

MizoIND

Lawm lo, huat lo, lungngai lo, duh lo, thil \ha leh \ha lo phatsan a, inpekna a khat chu Ka tan chuan a duh ber a ni.

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति'--मुख्य विकार चार हैं -- (1) राग, (2) द्वेष, (3) हर्ष और (4) शोक । सिद्ध भक्तमें ये चारों ही विकार नहीं होते। उसका यह अनुभव होता है कि संसारका प्रतिक्षण वियोग हो रहा है और भगवान्से कभी वियोग होता ही नहीं। संसारके साथ कभी संयोग था नहीं, है नहीं, रहेगा नहीं और रह सकता भी नहीं। अतः संसारकी कोई,स्वतन्त्र सत्ता नहीं है -- इस वास्तविकताका अनुभव कर लेनेके बाद (जडताका कोई सम्बन्ध न रहनेपर) भक्तका केवल भगवान्के साथ अपने नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव अटलरूपसे रहता है। इस कारण उसका अन्तःकरण राग-द्वेषादि विकारोंसे सर्वथा मुक्त होता है। भगवान्का साक्षात्कार होनेपर ये विकार सर्वथा मिट जाते हैं। साधनावस्थामें भी साधक ज्यों-ज्यों साधनमें आगे बढ़ता है, त्यों-ही-त्यों उसमें राग-द्वेषादि कम होते चले जाते हैं। जो कम होनेवाला होता है, वह मिटनेवाला भी होता है। अतः जब साधनावस्थामें ही विकार कम होने लगते हैं, तब सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सिद्धावस्थामें भक्तमें ये विकार नहीं रहते, पूर्णतया मिट जाते हैं। हर्ष और शोक -- दोनों राग-द्वेषके ही परिणाम हैं। जिसके प्रति राग होता है, उसके संयोगसे और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके वियोगसे 'हर्ष' होता है। इसके विपरीत जिसके प्रति राग होता है, उसके वियोग या वियोगकी आशङ्कासे और जिसके प्रति द्वेष होता है, उसके संयोग या संयोगकी आशङ्कासे 'शोक' होता है। सिद्ध भक्तमें राग-द्वेषका अत्यन्ताभाव होनेसे स्वतः एक साम्यावस्था निरन्तर रहती है। इसलिये वह विकारोंसे सर्वथा रहित होता है। जैसे रात्रिके समय अन्धकारमें दीपक जलानेकी कामना होती है; दीपक जलानेसे हर्ष होता है, दीपक बुझानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है और पुनः दीपक कैसे जले -- ऐसी चिन्ता होती है। रात्रि होनेसे ये चारों बातें होती हैं। परन्तु मध्याह्नका सूर्य तपता हो तो दीपक जलानेकी कामना नहीं होती, दीपक जलानेसे हर्ष नहीं होता, दीपक बुझानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध नहीं होता और (अँधेरा न होनेसे) प्रकाशके अभावकी चिन्ता भी नहीं होती। इसी प्रकार भगवान्से विमुख और संसारके सम्मुख होनेसे शरीरनिर्वाह और सुखके लिये अनुकूल पदार्थ, परिस्थिति आदिके मिलनेकी कामना होती है इनके मिलनेपर हर्ष होता है; इनकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचानेवालेके प्रति द्वेष या क्रोध होता है; और इनके न मिलनेपर 'कैसे मिलें' ऐसी चिन्ता होती है। परन्तु जिसको (मध्याह्नके सूर्यकी तरह) भगवत्प्राप्ति हो गयी है, उसमें ये विकार कभी नहीं रहते। वह पूर्णकाम हो जाता है। अतः उसको संसारकी कोई आवश्यकता नहीं रहती। 'शुभाशुभपरित्यागी'--ममता, आसक्ति और फलेच्छासे रहित होकर ही शुभ कर्म करनेके कारण भक्तके कर्म 'अकर्म' हो जाते हैं। इसलिये भक्तको शुभ कर्मोंका भी त्यागी कहा गया है। राग-द्वेषका सर्वथा अभाव होनेके कारण उससे अशुभ कर्म होते ही नहीं। अशुभ कर्मोंके होनेमें कामना, ममता, आसक्ति ही प्रधान कारण हैं, और भक्तमें इनका सर्वथा अभाव होता है। इसलिये उसको अशुभ कर्मोंका भी त्यागी कहा गया है।भक्त शुभ-कर्मोंसे तो राग नहीं करता और अशुभ-कर्मोंसे द्वेष नहीं करता। उसके द्वारा स्वाभाविक शास्त्रविहित शुभ कर्मोंका आचरण और अशुभ (निषिद्ध एवं काम्य) कर्मोंका त्याग होता है, राग-द्वेषपूर्वक नहीं। राग-द्वेषका सर्वथा त्याग करनेवाला ही सच्चा त्यागी है। मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते, प्रत्युत कर्मोंमें राग-द्वेष ही बाँधते हैं। भक्तके सम्पूर्ण कर्म राग-द्वेषरहित होते हैं, इसलिये वह शुभाशुभ सम्पूर्ण कर्मोंका परित्यागी है। 'शुभाशुभपरित्यागी' पदका अर्थ शुभ और अशुभ कर्मोंके फलका त्यागी भी लिया जा सकता है। परन्तु इसी श्लोकके पूर्वार्धमें आये 'न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति' पदोंका सम्बन्ध भी शुभ (अनुकूल) और अशुभ (प्रतिकूल) कर्मफलके त्यागसे ही है। अतः यहाँ 'शुभाशुभपरित्यागी' पदका अर्थ शुभाशुभ कर्मफलका त्यागी माननेसे पुनरुक्ति-दोष आता है। इसलिये इस पदका अर्थ शुभ एवं अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी ही मानना चाहिये। 'भक्तिमान्यः स मे प्रियः'-- भक्तकी भगवान्में अत्यधिक प्रियता रहती है। उसके द्वारा स्वतः-स्वाभाविक भगवान्का चिन्त, स्मरण, भजन होता रहता है। ऐसे भक्तको यहाँ 'भक्तिमान्' कहा गया है।भक्तका भगवान्में अनन्य प्रेम होता है? इसलिये वह भगवान्को प्रिय होता है। सम्बन्ध--अब आगेके दो श्लोकोंमें सिद्ध भक्तके दस लक्षणोंवाला पाँचवाँ और अन्तिम प्रकरण कहते हैं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, जो इष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं मानता? अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष नहीं करता? प्रिय वस्तुका वियोग होनेपर शोक नहीं करता और अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षा नहीं करता? ऐसा जो शुभ और अशुभ कर्मोंका त्याग कर देनेवाला भक्तिमान् पुरुष है वह मेरा प्यारा है।

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Sri Anandgiri

द्वेषहर्षादिराहित्यमपि ज्ञानिनो लक्षणमित्याह -- किञ्चेति। सर्वारम्भपरित्यागीत्यनेन विहितकाम्यत्यागस्योक्तत्वाद्विहितादन्यत्र मासङ्कोचीति विशिनष्टि -- शुभाशुभेति।

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Sri Dhanpati

किंच हर्षादिराहित्यमपि तत्त्वविदो विशेषणमित्याशयेनाह -- य इति। यत्तु एतमेव श्लोकं व्याचष्टे त्रिभिः श्लोकैर्य इति तुदपेक्ष्यम्। भाष्योक्तरीत्याऽपौनरुक्त्यसंभवे व्याख्यानव्याख्येयकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। यः इष्टप्राप्तौ न हृष्यति हर्ष न प्राप्नोति। अनिष्टप्राप्तौ न द्वेष्टि द्वेषं न करोति। अद्वेष्टा सर्वभूतानामित्यत्र सर्वभूतेषु सामान्यद्वेषाभावः स्वाभाविक उक्तः? अत्र त्वनिष्टप्राप्तौ तत्प्रत्युक्तद्वेषविशेषाभाव इत्यपौनक्त्यम्। प्रियवियोगे न शोचति शोकं मानसं तापं नाङ्गीकरोति। अप्राप्तं च न काङ्क्षति। शुभाशुभे पुण्यतापे कर्मणी परित्युक्तं शीलमस्येति तथा सर्वारम्भपरित्यागीत्यनेन वेदोक्तनित्यनैमित्तिककाम्यकर्मातिरिक्तसर्वारम्भपरित्यागीति सर्वपदसंकोचो माभूदित्यत उक्तं शुभाशुभपरित्यागीत्यनेन वेदोक्तनित्यनैमित्तिककाम्यकर्मातिरिक्तसर्वारम्भपरित्यागीति सर्वपदसंकोचो माभूदित्यत उक्तं शूभाशूभपरित्यागीति। भक्तिमान् यः स मे प्रियः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yaḥwho
naneither
hṛiṣhyatirejoice
nanor
dveṣhṭidespair
naneither
śhochatilament
nanor
kāṅkṣhatihanker for gain
śhubhaaśhubha
bhaktimān
yaḥwho
saḥthat person
meto me
priyaḥvery dear
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.18
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः

जो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 17
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।शुभाशुभपरित्यागी भक्ितमान्यः स मे प्रियः

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 17 का हिंदी अर्थ: "जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 17?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 17 translates to: "He who neither rejoices nor hates, nor grieves nor desires, renouncing both good and evil, and who is full of devotion, is dear to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।शुभाशुभपरित्यागी भक्ितमान्यः स मे प्" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 17 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yo na hṛiṣhyati na dveṣhṭi na śhochati na kāṅkṣhati" mean in English?

"yo na hṛiṣhyati na dveṣhṭi na śhochati na kāṅkṣhati" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 17. He who neither rejoices nor hates, nor grieves nor desires, renouncing both good and evil, and who is full of devotion, is dear to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.