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Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च

हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ। — VaniSagar

Global Translations

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TeluguIND

నేనే, ఓ గుడాకేశా, అన్ని జీవుల హృదయాలలో కూర్చున్నాను; నేనే అన్ని జీవులకు ఆది, మధ్య, అంతం.

TamilIND

நான் தான், ஓ குடகேசா, எல்லா உயிர்களின் இதயங்களிலும் அமர்ந்திருக்கிறேன்; எல்லா உயிர்களின் தொடக்கமும், நடுவும், முடிவும் நானே.

MalayalamIND

ഹേ ഗുഡകേശേ, എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളുടെയും ഹൃദയങ്ങളിൽ ഇരിക്കുന്ന ഞാനാണ് ഞാൻ. എല്ലാ ജീവജാലങ്ങളുടെയും ആരംഭവും മധ്യവും അവസാനവും ഞാനാണ്.

GujaratiIND

હે ગુડાકેસ, સર્વ જીવોના હ્રદયમાં બેઠેલો હું સ્વયં છું; હું સર્વ જીવોનો આરંભ, મધ્ય અને અંત છું.

KannadaIND

ನಾನು ಸ್ವಯಂ, ಓ ಗುಡಾಕೇಶ, ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಹೃದಯದಲ್ಲಿ ಕುಳಿತಿದ್ದೇನೆ; ನಾನು ಎಲ್ಲಾ ಜೀವಿಗಳ ಆದಿ, ಮಧ್ಯ ಮತ್ತು ಅಂತ್ಯ.

DogriIND

मैं आत्म ही गुडाकेस, सारे जीवां दे दिल विच बैठा हां; मैं सारे जीवां दा आरंभ, मध्ध ते अन्त हां।

MaithiliIND

हम स्वयं छी गुडाकेस, सब प्राणीक हृदय मे बैसल; हम सब प्राणीक आरम्भ, मध्य आ अन्त छी।

ManipuriIND

ꯑꯩꯗꯤ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯀꯤ ꯊꯝꯃꯣꯌꯗꯥ ꯐꯝꯂꯤꯕꯥ ꯑꯥꯠꯃꯥꯅꯤ, ꯍꯦ ꯒꯨꯗꯥꯀꯦꯁ; ꯑꯩꯗꯤ ꯖꯤꯕ ꯄꯨꯝꯅꯃꯛꯀꯤ ꯍꯧꯔꯀꯐꯝ, ꯃꯔꯛꯇꯥ ꯑꯃꯁꯨꯡ ꯑꯔꯣꯏꯕꯅꯤ꯫

BhojpuriIND

हम आत्म हईं हे गुडाकेस, सब जीव के हृदय में बइठल; हम सब जीव के आरंभ, मध्य आ अंत हईं।

SindhiIND

مان پاڻ آهيان، اي گودڪيسا، سڀني جاندارن جي دلين ۾ ويٺو آهي. مان سڀني مخلوقات جي شروعات، وچ ۽ پڇاڙي آهيان.

KonkaniIND

सगळ्या प्राण्यांच्या काळजांत बसल्लो आत्मो गुडाकेस; सगळ्या प्राण्यांचो आरंभ, मध्य आनी शेवट हांव.

BengaliIND

আমি স্বয়ং, হে গুদাকেশ, সমস্ত প্রাণীর হৃদয়ে উপবিষ্ট; আমিই সমস্ত প্রাণীর আদি, মধ্য এবং শেষ।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--[भगवान्का चिन्तन दो तरहसे होता है-- (1) साधक अपना जो इष्ट मानता है, उसके सिवाय दूसरा कोई भी चिन्तन न हो। कभी हो भी जाय तो मनको वहाँसे हटाकर अपने इष्टदेवके चिन्तनमें ही लगा दे; और (2) मनमें सांसारिक विशेषताको लेकर चिन्तन हो, तो उस विशेषताको भगवान्की ही विशेषता समझे। इस दूसरे चिन्तनके लिये ही यहाँ विभूतियोंका वर्णन है। तात्पर्य है कि किसी विशेषतोको लेकर जहा-कहीं वृत्ति जाय, वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये, उस वस्तु-व्यक्तिका नहीं। इसीके लिये भगवान् विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं।] 'अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च '-- यहाँ भगवान्ने अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका सार कहा है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। यह नियम है कि जो वस्तु उत्पत्ति-विनाशशील होती है, उसके आरम्भ और अन्तमें जो तत्त्व रहता है, वही तत्त्व उसके मध्यमें भी रहता है (चाहे दीखे या न दीखे) अर्थात् जो वस्तु जिस तत्त्वसे उत्पन्न होती है और जिसमें लीन होती है, उस वस्तुके आदि, मध्य और अन्तमें (सब समयमें) वही तत्त्व रहता है। जैसे, सोनेसे बने गहने पहले सोनारूप होते हैं और अन्तमें (गहनोंके सोनेमें लीन होनेपर) सोनारूप ही रहते हैं तथा बीचमें भी सोनारूप ही रहते हैं। केवल नाम, आकृति, उपयोग, माप, तौल आदि अलग-अलग होते हैं; और इनके अलगअलग होते हुए भी गहने सोना ही रहते हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी आदिमें भी परमात्मस्वरूप थे और अन्तमें लीन होनेपर भी परमात्मस्वरूप रहेंगे तथा मध्यमें नाम, रूप, आकृति, क्रिया, स्वभाव आदि अलग-अलग होनेपर भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप ही हैं -- यह बतानेके लिये ही यहाँ भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें कहा है।भगवान्ने विभूतियोंके इस प्रकरणमें आदि, मध्य और अन्तमें -- तीन जगह साररूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। पहले इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ बीचके बत्तीसवें श्लोकमें कहा कि सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ;' और अन्तके उनतालीसवें श्लोकमें कहा कि 'सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है, वह मैं ही हूँ क्योंकि मेरे बिना कोई भी चर-अचर प्राणी नहीं है। चिन्तन करनेके लिये यही विभूतियोंका सार है। तात्पर्य यह है कि किसी विशेषता आदिको लेकर जो विभूतियाँ कही गयी हैं, उन विभूतियोंके अतिरिक्त भी जो कुछ दिखायी दे, वह भी भगवान्की ही विभूति है -- यह बतानेके लिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें विद्यमान कहा है। तत्त्वसे सब कुछ परमात्मा ही है -- 'वासुदेवः सर्वम्'-- इस लक्ष्यको बतानेके लिये ही विभूतियाँ कही गयी हैं। इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंमें जो आत्मा है, जीवोंका जो स्वरूप है, उसको अपनी विभूति बताया है। फिर बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने सृष्टिरूपसे अपनी विभूति बतायी कि जो जड-चेतन, स्थावर-जङ्गम सृष्टि है, उसके आदिमें 'मैं एक ही बहुत रूपोंमें हो जाऊँ' ('बहु स्यां प्रजायेयेति' छान्दोग्य0 6। 2। 3) --ऐसा संकल्प करता हूँ और अन्तमें मैं ही शेष रहता हूँ--'शिष्यते शेषसंज्ञः' (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। अतः बीचमें भी सब कुछ मैं ही हूँ -- 'वासुदेवः सर्वम्' (गीता 7। 19) 'सदसच्चाहमर्जुन' (गीता 9। 19 ); क्योंकि जो तत्त्व आदि और अन्तमें होता है, वही तत्त्व बीचमें होता है। अन्तमें उन्तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बीज-(कारण-) रूपसे अपनी विभूति बतायी कि मैं ही सबका बीज हूँ, मेरे बिना कोई भी प्राणी नहीं है। इस प्रकार इन तीन जगह--तीन श्लोकोंमें मुख्य विभूतियाँ बतायी गयी हैं और अन्य श्लोकोंमें जो समुदायमें मुख्य हैं, जिनका समुदायपर आधिपत्य है, जिनमें कोई विशेषता है, उनको लेकर विभूतियाँ बतायी गयी हैं। परन्तु साधकको चाहिये कि वह इन विभूतियोंकी महत्ता, विशेषता, सुन्दरता, आधिपत्य आदिकी तरफ खयाल न करे, प्रत्युत ये सब विभूतियाँ भगवान्से ही प्रकट होती हैं, इनमें जो महत्ता आदि है, वह केवल भगवान्की है; ये विभूतियाँ भगवत्स्वरूप ही हैं-- इस तरफ खयाल रखे। कारण कि अर्जुनका प्रश्न भगवान्के चिन्तनके विषयमें है (10। 17), किसी वस्तु, व्यक्तिके चिन्तनके विषयमें नहीं।

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Sri Harikrishnadas Goenka

उनमें तू पहली विभूतिको ही सुन --, गुडाका -- निद्रा उसका स्वामी यानी निद्राजयी होनेके कारण अथवा घनकेश होनेके कारण अर्जुनका नाम गुडाकेश है। हे गुडाकेश समस्त भूतोंके आशयमें यानी आन्तरिक हृदयदेशमें स्थित सबका अन्तरात्मा मैं हूँ ( ऊँचे अधिकारियोंको तो ) मेरा ध्यान सदा इस प्रकार करना चाहिये। परंतु जो ऐसा ध्यान करनेमें असमर्थ हों उन्हें आगे कहे हुए भावोंमें मेरा चिन्तन करना चाहिये? अर्थात् उनके द्वारा ( इन अगले भावोंमें ) मेरा चिन्तन किया जा सकता है क्योंकि मैं ही सब भूतोंका आदि? मध्य और अन्त हूँ अर्थात् उनकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलयरूप मैं ही हूँ।

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Sri Anandgiri

विभूतिप्रदर्शने प्रस्तुते सत्यादावेव पारमार्थिकं पारमेश्वरं रूपं दर्शयितुं श्रोतुरर्जुनस्य मनःसमाधानार्थं यतते -- तत्रेति। सोपाधिकमपि काल्पनिकं परस्य रूपं पश्चाद्वक्ष्यमाणं श्रोतुं चित्तसमाधानं कर्तव्यमेवेत्याह -- तावदिति। आशेरतेऽस्मिन्विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञा इत्याशयो हृदयं सर्वेषां भूतानां हृदयेऽन्तःस्थितो,यः प्रत्यगात्मा सोऽहमेवेति वाक्यार्थमाह -- सर्वेषामिति। यस्तु मन्दो मध्यमो वा परमात्मानमात्मत्वेन ध्यातुं नालं तं प्रत्याह -- तदशक्तेनेति। वक्ष्यमाणादित्यादिषु परस्य न ध्येयत्वमन्यदेव कारणं किंचित्तत्र तत्र ध्येयमित्याशङ्क्याह -- यस्मादिति। सर्वकारणत्वेन सर्वज्ञत्वेन सर्वेश्वरत्वेन च परस्य ध्येयत्वमत्रेप्सितं नान्यस्य कस्यचित्कारणस्यादित्यादिषु ध्येयतेत्यर्थः।

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Sri Dhanpati

योगं विभूतिं च कथयेति त्वया पृष्टं तत्र प्रथमं तावन्मदीयं योगं श्रुणु। अहं वासुदेव आत्मा प्रत्यगात्मा सर्वेषां भूतानामाशयेऽन्तःकरणे स्थितः। एतज्जिताज्ञाननिद्रैरेव ज्ञातव्यमिति द्योतयन् संबोधयति -- हे गुडाकेशेति। एतदशक्तस्याह। अहमादिः कारणं भूतानां मध्यः स्थितिरन्तः प्रलयश्च। तथाच सर्वभूतान्तरात्मत्वेन ध्यातुमशक्तेनोत्पत्त्यादिकर्तृत्वेनाहं ध्येय इत्याशयः।

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Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
ahamI
ātmāsoul
guḍākeśhaArjun, the conqueror of sleep
sarvabhūta
āśhayasthitaḥ
ahamI
ādiḥthe beginning
chaand
madhyammiddle
chaand
bhūtānāmof all beings
antaḥend
evaeven
chaalso
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Related Shloks

Bhagavad Gita · 10.19
श्री भगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे

श्रीभगवान् बोले -- हाँ, ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे (संक्षेपसे) कहूँगा; क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ ! मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.21
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी

मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु (वामन) और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ। मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 20
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च

हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 20 का हिंदी अर्थ: "हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 20?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 20 translates to: "I am the Self, O Gudakesa, seated in the hearts of all beings; I am the beginning, the middle, and the end of all beings. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 20 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ" mean in English?

"aham ātmā guḍākeśha sarva-bhūtāśhaya-sthitaḥ" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 20. I am the Self, O Gudakesa, seated in the hearts of all beings; I am the beginning, the middle, and the end of all beings. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.