Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 11, Shlok 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः

जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

TeluguIND

చిమ్మటలు తమ వినాశనానికి దారితీస్తూ మండుతున్న అగ్నిలోకి త్వరత్వరగా పరుగెత్తుకొచ్చినట్లే, ఈ జీవులు కూడా తమ నాశనానికి దారితీస్తూ మీ నోటిలోకి త్వరపడతాయి.

GujaratiIND

જેમ શલભ ઉતાવળમાં સળગતી અગ્નિમાં ધસી આવે છે, જે તેમના પોતાના વિનાશ તરફ દોરી જાય છે, તેમ આ જીવો પણ તમારા મોંમાં ઉતાવળ કરે છે, જે તેમના પોતાના વિનાશ તરફ દોરી જાય છે.

PunjabiIND

ਜਿਵੇਂ ਕੀੜੇ ਜਲਦੀ ਨਾਲ ਬਲਦੀ ਅੱਗ ਵਿੱਚ ਭੱਜਦੇ ਹਨ, ਆਪਣੀ ਤਬਾਹੀ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਸੇ ਤਰ੍ਹਾਂ ਇਹ ਜੀਵ ਵੀ ਜਲਦੀ ਨਾਲ ਤੁਹਾਡੇ ਮੂੰਹ ਵਿੱਚ ਆਉਂਦੇ ਹਨ, ਆਪਣੀ ਤਬਾਹੀ ਵੱਲ ਲੈ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।

BengaliIND

পতঙ্গরা যেমন দ্রুত জ্বলন্ত আগুনে ছুটে যায়, নিজেদের ধ্বংসের দিকে নিয়ে যায়, তেমনি এই প্রাণীগুলোও তোমার মুখের দিকে তাড়াহুড়ো করে নিজেদের ধ্বংসের দিকে নিয়ে যায়।

MalayalamIND

നിശാശലഭങ്ങൾ ജ്വലിക്കുന്ന അഗ്നിയിലേക്ക് തിടുക്കത്തിൽ പാഞ്ഞുകയറുന്നതുപോലെ, സ്വന്തം നാശത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നതുപോലെ, ഈ ജീവികളും നിങ്ങളുടെ വായകളിലേക്ക് തിടുക്കപ്പെട്ട് അവയുടെ നാശത്തിലേക്ക് നയിക്കുന്നു.

TamilIND

அந்துப்பூச்சிகள் எரியும் நெருப்பில் விரைந்து செல்வது போல, தங்கள் அழிவுக்கு இட்டுச் செல்வது போல, இந்த உயிரினங்களும் உங்கள் வாய்க்குள் விரைந்து சென்று, தங்கள் அழிவுக்கு வழிவகுக்கும்.

KannadaIND

ಪತಂಗಗಳು ಆತುರದಿಂದ ಉರಿಯುತ್ತಿರುವ ಬೆಂಕಿಯೊಳಗೆ ನುಗ್ಗಿ, ತಮ್ಮ ವಿನಾಶಕ್ಕೆ ಕಾರಣವಾಗುವಂತೆ, ಈ ಜೀವಿಗಳು ನಿಮ್ಮ ಬಾಯಿಗೆ ಧಾವಿಸಿ, ಅವುಗಳ ನಾಶಕ್ಕೆ ಕಾರಣವಾಗುತ್ತವೆ.

SindhiIND

جيئن ڪيڏا تڪڙ ۾ ٻرندڙ باھ ۾ ڊوڙندا آھن، پنھنجي تباھيءَ ڏانھن، اھڙيءَ طرح ھي جاندار به جلدي تنھنجي وات ۾ گھڙندا آھن، پنھنجي تباھيءَ ڏانھن.

MarathiIND

जसे पतंग घाईघाईने धगधगत्या अग्नीकडे धाव घेतात, ज्यामुळे त्यांचा स्वतःचा नाश होतो, त्याचप्रमाणे हे प्राणीही तुमच्या तोंडात घाई करतात, ज्यामुळे त्यांचा स्वतःचा नाश होतो.

NepaliIND

जसरी पतंगहरू हतार-हतार ज्वालामुखी आगोमा दौडिन्छन्, जसले आफ्नै विनाशमा पुर्‍याउँछन्, त्यसरी नै यी प्राणीहरू पनि हतार-हतार तिम्रो मुखमा पस्छन्, जसले आफ्नै विनाशको दिशामा पुग्छन्।

OdiaIND

ଯେହେତୁ ପୋକମାନେ ଶୀଘ୍ର ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନିରେ ଦ rush ଡ଼ନ୍ତି, ଯାହା ସେମାନଙ୍କର ବିନାଶକୁ ନେଇଥାଏ, ସେହିପରି ଏହି ଜୀବମାନେ ମଧ୍ୟ ତୁମ ପାଟିରେ ଶୀଘ୍ର ଯାଇ ନିଜ ବିନାଶକୁ ନେଇଯାଆନ୍ତି |

MaithiliIND

जेना पतंग हड़बड़ा क' धधकैत आगि मे दौड़ैत अछि, जाहि सँ अपन विनाश भ' जाइत अछि, तहिना ई जीव सभ सेहो अहाँक मुँह मे हड़बड़ाइत अछि, जाहि सँ अपन विनाश भ' जाइत अछि ।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः--जैसे हरी-हरी घासमें रहनेवाले पतंगे चातुर्मासकी अँधेरी रात्रिमें कहींपर प्रज्वलित अग्नि देखते हैं, तो उसपर मुग्ध होकर (कि बहुत सुन्दर प्रकाश मिल गया, हम इससे लाभ ले लेंगे, हमारा अँधेरा मिट जायगा) उसकी तरफ बड़ी तेजीसे दौड़ते हैं। उनमेंसे कुछ तो प्रज्वलित अग्निमें स्वाहा हो जाते हैं; कुछको अग्निकी थोड़ी-सी लपट लग जाती है तो उनका उड़ना बंद हो जाता है और वे तड़पते रहते हैं। फिर भी उनकी लालसा उस अग्निकी तरफ ही रहती है! यदि कोई पुरुष दया करके उस अग्निको बुझा देता है तो वे पंतगे बड़े दुःखी हो जाते हैं कि उसने हमारेको बड़े लाभसे वञ्चित कर दिया! तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समुद्धवेगाः --भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही तत्परतापूर्वक लगे रहना और मनमें भोगों और संग्रहका ही चिन्तन होते रहना -- यह बढ़ा हुआ सांसारिक वेग है। ऐसे वेगवाले दुर्योधनादि राजालोग पंतगोंकी तरह बड़ी तेजीसे कालचक्ररूप आपके मुखोंमें जा रहे हैं अर्थात् पतनकी तरफ जा रहे हैं--चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि प्रायः मनुष्य सांसारिक भोग, सुख, आराम, मान, आदर आदिको प्राप्त करनेके लिये रात-दिन दौड़ते हैं। उनको प्राप्त करनेमें उनका अपमान होता है, निन्दा होती है, घाटा लगता है, चिन्ता होती है, अन्तःकरणमें जलन होती है और जिस आयुके बलपर वे जी रहे हैं, वह आयु भी समाप्त होती जाती है, फिर भी वे नाशवान् भोग और संग्रहकी प्राप्तिके लिये भीतरसे लालायित रहते हैं । सम्बन्ध--पीछेके दो श्लोकोंमें दो दृष्टान्तोंसे दोनों समुदायोंका वर्णन करके अब सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए विश्वरूप भगवान्के भयानक रूपका वर्णन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? सो कहते हैं --, जैसे पतंग -- पक्षीगण अपने नाशके लिये दौड़दौड़कर अत्यन्त वेगसे प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करते हैं? वैसे ही ( ये सब ) प्राणी भी नष्ट होनेके लिये दौड़दौड़कर अत्यन्त वेगके साथ आपके मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। जिनका वेग -- गति बढ़ी हुई हो? वे समृद्धवेग कहलाते हैं।,

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रवेशप्रयोजनं तत्प्रकारविशेषं चोदाहरणान्तरेण स्फोरयति -- ते किमर्थमित्यादिना।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अम्बुवेगाः समुद्रं विशन्ति नतु जलभावविनाशं प्राप्नुवन्ति। एते तु नाशाय प्रविशन्तीत्यतो दृष्टान्तान्तरमाह। यथा प्रदीप्तमग्निं पतङ्गाः क्षुद्रपक्षिविशेषाः समृद्धवेगा विनाशाय विशन्ति तथैव समृद्धवेगा लोकाः प्राणिनः तवापि मुखानि विनाशाय विशन्ति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
yathāas
pradīptamblazing
jvalanamfire
pataṅgāḥmoths
viśhantienter
nāśhāyato be perished
samṛiddha vegāḥwith great speed
tathā evasimilarly
nāśhāyato be perished
viśhantienter
lokāḥthese people
tavayour
apialso
vaktrāṇimouths
samṛiddhavegāḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 11.28
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति

जैसे नदियोंके बहुत-से जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं, ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 11.30
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो

आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हें चारों ओरसे बार-बार चाट रहे हैं और हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत् को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 11Shlok 29
Bhagavad Gita · Adhyay 11, Shlok 29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः

जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 29 का हिंदी अर्थ: "जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 29?

Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 29 translates to: "As moths hurriedly rush into a blazing fire, leading to their own destruction, so too these creatures hurry into Your mouths, leading to their own destruction. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशन्ति लोका स" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 11, श्लोक 29 है जो Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga में संकलित है। जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं, ऐसे ही ये सब लोग भी मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yathā pradīptaṁ jvalanaṁ pataṅgā" mean in English?

"yathā pradīptaṁ jvalanaṁ pataṅgā" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 29. As moths hurriedly rush into a blazing fire, leading to their own destruction, so too these creatures hurry into Your mouths, leading to their own destruction. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.