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Sudarshana Chakra
Adhyay 11, Shlok 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

NepaliIND

ब्रह्माण्ड विलयको आगोजस्तै डरलाग्दो दाँतले दन्किरहेको तिम्रो मुख देखेर, न चौतारी जान्दछु, न शान्ति पाउँछु। दया गर्नुहोस्, हे देवताहरूका स्वामी, हे ब्रह्माण्डको निवास।

SindhiIND

تنهنجي وات کي خوفناڪ ڏندن سان ٻرندڙ ڏندن جي باهه وانگر ٻرندڙ ڏٺا، مون کي نه چوٿون چوٿون ڄاڻن ٿيون ۽ نه ئي مون کي سڪون ملي ٿو. رحم ڪر، اي معبودن جا پالڻھار، اي ڪائنات جا مالڪ.

OdiaIND

ତୁମର ପାଟି ଭୟଭୀତ ହୋଇ ଦାନ୍ତରେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡର ନିଆଁ ପରି ଜଳୁଛି, ମୁଁ ଚାରି ଚତୁର୍ଥାଂଶ ଜାଣେ ନାହିଁ କି ଶାନ୍ତି ପାଏ ନାହିଁ | ହେ ଭଗବାନମାନଙ୍କର ପ୍ରଭୁ, ଦୟା କର, ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡର ବାସସ୍ଥାନ।

GujaratiIND

બ્રહ્માંડના વિસર્જનની અગ્નિની જેમ ભડકતા દાંતથી ભયભીત તમારા મુખને જોઈને, હું ચારેયને જાણતો નથી અને મને શાંતિ નથી મળતી. દયા કરો, હે દેવતાઓના ભગવાન, હે સૃષ્ટિના નિવાસસ્થાન.

MalayalamIND

പ്രപഞ്ച വിഘടനത്തിൻ്റെ അഗ്നിജ്വാലകൾ പോലെ ജ്വലിക്കുന്ന പല്ലുകളാൽ ഭയങ്കരമായ നിൻ്റെ വായ കണ്ടിട്ട്, ഞാൻ നാലഞ്ചുവരെ അറിയുന്നില്ല, സമാധാനം കണ്ടെത്തുന്നുമില്ല. ദൈവങ്ങളുടെ കർത്താവേ, പ്രപഞ്ചത്തിൻ്റെ വാസസ്ഥലമേ, കരുണയായിരിക്കണമേ.

KannadaIND

ಬ್ರಹ್ಮಾಂಡದ ವಿಸರ್ಜನೆಯ ಬೆಂಕಿಯಂತೆ ಹಲ್ಲುಗಳಿಂದ ಭಯಭೀತರಾಗಿರುವ ನಿನ್ನ ಬಾಯಿಗಳನ್ನು ನೋಡಿದ ನನಗೆ ನಾಲ್ಕು ಭಾಗಗಳು ತಿಳಿದಿಲ್ಲ, ಮತ್ತು ನನಗೆ ಶಾಂತಿ ಸಿಗುವುದಿಲ್ಲ. ಕರುಣಿಸು, ದೇವತೆಗಳ ಕರ್ತನೇ, ಬ್ರಹ್ಮಾಂಡದ ವಾಸಸ್ಥಾನವೇ.

MizoIND

Cosmic dissolution mei ang maia ha alh chhuak hlauhawm tak I hmui ka hmuh tawh avangin, a hmun li chu ka hre lo va, thlamuanna pawh ka hmu lo. Aw pathiante Lal, Khawngaihna nei rawh, Aw khawvel chenna.

ManipuriIND

ꯀꯣꯁ꯭ꯃꯤꯛ ꯗꯤꯁꯁꯜꯌꯨꯁꯅꯒꯤ ꯃꯩꯒꯨꯝꯅꯥ ꯍꯥꯀꯆꯥꯡꯁꯤꯡꯅꯥ ꯊꯜꯂꯕꯥ ꯅꯉꯒꯤ ꯃꯤꯠꯁꯤꯡ ꯑꯗꯨ ꯎꯔꯒꯥ ꯑꯩꯅꯥ ꯀ꯭ꯕꯥꯇꯔ ꯃꯔꯤ ꯑꯗꯨ ꯈꯉꯗꯦ, ꯁꯥꯟꯇꯤꯁꯨ ꯐꯪꯗꯦ꯫ ꯊꯧꯖꯥꯜ ꯄꯤꯕꯤꯌꯨ, ꯍꯦ ꯏꯁ꯭ꯕꯔꯒꯤ ꯃꯄꯨ, ꯍꯦ ꯃꯥꯂꯦꯃꯒꯤ ꯂꯩꯐꯝ꯫

TamilIND

பிரபஞ்சக் கலைப்பின் நெருப்பைப் போல பற்கள் எரிந்துகொண்டிருக்கும் உமது வாய்களைப் பார்த்து, நான் நான்கு பகுதிகளையும் அறியவில்லை, அமைதியைக் காணவில்லை. கருணை காட்டுங்கள், கடவுளின் இறைவனே, ஓ பிரபஞ்சத்தின் உறைவிடமே.

DogriIND

ब्रह्मांडीय विघटन दी अग्गें दे समान धधकदे दांतें कन्नै डरदे तेरे मुंह गी दिक्खदे होई मैं चार चौथाई नेईं जानदा ते ना गै मिगी शांति मिलदी ऐ। करुणा करो देवताओं के स्वामी, हे जगत के धाम।

BhojpuriIND

ब्रह्माण्डीय विघटन के आग नियर धधकत दाँत से भयभीत तोहार मुँह देख के हम चारो चौथाई ना जानत बानी, ना चैन पावेनी। दया कर देवां के स्वामी, हे जग के धाम।

BengaliIND

মহাজাগতিক বিগলনের আগুনের মতো জ্বলন্ত দাঁতে ভীত তোমার মুখ দেখে, আমি চতুর্ভুজ জানি না, শান্তিও পাই না। করুণা কর হে দেবতাদের প্রভু, হে বিশ্বজগতের বাসস্থান।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि'-- महाप्रलयके समय सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म करनेवाली जो अग्नि प्रकट होती है? उसे संवर्तक अथवा कालाग्नि कहते हैं। उस कालाग्निके समान आपके मुख है, जो भयंकर-भयंकर दाढ़ोंके कारण बहुत विकराल हो रहे हैं। उनको देखनेमात्रसे ही बड़ा भय लग रहा है। अगर उनका कार्य देखा जाय तो उसके सामने किसीका टिकना ही मुश्किल है। 'दिशो न जाने न लभे च शर्म'-- ऐसे विकराल मुखोंको देखकर मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो रहा है। इसका तात्पर्य है कि दिशाओंका ज्ञान होता है सूर्यके उदय और अस्त होनेसे। पर वह सूर्य तो आपके नेत्रोंकी जगह है अर्थात् वह तो आपके विराट्रूपके अन्तर्गत आ गया है। इसके सिवाय आपके चारों ओर महान् प्रज्वलित प्रकाश-ही-प्रकाश दीख रहा है (11। 12), जिसका न उदय और न अस्त हो रहा है। इसलिये मेरेको दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है और विकराल मुखोंको देखकर भयके कारण मैं किसी तरहका सुख और शान्ति भी प्राप्त नहीं कर रहा हूँ।'प्रसीद देवेश जगन्निवास'--आप सब देवताओंके मालिक हैं और सम्पूर्ण संसार आपमें ही निवास कर रहा है। अतः कोई भी देवता, मनुष्य भयभीत होनेपर आपको ही तो पुकारेगा! आपके सिवाय और किसको पुकारेगा? तथा और कौन सुनेगा? इसलिये मैं भी आपको पुकारकर कह रहा हूँ कि हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये।भगवान्के विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् मानो बड़े क्रोधमें आये हुए हैं। इस भावनाको लेकर ही भयभीत अर्जुन भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। सम्बन्ध --अब अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें मुख्य-मुख्य योद्धाओंका विराट्रूपमें प्रवेश होनेका वर्णन करते हैं।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

क्योंकि --, दाढ़ोंसे युक्त भयंकर -- विकराल आकृतिवाले और कालाग्निके समान अर्थात् प्रलयकालमें लोकोंको भस्मीभूत करनेवाली जो कालाग्नि है? उसके समान आपके मुखोंको देखकर मैं इन दिशाओंको पूर्व और पश्चिमके विवेकपूर्वक नहीं जानता हूँ अर्थात् मुझे दिग्भ्रम हो गया है। इसीसे ( आपके स्वरूपका दर्शन करते हुए भी ) मुझे विश्राम -- सुख नहीं मिल रहा है? सो हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।,

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

दृश्यमानेऽपि भगवद्देहे परितोषाद्यभावे कारणान्तरं प्रश्नपूर्वकमाह -- कस्मादिति। दृष्ट्वैवेत्येवकारेण प्राप्तिर्व्यावर्त्यते।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

दंष्ट्राभिः करानि विकृतानि प्रलयकालाग्निसदृशानि च दृष्टैव नतु प्राप्य दिशः पूर्वापरविवेकेन न जानामि। शर्म सुखं च न लभे अतो हे देवेश हे जगन्निवास? प्रसीद प्रसन्नो भव। तव देवेशत्वं जगन्निवासत्वं च प्रत्यक्षेण मयोपलब्धं यदर्थं मम प्रार्थना आसीदिति द्योतनार्थं संबोधनद्वयम्।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
danṣhṭrāteeth
karālāniterrible
chaand
teyour
mukhānimouths
dṛiṣhṭvāhaving seen
evaindeed
kālaanala
sannibhāniresembling
diśhaḥthe directions
nanot
jāneknow
nanot
labheI obtain
chaand
śharmapeace
prasīdahave mercy
devaīśha
jagatnivāsa
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 11.24
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो

हे विष्णो ! आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं, आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं, आपका मुख फैला हुआ है आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। ऐसे आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और शान्तिको प्राप्त नहीं हो रहा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 11.26
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथाऽसौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः

हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म, द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सब-के-सब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई-एक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 11Shlok 25
Bhagavad Gita · Adhyay 11, Shlok 25
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास

आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 11 श्लोक 25 का हिंदी अर्थ: "आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 25?

Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 25 translates to: "Having seen Thy mouths fearful with teeth blazing like the fires of cosmic dissolution, I know not the four quarters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म " — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 11, श्लोक 25 है जो Bhagavad Gita के Vishvarupa-Darsana Yoga में संकलित है। आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न होइये। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "danṣhṭrā-karālāni cha te mukhāni" mean in English?

"danṣhṭrā-karālāni cha te mukhāni" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 11 Verse 25. Having seen Thy mouths fearful with teeth blazing like the fires of cosmic dissolution, I know not the four quarters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.