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Sudarshana Chakra
Adhyay 10, Shlok 18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्

हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। — VaniSagar

Global Translations

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KannadaIND

ಓ ಕೃಷ್ಣಾ, ನಿನ್ನ ಯೋಗಶಕ್ತಿ ಮತ್ತು ಮಹಿಮೆಯ ಬಗ್ಗೆ ಮತ್ತೊಮ್ಮೆ ವಿವರವಾಗಿ ಹೇಳು; ಯಾಕಂದರೆ ನಿನ್ನ ಪ್ರಾಣ ಕೊಡುವ ಮತ್ತು ಅಮೃತದಂತಹ ಮಾತನ್ನು ಕೇಳಿದ್ದಕ್ಕೆ ನನಗೆ ತೃಪ್ತಿಯಿಲ್ಲ.

PunjabiIND

ਹੇ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ, ਆਪਣੀ ਯੋਗ ਸ਼ਕਤੀ ਅਤੇ ਮਹਿਮਾ ਬਾਰੇ ਮੈਨੂੰ ਦੁਬਾਰਾ ਵਿਸਥਾਰ ਨਾਲ ਦੱਸੋ; ਕਿਉਂਕਿ ਮੈਂ ਤੁਹਾਡੇ ਜੀਵਨ-ਦਾਇਕ ਅਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਵਰਗੀ ਬਾਣੀ ਸੁਣ ਕੇ ਰੱਜਿਆ ਨਹੀਂ।

MarathiIND

हे कृष्णा, मला पुन्हा एकदा सविस्तर सांगा, तुझ्या योगशक्ती आणि वैभवाबद्दल; कारण मी तुझे जीवनदायी आणि अमृततुल्य वाणी ऐकून तृप्त झालो नाही.

GujaratiIND

હે કૃષ્ણ, તમારી યોગશક્તિ અને મહિમા વિશે મને ફરીથી વિગતવાર કહો; કારણ કે તમારી જીવનદાયી અને અમૃત સમાન વાણી મેં સાંભળી છે તેનાથી હું તૃપ્ત થયો નથી.

NepaliIND

हे कृष्ण, आफ्नो योग शक्ति र महिमाको बारेमा मलाई फेरि विस्तारमा भन्नुहोस्; किनकि तिम्रो जीवनदायी र अमृतमय वाणी सुनेर म तृप्त छैन।

OdiaIND

ହେ କୃଷ୍ଣ, ତୁମର ଯୋଗ ଶକ୍ତି ଏବଂ ଗ glory ରବ ବିଷୟରେ ମୋତେ ପୁନର୍ବାର ବିସ୍ତୃତ ଭାବରେ କୁହ; କାରଣ ମୁଁ ତୁମର ଜୀବନ ପ୍ରଦାନକାରୀ ଏବଂ ଅମୃତଭଣ୍ଡା ପରି ବକ୍ତବ୍ୟ ବିଷୟରେ ଯାହା ଶୁଣିଛି, ସେଥିରେ ମୁଁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ନୁହେଁ |

MalayalamIND

കൃഷ്ണാ, നിൻ്റെ യോഗശക്തിയെയും മഹത്വത്തെയും കുറിച്ച് എന്നോട് വീണ്ടും വിശദമായി പറയുക. എന്തെന്നാൽ, നിൻ്റെ ജീവദായകവും അമൃത് പോലുള്ള സംസാരവും ഞാൻ കേട്ടതിൽ എനിക്ക് തൃപ്തിയില്ല.

BengaliIND

হে কৃষ্ণ, তোমার যোগশক্তি ও মহিমা আমাকে আবার বিস্তারিতভাবে বলুন; কেননা তোমার জীবনদানকারী ও অমৃততুল্য কথা শুনে আমি তৃপ্ত হই না।

TamilIND

கிருஷ்ணா, உனது யோக ஆற்றலையும் மகிமையையும் பற்றி மீண்டும் விரிவாகச் சொல்; ஏனென்றால், உனது உயிரைக் கொடுக்கும், அமிர்தம் போன்ற பேச்சைக் கேட்டதில் நான் திருப்தி அடையவில்லை.

TeluguIND

ఓ కృష్ణా, నీ యోగ శక్తి మరియు మహిమ గురించి వివరంగా మళ్ళీ చెప్పు; ఎందుకంటే నీ ప్రాణాధారమైన మరియు అమృతం లాంటి ప్రసంగం గురించి నేను విన్న దానితో నేను సంతృప్తి చెందలేదు.

SindhiIND

مون کي وري تفصيل سان ٻڌاءِ، اي ڪرشنا، تنهنجي يوگڪ طاقت ۽ شان جي؛ ڇالاءِ⁠جو مان تنھنجي حياتي بخشيندڙ ۽ امرت جھڙي ڳالھ ٻُڌي اُن سان مطمئن نه آھيان.

BhojpuriIND

हे कृष्ण, आपन योग शक्ति आ महिमा के बारे में फेरु विस्तार से बताईं; काहे कि तोहरा जीवनदायी आ अमृत नियर भाषण के बारे में जवन सुनले बानी ओकरा से हम तृप्त नइखीं।

Sacred Commentaries

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Scripture Scholar

Swami Ramsukhdas

व्याख्या--'विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन'--भगवान्ने सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानका विषय खूब कह दिया। इतना कहनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई, इसलिये दसवाँ अध्याय अपनी ओरसे ही कहना शुरू कर दिया। भगवान्ने दसवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए कहा कि 'तू फिर मेरे परम वचनको सुन।'

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Harikrishnadas Goenka

हे जनार्दन अपने योगको -- अपनी योगैश्वर्यरूप विशेष शक्तिको और विभूतिको यानी चिन्तन करनेयोग्य पदार्थोंके विस्तारको? विस्तारपूर्वक कहिये। गमन जिसका कर्म है ऐसी अर्द धातुका रूप जनार्दन है। असुरोंको यानी देवोंके प्रतिपक्षी मनुष्योंको नरकादिमें भेजनेवाले होनेसे भगवान्का नाम जनार्दन है। अथवा उन्नति और कल्याण -- ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रयोजन सब लोगोंके द्वारा भगवान्से माँगे जाते हैं? इसलिये भगवान्का नाम जनार्दन है -- यद्यपि आप पहले कह चुके हैं तो भी फिर कहिये क्योंकि आपके मुखसे निकले हुए वाक्यरूप अमृतको सुनतेसुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है -- संतोष नहीं होता है।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Anandgiri

प्रकृतं प्रश्नमुपसंहरति -- विस्तरेणेति। अर्दतेर्गतिकर्मणो जनार्दनेति रूपम्? तद्व्युत्पादयति -- असुराणामिति। प्रकारान्तरेण शब्दार्थं व्युत्पादयति -- अभ्युदयेति। ननु पूर्वमेव सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्वर्यं चेश्वरस्य दर्शितं तत्किमिति श्रोतुमिष्यते तत्राह -- भूय इति। अमृतममृतप्रख्यमित्यर्थः।

VaniSagar Research Vault
Scripture Scholar

Sri Dhanpati

ननु सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्यवर्य च दर्शितं तत्किमिति पुनः पृच्छसि तत्राह -- विस्तरेणेति। स्वस्य योगैश्वर्यशक्तिविशेषं विभूतिं च पूर्वोक्तमपि योगादि भूयो विस्तरेण कथय। हे जनार्दन देवशत्रुजनानां असुराणां प्राणवियोगनरकादिगमयितृत्वातं। तथा चास्मच्छत्रुजनानां रोगद्वेषादीनां नाशनाय ध्येयोगविभूति कथनं तव नामानुरुपत्वाद्योग्यमित्याशयः। यद्वाभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैजनैर्याच्यते इति तथा संबोधयन् ममापि याञ्चा त्वयि युक्तेवेति सूचयति। हि यस्मात्तव वाक्याभृतं श्रृण्वतो मम तृप्तिर्नास्ति। नीरसत्वप्रयुक्ततृप्तिव्यावृत्तयेऽमृतमित्युक्तम्। रसाज्ञानप्रयुक्ततृप्तिव्यावर्तनाय मे लसज्ञस्येत्युक्तम्। उदरे पूर्णेऽभृतेऽप्यलंबुद्धिर्भवतीति तद्य्ववच्छेदाय श्रृण्वत इत्युक्तम्। आकाशात्मकस्य श्रोत्रस्य शब्देन गुणे पूर्णताया असंभवात्तृप्तिर्नास्तीति।

VaniSagar Research Vault

Word-by-Word Lexicon

Original WordContextual Meaning
vistareṇain detail
ātmanaḥyour
yogamdivine glories
vibhūtimopulences
chaalso
janaārdanaShree Krishna, he who looks after the public
bhūyaḥagain
kathayadescribe
tṛiptiḥsatisfaction
hibecause
śhṛiṇvataḥhearing
nanot
astiis
memy
amṛitamnectar
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Bhagavad Gita · 10.17
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया

हे योगिन् ! हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ ? और हे भगवन् ! किन-किन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किन-किन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ ? — VaniSagar

Bhagavad Gita · 10.19
श्री भगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे

श्रीभगवान् बोले -- हाँ, ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे (संक्षेपसे) कहूँगा; क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ ! मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। — VaniSagar

Bhagavad GitaAdhyay 10Shlok 18
Bhagavad Gita · Adhyay 10, Shlok 18
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्

हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। — VaniSagar

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ क्या है?

Bhagavad Gita अध्याय 10 श्लोक 18 का हिंदी अर्थ: "हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। — VaniSagar" यह पावन श्लोक Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga से लिया गया है। जो लोग गीता का दैनिक श्लोक, कर्म योग, और जीवन की कठिनाइयों में मार्गदर्शन खोज रहे हैं, उनके लिए यह श्लोक जीवन के गहरे सत्यों के बारे में शिक्षित करता है। VaniSagar पर इसकी विस्तृत व्याख्या, शब्द-अर्थ और आज का श्लोक (Shloka of the day) उपलब्ध हैं।

What is the meaning and translation of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 18?

Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 18 translates to: "Tell me again in detail, O Krishna, of your yogic power and glory; for I am not satiated with what I have heard of your life-giving and nectar-like speech. — VaniSagar" This verse is highly regarded for those seeking a daily Gita shloka, guidance on karma, depression, success, or daily motivation. In the hinduism tradition, such verses authored by Sacred Wisdom provide essential guidance. Explore the complete word-by-word analysis, translations, and the shloka of the day and motivational Gita quotes for students and life at VaniSagar.

"विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽम" — इस श्लोक का अर्थ और महत्व क्या है?

यह श्लोक Bhagavad Gita अध्याय 10, श्लोक 18 है जो Bhagavad Gita के Vibhuti-Vistara-Yoga में संकलित है। हे जनार्दन ! आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये; क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते-सुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। — VaniSagar Sacred Wisdom द्वारा रचित यह श्लोक hinduism दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और इसे अक्सर 'morning mantra' या शांति के लिए जपा जाता है। पूर्ण अर्थ और व्याकरण-विश्लेषण VaniSagar पर देखें।

What does the mantra "vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana" mean in English?

"vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ cha janārdana" is the opening of Bhagavad Gita Chapter 10 Verse 18. Tell me again in detail, O Krishna, of your yogic power and glory; for I am not satiated with what I have heard of your life-giving and nectar-like speech. — VaniSagar As a core part of the Bhagavad Gita, this verse reflects the wisdom of Sacred Wisdom and the rich hinduism heritage. Perfect for meditation, chanting, or your daily spiritual routine. For a full breakdown of each word and its philosophical context, visit VaniSagar.