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Adhyay 10, Shlok 3
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते

जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar

Global Translations

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OdiaIND

ଯିଏ ମୋତେ ଅବିନାଶ ଏବଂ ଆରମ୍ଭହୀନ, ଜଗତର ମହାନ ପ୍ରଭୁ ଭାବରେ ଜାଣନ୍ତି, ସେ ମର୍ତ୍ତ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅବହେଳିତ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପାପରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇଲେ |

KannadaIND

ಯಾರು ನನ್ನನ್ನು ಜನ್ಮರಹಿತನೆಂದು ಮತ್ತು ಆದಿರಹಿತನೆಂದು, ಲೋಕಗಳ ಶ್ರೇಷ್ಠ ಭಗವಂತನೆಂದು ತಿಳಿಯುವನೋ, ಅವನು ಮರ್ತ್ಯರಲ್ಲಿ ಭ್ರಮೆಯಿಲ್ಲದವನಾಗಿರುತ್ತಾನೆ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಪಾಪಗಳಿಂದ ಮುಕ್ತನಾಗಿದ್ದಾನೆ.

NepaliIND

जसले मलाई अजन्मा र अनादि, जगतको महान् भगवानको रूपमा जान्दछ, उहाँ नश्वरहरूमा मोहरहित र सबै पापहरूबाट मुक्त हुन्छ।

TeluguIND

నన్ను జన్మరహితుడను, ఆదిరహితుడను, లోకములకు గొప్ప ప్రభువుగా ఎరిగినవాడు, మృత్యువులలో భ్రాంతి లేనివాడు మరియు సర్వపాపములనుండి విముక్తుడు.

TamilIND

எவன் என்னை பிறப்பற்றவனாகவும், ஆரம்பமில்லாதவனாகவும், உலகங்களுக்குப் பெரியவனாகவும் அறிகிறானோ, அவன் மனிதர்களில் மாயையற்றவனாகவும், எல்லாப் பாவங்களிலிருந்தும் விடுதலை பெற்றவனாகவும் இருக்கிறான்.

BengaliIND

যিনি আমাকে অজাত ও অনাদি, জগতের মহান প্রভু হিসাবে জানেন, তিনি মরণশীলদের মধ্যে ভ্রান্ত এবং সমস্ত পাপ থেকে মুক্ত হন।

GujaratiIND

જે મને અજન્મા અને અનાદિ રૂપે જાણે છે, જગતના મહાન ભગવાન તરીકે જાણે છે, તે નશ્વર લોકોમાં અસ્પષ્ટ છે અને તે બધા પાપોથી મુક્ત છે.

MarathiIND

जो मला अजन्मा आणि अनादि म्हणून जगाचा महान स्वामी म्हणून जाणतो, तो नश्वरांमध्ये मोहमुक्त होतो आणि सर्व पापांपासून मुक्त होतो.

PunjabiIND

ਜੋ ਮੈਨੂੰ ਅਜੰਮੇ ਅਤੇ ਅਨਾਦਿ, ਸੰਸਾਰ ਦੇ ਮਹਾਨ ਸੁਆਮੀ ਦੇ ਰੂਪ ਵਿੱਚ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਪ੍ਰਾਣੀਆਂ ਵਿੱਚ ਮੋਹ ਰਹਿਤ ਅਤੇ ਸਾਰੇ ਪਾਪਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।

SindhiIND

جيڪو مون کي اڻ ڄاول ۽ بي ابتداءَ طور ڄاڻي ٿو، دنيا جي عظيم رب جي حيثيت ۾، انسانن ۾، اهو بيڪار آهي ۽ سڀني گناهن کان آزاد آهي.

MalayalamIND

എന്നെ ജനിക്കാത്തവനും ആദിയില്ലാത്തവനുമായി അറിയുന്നവൻ, ലോകങ്ങളുടെ മഹാനായ നാഥനെന്ന നിലയിൽ, അവൻ മർത്യന്മാരിൽ തെറ്റില്ലാത്തവനും എല്ലാ പാപങ്ങളിൽ നിന്നും മോചിതനുമാണ്.

AssameseIND

যি মোক অজন্ম আৰু অনাদি বুলি জানে, জগতৰ মহান প্ৰভু হিচাপে, তেওঁ মৰ্ত্যলোকৰ মাজত অমোহ আৰু সকলো পাপৰ পৰা মুক্ত।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या --'यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्'-- पीछेके श्लोकमें भगवान्के प्रकट होनेको जाननेका विषय नहीं बताया है। इस विषयको तो मनुष्य भी नहीं जानता, पर जितना जाननेसे मनुष्य अपना कल्याण कर ले, उतना तो वह जान ही सकता है। वह जानना अर्थात् मानना यह है कि भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित हैं। वे अनादि हैं अर्थात् यह जो काल कहा जाता है, जिसमें आदि-अनादि शब्दोंका प्रयोग होता है, भगवान् उस कालके भी काल हैं। उन कालातीत भगवान्में कालका भी आदि और अन्त हो जाता है। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके महान् ईश्वर हैं अर्थात् स्वर्ग, पृथ्वी और पातालरूप जो त्रिलोकी है तथा उस त्रिलोकीमें जितने प्राणी हैं और उन प्राणियोंपर शासन करनेवाले (अलग-अलग अधिकार-प्राप्त) जितने ईश्वर (मालिक) हैं, उन सब ईश्वरोंके भी महान् ईश्वर भगवान् हैं। इस प्रकार जाननेसे अर्थात् श्रद्धा-विश्वासपूर्वक दृढ़तासे माननेसे मनुष्यको भगवान्के अज, अविनाशी और लोकमहेश्वर होनेमें कभी किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं होता।

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Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

तथा --, क्योंकि मैं महर्षियोंका और देवोंका आदिकारण हूँ? मेरा आदि दूसरा कोई नहीं है? इसलिये मैं अजन्मा और अनादि हूँ। अनादित्व ही जन्मरहित होनेमें कारण है। इस प्रकार जो मुझे जन्मरहित अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यसे रहित ( जाग्रत? स्वप्न? सुषुप्ति -- इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत ) चतुर्थ अवस्थायुक्त जानता है? वह ( इस प्रकार जाननेवाला ) मनुष्योंमें ज्ञानी है अर्थात् मोहसे रहित श्रेष्ठ पुरुष है और वह जानबूझकर किये हुए या बिना जाने किये हुए सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।

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Sri Anandgiri

इतश्च कश्चिदेव भगवत्प्रभावं वेत्तीत्याह -- किञ्चेति। कोऽसौ प्रभावो भगवतो यं बहवो न विदुरित्यपेक्षायां पारमार्थिकं प्रभावं तद्धीफलं च कथयति -- यो मामिति। पदद्वयापौनरुक्त्यमाह -- अनादित्वमिति।

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Sri Dhanpati

अजत्वेन सर्वभूतमहेश्वरत्वेन च मज्ज्ञानं केषांचिदसंमूढानां सुरादीनां भवति तु एतावानीश्वर प्रभावः इदं परमेश्वरस्य जन्मेत्यतस्तावज्ज्ञानेन केवलं सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते नतु प्रभववर्णने शक्ता भवन्तीत्यतः स्वप्रभवमहमेव वक्ष्यामीत्यभिप्रायेणाह -- य इति। यो मानीश्वरं सर्वकारणं कारणवर्जितमतएवाजमुत्पत्तिरहितं लोकानां महान्तमीश्वरं निरति शयैस्वर्यवन्तं वेत्ति परमात्मानादित्वेनाजः सर्वलोकमहेश्वर इति यो जानाति स मर्त्येषु असंमूढः। संमोहो नाम देहेन्द्रियादिविलक्षण ईश्वरादिभिन्नोऽकर्ताऽभोक्ता चाहमिति स्वस्वरुपास्फुरणं तेन मत्कृपया रहितः सर्वैः ज्ञाताज्ञातै संचितक्रियमाणैः प्रकर्षेणाविद्यानिवृत्तिपूर्वकमुच्यते।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
verseyaḥwho
māmme
ajamunborn
anādimbeginningless
chaand
vettiknow
lokaof the universe
mahāīśhvaram
asammūḍhaḥundeluded
saḥthey
martyeṣhuamong mortals
sarvapāpaiḥ
pramuchyateare freed from
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न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः

मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि; क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ। — VaniSagar

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बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, दम, शम, सुख, दुःख, भव, अभाव, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलग-अलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 3
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यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते

जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 3 का हिंदी अर्थ: "जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 3?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 3 translates to: "He who knows Me as unborn and beginningless, as the great Lord of the worlds, he among mortals is undeluded and is liberated from all sins. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 3 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram" mean in English?

"yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 3. He who knows Me as unborn and beginningless, as the great Lord of the worlds, he among mortals is undeluded and is liberated from all sins. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.