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Sudarshana Chakra
Adhyay 12, Shlok 10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि

अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

BengaliIND

যদি আপনি এই অধ্যয়ন যোগ অনুশীলন করতে অক্ষম হন তবে আমার জন্য কর্ম করার জন্য অভিপ্রায় করুন; এমনকি আমার জন্য কর্ম করলেও তুমি পূর্ণতা পাবে।

KannadaIND

ನೀವು ಈ ಅಭ್ಯಾಸ ಯೋಗವನ್ನು ಅಭ್ಯಾಸ ಮಾಡಲು ಸಾಧ್ಯವಾಗದಿದ್ದರೆ, ನನ್ನ ಸಲುವಾಗಿ ಕಾರ್ಯಗಳನ್ನು ಮಾಡುವ ಉದ್ದೇಶದಿಂದಿರಿ; ನನ್ನ ಸಲುವಾಗಿ ಕ್ರಿಯೆಗಳನ್ನು ಮಾಡಿದರೂ ಸಹ, ನೀವು ಪರಿಪೂರ್ಣತೆಯನ್ನು ಪಡೆಯುತ್ತೀರಿ.

TamilIND

இந்த அபயாச யோகத்தைக் கூட உங்களால் பயிற்சி செய்ய முடியாவிட்டால், என் பொருட்டுச் செயல்களைச் செய்வதில் குறியாக இருங்கள்; என் பொருட்டுச் செயல்களைச் செய்தாலும், நீங்கள் முழுமையை அடைவீர்கள்.

MarathiIND

जर तुम्ही या अभ्यास योगाचा अभ्यास करू शकत नसाल, तर माझ्यासाठी कर्म करण्याचा संकल्प करा; माझ्यासाठी कर्म करूनही तुला सिद्धी प्राप्त होईल.

SindhiIND

جيڪڏهن توهان هن ابياس يوگا جي مشق ڪرڻ کان به قاصر آهيو، ته منهنجي خاطر عمل ڪرڻ جو ارادو ڪيو؛ منهنجي خاطر عمل ڪرڻ سان به تون ڪمال حاصل ڪندين.

TeluguIND

మీరు ఈ అభ్యాస యోగాన్ని కూడా ఆచరించలేనట్లయితే, నా కొరకు క్రియలు చేయాలనే ఉద్దేశ్యంతో ఉండండి; నా కొరకు చర్యలు చేయడం ద్వారా కూడా మీరు పరిపూర్ణతను పొందుతారు.

PunjabiIND

ਜੇਕਰ ਤੁਸੀਂ ਇਸ ਅਭਿਆਸ ਯੋਗ ਦਾ ਅਭਿਆਸ ਕਰਨ ਵਿੱਚ ਵੀ ਅਸਮਰੱਥ ਹੋ, ਤਾਂ ਮੇਰੇ ਲਈ ਕਰਮ ਕਰਨ ਦਾ ਇਰਾਦਾ ਰੱਖੋ; ਮੇਰੀ ਖ਼ਾਤਰ ਕਰਮ ਕਰਨ ਨਾਲ ਵੀ ਤੂੰ ਪੂਰਨਤਾ ਨੂੰ ਪਾ ਲਵੇਂਗਾ।

NepaliIND

यदि तिमी यो अभ्यास योगको अभ्यास गर्न असमर्थ छौ भने, मेरो लागि कर्म गर्ने मनस्थिति गर। मेरो लागि कर्म गरेर पनि सिद्धि प्राप्त हुनेछ।

MalayalamIND

നിങ്ങൾക്ക് ഈ അഭ്യാസ യോഗ പോലും പരിശീലിക്കാൻ കഴിയുന്നില്ലെങ്കിൽ, എനിക്കുവേണ്ടി കർമ്മങ്ങൾ ചെയ്യുന്നതിൽ ഉദ്ദേശിക്കുക. എനിക്കുവേണ്ടി കർമ്മങ്ങൾ ചെയ്താലും നിങ്ങൾ പൂർണത കൈവരിക്കും.

GujaratiIND

જો તમે આ અભ્યાસ યોગનો પણ અભ્યાસ કરી શકતા નથી, તો મારી ખાતર ક્રિયાઓ કરવાનો ઉદ્દેશ રાખો; મારા માટે કર્મ કરવાથી પણ તમે પૂર્ણતા પ્રાપ્ત કરશો.

BhojpuriIND

अगर रउआ एह अभ्यास योग के भी अभ्यास करे में असमर्थ बानी त हमरा खातिर कर्म करे के इरादा राखीं; हमरा खातिर कर्म कइला से भी रउरा सिद्धि के प्राप्ति करब।

ManipuriIND

ꯀꯔꯤꯒꯨꯝꯕꯥ ꯅꯍꯥꯛꯅꯥ ꯑꯚ꯭ꯌꯁ ꯌꯣꯒ ꯑꯁꯤ ꯐꯥꯑꯣꯕꯥ ꯄꯥꯡꯊꯣꯀꯄꯥ ꯉꯃꯗ꯭ꯔꯕꯗꯤ, ꯑꯩꯒꯤꯗꯃꯛꯇꯗꯤ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯅꯕꯥ ꯋꯥꯈꯜ ꯊꯥꯗꯣꯀꯎ; ꯑꯩꯒꯤꯗꯃꯛꯇꯗꯤ ꯊꯕꯛ ꯇꯧꯕꯗꯁꯨ ꯅꯈꯣꯌꯅꯥ ꯃꯄꯨꯡ ꯐꯥꯕꯥ ꯐꯪꯒꯅꯤ꯫

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव'-- यहाँ 'अभ्यासे' पदका अभिप्राय पीछेके (नवें) श्लोकमें वर्णित अभ्यासयोग से है। गीताकी यह शैली है कि पहले कहे हुए विषयका आगे संक्षेपमें वर्णन किया जाता है। आठवें श्लोकमें भगवान्ने अपनेमें मन-बुद्धि लगानेके साधनको नवें श्लोकमें पुनः 'चित्तं समाधातुम्' पदोंसे कहा अर्थात् 'चित्तम्' पदके अन्तर्गत मन-बुद्धि दोनोंका समावेश कर लिया। इसी प्रकार नवें श्लोकमें आये हुए अभ्यासयोगके लिये यहाँ (दसवें श्लोकमें) 'अभ्यासे' पद आया है।भगवान् कहते हैं कि अगर तू पूर्वश्लोकमें वर्णित अभ्यासयोगमें भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिये ही सम्पूर्ण कर्म करनेके परायण हो जा। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण कर्मों-(वर्णाश्रमधर्मानुसार) शरीरनिर्वाह और आजीविका-सम्बन्धी लौकिक एवं भजन, ध्यान, नाम-जप आदि पारमार्थिक कर्मों-) का उद्देश्य सांसारिक भोग और संग्रह न होकर एकमात्र भगवत्प्राप्ति ही हो। जो कर्म भगवत्प्राप्तिके लिये भगवदाज्ञानुसार किये जाते हैं, उनको 'मत्कर्म' कहते हैं। जो साधक इस प्रकार कर्मोंके परायण हैं, वे 'मत्कर्मपरम' कहे जाते हैं। साधकका अपना सम्बन्ध भी भगवान्से हो और कर्मोंका सम्बन्ध भी भगवान्के साथ रहे, तभी मत्कर्मपरायणता सिद्ध होगी। साधकका ध्येय जब संसार (भोग और संग्रह) नहीं रहेगा, तब निषिद्ध क्रियाएँ सर्वथा छूट जायँगी; क्योंकि निषिद्ध क्रियाओंके अनुष्ठानमें संसारकी 'कामना' ही हेतु है (गीता 3। 37)। अतः भगवत्प्राप्तिका ही उद्देश्य होनेसे साधककी सम्पूर्ण क्रियाएँ शास्त्रविहित और भगवदर्थ ही होंगी।'मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि' -- भगवान्ने जिस साधनकी बात इसी श्लोकके पूर्वार्धमें 'मत्कर्मपरमो भव' पदोंसे कही है, वही बात इन पदोंमें पुनः कही गयी है। भाव यह है कि केवल परमात्माका उद्देश्य होनेसे उस साधककी और जगह स्थिति हो ही कैसे सकती है?

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

( यदि तू ) अभ्यासमें भी असमर्थ है तो मेरे लिये कर्म करनेमें तत्पर हो -- मदर्थकर्मका नाम मत्कर्म है? उसमें तत्पर हो अर्थात् मेरे लिये कर्म करनेको ही प्रधान समझनेवाला हो। अभ्यासके बिना केवल मेरे लिये कर्म करता हुआ भी तू अन्तःकरणकी शुद्धि और ज्ञानयोगकी प्राप्तिद्वारा परमसिद्धि प्राप्त कर लेगा।

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Sri Anandgiri

द्वैताभिनिवेशादभ्यासाधीने योगेऽपि सामर्थ्याभावे पुनरुपायान्तरमाह -- अभ्यासेऽपीति। अभ्यासयोगेन विना भगवदर्थं कर्माणि कुर्वाणस्य किं स्यादित्याशङ्क्याह -- अभ्यासेनेति। सिद्धिर्ब्रह्मभावः। अपिरुक्तव्यवधिसूचनार्थः।

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Scripture Scholar

Sri Dhanpati

सर्वतश्चित्तमाहृत्यैकात्मालम्बने पुनः पुनः स्थापनेऽशक्तं प्रत्यपायान्तरमाह। अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि चेत् मदर्थमपि कर्म मत्प्रीत्यर्थं यत्कर्म तत्परमस्तत्प्रधानो भव। अभ्यासने विना मदर्थमपि केवलं कुर्वन् सिद्धिं ब्रह्मस्वभावं मोक्षं सत्त्वशुद्धियोगज्ञानप्राप्तिद्वारा प्राप्स्यसीत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
abhyāsein practice
apiif
asamarthaḥunable
asiyou
matkarma paramaḥ
bhavabe
matartham
apialso
karmāṇiwork
kurvanperforming
siddhimperfection
avāpsyasiyou shall achieve
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 12.9
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय

अगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 12.11
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्

अगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 12Shlok 10
Bhagavad Gita · Adhyay 12, Shlok 10
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि

अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 12 श्लोक 10 का हिंदी अर्थ: "अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Bhakti Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 10?

Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 10 translates to: "If you are unable to practice even this Abhyasa Yoga, be intent on doing actions for My sake; even by doing actions for My sake, you will attain perfection. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 12, श्लोक 10 है जो Bhagavad Gita के Bhakti Yoga में संकलित है। अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava" mean in English?

"abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 12 Verse 10. If you are unable to practice even this Abhyasa Yoga, be intent on doing actions for My sake; even by doing actions for My sake, you will attain perfection. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.