Bhagavad Gita 10.9 — Commentary
19 Scholarly Commentaries · Advaita · Vishishtadvaita · Dvaita · Bhakti
Shankaracharya · Ramanuja · Madhvacharya · Chinmayananda · Sivananda · and more
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च
mach-chittā mad-gata-prāṇā bodhayantaḥ parasparam kathayantaśh cha māṁ nityaṁ tuṣhyanti cha ramanti cha
"With their minds and lives wholly absorbed in Me, they enlighten each other and ever speak of Me, being satisfied and delighted."
Scholar Commentaries (19)
Compare how different schools of Vedantic philosophy interpret this verse.
Sri Shankaracharya
8th century CE · Advaita Vedanta
The greatest Advaita philosopher, authored the definitive Sanskrit commentary (Bhasya) on the Gita.
,मच्चित्ताः? मयि चित्तं येषां ते मच्चित्ताः? मद्गतप्राणाः मां गताः प्राप्ताः चक्षुरादयः प्राणाः येषां ते मद्गतप्राणाः? मयि उपसंहृतकरणाः इत्यर्थः। अथवा? मद्गतप्राणाः मद्गतजीवनाः इत्येतत्। बोधयन्तः अवगमयन्तः परस्परम् अन्योन्यम्? कथयन्तश्च ज्ञानबलवीर्यादिधर्मैः विशिष्टं माम्? तुष्यन्ति च परितोषम् उपयान्ति च रमन्ति च रतिं च प्राप्नुवन्ति प्रियसंगत्येव।।ये यथोक्तैः प्रकारैः भजन्ते मां भक्ताः सन्तः --,
Sri Ramanuja
11th–12th century CE · Vishishtadvaita
Founder of Vishishtadvaita, emphasized Bhakti and the personal nature of Brahman.
मच्चित्ताः मयि निविष्टमनसः? मद्गतप्राणाः मद्गतजीविताः मया विना आत्मधारणम् अलभमाना इत्यर्थः। स्वैः स्वैः अनुभूतान् मदीयान् गुणान् परस्परं बोधयन्तः? मदीयानि दिव्यानि रमणीयानि कर्माणि च कथयन्तः तुष्यन्ति च रमन्ति च। वक्तारः तद्वचनेन अनन्यप्रयोजनेन तुष्यन्ति? श्रोतारश्च तच्छ्रवणेन अनवधिकातिशयप्रियेण रमन्ते।
Sri Madhavacharya
13th century CE · Dvaita Vedanta
Proponent of Dvaita philosophy emphasizing the eternal distinction between soul and God.
सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह -- अहमित्यादिना।
Swami Chinmayananda
20th century CE · Neo-Vedanta
Modern Vedantic teacher whose commentary bridges ancient wisdom with contemporary life.
जब मन सुगठित और एकाग्र होता है? तभी साधक उस मन के द्वारा परमात्मा का ध्यान सफलतापूर्वक कर सकता है। ध्येय से भिन्न विषय का विचार उठने पर यह एकाग्रता भंग हो जाती है। विद्युत् के सभी उपकरणों में विद्युत् शक्ति देखने? अथवा मिट्टी से बने घटों में मिट्टी को पहचानने में हमें कोई कठिनाई उत्पन्न नहीं होती अथवा कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता? क्योंकि उनका हमें दृढ़ ज्ञान होता है। इसी प्रकार? एक बार निश्चयात्मक रूप से यह जान लेने पर कि ईश्वर और जीव का वास्तविक स्वरूप एक चैतन्य आत्मा ही है? मन में किसी भी प्रकार की वृत्ति उठने पर भी सत्य के साधक को इस आत्मा का भान बनाये रखने में कोई कठिनाई नहीं होती। इस्ा आशय को यहाँ मच्चिता इस शब्द से स्पष्ट किया गया है।समस्त प्राणों अर्थात् इन्द्रियों को मुझमें अर्पित करके (मद्गतप्राणा) प्राण शब्द से केवल प्राणवायु से ही तात्पर्य नहीं समझना चाहिए। प्राणियों के शरीर में होने वाली पाचनादि क्रियाओं को प्राण शब्द से दर्शाया जाता है। किन्तु यहाँ इस शब्द का प्रयोग मुख्यत पाँच ज्ञानेन्द्रियों को सूचित करने के लिए किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही वे पाँच द्वार या वातायन हैं? जिनके द्वारा मन बाह्य विषयों में विचरण करता है और इनके माध्यम से ही जगत् के विषय मन में प्रवेश करते हैं। वेदान्त कभी भी इन विषयों से पलायन का उपदेश नहीं देता। इस जगत् में जीते हुए विषयों से पलायन कदापि सम्भव नहीं हो सकता। ज्ञानमार्ग विवेकपूर्ण विचार का मार्ग है। इसमें विवेक के द्वारा मन को इस प्रकार संयमित और प्रशिक्षित किया जाता है कि जब कभीभी बाह्य विषय मन पर अपना प्रभाव डालते हैं? तत्काल ही साधक को अपने उस आत्मस्वरूप का स्मरण हो जाता है? जिसके बिना वे विषय कभी प्रकाशित नहीं हो सकते थे।परस्पर चर्चा करते हुए किसी एक विषय में समान बौद्धिक रुचि के विद्यार्थीगण जब आपस में उस विषय की चर्चा करते हैं? तब न केवल वे अपने ज्ञान को स्पष्टत व्यक्त करते हैं? वरन् इस प्रक्रिया में उनका ज्ञान दृ88ढ़ निश्चयात्मक रूप भी ले लेता है जो प्रारम्भ में केवल पुस्तकीय ज्ञान ही था। परिसंवाद की इस सर्वविदित पद्धति का वेदान्त में अथक रूप से अनुमोदन एवं उपदेश दिया गया है। वेदान्त में इसका नाम है ब्रह्माभ्यास जो साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।अध्यात्म का सच्चा साधक वही है? जो अपने मन और इन्द्रियों की सभी प्रकार की क्रियाओं में आत्मा का स्मरण बनाये रखता है। इसका एक उपाय है आत्म विषय में अन्य साधकजनों के साथ चर्चा एवं निदिध्यासन। ऐसे साधक साधना के फलस्वरूप उस परम आनन्द को प्राप्त करते हैं? जो उनके जीवन रथ के चक्रों के लिए पथरीले मार्ग पर सरलता से अग्रसर होने के लिए चिकने तेल का काम करता है और यात्रा को सुगम बना देता है। तुष्यन्ति और रमन्ति के भाव को ही उपनिषदों में सुन्दर प्रकार से क्रीडन्ति और रमन्ति शब्दों के द्वारा इंगित किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ आश्वासन देते हैं कि पूर्णत्व का साधक जब विचार मार्ग पर अग्रसर होता है तब उसी समय उसे सन्तोष और रमण का अनुभव होता है। सन्तोष और आनन्द से मन में ऐसा सुन्दर वातावरण निर्मित होता है? जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यन्त अनुकूल बनकर साधक की सफलता निश्चित कर देता है। सदैव असन्तुष्ट? शोक मनाने वाले मानसिक स्तब्धता और बौद्धिक दरिद्रता का चित्र प्रस्तुत करने वाले साधक कदापि अपने इस परम आनन्दस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकते हैं।प्रगति की इस सीमा तक पहुँचने पर साधकों को कहाँ से मार्गदर्शन और बल मिलता है जिससे वे अपनी यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचते हैं इसका उत्तर है --
Swami Sivananda
20th century CE · Integral Yoga
Divine Life Society founder who synthesised Jnana, Bhakti, Karma, and Raja Yoga.
10.9 मच्चित्ताः with their minds wholly in Me? मद्गतप्राणाः with their life absorbed in Me? बोधयन्तः,enlightening? परस्परम् mutually? कथयन्तः speaking of? च and? माम् Me? नित्यम् always? तुष्यन्ति are satisfied? च and? रमन्ति (they) are delighted? च and.Commentary The characteristics of a devotee who has attained the realisation of oneness are described in this verse. The devotee constantly thinks of the Lord. His very life is absorbed in Him. He has consecrated his whole life to the Lord. According to another interpretation? all his senses (which function because of the Prana)? such as the eye are absorbed in Him. He takes immense delight in talking about Him? about His supreme wisdom? power? might and other attributes. He has completely dedicated himself to the Lord.He feels intense satisfaction and is delighted as if he is in the company of his Beloved (God). The Purana says? The sum total of the sensual pleasures of this world and also all the great pleasures of the divine regions (heavens) are not worth a sixteenth part of that bliss which proceeds from the eradication of desires and cravings. (Cf.XII.8)
Swami Ramsukhdas
20th century CE · Gita Press Gorakhpur
Prolific author and commentator whose Hindi commentaries are among the most widely read in India.
व्याख्या--[भगवान्से ही सब उत्पन्न हुए हैं और भगवान्से ही सबकी चेष्टा हो रही है अर्थात् सबके मूलमें परमात्मा है -- यह बात जिनको दृढ़तासे और निःसन्देहपूर्वक जँच गयी है, उनके लिये कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता। बस, उनका एक ही काम रहता है -- सब प्रकारसे भगवान्में ही लगे रहना। यही बात इस श्लोकमें बतायी गयी है।]
Sri Harikrishnadas Goenka
19th–20th century CE · Gita Press
Co-founder of Gita Press Gorakhpur whose translations shaped how millions of Hindus read scripture.
तथा --, मुझमें ही जिनका चित्त है वे मच्चित्त हैं तथा मुझमें ही जिनके चक्षु आदि इन्द्रियरूप प्राण लगे रहते हैं -- मुझमें ही जिन्होंने समस्त करणोंका उपसंहार कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं अथवा जिन्होंने मेरे लिये ही अपना जीवन अर्पण कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं। ऐसे मेरे भक्त आपसमें एक दूसरेको ( मेरा तत्त्व ) समझाते हुए एवं ज्ञान? बल और सामर्थ्य आदि गुणोंसे युक्त मुझ परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए सदा संतुष्ट रहते हैं अर्थात् संतोषको प्राप्त होते हैं और रमण करते हैं अर्थात् मानो कोई अपना अत्यन्त प्यारा मिल गया हो उसी तरह रतिको प्राप्त होते हैं।
Sri Anandgiri
13th century CE · Advaita
Pupil of Adi Shankaracharya's lineage who wrote important sub-commentaries (Tikas).
न केवमुक्तमेव भगवद्भजने साधनां साधनान्तरं चास्तीत्याह -- किञ्चेति। ईश्वरात्प्रतीचः प्रागुक्तादन्यत्र चित्तप्रचारराहित्यं भगवद्भजनोपायमाह -- मयीति। चक्षुरादीनां भगवत्यप्राप्तिस्तदगोचरत्वात्तस्येत्याशङ्क्याह -- मय्युपसंहृतेति। भगवदतिरेकेण जीवनेऽपि नादरस्तदपि मय्येवार्पितं भक्तानामित्याह -- अथवेति। आचार्येभ्यः श्रुत्वा वादकथया परस्परं भगवन्तं सब्रह्मचारिणो बोधयन्ति तदपि भगवद्भजनसाधनमित्याह -- बोधयन्त इति। आगमोपपत्तिभ्यां भगवन्तमेव विशिष्टधर्माणं शिष्येभ्यो गुरवो व्यपदिशन्ति तदपि भगवद्भजनमेवेत्याह -- कथयन्त इति। भक्तानां तुष्टिरती स्वरसतः स्यातामित्याह -- तुष्यन्तीति। मनोरथपूर्त्या रतिप्राप्तौ कामुकसंमतमुदाहरणमाह -- प्रियेति।
Sri Dhanpati
14th century CE · Vedanta
Disciple of Vidyaranya who authored important sub-commentaries on Vedantic texts.
किं चैवं भजन्तीत्याह -- मच्चित्ता मयि वासुदेवे चित्तं येषां ते मा गताः प्राप्ताः प्राणाश्र्चक्षुरादयो येषां ते मय्युपसंहृतसर्वकरणाः? सद्गतजीवना इति वा। आचार्यात् श्रुत्वा वादकथया समानेषु परस्परं बोधयन्तः मां ज्ञानबलादियुक्तं शिष्येभ्यः कथयन्तः मद्भजनेनैव तुष्यन्ति संतोषमुपयान्ति तेनैव च रमन्ति रतिं प्राप्नुवन्ति न स्त्र्यादिना।
Sri Neelkanth
17th century CE · Advaita
Wrote "Bhārata Bhāvadīpa", a verse-by-verse commentary on the Mahabharata including the Gita.
एवं ध्याने भावनाप्रकारमुक्त्वा व्युत्थाने तमाह -- मच्चित्ता इति। अहमेव चित्ते येषां ते मच्चित्ताः। तथाहमेव गतो विद्यमानो येषु ते मद्गतास्तथाविधाः प्राणा इन्द्रियाणि येषां ते मद्गतप्राणाः। चित्तेनेन्द्रियैर्वा यद्गृह्यते तत्सर्वं प्रत्यगात्मा वासुदेव इति भावयन्त इत्यर्थः। इममेवार्थं परस्परं बोधयन्तः श्रुतियुक्तिप्रदर्शनेन समानानां समुदायं ज्ञापयन्तः। कथयन्तश्च शिष्यान्प्रति। तुष्यन्ति तेनैव ज्ञानेन न तु मिष्टान्नादिना। रमन्ति च तत्रैव नतु स्त्र्यादावित्यर्थः।
Sri Sridhara Swami
14th century CE · Advaita
Authored "Subodhinī", widely praised for its clarity and depth across all Vedantic schools.
प्रीतिपूर्वकं भजनमेवाह -- मच्चित्ता इति। मय्येव चित्तं येषां ते मच्चित्ताः। मामेव गताः प्राप्ताः प्राणा इन्द्रियाणि येषां ते मद्गतप्राणाः मदर्पितजीवना इति वा। एवंभूतास्ते बुधाः अन्योन्यं मां न्यायोपेतैः श्रुत्यादिप्रमाणैर्बोधयन्तः? बुद्ध्या च मां कथयन्तः संकीर्तयन्तः सन्तो नित्यं तुष्यन्त्यनुमोदनेन तुष्टिं यान्ति। रमन्ति च निर्वृत्तिं यान्ति।
Sri Vedantadeshikacharya Venkatanatha
13th–14th century CE · Vishishtadvaita
Prolific philosopher-poet of Sri Vaishnavism who composed the "Tatparya Chandrika" on the Gita.
भावसमन्वितत्वप्रपञ्चनमेवानन्तरं क्रियत इत्यभिप्रायेण तदाकाङ्क्षां दर्शयतिकथमिति। भक्तिपरिपाकक्रमविशेषसिद्धाकारप्रदर्शनंमच्चित्ताः इत्यादिभिश्चतुर्भिर्विशेषणैः क्रियत इत्यभिप्रायेणमयि निविष्टमनस इत्यादिकमुक्तम्।मद्गतग्राणाः इत्यस्य तात्पर्यप्रदर्शनाय पर्यायं तावदाहमद्गतजीविता इति। भक्तगतस्य जीवितस्य कथं तद्गतत्वं इत्यत्राहमया विनेति। बोधनकथनशब्दयोरेकविषयत्वे पौनरुक्त्याद्विषयभेदो वाच्यः तत्र चबोधयन्तः इत्यनेन अज्ञातार्थज्ञापनंकथयन्तः इत्यनेन च इति वृत्तवर्णनं च स्वरसतः प्रतीयत इत्यभिप्रायेणस्वैः स्वैरित्यादिकमुक्तम्।दिव्यानीत्यतिमानुषत्वप्रयुक्ताद्भुतत्वं विवक्षितम्। तस्यैव भोग्यत्वंरमणीयानीत्यनेनोक्तम्।तुष्यन्ति च रमन्ति च इत्यनयोर्द्वयोरपि कथाकथकविषयत्वेनातिभिन्नार्थतायां मन्दप्रयोजनत्वात्कस्यचित्कथकविषयत्वमन्यस्य कथनाक्षिप्तश्रोतृविषयत्वं च युक्तम् तत्र च स्वप्रयोजनान्तरसाधकपरप्रीत्यर्थं हि लोके कथाप्रयोगो दृष्टः। तोषशब्दश्चाधिकस्पृहानिवृत्त्यर्थः ततोऽत्रतुष्यन्ति इत्यनन्यप्रयोजनकथकविषयम्? पारिशेष्यात्रमन्ति इत्यस्य श्रवणमूलत्वं लब्धम्।तुष्यन्ति च रमन्ति च इत्यनयोःमच्चित्ताः इत्याद्युक्तैककर्तृकत्वं कथनश्रवणयोरेकस्मिन्नेव कालभेदेन सम्भवान्न परित्यक्तम्। तदेतदखिलमभिप्रेत्याहवक्तार इत्यादिरमन्त इत्यन्तम्।
Sri Jayatritha
14th century CE · Dvaita Vedanta
A pre-eminent Dvaita scholar who wrote decisive commentaries defending Madhvacharya's views.
ननुएतां विभूतिम् [10।7] इति परिज्ञातुः फलमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यतस्तात्पर्यान्तरमाह -- सन्ति चेति। उक्तफले विश्वासजननार्थमिति शेषः।
Sri Madhusudan Saraswati
16th century CE · Advaita
Wrote "Gudhartha Dipika", a celebrated commentary reconciling Advaita and Bhakti.
प्रेमपूर्वकं भजनमेव विवृणोति -- मयि भगवति चित्तं येषां ते मच्चित्ताः। तथा मद्गता मां प्राप्ताः प्राणाश्चक्षुरादयो येषां ते मद्गतप्राणाः? मद्भजननिमित्तचक्षुरादिव्यापारा मय्युपसंहृतसर्वकरणा वा। अथवा मद्गतप्राणा मद्भजनार्थजीवनाः। मद्भजनातिरिक्तप्रयोजनशून्यजीवना इति यावत्। विद्वद्गोष्ठीषु परस्परमन्योन्यं श्रुतिभिर्युक्तिभिश्च मामेव बोधयन्तः तत्त्वबुभुत्सुकथया ज्ञापयन्तः। तथा स्वशिष्येभ्यश्च मामेव कथयन्त उपदिशन्तश्च। मयि चित्तार्पणं तथा बाह्यकरणार्पणं तथा जीवनार्पणमेवं समानामन्योन्यं मद्बोधनं स्वन्यूनेभ्यश्च मदुपदेशनमित्येवंरूपं यन्मद्भजनं तेनैव तुष्यन्ति च। एतावतैव लब्धसर्वार्था वयमलमन्येन लब्धव्येनेत्येवंप्रत्ययरूपं संतोषं प्राप्नुवन्ति च। तेन संतोषेण रमन्ति च रमन्ते च। प्रियसङ्गमेनेवोत्तमं सुखमनुभवन्ति च। तदुक्तं पतञ्जलिनासंतोषादनुत्तमः सुखलाभः इति। उक्तंच पुराणेयच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् इति। तृष्णाक्षयः संतोषः।
Sri Purushottamji
16th century CE · Vallabha Sampradaya
Son of Sri Vallabhacharya, who continued the Pushti Marg tradition of Gita exposition.
भजने प्रकारमाह -- मच्चित्ता इति। मय्येव चित्तं येषां ते मच्चिन्तनपराः लीलावस्थमत्स्वरूपविचारणपराः। मद्गतप्राणाः मय्येव गताः प्राप्ताः प्राणा येषां ते? मद्दुःखदुःखिता मत्सुखसुखिता इत्यर्थः। तादृशाः सन्तः परस्परं तादृशानेव मामेतादृशं स्वानुभवप्रमाणादिभिर्बोधयन्तस्तदनुकथयन्तः कीर्तनरीत्या कीर्तयन्तः। चकारेणाऽन्यकीर्त्तनं श्रृण्वन्तः। च पुनः। तद्भाने सति तुष्यन्ति ज्ञानेन वा रमन्ते च। स्वयं कीर्त्तनेनानन्दयुक्ता भवन्ति रमन्ते वा। तोषमानन्दं च प्राप्नुवन्तीति भावः। यद्वा मां विप्रयोगादिलीलावस्थासु नित्यं कथयन्तः सततं परस्परं बोधयन्तः।
Sri Vallabhacharya
15th–16th century CE · Shuddhadvaita
Founded the Pushti Marg devotional tradition, focused on Krishna as the Supreme Being.
विभूतियोगज्ञानविपाकरूपभक्तिविवृद्धिं दर्शयति चतुर्भिः पुमर्थरूपैः अहमित्यादिभिः -- अहं सर्वस्य प्रभव इत्यादि। विश्वोत्पादकत्वप्रवर्त्तकत्वरूपस्वयोगविभूतिस्वरूपाविष्करणं इत्येवं मम योगं विभूतिं च भगवन्मार्गीयाचार्योपदेशद्वारा मयि भावो भक्तिस्तया समन्विता मां सेवन्ते बुधाः। एते च माहात्म्यज्ञानपूर्वकभक्तिमन्तो भगवत्सेवकाः स्वरूपतो निर्दिश्यन्ते भगवन्मार्गीया उद्धवादय इव। मच्चित्ता इति मदर्पितान्तःकरणाः। मद्गतप्राणा इति -- प्राणशब्द इन्द्रियप्राणवाचक इति मदर्पितेन्द्रियप्राणाः मयि सततं युक्ता देहेनेति? समर्पितदेहाः आत्मना वा भगवति सततं युक्ताः अयमेव ब्रह्मसम्बन्धः भगवते कृष्णाय दारागारपुत्राप्त -- इतिवाक्यात्आत्मना सह तत्तदीहापराणि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि तद्धर्मांश्च समर्पयित्वा स्वयं दासभूता नित्यं भगवन्तं भजन्ते सेवामार्गप्रकारेण सेवन्ते? न पूजाडम्बरेणेति? सेवायां स्थितिस्तेषामुक्तासेवायां वा कथायां वा इति भक्तिवर्द्धिन्यां कथायां च स्थितिमाह -- परस्परं बोधयन्तः कथयन्तश्च मां इति। तदपि नित्यं? न तु नैमित्तिकम्। तथैव च तुष्यन्ति मनउत्सवादिषु च रमन्ति अनुकरणेन वा क्री़डन्ति तथाभूतानां तेषां प्रीतिपूर्वकं पुष्टिमर्यादानुकूलापरानुरक्तिरीश्वरे सर्वात्मना प्रीतिस्तत्पूर्वकं भजतां सेवतां -- अनेनचेतस्तत्प्रवणं सेवा इति मानसीस्वरूपमुक्तं -- तेषामेव बुद्धियोगं विपाकदशामापन्नं ददामि येन ते मां पुरुषोत्तमं उप समीप एव प्राप्ता भवन्ति। इत्थं तेषां निर्गुणमुक्तिर्भावितया सूचिता।
Swami Gambirananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Translated the Sanskrit commentaries of Shankara into precise English for modern readers.
10.9 Maccittah, with minds fixed on Me; mad-gata-pranah, with lives (pranas) dedicated to Me, or having their organs, eyes etc. absorbed in Me, i.e. having their organs withdrawn into Me; bodhayantah, enlightening; parasparam, each other; and nityam, always; kathayantah, speaking of; mam, Me, as possessed of alities like knowledge, strength, valour, etc; tusyanti, they derive satisfaction; and ramanti, rejoice, get happiness, as by coming in contact with a dear one.
Swami Adidevananda
20th century CE · Ramakrishna Mission
Ramakrishna Mission monk who translated the Gita Bhasya of Ramanuja into English.
10.9 They live with their minds 'focussed' on Me, namely, with their minds fixed on Me; with their 'Pranas', i.e., life, centred on Me - the meaning is that they are unable to sustain themselves without Me. They 'inspire one another' by speaking about My attributes which have been experienced by them and narrating My divine and adorable deeds. They live in contentment and bliss at all times. The speakers are delighted by their own speech, because it is spontaneous, without any ulterior motive; the listeners too feel the speech to be unsurpassingly and incomparably dear to them. They thus live in bliss.
Frequently Asked Questions
What is Shankaracharya's commentary on BG 10.9?
,मच्चित्ताः? मयि चित्तं येषां ते मच्चित्ताः? मद्गतप्राणाः मां गताः प्राप्ताः चक्षुरादयः प्राणाः येषां ते मद्गतप्राणाः? मयि उपसंहृतकरणाः इत्यर्थः। अथवा? मद्गतप्राणाः मद्गतजीवनाः इत्येतत्। बोधयन्तः अवगमयन्तः परस्परम् अन्योन्यम्? कथयन्तश्च ज्ञानबलवीर्यादिधर्मैः विशिष्टं माम्? तुष्यन्ति च परितोषम् उपयान्ति च रमन्ति च रतिं च प्राप्नुवन्ति प्रियसंगत्येव।।ये यथोक्तैः प्रकारैः भजन्ते मां भक्ताः सन्तः --,
How many scholars have commented on this verse?
VaniSagar presents 19 authoritative commentaries on Bhagavad Gita 10.9, representing Advaita, Vishishtadvaita, Dvaita, Shuddhadvaita, Kashmir Shaivism, and modern Neo-Vedantic traditions.
Which commentary is best for a beginner?
For beginners, Swami Chinmayananda's and Swami Sivananda's commentaries are most accessible, written in clear modern English. For serious scholarly study, Sri Shankaracharya's commentary is the gold standard.