Preserving the eternal wisdom of all sacred traditions — 100% ad-free & open-source.
Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः

अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ। — VaniSagar

Global Translations

Wisdom transcends borders. Statically translated into 133 world languages.

GujaratiIND

મૂળાક્ષરોના અક્ષરોમાં, હું અક્ષર 'A' અને સંયોજનોમાં દ્વિ છું. હું ખરેખર અખૂટ અને શાશ્વત સમય છું; હું કર્મોનાં ફળનો વિતરક છું, ચારે દિશામાં મુખ ધરાવનાર છું.

MarathiIND

वर्णमालेतील अक्षरांमध्ये मी 'अ' अक्षर आहे आणि संयुगांमध्ये द्वैत आहे. मी खरोखरच अक्षय आणि शाश्वत काळ आहे; मी कर्मांचे फळ देणारा आहे, सर्व दिशांना मुखे आहेत.

KonkaniIND

वर्णमाळेच्या अक्षरांमदीं हांव ‘अ’ अक्षर आनी संयुगांमदीं द्वैत. हांव खरेंच अक्षय आनी सासणाचो काळ; सगळ्या दिकांनी मुखामळ आशिल्लो कर्म फळांचो वितरक हांव.

AssameseIND

বৰ্ণমালাৰ আখৰৰ ভিতৰত মই 'ক' আখৰ আৰু যৌগসমূহৰ মাজত দ্বৈত। মই সঁচাকৈয়ে অক্ষয় আৰু চিৰন্তন সময়; মই কৰ্মৰ ফলৰ বিতৰণকাৰী, সকলো দিশতে মুখ থকা।

BhojpuriIND

वर्णमाला के अक्षरन में हम ‘क’ अक्षर आ समास के बीच द्वैत हईं. हम सचमुच अक्षय आ अनन्त समय हईं; हम कर्म के फल के वितरक हईं, चारो ओर चेहरा वाला।

MalayalamIND

അക്ഷരമാലയിലെ അക്ഷരങ്ങളിൽ, ഞാൻ 'എ' എന്ന അക്ഷരവും സംയുക്തങ്ങൾക്കിടയിൽ ദ്വിതീയവുമാണ്. തീർച്ചയായും ഞാൻ അക്ഷയവും ശാശ്വതവുമായ സമയമാണ്; എല്ലാ ദിക്കുകളിലും മുഖമുള്ള ഞാൻ കർമ്മഫലങ്ങളുടെ വിതരണക്കാരനാണ്.

BengaliIND

বর্ণমালার অক্ষরগুলির মধ্যে আমি অক্ষর 'A' এবং যৌগগুলির মধ্যে দ্বৈত। আমি সত্যই অক্ষয় এবং চিরস্থায়ী সময়; আমি কর্মের ফল প্রদানকারী, সমস্ত দিকে মুখ আছে।

TeluguIND

వర్ణమాలలోని అక్షరాలలో, నేను అక్షరం 'A' మరియు సమ్మేళనాలలో ద్వంద్వ. నేను నిజంగా తరగని మరియు శాశ్వతమైన సమయం; నేను అన్ని దిశలలో ముఖాలు కలిగి, కర్మల ఫలాలను పంచేవాడిని.

KannadaIND

ವರ್ಣಮಾಲೆಯ ಅಕ್ಷರಗಳಲ್ಲಿ, ನಾನು 'A' ಅಕ್ಷರ ಮತ್ತು ಸಂಯುಕ್ತಗಳ ನಡುವೆ ದ್ವಿಗುಣ. ನಾನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಅಕ್ಷಯ ಮತ್ತು ಶಾಶ್ವತ ಸಮಯ; ನಾನು ಎಲ್ಲಾ ದಿಕ್ಕುಗಳಲ್ಲಿಯೂ ಮುಖಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿರುವ ಕ್ರಿಯೆಗಳ ಫಲವನ್ನು ವಿತರಿಸುವವನು.

SindhiIND

الفابيٽ جي اکرن ۾ مان اکر آھيان ۽ مرکبات ۾ دوئي. مان سچ پچ ته نه ختم ٿيندڙ ۽ دائمي وقت آهيان. مان عملن جي ميوي جو ورهائيندڙ آهيان، جن جا منهن هر طرف آهن.

PunjabiIND

ਵਰਣਮਾਲਾ ਦੇ ਅੱਖਰਾਂ ਵਿੱਚੋਂ, ਮੈਂ ਅੱਖਰ 'ਏ' ਅਤੇ ਮਿਸ਼ਰਣਾਂ ਵਿੱਚ ਦੋਹਰਾ ਹਾਂ। ਮੈਂ ਸੱਚਮੁੱਚ ਅਮੁੱਕ ਅਤੇ ਸਦੀਵੀ ਸਮਾਂ ਹਾਂ; ਮੈਂ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਫਲ ਦਾ ਵਿਵਹਾਰਕ ਹਾਂ, ਸਾਰੇ ਦਿਸ਼ਾਵਾਂ ਵਿੱਚ ਚਿਹਰੇ ਵਾਲੇ ਹਾਂ।

NepaliIND

वर्णमालाका अक्षरहरूमध्ये म अक्षर 'ए' र यौगिकहरूमा द्वैध हुँ। म साँच्चै अपरिहार्य र अनन्त समय हुँ; म कर्मफलको प्रवक्ता हुँ, चारै दिशामा मुख भएको छु।

Sacred Commentaries

Explore timeless interpretations from the world's most revered scripture scholars.

Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'अक्षराणामकारोऽस्मि'--वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यञ्जन--दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

अक्षरोंमें -- वर्णोंमें अकार -- अ वर्ण मैं हूँ। समास -- समूहमें द्वन्द्व नामक समास मैं हूँ तथा मैं ही अविनाशी काल -- जो क्षणघड़ी आदि नामोंसे प्रसिद्ध है वह समय? अथवा कालका भी काल परमेश्वर हूँ और मैं ही विधाता -- सब जगत्के कर्मफलका विधान करनेवाला तथा सब ओर मुखवाला परमात्मा हूँ।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

सर्वहरशब्दस्य मुख्यमर्थान्तरमाह -- अथवेति। भाविकल्याणानामित्युक्तमेव स्पष्टयति -- उत्कर्षेति। कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता ख्यातिः। श्रीर्लक्ष्मीः? कान्तिः शोभा? वाग्वाणी सर्वस्य प्रकाशिका? स्मृतिश्चिरानुभूतस्मरणशक्तिः? मेधा ग्रन्थधारणशक्तिः? धृतिर्धैर्यम्? क्षमा मानापमानयोरविकृतचित्तता। स्त्रीषु कीर्त्यादीनामुत्तमत्वमुपपादयति -- यासामिति।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

अक्षराणामकारोर्णोऽस्मिअकारो वै सर्वा वाक्?आकारो स्यात् इत्युक्तेः। सामासिकस्याव्ययीभावतत्पुरुषबहुब्रीहिद्वन्द्वसमाससमुदायस्य द्वन्द्वः समासोऽस्मि। तस्योभयपदप्रधानत्वेन श्रेष्ठत्वात्। ननु सममेकत्र आसनं समासो विदुषां वा गुरुशिष्याणां वा मन्त्रार्थ कतार्थं वा एकत्रावस्थानं तत्र विदितमर्थजातं सामासिकं चातुर्थिकष्ठक्।ठस्येकः इतीकादेशः।यस्येति च इत्यलोपः। तस्य मध्ये द्वन्द्वो रहस्योर्थोऽहंद्वन्द्वं रहस्य -- इति सूत्रे द्वन्दव्शब्दस्य रहस्यवाचित्वं शाब्दिकप्रसिद्धमिति भाष्कारैः कुतो न व्याख्यातमितिचेत् समासशब्दस्याव्यायीभावादौ द्वन्द्वशब्दस्य द्वन्द्वसमा्से च योगरुढेः केवलं योगापेक्षया प्रबलत्वात् प्रकृते द्वन्द्वशब्दस्य पंस्त्वेन निर्देशात्। अक्षराणाभकारोऽस्मीतिसमभिव्याहाराच्चेति गृहाण। अन्यथाक्षाराणांअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति?प्राणा वै सत्यम् इत्यादिनाऽक्षयत्वेन प्रतिपादितानां न करोतीत्यकारः कर्तृत्वादिवर्जितः परमात्माहं तस्य परमार्थसत्यत्वात्। यद्वाक्षराणां व्यापकानां करोतीति करः कर एव कारः स्वार्थकः प्रज्ञाद्यण्प्रत्ययः नकोरोऽकारः आकाशोऽहम्। एकत्र रणभूमौ आसनमासोऽवस्थानं तत्र भवं युद्धजातं सामासिकं तस्य मध्ये द्वन्द्वः द्वन्द्वयुद्धमहं इत्यादि आकाशोऽहम्। एकत्र रणभूमौ आसनमासोऽवस्थानं तत्र भवं युद्धजातं सामासिकं तस्य मध्ये द्वन्द्वः द्वन्द्वयुद्धमहं इत्यादि यत्किंचित्कल्पयितुं शक्यम्। तस्मादाचार्योक्तमेव सम्यक् इति दिक्। अक्षयः क्षयवर्जितः कालोऽहमेव। यद्वा कालस्यापि कालः परमेस्वरोऽहमेव। फलदातृृणां मध्ये सर्वस्य विश्वस्य कर्मफलस्य विधाता सर्वतोमुखोऽहमेवेत्यर्थः।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
akṣharāṇāmamongst all letters
akāraḥ
asmiI am
dvandvaḥthe dual
sāmāsikasyaamongst grammatical compounds
chaand
ahamI
evaonly
akṣhayaḥendless
kālaḥtime
dhātāamongst the creators
ahamI
viśhwataḥmukhaḥ
आगे पढ़ें

Related Shloks

Bhagavad Gita · 10.32
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्

हे अर्जुन ! सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका(तत्त्व-निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.34
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा

सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उभ्दव मैं हूँ तथा स्त्री-जातिमें कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मैं हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 33
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 33
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः

अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ। — VaniSagar

Shlokify.inWISDOM FOR THE MODERN SOUL

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 33 का हिंदी अर्थ: "अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 33?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 33 translates to: "Among the letters of the alphabet, I am the letter 'A' and the dual among compounds. I am verily the inexhaustible and everlasting time; I am the dispenser of the fruits of actions, having faces in all directions. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 33 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33||" mean in English?

"अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: || 33||" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 33. Among the letters of the alphabet, I am the letter 'A' and the dual among compounds. I am verily the inexhaustible and everlasting time; I am the dispenser of the fruits of actions, having faces in all directions. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.