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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। — VaniSagar

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BengaliIND

যিনি কামনা মুক্ত, শুদ্ধ, বিশেষজ্ঞ, উদ্বিগ্ন এবং বেদনামুক্ত, সমস্ত উদ্যোগ ও সূচনা ত্যাগ করে, যিনি আমার ভক্ত, তিনি আমার প্রিয়।

KannadaIND

ಆಸೆಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿ, ಶುದ್ಧನಾಗಿ, ಪರಿಣಿತನಾಗಿ, ಕಾಳಜಿಯಿಲ್ಲದ, ಮತ್ತು ನೋವಿನಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿ, ಎಲ್ಲಾ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ಪ್ರಾರಂಭಗಳನ್ನು ತ್ಯಜಿಸುವವನು, ನನಗೆ ಅರ್ಪಿತನಾದವನು ನನಗೆ ಪ್ರಿಯ.

MalayalamIND

ആഗ്രഹങ്ങളിൽ നിന്ന് മുക്തനും, ശുദ്ധനും, നിപുണനും, ഉത്കണ്ഠയില്ലാത്തവനും, വേദനയിൽ നിന്നും മുക്തനും, എല്ലാ പ്രവർത്തനങ്ങളെയും പ്രാരംഭങ്ങളെയും ത്യജിക്കുന്നവനും, എന്നിൽ അർപ്പിക്കുന്നവൻ എനിക്ക് പ്രിയപ്പെട്ടവനാണ്.

TamilIND

தேவைகள் இல்லாதவனும், தூய்மையானவனும், நிபுணனும், அக்கறையற்றவனும், வலியற்றவனும், எல்லா முயற்சிகளையும், துவக்கங்களையும் துறந்தவனும், என்னிடம் பக்தி கொண்டவனே எனக்குப் பிரியமானவன்.

SindhiIND

جيڪو خواهشن کان پاڪ، خالص، ماهر، بي پرواهه ۽ دردن کان آزاد آهي، سڀني ڪمن ۽ ڪمن کي ڇڏي، جيڪو مون کي وقف ڪري ٿو، اهو مون کي پيارو آهي.

TeluguIND

కోరికలు లేనివాడు, శుద్ధుడు, నిపుణుడు, శ్రద్ధ లేనివాడు మరియు బాధలు లేనివాడు, అన్ని కార్యాలను మరియు ప్రారంభాలను త్యజించేవాడు, నాకు అంకితమైనవాడు నాకు ప్రియమైనవాడు.

PunjabiIND

ਜੋ ਇੱਛਾਵਾਂ ਤੋਂ ਰਹਿਤ, ਸ਼ੁੱਧ, ਮਾਹਰ, ਬੇ-ਫਿਕਰ, ਅਤੇ ਦੁੱਖ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਹੈ, ਸਾਰੇ ਕਾਰਜਾਂ ਅਤੇ ਅਰੰਭਾਂ ਨੂੰ ਤਿਆਗ ਕੇ, ਜੋ ਮੈਨੂੰ ਸਮਰਪਿਤ ਹੈ, ਉਹ ਮੈਨੂੰ ਪਿਆਰਾ ਹੈ।

GujaratiIND

જે ઈચ્છાઓથી મુક્ત છે, શુદ્ધ છે, નિષ્ણાત છે, બેફિકર છે અને દુઃખમુક્ત છે, સર્વ ઉપક્રમો અને આરંભોનો ત્યાગ કરે છે, જે મને ભક્ત છે તે મને પ્રિય છે.

MarathiIND

जो वासनामुक्त, शुद्ध, निष्णात, चिंतारहित आणि दुःखमुक्त आहे, सर्व उपक्रम आणि आरंभांचा त्याग करणारा, जो माझी भक्ती करतो तो मला प्रिय आहे.

NepaliIND

जो इच्छारहित, शुद्ध, विज्ञ, चिन्तित, दु:खरहित, सबै कर्म र आरम्भ त्यागेर ममा समर्पित छ, त्यो मलाई प्रिय छ।

MizoIND

Thil mamawh laka fihlim, thianghlim, thiam, ngaihsak lo, hrehawmna nei lo, thil tih leh bul tanna zawng zawng kalsan, Ka tana inpe chu Ka tan chuan a hmangaih a ni.

AssameseIND

যিজন অভাৱৰ পৰা মুক্ত, বিশুদ্ধ, বিশেষজ্ঞ, অচিন্তিত আৰু যন্ত্ৰণামুক্ত, সকলো কাম আৰু আৰম্ভণি ত্যাগ কৰি, যি মোৰ প্ৰতি নিষ্ঠাবান, তেওঁ মোৰ প্ৰিয়।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अनपेक्षः'--भक्त भगवान्को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है। उसकी दृष्टिमें भगवत्प्राप्तिसे बढ़कर दूसरा कोई लाभ नहीं होता। अतः संसारकी किसी भी वस्तुमें उसका किञ्चिन्मात्र भी खिंचाव नहीं होता। इतना ही नहीं? अपने कहलानेवाले शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धिमें भी उसका अपनापन नहीं रहता, प्रत्युत वह उनको भी भगवान्का ही मानता है, जो कि वास्तवमें भगवान्के ही हैं। अतः उसको शरीर-निर्वाहकी भी चिन्ता नहीं होती। फिर वह और किस बातकी अपेक्षा करे? अर्थात् फिर उसे किसी भी वस्तुकी इच्छा-वासना-स्पृहा नहीं रहती। भक्तपर चाहे कितनी ही बड़ी आपत्ति आ जाय, आपत्तिका ज्ञान होनेपर भी उसके चित्तपर प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। भयंकर-से-भयंकर परिस्थितिमें भी वह भगवान्की लीलाका अनुभव करके मस्त रहता है। इसलिये वह किसी प्रकारकी अनुकूलताकी कामना नहीं करता। नाशवान् पदार्थ तो रहते नहीं, उनका वियोग अवश्यम्भावी है और अविनाशी परमात्मासे कभी वियोग होता ही नहीं --इस वास्तविकताको जाननेके कारण भक्तमें स्वाभाविक ही नाशवान् पदार्थोंकी इच्छा पैदा नहीं होती। यह बात खास ध्यान देनेकी है कि केवल इच्छा करनेसे शरीर-निर्वाहके पदार्थ मिलते हों तथा इच्छा न करनेसे न मिलते हों--ऐसा कोई नियम नहीं है। वास्तवमें शरीर-निर्वाहकी आवश्यक सामग्री स्वतः प्राप्त होती है; क्योंकि जीवमात्रके शरीर-निर्वाहकी आवश्यक सामग्रीका प्रबन्ध भगवान्की ओरसे पहले ही हुआ रहता है। इच्छा करनेसे तो आवश्यक वस्तुओंकी प्राप्तिमें बाधा ही आती है। अगर मनुष्य किसी वस्तुको अपने लिये अत्यन्त आवश्यक समझकर वह वस्तु कैसे मिले? कहाँ मिले? कब मिले?' -- ऐसी प्रबल इच्छाको अपने अन्तःकरणमें पकड़े रहता है, तो उसकी उस इच्छाका विस्तार नहीं हो पाता अर्थात् उसकी वह इच्छा दूसरे लोगोंके अन्तःकरणतक नहीं पहुँच पाती। इस कारण दूसरे लोगोंके अन्तःकरणमें उस आवश्यक वस्तुको देनेकी इच्छा या प्रेरणा नहीं होती। प्रायः देखा जाता है कि लेनेकी प्रबल इच्छा रखनेवाले-(चोर आदि) को कोई देना नहीं चाहता। इसके विपरीत किसी वस्तुकी इच्छा न रखनेवाले विरक्त त्यागी और बालककी आवश्यकताओंका अनुभव अपने-आप दूसरोंको होता है, और दूसरे उनके शरीर-निर्वाहका अपने-आप प्रसन्नतापूर्वक प्रबन्ध करते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि इच्छा न करनेसे जीवन-निर्वाहकी आवश्यक वस्तुएँ बिना माँगे स्वतः मिलती हैं। अतः वस्तुओंकी इच्छा करना केवल मूर्खता और अकारण दुःख पाना ही है। सिद्ध भक्तको तो अपने कहे जानेवाले शरीरकी भी अपेक्षा नहीं होती; इसलिये वह सर्वथा निरपेक्ष होता है। किसी-किसी भक्तको तो इसकी भी अपेक्षा नहीं होती कि भगवान् दर्शन दें! भगवान् दर्शन दें तो आनन्द, न दें तो आनन्द! वह तो सदा भगवान्की प्रसन्नता और कृपाको देखकर मस्त रहता है। ऐसे निरपेक्ष भक्तके पीछे-पीछे भगवान् भी घूमा करते हैं! भगवान् स्वयं कहते हैं -- निरेपक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः।। (श्रीमद्भा0 11। 14। 16) 'जो निरपेक्ष (किसीकी अपेक्षा न रखनेवाला), निरन्तर मेरा मनन करनेवाला, शान्त, द्वेष-रहित और सबके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है, उस महात्माके पीछे-पीछे मैं सदा यह सोचकर घूमा करता हूँ कि उसकी चरण-रज मेरे ऊपर पड़ जाय और मैं पवित्र हो जाऊँ।' किसी वस्तुकी इच्छाको लेकर भगवान्की भक्ति करनेवाला मनुष्य वस्तुतः उस इच्छित वस्तुका ही भक्त होता है; क्योंकि (वस्तुकी ओर लक्ष्य रहनेसे) वह वस्तुके लिये ही भगवान्की भक्ति करता है, न कि भगवान्के लिये। परन्तु भगवान्की यह उदारता है कि उसको भी अपना भक्त मानते हैं (गीता 7। 16); क्योंकि वह इच्छित वस्तुके लिये किसी दूसरेपर भरोसा न रखकर अर्थात् केवल भगवान्पर भरोसा रखकर ही भजन करता है। इतना ही नहीं, भगवान् भक्त ध्रुवकी तरह उस (अर्थार्थी भक्त) की इच्छा पूरी करके उसको सर्वथा निःस्पृह भी बना देते हैं। 'शुचिः'--शरीरमें अहंता-ममता (मैं-मेरापन) न रहनेसे भक्तका शरीर अत्यन्त पवित्र होता है। अन्तःकरणमें राग-द्वेष, हर्ष-शोक, काम-क्रोधादि विकारोंके न रहनेसे उसका अन्तःकरण भी अत्यन्त पवित्र होता है। ऐसे (बाहर-भीतरसे अत्यन्त पवित्र) भक्तके दर्शन, स्पर्श, वार्तालाप और चिन्तनसे दूसरे लोग भी पवित्र हो जाते हैं। तीर्थ सब लोगोंको पवित्र करते हैं; किन्तु ऐसे भक्त तीर्थोंको भी तीर्थत्व प्रदान करते हैं अर्थात् तीर्थ भी उनके चरण-स्पर्शसे पवित्र हो जाते हैं (पर भक्तोंके मनमें ऐसा अहंकार नहीं होता)। ऐसे भक्त अपने हृदयमें विराजित 'पवित्राणां पवित्रम्' (पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले) भगवान्के प्रभावसे तीर्थोंको भी महातीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं -- तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता।।(श्रीमद्भा0 1। 13। 10)महाराज भगीरथ गङ्गाजीसे कहते हैं -- साधवो न्यासिनः शान्ता ब्रह्मिष्ठा लोकपावनाः। हरन्त्यघं तेऽङ्गसङ्गात् तेष्वास्ते ह्यघभिद्धरिः।।(श्रीमद्भा0 9। 9। 6)'माता! जिन्होंने लोक-परलोककी समस्त कामनाओंका त्याग कर दिया है, जो संसारसे उपरत होकर अपने-आपमें शान्त हैं, जो ब्रह्मनिष्ठ और लोकोंको पवित्र करनेवाले परोपकारी साधु पुरुष हैं, वे अपने अङ्गस्पर्शसे तुम्हारे (पापियोंके अङ्ग-स्पर्शसे आये) समस्त पापोंको नष्ट कर देंगे; क्योंकि उनके हृदयमें समस्त पापोंका नाश करनेवाले भगवान् सर्वदा निवास करते हैं।' 'दक्षः'--जिसने करनेयोग्य काम कर लिया है, वही दक्ष है। मानव-जीवनका उद्देश्य भगवत्प्राप्ति ही है। इसीके लिये मनुष्यशरीर मिला है। अतः जिसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया अर्थात् भगवान्को प्राप्त कर लिया, वही वास्तवमें दक्ष अर्थात् चतुर है। भगवान् कहते हैं -- एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्।।(श्रीमद्भा0 11। 29। 22)'विवेकियोंके विवेक और चतुरोंकी चतुराईकी पराकाष्ठा इसीमें है कि वे इस विनाशी और असत्य शरीरके द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्य तत्त्वको प्राप्त कर लें।' सांसारिक दक्षता (चतुराई) वास्तवमें दक्षता नहीं है। एक दृष्टिसे तो व्यवहारमें अधिक दक्षता होना कलङ्क ही है; क्योंकि इससे अन्तःकरणमें जड पदार्थोंका आदर बढ़ता है, जो मनुष्यके पतनका कारण होता है।सिद्ध भक्तमें व्यावहारिक (सांसारिक) दक्षता भी होती है। परन्तु व्यावहारिक दक्षताको पारमार्थिक स्थितिकी कसौटी मानना वस्तुतः सिद्ध भक्तका अपमान ही करना है।'उदासीनः'--उदासीन शब्दका अर्थ है -- उत्आसीन अर्थात् ऊपर बैठा हुआ, तटस्थ, पक्षपातसे रहित।विवाद करनेवाले दो व्यक्तियोंके प्रति जिसका सर्वथा तटस्थ भाव रहता है, उसको उदासीन कहा जाता है। उदासीन शब्द निर्लिप्तताका द्योतक है। जैसे ऊँचे पर्वतपर खड़े हुए पुरुषपर नीचे पृथ्वीपर लगी हुई आग या बाढ़ आदिका कोई असर नहीं पड़ता, ऐसे ही किसी भी अवस्था, घटना, परिस्थिति आदिका भक्तपर कोई असर नहीं पड़ता, वह सदा निर्लिप्त रहता है।जो मनुष्य भक्तका हित चाहता है तथा उसके अनुकूल आचरण करता है, वह उसका मित्र समझा जाता है और जो मनुष्य भक्तका अहित चाहता है तथा उसके प्रतिकूल आचरण करता है? वह उसका शत्रु समझा जाता है। इस प्रकार मित्र और शत्रु समझे जानेवाले व्यक्तिके साथ भक्तके बाहरी व्यवहारमें फरक मालूम दे सकता है; परन्तु भक्तके अन्तःकरणमें दोनों मनुष्योंके प्रति किञ्चिन्मात्र भी भेदभाव नहीं होता। वह दोनों स्थितियोंमें सर्वथा उदासीन अर्थात् निर्लिप्त रहता है।भक्तके अन्तःकरणमें अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती। वह शरीरसहित सम्पूर्ण संसारको परमात्माका ही मानता है। इसलिये उसका व्यवहार पक्षपातसे रहित होता है।'गतव्यथः'--कुछ मिले या न मिले, कुछ भी आये या चला जाय, जिसके चित्तमें दुःख-चिन्ता-शोकरूप हलचल कभी होती ही नहीं, उस भक्तको यहाँ 'गतव्यथः' कहा गया है।यहाँ 'व्यथा' शब्द केवल दुःखका वाचक नहीं है। अनुकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें प्रसन्नता तथा प्रतिकूलताकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें खिन्नताकी जो हलचल होती है, वह भी 'व्यथा' ही है। अतः अनुकूलता तथा प्रतिकूलतासे अन्तःकरणमें होनेवाले राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि विकारोंके सर्वथा अभावको ही यहाँ 'गतव्यथः' पदसे कहा गया है। 'सर्वारम्भपरित्यागी'--भोग और संग्रहके उद्देश्यसे नयेनये कर्म करनेको 'आरम्भ' कहते हैं; जैसे -- सुखभोगके उद्देश्यसे घरमें नयी-नयी चीजें इकट्ठी करना, वस्त्र खरीदना; रुपये बढ़ानेके उद्देश्यसे नयीनयी दूकानें खोलना, नया व्यापार शुरू करना आदि। भक्त भोग और संग्रहके लिये किये जानेवाले मात्र कर्मोंका सर्वथा त्यागी होता है ।जिसका उद्देश्य संसारका है और जो वर्ण, आश्रम, विद्या, बुद्धि, योग्यता, पद, अधिकार आदिको लेकर,अपनेमें विशेषता देखता है, वह भक्त नहीं होता। भक्त भगवन्निष्ठ होता है। अतः उसके कहलानेवाले शरीर, इन्द्रि, मन, बुद्धि, क्रिया फल आदि सब भगवान्के अर्पित होते हैं। वास्तवमें इन शरीरादिके मालिक भगवान् ही हैं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्यमात्र भगवान्का है। अतः भक्त एक भगवान्के सिवाय किसीको भी अपना नहीं मानता। वह अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके द्वारा होनेवाले मात्र कर्म भगवान्की प्रसन्नताके लिये ही होते हैं। धन-सम्पत्ति, सुख-आराम, मान-बड़ाई आदिके लिये किये जानेवाले कर्म उसके द्वारा कभी होते ही नहीं।जिसके भीतर परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिकी ही सच्ची लगन लगी है, वह साधक चाहे किसी भी मार्गका क्यों न हो, भोग भोगने और संग्रह करनेके उद्देश्यसे वह कभी कोई नया कर्म आरम्भ नहीं करता।'यो मद्भक्तः स मे प्रियः' -- भगवान्में स्वाभाविक ही इतना महान् आकर्षण है कि भक्त स्वतः उनकी ओर खिंच जाता है, उनका प्रेमी हो जाता है।आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः।।(श्रीमद्भा0 1। 7। 10)'ज्ञानके द्वारा जिनकी चित्-जड-ग्रन्थि कट गयी है, ऐसे आत्माराम मुनिगण भी भगवान्की हेतुरहित (निष्काम) भक्ति किया करते हैं; क्योंकि भगवान्के गुण ही ऐसे हैं कि वे प्राणियोंको अपनी ओर खींच लेते हैं। यहाँ प्रश्न हो सकता है कि अगर भगवान्में इतना महान् आकर्षण है, तो सभी मनुष्य भगवान्की ओर क्यों नहीं खिंच जाते, उनके प्रेमी क्यों नहीं हो जाते? वास्तवमें देखा जाय तो जीव भगवान्का ही अंश है। अतः उसका भगवान्की ओर स्वतः-स्वाभाविक आकर्षण होता है। परन्तु जो भगवान् वास्तवमें अपने हैं, उनको तो मनुष्यने अपना माना नहीं और जो मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ शरीर-कुटुम्बादि अपने नहीं हैं, उनको उसने अपना मान लिया। इसीलिये वह शारीरिक निर्वाह और सुखकी कामनासे सांसारिक भोगोंकी ओर आकृष्ट हो गया तथा अपने अंशी भगवान्से दूर (विमुख) हो गया। फिर भी उसकी यह दूरी वास्तविक नहीं माननी चाहिये। कारण कि नाशवान् भोगोंकी ओर आकृष्ट होनेसे उसकी भगवान्से दूरी दिखायी तो देती है, पर वास्तवमें दूरी है नहीं; क्योंकि उन भोगोंमें भी तो सर्वव्यापी भगवान् परिपूर्ण हैं। परन्तु इन्द्रियोंके विषयोंमें अर्थात् भोगोंमें ही आसक्ति होनेके कारण उसको उनमें छिपे भगवान् दिखायी नहीं देते। जब इन नाशवान् भोगोंकी ओर उसका आकर्षण नहीं रहता, तब वह स्वतः ही भगवान्की ओर खिंच जाता है। संसारमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेसे भक्तका एकमात्र भगवान्में स्वतः प्रेम होता है। ऐसे अनन्यप्रेमी भक्तको भगवान् 'मद्भक्तः' कहते हैं।जिस भक्तका भगवान्में अनन्य प्रेम है, वह भगवान्को प्रिय होता है। सम्बन्ध--सिद्ध भक्तके पाँच लक्षणोंवाला चौथा प्रकरण आगेके श्लोकमें आया है।

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Sri Harikrishnadas Goenka

जो शरीर? इन्द्रिय? विषय और उनके सम्बन्ध आदि स्पृहाके विषयोंमें अपेक्षारहित -- निःस्पृह है? बाहरभीतरकी शुद्धिसे सम्पन्न है? और चतुर अर्थात् अनेक कर्त्तव्योंके प्राप्त होनेपर उनमेंसे तुरंत ही यथार्थ कर्त्तव्यको निश्चित करनेमें समर्थ है। तथा जो उदासीन अर्थात् किसी मित्र आदिका पक्षपात न करनेवाला संन्यासी है और गतव्यथ यानी निर्भय है। तथा जो समस्त आरम्भोंका त्याग करनेवाला है -- जो आरम्भ किये जायँ उनका नाम आरम्भ है? इसके अनुसार इस लोक और परलोकके फलभोगके लिये किये जानेवाले समस्त कामनाहेतुक कर्मोंका नाम सर्वारम्भ है? उन्हें त्यागनेका जिसका स्वभाव है ऐसा जो मेरा भक्त है वह मेरा प्यारा है।

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Sri Anandgiri

निरपेक्षत्वादिकमपि ज्ञानिनो विशेषणमित्याह -- अनपेक्ष इति। आदिपदमपेक्षणीयसर्वसंग्रहार्थं? प्रतिपत्तव्येषु प्रतिपत्तुं कर्तव्येषु कर्तुं चेत्यर्थः। परैस्ताडितस्यापि गता व्यथा भयमस्येति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह -- गतेति। नच क्षमीत्यनेन पौनरुक्त्यं प्रत्युत्पन्नायामपि व्यथायामपकर्तृष्वनपकर्तृत्वं क्षमित्वमित्यभ्युपगमात्।

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Sri Dhanpati

निरपेक्षत्वादिकमपि ज्ञानिनो विशेषणमित्याशयेनाह। अनपेक्षः देहेन्द्रियविषयसंबन्धेषु सर्वेष्वपेक्षणीयेषु यदृच्छायोपलब्धेष्वपेक्षाशून्यो निस्पृहः। शुचिः मृदम्ब्वादिनिमित्तेन बाह्येन दयादिनाभ्यन्तरेण च शौचने संपन्नः पुण्यापुण्याभ्यामलिप्य इति वा। अस्मिन्पक्षे प्रकरणाविरोधः। पुण्यापुण्ये न करोत्यस्ताभ्यामलिप्त इत्यर्थे तु शूभाशुभपरित्यागीत्येन पौनरुक्त्यं बोध्यम्। दक्षः प्रत्युत्पन्नेषु कर्तव्येषु यथावज्ज्ञातु कर्तुं न कुशलो नत्वलसः। कस्यचिन्मित्रादेः पक्षपातं न भजत इत्युदासीनः। यत्तु मानापमानादौ समवृत्तिरुदासीन इति तन्न। तथा मानापमानयोरित्यादिना पौनरुक्त्यापत्तेः। ताडितुमुद्यतादपि व्यथानिमित्तं गतं भयं यस्मात्। नच क्षमीत्यनेन पौनरुक्त्यं परैस्ताडितस्य प्रत्युत्पन्नायामापि पीडायां तन्निमित्तं ताडनकर्तृषु ताडनाद्यकर्तुत्वं क्षमित्वमित्यभ्युपगमात्। अतएवैहिकामुष्मकदुःखनिवृत्तितत्सुखप्राप्त्यर्थानि कर्माणि आरभ्यन्त इत्यारम्भास्तान् परियक्तुं शीलमस्य स सर्वारम्भपरित्यागी। यतो भयहेतुभूतसर्वारम्भपरित्यागी अतो गतव्यथ इति वा। यो मद्भक्तः स मे प्रियः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
anapekṣhaḥindifferent to worldly gain
śhuchiḥpure
dakṣhaḥskillful
udāsīnaḥwithout cares
gatavyathaḥ
sarvaārambha
parityāgīrenouncer
saḥwho
matbhaktaḥ
saḥhe
meto ne
priyaḥvery dear
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Bhagavad Gita · 12.15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः

जिससे किसी प्राणीको उद्वेग नहीं होता और जिसको खुद भी किसी प्राणीसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेगसे रहित है, वह मुझे प्रिय है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.17
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।शुभाशुभपरित्यागी भक्ितमान्यः स मे प्रियः

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 16
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 16
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः

जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 16 का हिंदी अर्थ: "जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 16?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 16 translates to: "He who is free from wants, pure, expert, unconcerned, and free from pain, renouncing all undertakings and commencements, he who is devoted to Me is dear to Me. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 16 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। जो आकाङ्क्षासे रहित, बाहर-भीतरसे पवित्र, दक्ष, उदासीन, व्यथासे रहित और सभी आरम्भोंका अर्थात् नये-नये कर्मोंके आरम्भका सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "anapekṣhaḥ śhuchir dakṣha udāsīno gata-vyathaḥ" mean in English?

"anapekṣhaḥ śhuchir dakṣha udāsīno gata-vyathaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 16. He who is free from wants, pure, expert, unconcerned, and free from pain, renouncing all undertakings and commencements, he who is devoted to Me is dear to Me. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.